सोमवार, 4 नवंबर 2013



तुम्हारी उत्तप्त सांसों का ज्वार
जब जब टकराता है 
मेरी कनपटी से
मैं उन्मत्त हो 
पी जाना चाहता हूँ
सारा समुद्र
रोंद डालना चाहता हूँ
समूची पृथ्वी
मसल देना चाहता हूँ
चाँद और सूरज
जकड़ लेता हूँ तुम्हे 
बाँहों के मजबूत घेरे में
और तुम भी समां जाती हो 
मुझमे
सारी सृष्टि समेटे हुए
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