बुधवार, 6 नवंबर 2013

गुनगुनी सी मखमली सी
याद  तेरी
छेड़ जाती है
अकेले में कभी
तो रात भर फिर जागता हूँ

सोचता हूँ मैं तुम्हे क्या याद हूँगा
साथ जो लम्हे बिताये
वो तुम्हे क्या याद होंगे

याद होगी क्या तुम्हे मेरी वो पहली प्रेम पाती
शाम की वो मस्तियाँ सुबहों के वो मीठे तराने याद होंगे

याद होगा क्या तुम्हे
कंधे से मेरे सिर टिकाना
रूठना और मान जाना
मुस्करा कर फिर मुझे ग़ालिब की वो ग़ज़लें सुनाना
याद होगा

सोचता हूँ रात भर और जागता हूँ


गुनगुनी सी मखमली सी
याद  तेरी
छेड़ जाती है
अकेले में कभी
तो रात भर फिर जागता हूँ

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