
ज़िन्दगी की धूप जब जब मुझे झुलसाने लगती है
मैं तुम्हारे कंधे पे सर रख कर
थोडा सुस्ता लेता हूँ
तुम्हारी नर्म उंगलिया
सुलझाती हैं मेरे उलझे हुए केश
तुम्हारी आँखों में लहरा उठता है एक समुद्र
एक कलि की तरह चटकती है तुम्हारे होठों से
एक श्वेत चंचल मुस्कराहट
फूट पड़ता है झरना
हवाओं में सुगंध भर जाती हैगाल सुर्ख हो जाते हैं तुम्हारे
समय भी गुलाबी हो जाता है
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें