शुक्रवार, 8 नवंबर 2013



ज़िन्दगी की धूप जब जब मुझे झुलसाने लगती है
मैं तुम्हारे कंधे पे सर रख कर 
थोडा सुस्ता  लेता हूँ 
तुम्हारी नर्म उंगलिया 
सुलझाती हैं मेरे उलझे हुए केश
तुम्हारी आँखों में लहरा उठता है एक समुद्र 
एक कलि की तरह चटकती है तुम्हारे होठों से
 एक श्वेत चंचल मुस्कराहट
फूट पड़ता है झरना 
हवाओं में सुगंध भर जाती हैगाल  सुर्ख हो जाते हैं तुम्हारे
समय भी गुलाबी हो जाता है

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