बुधवार, 3 जून 2026

ड्रीम गर्ल

 चंबल की बीहड़ धरती पर शाम जल्दी उतरती है। सूरज जैसे ही टेढ़ा होकर नीचे झुकता, कंटीली झाड़ियां लंबी परछाइयों में बदल जातीं और दूर-दूर तक फैले ऊसर मैदानों में एक अजीब किस्म की उदासी तैरने लगती। हवा में रेत, पसीने और नदी की कच्ची गंध घुली रहती। यही वह इलाका था जहां कभी डाकुओं के नाम से बच्चे चुप करा दिए जाते थे और पुलिस वाले भी बिना वजह जीप रोककर पेशाब करने की हिम्मत नहीं करते थे।

उसी बीहड़ में एक स्कूल था—सरकारी प्राथमिक विद्यालय, पथरिया का पुरा।

नाम बड़ा था, मगर स्कूल दो कमरों की टूटी इमारत भर था। दीवारों पर कभी नीले रंग से लिखे गए नारे अब धूप और बारिश में छिल चुके थे—“शिक्षा का अधिकार, सबका अधिकार।”

नीचे किसी बच्चे ने कोयले से लिख दिया था—“मास्टर जी महीने में चार बार।”

कुछ साल पहले तक यह इलाका चंबल के दस्यु गिरोहों का सुरक्षित अड्डा था। शाम ढलते ही गांव के दरवाजे भीतर से बंद हो जाते। स्कूल भी महीनों बंद पड़ा रहा। खिड़कियों के पल्ले टूट गए, बकरियां भीतर बैठकर जुगाली करने लगीं।

फिर वक्त बदला।

मोबाइल फोन आए। पहले-पहल लोगों ने सोचा खिलौना है। बाद में पुलिस ने समझा कि यही खिलौना डाकुओं के लिए फंदा बनेगा। कहीं कोई कॉल हुई, कहीं लोकेशन मिली, कहीं किसी प्रेमिका ने राज खोल दिया। धीरे-धीरे गिरोह खत्म होने लगे। जो बचे, वे या तो मारे गए या राजनीति में शामिल हो गए।बीहड़ शांत हो गया।और स्कूल फिर से खुल गया।

स्कूल में एक ही शिक्षक थे—हरिराम । बच्चे उन्हें “माट साहब” कहते थे। क्यों कहते थे, किसी को ठीक से पता नहीं। हरिराम इसका कारण कुछ यूं बताते थे कि अंग्रेजों के जमाने में एक होते थे लाट साहब जो कुछ भी कर सकते थे सर्व शक्तिमान थे उसी तरह अब हैं माट साहब इन्हें भी सर्वशक्तिमान समझा जाता है और सरकार यह मानती है कि जो कोई नहीं कर सकता वह माट साहब कर सकता है । इसीलिए ढेर सारे काम उनके जिम्मे होते हैं ।

हरिराम  की उम्र पचास के करीब रही होगी। पेट थोड़ा निकला हुआ, आंखों में स्थायी नींद, होंठों पर हमेशा पान की पीक की लालिमा। वे रोज सुबह दस बजे तक मोटरसाइकिल से स्कूल पहुंचते। मोटरसाइकिल इतनी पुरानी थी कि उसके स्टार्ट होने की आवाज सुनकर गांव के लोग समझा लेते कि माट साब आ गए।

उस दिन भी वे आए।

स्कूल के बरामदे में चार बच्चे बैठे थे। दो बिना चप्पल के। एक लड़की अपने छोटे भाई को गोद में लिए हुए।

“राम-राम माट साहब,” बच्चों ने एक साथ कहा।

“हूं…” माट साब ने जम्हाई लेते हुए जवाब दिया।

उन्होंने मोटरसाइकिल खड़ी की, थैले से एक पुराना तौलिया निकाला और बरामदे में पड़ी टूटी कुर्सी पर धम्म से बैठ गए।

“कितने आए हैं आज?”

“सात,” सबसे बड़े लड़के रामकेश ने कहा।

“बाकी?”

पिलिया खेल रहे… ।”

माट साहब ने सिर हिलाया जैसे देश की अर्थव्यवस्था पर गंभीर चिंतन कर रहे हों। फुसफुसाते हुए  कहा पूरा देश पिलिया खेल रहा है । फिर तेज स्वर में बोले —“चलो, पहाड़ा सुनाओ।”

“दो दूनी चार, दो तिया छह…”बच्चे सुर में चिल्लाने लगे।

माट साब ने जेब से मोबाइल निकाला। नेटवर्क नहीं था। उन्होंने बिना देखे ही वीडियो चला दिया। पिछली रात डाउनलोड की हुई पुरानी फिल्म थी—धर्मेंद्र और हेमा मालिनी वाली।

स्क्रीन पर गोलीबारी चल रही थी और इधर बच्चे पहाड़े रट रहे थे।

थोड़ी देर बाद हरिराम ऊब गए।

“अरे बस करो। कितना चिल्लाते हो!”

वे उठे और बरामदे से नीचे उतरकर चंबल की तरफ चल पड़े। स्कूल के ठीक पीछे नदी बहती थी। बरसात में चौड़ी और डरावनी, गर्मियों में शांत मगर भीतर से गहरी।

रामकेश ने धीरे से दूसरे लड़के से कहा—

“अब नहाएंगे।”

दूसरा हंसा—“फिर खाना खाकर सो जाएंगे।”

और सचमुच वही हुआ ।माट साब  ने कुर्ता उतारा, बनियान में ही नदी में उतर गए। पानी में डुबकी लगाते ही उनके मुंह से लंबी सांस निकली। “जय चंबल मैया…”

उधर स्कूल में रसोइया फूलवती खिचड़ी बना रही थी। फूलवती विधवा थी। उसका आदमी कभी डाकुओं के लिए मुखबिरी करता था। एक रात पुलिस उठा ले गई। फिर कभी नहीं लौटा। गांव में लोग कहते थे, “एनकाउंटर हो गया।” 

 हरिराम लौटकर आए तो खिचड़ी तैयार थी।

“आज क्या बनाया है?”

“खिचड़ी।”

माट साब ने कटोरी में थोड़ा चखा। फिर बोले—“नमक कम है।”

फूलवती ने तुनककर जवाब दिया—“नमक तुम लाओ तब तो डालें ,रोज तो कहते हैं ।”

माट साब हंस दिए।

बच्चे थाली  लेकर लाइन में बैठ गए। कुछ ऐसे खा रहे थे जैसे सुबह से कुछ न खाया हो। एक छोटा लड़का खिचड़ी बचाकर पॉलीथिन में भरने लगा।

“अरे ओ! क्या कर रहा?” दुबे जी चिल्लाए।

लड़का डर गया। बोला—“बहिन के लिए…”

हरिराम कुछ देर चुप रहे। फिर बोले—“भर ले।”

उसके बाद वे बरामदे की कुर्सी पर लेट गए। मोबाइल में फिल्म चलती रही। हवा गर्म थी। गीत बज रहा था , 

ड्रीम गर्ल 

किसी झील का कमल

ड्रीम गर्ल

 और देखते-देखते माट साब  को नींद आ गई।

दोपहर बाद गांव का बूढ़ा आदमी, मंगल सिंह, स्कूल के पास आकर बैठ गया। कभी उसके नाम से पूरा इलाका कांपता था। कहते हैं वह एक डाकू गिरोह के लिए राशन पहुंचाता था। अब कमर झुक गई थी।उसने सोते हुए हरिराम को देखा और हंसा।

“गुरुजी बड़ा कठिन काम कर रहे।”

रामकेश बोला—“सो रहे हैं।”

“अरे बेटा, आज के जमाने में यही तो सबसे कठिन काम है—आराम से सोना।”मंगल सिंह ने बीड़ी सुलगाई। फिर नदी की तरफ देखते हुए बोला—“जब डाकू थे , तब भी डर था। अब डाकू नहीं हैं, तब भी डर है पहले आदमी जान बचाकर भागता था। अब पेट बचाने भागता है। गांव में रहा क्या? न खेती में पैसा, न काम। जवान लड़के सब अहमदाबाद, दिल्ली। यहां हम जैसे बूढ़े,और तुम जैसे बच्चे।”

रामकेश चुप रहा।

वह पढ़ना चाहता था। सचमुच चाहता था। मगर पांचवीं के बाद स्कूल 5  किलोमीटर दूर था। उसके बाप ने पहले ही कह रखा था - “ज्यादा पढ़-लिख के कलेक्टर थोड़े बन जाएगा। अगले साल साथ चलना अहमदाबाद।”

दोपहर ढलने  लगी थी। हरिराम की नींद खुली।उन्होंने आंखें मलते हुए पूछा—“बच्चे गए?”

“दो बचे हैं,” रामकेश  ने कहा।

“अच्छा…”उन्होंने जेब से कंघी निकाली, बाल ठीक किए और मोटरसाइकिल के पास पहुंचे। तभी रामकेश धीरे से बोला—

“माट साहब…”

“क्या है?”

“शहर में पढ़ने से नौकरी मिल जाती है?”

वे कुछ पल उसे देखते रहे। शायद कई साल बाद किसी बच्चे ने उनसे एक कठिन  सवाल पूछा था।उन्होंने बीड़ी सुलगाई। लंबा कश लिया। फिर बोले—“कभी-कभी मिल जाती है।”

“और नहीं मिली तो?”

“तो  आदमी मास्टर बन जाता है।”

रामकेश समझा नहीं।

 फूलवती हंस पड़ी। मंगल सिंह भी हंसा। यहां तक कि हरिराम खुद भी ।हंसी कुछ देर हवा में तैरती रही, फिर बीहड़ों में खो गई।।।।

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उस सुबह चंबल के बीहड़ों पर हल्की धुंध थी। गर्मी शुरू हो चुकी थी, मगर सुबह की हवा में अभी भी नदी की ठंडक बची हुई थी। नीलगायें भाग रही थीं और बीहड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर रात के जानवरों के पैरों के ताज़ा निशान पड़े थे।

हरिराम  उर्फ़ माट साहब अपनी पुरानी मोटरसाइकिल पर स्कूल जा रहे थे। मोटरसाइकिल ऐसी आवाज़ करती थी जैसे हर मोड़ पर अपनी अंतिम सांस ले रही हो। पीछे बंधे थैले में सरकारी रजिस्टर, एक गमछा, दो पान के बीड़े और मोबाइल रखा था जिसमें कल रात डाउनलोड की हुई फिल्म बाकी थी।

  माट साब रास्ते भर ऊंघते हुए मोटरसाइकिल चलाते थे। बीहड़ में वैसे भी ट्रैफिक नहीं था। कभी-कभार कोई साइकिल दिख जाती, या कोई बूढ़ा आदमी बीड़ी पीता हुआ।

उस दिन मोड़ के पास पहुंचते ही उन्होंने मोटरसाइकिल धीमी कर दी।

आगे एक औरत चल रही थी।उसके साथ एक आदमी था। दुबला-पतला, सांवला, औसत चेहरा। हाथ में पुराना बैग। मगर औरत…माट साब की आंखें कुछ क्षण वहीं अटक गईं।

हल्के पीले रंग का सूती सलवार-कुर्ता। सिर पर ढीला दुपट्टा। सुबह की धूप उसके चेहरे पर पड़ रही थी और गोरी त्वचा लालिमा लिए चमक रही थी। चलते हुए वह बार-बार माथे पर आए बाल पीछे कर रही थी।

बीहड़ों में ऐसी औरतें कम दिखती थीं।

हरीराम के मन में अचानक इच्छा हुई—

“रोकूं गाड़ी… पूछूं कहां जाना है… कह दूं बैठ जाइए, छोड़ देता हूं…”मगर अगले ही पल उन्होंने खुद को रोक लिया।“जाने दो। हमें क्या।”

उन्होंने मोटरसाइकिल थोड़ा  धीरे कर ली। अब वे दोनों के बराबर आ चुके थे।

औरत ने एक नजर उनकी तरफ देखा। और माट साब ने उस की तरफ आँखें चार हुईं और हरिराम के दिल के एक कोने में गीत सा गूंजने लगा 

रंग रूप लेती है बदल

कौन 

ड्रीमगर्ल ,ओहो ड्रीम गर्ल

माट साब गीत गुनगुनाते हुए स्कूल पहुंच गए । कुछ बच्चे खड़े थे हरिराम ने वही किया जो वे रोज करते थे और बच्चों से कहा एक पन्ना  सुलेख लिखो 

नमस्ते,” एक नारी कंठ की आवाज आई।

 हरिराम ने सिर उठाया।कुछ क्षणों के लिए उन्हें लगा जैसे चंबल की गर्म हवा अचानक ठंडी हो गई हो। आंखें सचमुच बाहर निकल आना चाहती थीं। वही युवती उनके सामने खड़ी थी जो थोड़ी देर पहले रास्ते में मिली थी। धूप अब और तेज हो चुकी थी और उसके चेहरे पर पड़कर उसकी गोरी त्वचा में हल्की लालिमा घुल गई थी। माथे पर पसीने की महीन बूंदें थीं, मगर उनमें भी एक अजीब चमक थी।

हरिराम का गला सूख गया।

“हां… नमस्ते…”

उन्होंने कुर्सी से उठने की कोशिश की, मगर कुर्ता कुर्सी के टूटे हुए हत्थे में फंस गया। झेंपते हुए उन्होंने उसे छुड़ाया।

साथ वाला आदमी आगे बढ़ा।

“ माट साब, पथरिया का पुरा स्कूल यही है?”

“हां…” , “यही है।”

आदमी मुस्कराया।

“ मैडम की नई नियुक्ति हुई है यहां। ज्वाइन करना है।”

माट साब का  दिल धक से हुआ।

“मैडम?”

उनके भीतर जैसे किसी बूढ़े कुएं में अचानक पत्थर गिरा हो।

तो क्या ऊपर वाले ने  आखिर इतने साल बाद उनकी अर्ज़ी पढ़ ही ली?

उन्होंने जल्दी से महिला की तरफ देखा।

वह दुपट्टा थोड़ा चेहरे पर खींच रही थी। आंखों में हल्की थकान थी,  वह आसपास सब कुछ गौर से देख रही थी—टूटी दीवारें, बरामदे में बंधी बकरी, कोने में पड़ा हैंडपंप और दीवार पर आधा उखड़ा “सर्व शिक्षा अभियान " का पलस्तर 

“अच्छा…” माट साब ने धीरे से कहा।

“ये लीजिए लेटर,” आदमी ने बैग से  कागज़ निकालकर दिया।

उन्होंने   कागज़ खोला। सरकारी भाषा हमेशा की तरह ऐसी थी मानो आदमी नहीं, आलू की बोरियां इधर-उधर भेजी जा रही हों।उन्होंने पढ़ा—“श्रीमती संध्या , सहायक अध्यापक…”उनकी नजर “श्रीमती” शब्द पर अटक गई।मन में जो छोटी-सी घंटी अभी-अभी बजी थी, वह अचानक टूटकर गिरने लगी ।

“आप?” उन्होंने जैसे औपचारिकता निभाने के लिए पूछा।

आदमी मुस्कराया।“जी, मैं इनका पति हूं—रमेश।”

माट साब के भीतर अचानक एक अजीब खीझ उठी। उन्हें लगा कि प्रकृति कभी-कभी बेहद घटिया मजाक करती है। इतनी सुंदर औरत… और उसके साथ यह आदमी! न चेहरा, न बात करने का ढंग, न कपड़े पहनने की तमीज , उन्होंने मुंह में दबाया हुआ पान दांतों से चबाया और जोर से पीक जमीन पर थूक दी।

मन ही मन बोले—“साला भाग्य…”

“आपका नाम?” उन्होंने महिला से पूछा।

“संध्या,” उसने कहा।

आवाज़ धीमी थी मगर साफ। वैसी आवाज़ जो आदमी को दोबारा सुनने का मन करे।“और ये मेरे पति हैं—रमेश।”

रमेश ने तुरंत हाथ बढ़ा दिया।

माट साब ने हाथ मिलाया।उन्हें  लगा जैसे हाथ किसी गीली चीज़ में सन गया हो। मन हुआ जाकर हैंडपंप पर साबुन से धो लें। मगर चेहरे पर मुस्कान चिपकाए रहे। सरकारी नौकरी आदमी को बहुत कुछ सिखा देती है। झूठी मुस्कान सबसे पहले

तभी रसोई से फूलवती बाहर निकली। उसके हाथ में बड़ा-सा कलछुल था और माथे पर पसीना चमक रहा था। सुबह से वह  दाल को इतना पानी पिला चुकी थी कि खुद दाल भी शर्म से पतली हो गई थी। बाहर आते ही उसकी नजर संध्या पर पड़ी।और वह कुछ क्षणों तक सचमुच उसे देखती ही रह गई।

बीहड़ के उस उजाड़ गांव में औरतें जल्दी बूढ़ी हो जाती थीं। धूप, बच्चे, खेत, गरीबी और मर्द—सब मिलकर चेहरा चबा डालते थे। वहां अचानक इस तरह की साफ-सुथरी, गोरी, शहरनुमा औरत दिख जाए तो आदमी दो बार देखे बिना नहीं रह सकता। फूलवती भी अपलक देख रही थी 

" ई नई मैडम है "  माट साब की  आवाज गूंजी

“नमस्ते मैडम जी…” फूलवती हाथ जोड़ कर बोली 

संध्या ने हल्की मुस्कान से नमस्ते किया। मुस्कुराते वक्त उसके दाहिने गाल पर छोटा-सा गड्ढा पड़ता था। माट साब ने वह गड्ढा नोट किया। आदमी अगर लंबे समय तक अकेला रहे तो ऐसी चीजें बहुत जल्दी नोटिस करने लगता है।

फूलवती संध्या को ऊपर से नीचे तक देखती रही। साफ कपड़े। हाथों में पतली चूड़ियां। पैरों में सैंडिल। बालों से हल्की खुशबू भी आ रही थी।

फूलवती ने मन ही मन सोचा—

“हे भगवान… ई औरत यहां टिकेगी कैसे?”

फिर उसकी नजर हरिराम पर गई।वे ऐसे खड़े थे जैसे तहसीलदार निरीक्षण पर आया हो। पेट भीतर खींच रखा था। बालों पर हाथ फेर चुके थे। यहां तक कि पान भी गाल के एक तरफ दबा लिया था ताकि मुंह कम भद्दा लगे।

फूलवती की हंसी छूटते-छूटते बची।

थोड़ी देर बाद मौका मिलते ही उसने हरिराम  को बरामदे के कोने में खींच लिया।

“माट साहब…”

“क्या है?”

“ई मास्टरनी है कि फिल्म की हिरोइन?”

माट साब ने तुरंत चेहरे पर ऊब चिपका ली। जैसे उन्हें किसी से कोई फर्क ही न पड़ता हो।

तो 

फूलवती ने आंखें गोल कर लीं।

अच्छा उसने शरारत से कहा 

हरिराम झेंप गए।

“अपना काम करो।”

फूलवती अब खुलकर हंस रही थी।

“काम? काम तो अब तुम करोगे गुरुजी। वह हंसी

“बकवास बंद करो।”

हरिराम  ने इधर-उधर देखा कि कहीं संध्या सुन तो नहीं रही।

धीरे से बोले—

“ज्यादा जबान मत चलाओ फूलवती।”

“काहे? हम तो बस देख रहे। कल तक जो आदमी बच्चों को गिनती पढ़ाने में थक जाता था, आज कुर्सी सीधी करके बैठा है।”

उन्होंने खुद को देखा वे सचमुच कुर्सी सीधी करके बैठे थे।

उन्हें  महसूस हो रहा था कि भीतर कुछ बदल रहा है। जैसे कई सालों से बंद पड़ा कोई कमरा अचानक खुल गया हो। उन्हें अपनी कुर्ते की बदबू महसूस होने लगी। पान के दाग दिखने लगे। यहां तक कि टूटी चप्पल भी शर्मिंदा करने लगी।

आदमी जब अकेला होता है तो धीरे-धीरे खुद से उम्मीद छोड़ देता है।औरतें कभी-कभी वह उम्मीद वापस लौटा देती हैं—कभी कभी तो सिर्फ मुस्कुराकर ही।

दोपहर तक गांव में खबर फैल चुकी थी—“नई मास्टरनी आई है।”

सबसे पहले खबर कल्लू तक पहुंची। कल्लू ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा

“सुना है गोरी है।”

दूसरे ने पूछा—

“कितनी गोरी?”

कल्लू ने दार्शनिक अंदाज में बोला —“इतनी कि माट साहब सुबह से दो बार बालों में कंघा कर चुके हैं ।

एक घंटे के भीतर पूरा गांव जान गया कि स्कूल में “नई मास्टरनी” आई है। और सिर्फ आई नहीं है—सुंदर भी है।

तीन बूढ़े बिना किसी काम के स्कूल के सामने से चार बार निकले। हर बार गुजरते हुए गर्दन थोड़ी टेढ़ी कर लेते।

माट साहब राम राम 

आवाज थोड़ी थोड़ी देर में आती रहती ।

माट साब हर बार हिकारत से देखते हुए राम राम करते । वे सब समझते थे  ।

मंगल सिंह भी आ पहुंचा। हाथ में बीड़ी। सिर पर पुराना गमछा। आंखों में वही पुरानी शरारत जो उम्र के साथ मरती नहीं, सिर्फ धीमी हो जाती है।कभी यही मंगल सिंह डाकुओं के लिए राशन पहुंचाता था। अब उसका मुख्य काम गांव में बैठकर दूसरों की जिंदगी पर टिप्पणी करना था।

वह बरामदे के पास खड़ा होकर संध्या को देखने लगा।

संध्या बच्चों को कॉपी में कुछ लिखना सिखा रही थी। धूप खिड़की से छनकर उसके चेहरे पर पड़ रही थी। वह बाल पीछे करती और फिर झुककर बच्चे की कॉपी देखने लगती।

मंगल सिंह ने बीड़ी का लंबा कश लिया। फिर हरिराम  की तरफ देखकर मुस्कराया।

“गुरुजी…”

हरिराम समझ गए कि बूढ़ा कुछ न कुछ गंदा बोलेगा ही।

“क्या है?”

“अब तो स्कूल में उपस्थिति बढ़ेगी।”

वे चिढ़ गए।

“काहे?”

मंगल सिंह ने बीड़ी नीचे फेंकी और पैर से मसल दी ।फूलवती जोर से हंस पड़ी। इतनी जोर से कि खिचड़ी चला रही कलछुल हाथ से गिरते-गिरते बची।

माट साब ने  आंख दिखाई।

“बहुत हंसी चढ़ रही है तुमको।”

फूलवती बोली—“गलत क्या कहा बूढ़े ने? अभी देखो न… सुबह से स्कूल में मेला लगा है ।

सच भी था।

जो स्कूल महीनों वीरान पड़ा रहता था, वहां अचानक चहल-पहल आ गई थी। एक आदमी अपनी बकरी खोजने के बहाने आया। दूसरा राशन कार्ड पूछने। तीसरा यूं ही हैंडपंप से पानी पीने। सबकी आंखें एक ही दिशा में जातीं।

संध्या भी यह सब समझ रही थी।औरतें बहुत जल्दी समझ जाती हैं कि कौन आदमी क्या देख रहा है। कौन सिर्फ देख रहा है, कौन नाप रहा है और कौन सपने बुन रहा है।मगर उसने अनदेखा कर दिया।यह हुनर औरतें जल्दी सीख जाती हैं।अगर हर नजर का जवाब देने लगें तो जिंदगी मुश्किल हो जाए।

वह दूसरे कमरे में  बच्चों को पढ़ाती रही।

“बताओ, ‘क’ से क्या होता है?”

“कबूतर,” एक बच्चा बोला।

ख से 

खरगोश 

“और ‘ग’ से?”

 दूसरे कमरे में हरिराम  के पीछे खड़ा मंगल सिंह हंसकर बोला

“ ग से गोरी मास्टरनी।”

हरिराम  ने झल्लाकर कहा—

“भाग यहां से ”

मंगल सिंह हंसता हुआ बरामदे से नीचे उतर गया।

जाते-जाते बोला—

“गुरुजी, अब रोज दाढ़ी बनाकर आया करो। सरकारी स्कूल का भी स्तर ऊंचा होना चाहिए।”

फूलवती फिर हंसने लगी।

हरिराम  ने गुस्से में पान दबाया। मगर भीतर कहीं उन्हें खुद भी लग रहा था कि बूढ़ा पूरी तरह गलत नहीं कह रहा।उन्होंने चोरी से संध्या की तरफ देखा।वह बच्चों के बीच बैठी थी। धूप में उसका चेहरा चमक रहा था।पास ही रमेश बैठा था ।उन्हें घृणा हो आई रमेश से ।

उन्होने अचानक अपने  कुर्ते के कॉलर को सूंघा।हल्की पसीने और पान की मिली-जुली गंध आई।उन्हें पहली बार लगा— कल साबुन से नहा लेना चाहिए।

शाम को संध्या और रमेश वापस लौटने लगे।

बहुत दिनों बाद स्कूल उस दिन पूरे समय तक खुला था। बरामदे में बच्चों का शोर देर तक गूंजता रहा। दीवारों पर धूल जमी थी, मगर उस दिन स्कूल पहली बार सचमुच स्कूल जैसा लग रहा था।

बरामदे में रमेश अपना बैग संभाल रहा था। संध्या बच्चों को हाथ हिलाकर विदा कर रही थी। ढलती धूप में उसका चेहरा और मुलायम लग रहा था। हवा में उसका दुपट्टा बार-बार उड़ता और फिर कंधे पर आ टिकता।

हरिराम बरामदे के खंभे से टिके खड़े थे। हाथ में पान था मगर कई मिनट से चबाना भूल गए थे।उन्हें अचानक याद आया कि उन्होंने सुबह दाढ़ी ठीक से नहीं बनाई थी। आदमी को अपनी शक्ल सबसे ज्यादा तब याद आती है जब सामने कोई सुंदर औरत खड़ी हो।

रमेश ने उनकी तरफ देखा।

“देखिए गुरुजी,” उसने कहा, “इलाका नया है। थोड़ा ध्यान रखिएगा इनका।”

“हूं…” हरिराम ने सामान्य बनने की कोशिश की। भीतर मगर उन्हें लग रहा था जैसे किसी ने अचानक उनके  दिल में  दिया जला दिया हो।

“फोन भी शायद यहां नहीं चलता?” रमेश ने पूछा।

“कभी-कभी पेड़ पर चढ़ो तो एक लाइन आ जाती है,” हरिराम बोले।

संध्या हंस पड़ी। खुली हुई, साफ, बिना हिसाब की हंसी।

रमेश भी हंसा।

“अजीब जगह है।”

ऐसे मौकों पर माट साब बीड़ी सुलगा लिया करते थे। मगर आज उन्हें पहली बार लगा कि जेब में बीड़ी नहीं, सिगरेट होनी चाहिए थी। सिगरेट में थोड़ा रुतबा होता है।उन्होंने मन ही मन तय किया कि कल दुकान  से गोल्ड फ्लेक खरीदेंगे।

उन्होंने  कहा—

“हम लोग भी यही सोचते थे। फिर आदत हो गई।”

रमेश ने बैग कंधे पर टांगा।

“मुख्य सड़क से दूर पड़ता है ये स्कूल। आप तो मोटरसाइकिल से आते ही हैं… इन्हें भी बैठा लिया कीजिएगा। चिरैया मोड़ तक ये बस से आ जाएंगी।”

हरिराम  का मन हुआ कि उसी समय रमेश का मुंह चूम लें।साले ने सीधे उनके दिल की बात कह दी थी।उन्होंने सोचा—खराब से खराब आदमी में भी कुछ न कुछ अच्छा जरूर होता है।

मगर चेहरे पर उन्होंने  वही सरकारी उदासी बनाए रखी।

“ठीक है…” उन्होंने ऐसे कहा जैसे कोई विशेष फर्क न पड़ता हो ।अंदर मगर पटाखे फूट रहे थे।

रमेश और संध्या ने नमस्ते किया और पैदल चल पड़े।

माट साब कुछ क्षण उन्हें जाते हुए देखते रहे। फिर अचानक मोटर साइकिल की तरफ इशारा करते हुए बोले—

“अरे… बैठ जाइए। छोड़ देते हैं।”

“अरे नहीं गुरुजी,” रमेश बोला, “कष्ट होगा।”

“कौन-सा कष्ट। मोटरसाइकिल खाली ही जा रही।”

संध्या ने हल्की मुस्कान से रमेश की तरफ देखा।

“बैठ जाते हैं। बस छूट गई तो दिक्कत होगी।”

हरिराम  को लगा जैसे किसी ने उनके नाम का भजन गा दिया हो।

थोड़ी-सी ना-नुकुर के बाद दोनों बैठ गए।

हरिराम आगे। बीच में रमेश। सबसे पीछे संध्या।

हरिराम  को अच्छा तो नहीं लग रहा था कि रमेश उनके और संध्या के बीच दीवार बना बैठा है। मगर उन्होंने गम खा लिया।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“कोई बात नहीं हरिराम… जिंदगी लंबी है। कल तो यह छुअन तेरी किस्मत में होगी ही।”

उन्होंने मोटरसाइकिल स्टार्ट की।

पुरानी फटफटिया धुआं छोड़ती हुई आगे बढ़ चली।बीहड़ों की सड़कें सीधी नहीं होतीं। कहीं रेत, कहीं गड्ढे, कहीं अचानक मोड़। मोटरसाइकिल उछलती तो पीछे बैठी संध्या का घुटना कभी-कभी रमेश से टकराता और रमेश हरिराम  की पीठ से।हरिराम  को लगता जैसे पूरा संसार गलत क्रम में चल रहा है।

हवा में संध्या के बदन की  जैसे खुशबू आ रही थी। हरिराम ने कई साल बाद अपनी सांसों पर ध्यान दिया।उन्हें डर हुआ कहीं मुंह से पान की बदबू न आ रही हो।उन्होंने धीरे से चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

पीछे से संध्या की आवाज आई—

“आप रोज इतने दूर से आते हैं?”

“हूं…”

“थक जाते होंगे?”

हरिराम को पहली बार लगा कि इस दुनिया में कोई उनकी थकान के बारे में भी पूछ सकता है।

उन्होंने मोटरसाइकिल थोड़ा संभालते हुए कहा—

“आदमी सबका आदी हो जाता है मैडम।”

रमेश बीच में बोला—

“सरकारी नौकरी में यही फायदा है। एक बार लग जाए तो आदमी कहीं भी रह लेता है।”

रास्ते में एक जगह बकरियों का झुंड आ गया। हरिराम ने ने अचानक ब्रेक लगाया। पीछे से संध्या का हाथ क्षण भर के लिए रमेश के कंधे से फिसलकर उनकी   पीठ से छू गया।

बस हल्का-सा स्पर्श।मगर हरिराम को लगा जैसे किसी ने सूखे  बबूल में फिर से रस भर दिया हो।उन्होंने तुरंत मोटरसाइकिल संभाली।दिल मगर कुछ देर तक तेज धड़कता रहा । चिरैया मोड़ पर पहुंचकर उन्होंने मोटरसाइकिल रोक दी।

“यहां के मंगौड़े बहुत अच्छे होते हैं,” उन्होंने कहा, “आइए, थोड़े चख लिए जाएं।”

रमेश ने संध्या की तरफ देखा।

संध्या मुस्कराई।

“चलिये।”

सड़क किनारे ठेला लगा था—

‘दद्दा के मशहूर मंगौड़े’

तेल की कड़ाही में मूंग दाल के मंगौड़े छन रहे थे। उनमें खड़े लहसुन और  हरी मिर्च की खुशबू हवा में फैल रही थी। ऊपर से इमली की मीठी-खट्टी चटनी। पूरे इलाके में मशहूर थे।

हरिराम  ने आवाज लगाई—

“ए तीन जगह लगाओ ” और बगल की दुकान से एक गोल्ड फ्लैक का पैकेट खरीद लिया ।

ठेले वाले ने संध्या को देखा तो तुरंत गमछे से हाथ पोंछने लगा। आदमी सुंदर औरत के सामने अचानक साफ-सुथरा बनने लगता है।

“तीखी चलेगी मैडम?”  उसने चटनी डालते हुए पूछा।

“थोड़ी,” संध्या ने कहा।

“अरे नहीं,” रमेश बोला, “इनको ज्यादा तीखा नहीं पसंद।”

हरिराम  को रमेश पर फिर गुस्सा आया।

साला हर बात में इसको घुसना  है उसे तीखा पसंद है तो खाने दो । पर वे चुप रहे

तीनों खड़े होकर मंगौड़े खाने लगे।

गरम मंगौड़े तोड़ते वक्त संध्या की उंगलियां हल्की लाल हो गईं। वह फूंक मारकर खाती और फिर हल्का-सा “सी…” करती।

हरिराम  चोरी-चोरी उसे देख रहे थे। उन्हें लग रहा था कि कोई आदमी पूरी जिंदगी सिर्फ बैठकर एक सुंदर औरत को मंगौड़े खाते हुए भी देख सकता है।उनकी कल्पनाओं को पंख लग गए।वे चाह रहे थे कि समय यहीं रुक जाए। सूरज इसी रंग में ठहरा रहे। हवा यूं ही चलती रहे। और वे यूं ही खड़े होकर उसे खाते हुए देखते रहें।

तभी संध्या ने अचानक उनकी तरफ देखा और मुस्कुरा दी। गालों में फिर वही छोटे गड्ढे पड़े।

हरिराम  को सचमुच लगा कि वे डूब जाएंगे।उन्होंने जल्दी से नजरें फेर लीं और गरम मंगौड़ा मुंह में डाल लिया।जीभ जल गई।मगर उन्हें अच्छा लग रहा था ।

तभी सड़क पर धूल उड़ाती एक बोलेरो जीप आकर रुकी। लोहे की प्लेट पर मोटे लाल अक्षरों में लिखा था—‘क्षेत्र पंचायत सदस्य’

ठेले पर बैठा मुंगोड़े वाला जोर से बोला “राम-राम विधायक जी!”

बोलेरो  से सफेद कुर्ता-पायजामा पहने एक मोटा आदमी उतरा। आंखों पर काला चश्मा। हाथ में सोने की अंगूठियां। चलते वक्त ऐसा लगता था जैसे जमीन भी उसे रास्ता दे रही हो।उसके पीछे दो लड़के उतरे। दोनों के चेहरे पर वही भाव था जो छोटे गुंडों के चेहरे पर होता है।मोटे आदमी ने हंसकर कहा—“अरे हम विधायक कहां … अभी तो छोटे आदमी हैं।”

यह कहते वक्त उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी जो सांप दूध पीते समय बनाता होगा।

हरिराम  उसे पहचानते थे।नाम था—भंवरपाल सिंह।पहले डाकुओं को राशन पहुंचाता था। फिर नेताओं को शराबऔर लड़कियां । अब खुद नेता था।लोकतंत्र का यही फायदा है—यह हर आदमी को ऊपर आने का मौका देता है। चाहे वह ऊपर आने लायक हो या नहीं।

भंवरपाल की नजर सीधे संध्या पर गई।और वहीं अटक गई।

हरिराम   ने उस नजर को पहचान लिया।मर्द की आंख जब औरत को देखती है तो उसमें भूख, प्यार, जिज्ञासा या सम्मान—कुछ न कुछ दिख ही जाता है।भंवरपाल की आंख में  कब्जा था।

“नई मास्टरनी हैं क्या?” उसने मुस्कुराकर पूछा।

हरिराम का मन हुआ कि आदमी की आंख में गरम तेल डाल दें।मगर सरकारी नौकरी आदमी को बहादुर नहीं रहने देती। आदमी हर वक्त अपनी तनख्वाह, निलंबन और ट्रांसफर के बीच झूलता रहता है।

उन्होंने सामान्य स्वर में कहा—“हां, अभी पोस्टिंग हुई है।”

भंवरपाल मुस्कुराया।“अच्छा-अच्छा… बहुत बढ़िया। इलाके को अब शिक्षा मिलेगी।” .....“नाम क्या  है आपका ?”

“संध्या,” उसने हल्के संकोच से कहा।

“बहुत सुंदर नाम है।”यह कहते समय उसकी आंखें और  चित्त नाम पर नहीं थीं।रमेश थोड़ा असहज हो रहा था ।

हरिराम  के भीतर का  प्रेमी अब जल उठा था। आदमी चाहे पचास का हो जाए, सुंदर औरत के सामने उसका भीतर का लड़का जिंदा रहता है। फर्क सिर्फ इतना पड़ता है कि जवान लड़का लड़ाई कर बैठता है और बूढ़ा आदमी सिगरेट सुलगा लेता है।उन्होंने सिगरेट सुलगाते हुए बीच में बात काटी—“चलें? अंधेरा हो जाएगा।”

भंवरपाल ने पहली बार हरिराम को गौर से देखा।उसे महसूस हुआ कि मास्टर की आंखों में कुछ कड़वाहट है। मगर वह हंस दिया।

“अरे गुरुजी, कभी आपके स्कूल  आएंगे।”

हरिराम  ने सिगरेट  नीचे फेंकी और जूते से मसल दी।

फिर बोले—“स्कूल में बच्चे पढ़ने आते हैं … नेता नहीं।”

एक सेकंड को हवा सचमुच रुक गई।

रमेश ने आंखें फैला दीं।

संध्या ने पहली बार हरिराम को नए ढंग से देखा।उसके चेहरे पर हल्का आश्चर्य था।भंवरपाल कुछ क्षण चुप रहा।फिर हंसा।मगर इस बार हंसी में मिठास नहीं थी।

“पुराने आदमी लगते हो गुरुजी।”

“हां,” हरीराम धीरे से बोले, “इतने पुराने कि आदमी पहचान लेते हैं।”

भंवरपाल की आंखों के पीछे क्षण भर के लिए गुस्सा चमका। मगर राजनीति आदमी को गुस्सा पीना भी सिखा देती है।उसने मुस्कुराकर कहा—“ठीक है गुरुजी। फिर मिलेंगे।”

भंवर पाल बोलेरो में बैठ गया। जाते-जाते उसने एक बार फिर संध्या की तरफ देखा।गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई।कुछ देर तक वहां अजीब-सी चुप्पी रही।

 रमेश धीरे से बोला—“गुरुजी… आप तो बड़े खतरनाक निकले।” हरिराम  ने जेब से सिगरेट  निकाली। सुलगाते हुए कहा, “सरकारी मास्टर और बूढ़ा कुत्ता… दोनों बहुत कुछ देख चुके होते हैं। ये ज्यादा भौंकते नहीं लेकिन काटते हैं तो फिर इलाज नहीं होता ”

संध्या हंस पड़ी।

इस बार हरिराम  ने नजरें नहीं चुराईं।

उन्होंने सीधे उसकी तरफ देखा।ढलती शाम में उसकी आंखें चमक रही थीं।और पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि इतने सालों में उनके भीतर जो आदमी सूख गया था… वह शायद अभी पूरी तरह मरा नहीं है।चंबल के बीहड़ों में अंधेरा उतर रहा था।और  हरिराम मास्टर के भीतर कहीं बहुत दिनों बाद हल्की-सी रोशनी जली थी।


उस रात हरिराम  ने जीवन में पहली बार महसूस किया कि प्रेम और गैस की बीमारी में एक समानता होती है—दोनों आदमी को पूरी रात सोने नहीं देते।रात के 2 बजे थे चारपाई पर लेटे-लेटे वे कभी करवट बदलते, कभी छत देखते, कभी हाथ से अपने बाल टटोलते कि सचमुच इतने सफेद हो गए हैं क्या।

दिमाग में सिर्फ संध्या थी।

मंगौड़े खाते वक्त उसकी उंगलियां।

हंसते वक्त गालों के गड्ढे।

मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी उसकी खुशबू।

और सबसे खतरनाक बात—आज वह अकेली आने वाली थी।

उन्होंने आंखें बंद कीं और कल्पना की—मोटरसाइकिल चल रही है… हवा चल रही है… पीछे से संध्या कह रही है—

“गुरुजी, धीरे चलाइए…”

और वह जवाब दे रहे हैं—

“डरिए मत मैडम, चंबल में हम और हमारी ड्राइविंग दोनों  मशहूर हैं।”

वे खुद ही मुस्कुरा दिए।

फिर अचानक उठ बैठे। अपराधबोध हुआ।

“हरिराम,” उन्होंने खुद से कहा, “ भगवान से डरो।”

मगर दिल ने जवाब दिया—

“भगवान ने ही भेजी है।”

और पानी पी कर लेट गये


सुबह हरिराम  न सिर्फ जल्दी उठे थे, बल्कि साबुन लगा कर नहाये भी ।नाई की दुकान पहुंचे।

रामसहाय नाई उन्हें देखकर चौंक गया।

“गुरुजी? इतनी सुबह?”

“हां तो?”  दाढ़ी बनानी है।”

रामसहाय ने चेहरा गौर से देखा।

“कहीं इंटरव्यू-विंटरव्यू देने जा रहे?”

हरिराम  चिढ़ गए।

“ज्यादा जबान न चलाओ।”

दाढ़ी बनते समय वे बार-बार पूछते रहे—“ज्यादा उमर तो नहीं लग रही ?”

रामसहाय बोला—

“उम्र के हिसाब से ठीक हो।”

“मतलब?”

“मतलब… अगर रात में देखो तो डर नहीं लगेगा।”

“साले, उस्तरा गले पर है इसलिए तू बचा हुआ है।”हरिराम चिढ़ गए ।फिर भी उन्होंने पहली बार फेसियल करा लिया।जब चेहरे पर ठंडी क्रीम लगी तो उन्हें लगा जैसे जवानी सरकारी फाइल की तरह वापस खुल रही हो।

नाई ने आखिर में पूछा—

“बाल में डाई भी लगा दें?”

वे कुछ पल सोचते रहे फिर बोले—“इतना भी जवान नहीं दिखना है ।” दुकान से निकलते वक्त उन्होंने पान नहीं खाया।सिर्फ इलायची ली।फिर सिगरेट खरीदी। --"गोल्ड फ्लेक"

दुकानदार ने पूछा—“बीड़ी छोड़ दी गुरुजी?”

हरिराम ने सिगरेट जेब में रखते हुए कहा—“आदमी को जिंदगी में बदलाव करते रहना चाहिए।”

चिरैया  मोड़ पर वे पूरे पैंतालीस मिनट पहले पहुंच गए।मोटरसाइकिल चमका ली थी। सीट तक कपड़े से पोंछी गई थी। यहां तक कि पीछे की टूटी रस्सी भी बदल दी थी।

बस स्टैंड पर  सब कुछ प्रायः अव्यवस्थित रहता था पर आज हरिराम को ज्यादा शिकायत नहीं थी । वे  मोटरसाइकिल खड़ी करके ऐसे खड़े हो गए जैसे किसी सरकारी जांच दल का इंतजार कर रहे हों।मगर भीतर हालत स्कूल के लड़के जैसी थी जिसे पहली बार प्रेमपत्र मिलने वाला हो।हर आती बस पर उनकी गर्दन उठ जाती।हर उतरती औरत को वे ध्यान से देखते।फिर खुद को डांटते—“हरिराम, शर्म करो।” मगर दिल नहीं मान रहा था।

करीब आठ बजे बस आई।पुरानी, धूल भरी, खड़खड़ाती हुई। जिसमें  गेट के पास स्पष्ट लिखा होता है "ईश्वर आपकी यात्रा सफल करें"।हरिराम का दिल तेज धड़कने लगाआज रमेश साथ नहीं था। उनके भीतर अचानक मंदिर की घंटियां बज उठीं।संध्या बस से उतर रही थी ।संध्या ने उन्हें देखा और मुस्कुरा दी।

“अरे… आप इतनी जल्दी?”

हरिराम ने सामान्य बनने की कोशिश की।“हूं… हम तो रोज ऐसे ही आते हैं ।

“आज रमेश नहीं आए?” उन्होंने  पूछा।

“नहीं,” उसने कहा, वे बोले कि  अब रास्ता तो  समझ आ गया है,इसलिए वे रोज रोज जा कर क्या करेंगे ।”

हरिराम  ने मन ही मन रमेश को आशीर्वाद दिया।

“बहुत समझदार आदमी है,” उन्होंने गंभीरता से कहा

 संध्या ने हल्का हरा सूट पहना था। हाथ में कपड़े का बैग। माथे पर हल्का पसीना।

वह मोटरसाइकिल  पर बैठी। आज बीच में कोई नहीं था।हरिराम को लगा जैसे जिंदगी ने देर से सही, मगर एक छोटा-सा इनाम भेजा है।उन्होंने मोटरसाइकिल स्टार्ट की।

पहला किक फेल।

दूसरा भी।

माट साब पसीना पोंछते हुए बोले—

“ठंड में मशीन जाम हो जाती है।” जबकि मई का महीना था।

तीसरे किक में मोटरसाइकिल स्टार्ट हुई। वे पूरे रौब से चल पडे 

सुबह की हवा चल रही थी।आज बीच में कोई रमेश नहीं था।बस हवा थी… मोटरसाइकिल थी… और पीछे बैठी एक औरत की हल्की खुशबू। संध्या का दुपट्टा कभी-कभी उनके कंधे से छू जाता।उन्हें अचानक अपनी पीठ सीधी रखने का ध्यान आया।पेट भीतर खींच लिया। मोटरसाइकिल बीहड़ों की सड़क पर चली जा रही थी ।हरिराम  को लग रहा था कि अगर इसी समय मौत आ जाए तो भी शिकायत नहीं करेंगे।उनका मन आज गाने का हो रहा था।

ड्रीम गर्ल ओहो ड्रीम गर्ल

किसी शायर की ग़ज़ल

ड्रीम गर्ल ।।

“आप शादीशुदा हैं?” संध्या ने अचानक पूछा।

हरिराम  का दिल एक पल को रुक गया।

उन्होंने  कहा—“हां… मतलब थे।”

“थे?”

“बीवी पांच साल पहले मायके गई थी।”

“फिर?”

“फिर वहीं खुश हो गई।”

उन्हें लगा माहौल थोड़ा भरी हो गया है ।उन्होंने  तुरंत दूसरा किस्सा शुरू किया—“एक बार यहां डाकू आ गए…”

“फिर?”

“बोले—मास्टर, डरते नहीं?”

“आपने क्या कहा?”

“हमने कहा—जब यहीं नौकरी करनी है तो , अब डर कैसा?”

संध्या  हंस पड़ी।

हंसते वक्त उसका हाथ हल्के से हरिराम के कंधे पर पड़ा। हरिराम  को लगा चंबल में कहीं फूल खिल गए हैं।

रास्ते में अचानक मोटरसाइकिल गड्ढे में धंसी। संध्या हल्का-सा लड़खड़ाई और दोनों हाथों से हरिराम को पकड़ लिया।

बस दो सेकंड।

मगर उन दो सेकंड में हरिराम अपनी अधूरी जवानी, असफल शादी, सरकारी नौकरी और अकेलापन सब भूल गया।

डर गई

हां 

डरने की बात नहीं ,हम हैं न

संध्या मुस्कुराई।

“आपको बड़ा भरोसा है खुद पर।”

दुबे जी बोले—

“चंबल में आदमी अगर खुद पर भरोसा न रखे तो क्या करे ,यहां तो भगवान भी कभी कभी छुट्टी पर चला जाता है।”

दोनों हंस पड़े।

दूर स्कूल दिखाई देने लगा।टूटी दीवारें ,बरामदे में बैठी बकरियां।मगर आज हरिराम को वह उजड़ा स्कूल भी किसी प्रेम कहानी का सेट लग रहा था। उन्हें महसूस हुआ— प्रेम कभी रिटायर नहीं होता।

अब यह रोज का नियम हो गया था।

सुबह चिरैया मोड़ पर बस रुकती। धूल उड़ती। लोग उतरते। और उन सबके बीच संध्या दिखाई देती—कभी नीले सूट में, कभी हल्के पीले में, कभी सफेद दुपट्टे के साथ।और हरिराम  पहले से वहां मौजूद मिलते।

मोटरसाइकिल चमकाई हुई।बालों में तेल।जेब में पान की जगह इलायची।

गांव वालों ने नोटिस किया कि माट साहब अब पहले जैसे नहीं रहे।पहले वे स्कूल तब पहुंचते थे जब सूरज आधा चढ़ जाए। अब सबेरे  पहुंच जाते थे।पहले स्कूल उनके मूड से चलता था। अब समय से खुलने लगा।पहले बच्चे डरते थे कि कब माट साहब कह देंगे—“भागो घर।”अब वे खुद ब्लैकबोर्ड साफ करते।यहां तक कि एक दिन उन्होंने राष्ट्रीय गान भी पूरा गवाया।

स्कूल का माहौल बदल गया था।

दोपहर में दोनों बरामदे में साथ बैठकर खाना खाते।संध्या स्टील का डिब्बा खोलती। कभी आलू की सब्जी। कभी पूड़ी। कभी परांठे।हरिराम तो कई बरसों से मिड डे मील ही खा रहे थे 

संध्या कहती—

“गुरुजी, ये लीजिए।”

“अरे नहीं…”

“थोड़ा तो खाइए।”

और फिर वह जबरदस्ती उनकी प्लेट में सब्जी डाल देती। हरिराम बाहर से बहुत मना करते, पर भीतर से उन्हें लगता कि जैसे कुंवर कलेऊ में बैठे हों ।

एक दिन संध्या मिठाई लाई।उसने मुस्कुराकर कहा—

“गुरुजी, ये मिठाई खास आपके लिए लाई हूं।”

“हमारे लिए?”

“हां। घर गई थी। वहां के मशहूर पेडे है।”

हरिराम ने पेड़ा ऐसे लिया जैसे प्रेमपत्र हो।

फूलवती दूर से यह सब देख रही थी।उसे अब चिंता होने लगी थी।औरतें प्रेम में पड़े मर्दों से जल्दी पहचान लेती हैं। उस दिन उसने पानी भरते समय हरिराम को अलग ले जाकर कहा—

“माट साहब…”

“क्या?”

“जरा संभल के रहो।”

“काहे?”

फूलवती धीरे से बोली—

“ई रास्ता ठीक नहीं।

हरिराम चिढ़ गए।

“तुमको हर चीज में गंदगी दिखती है।”

फूलवती ने आंखें सिकोड़कर कहा—

“हमने दुनिया देखी है माट साब इसलिए चेता रहे तुम्हे

वे कुछ क्षण चुप रहे , फिर बोले " सब ठीक है फूलवती " ।

एक दिन हरिराम मोटरसाइकिल पर संध्या को बैठाकर आ रहे थे कि सामने से दो लड़के हंसते हुए बोले—

“गुरुजी, मौज चल रही ।”

गुरु जी  ने तुरंत ब्रेक मारा।

“अबे हरामियों!”

लड़के भाग गए।

पीछे बैठी संध्या हंसते-हंसते झुक गई।

“लोग भी न…” हरिराम  बड़बड़ाए—“गांव में आदमी छींक दे तो लोग कहानी बना लेते हैं।”

संध्या ने हल्की मुस्कान से कहा—

“तो क्या हम कहानी नहीं हैं?”

वे कुछ क्षण चुप रह गए।मोटरसाइकिल की आवाज अचानक बहुत साफ सुनाई देने लगी।


एक दिन दोपहर में बच्चे खेल रहे थे।संध्या बरामदे में बैठी कॉपियां जांच रही थी।हवा चल रही थी। उसका दुपट्टा बार-बार उड़कर माट साब के हाथ से छू जा रहा था। माट साब ब्लैकबोर्ड  पर कुछ लिखने का नाटक कर रहे थे जबकि ध्यान पूरा पीछे था।

तभी संध्या बोली—

“गुरुजी?”

“हूं?”

“मैं दो दिन नहीं आ पाऊंगी।”

उनका  का हाथ वहीं रुक गया।

“काहे?”

“घर में कुछ काम है।”

“अच्छा…”

“छुट्टी के लिए क्या करना पड़ेगा?”

हरिराम  तुरंत कुर्सी पर आकर बैठ गए। आवाज धीमी कर ली जैसे बहुत बड़ा प्रशासनिक फैसला लेने वाले हों।

“अरे… वो सब हम देख लेंगे।”

“लेकिन एप्लीकेशन?”

“काहे की एप्लीकेशन? यहां कौन रोज फाइल देखता है।”

संध्या हंस पड़ी।

“मतलब बिना छुट्टी के भी चल जाएगा?”

उन्होंने  ने गर्व से कहा—“मैडम, सरकारी स्कूल सिर्फ दो चीजों पर चलते हैं—आदेश और एडजस्टमेंट।”

“तो आप संभाल लेंगे?”

“आप निश्चिंत रहिए।”

संध्या ने मुस्कुराकर कहा—

“थैंक यू गुरुजी।”

बस इतना सुनना था कि हरिराम  को लगा जैसे उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिल गया हो।

फिर वे दो दिन आए।जब संध्या नहीं आई।और उन दो दिनों में हरिराम  को पहली बार समझ आया कि आदमी आदत का कितना बड़ा गुलाम होता है।

सुबह चिरैया  मोड़ सूना लगा।

मोटरसाइकिल खाली लगी।

स्कूल पहुंचकर बरामदा सूना लगा।

यहां तक कि हवा भी बेरंग लगी।

पहले दिन उन्होंने खुद को समझाया—

“अरे दो दिन की बात है।”

दूसरे दिन हालत खराब हो गई।

बार-बार मोबाइल देखते।

हालांकि नेटवर्क था नहीं।

बच्चे पढ़ रहे थे।

वे पूरा समय स्कूल में रहे।क्योंकि उन्होंने संध्या से वादा किया था— “बच्चों की पढ़ाई का हरज नहीं होगा।” उन्होंने सचमुच पढ़ाया भी।

गिनती।

पहाड़े।

हिंदी।

यहां तक कि नक्शे में भारत भी दिखाया।

दूसरे दिन छुट्टी के बाद हरिराम बरामदे में अकेले बैठे रहे।हवा चल रही थी। दूर कहीं गाय रंभा रही थी और फूलवती बर्तन धोते-धोते उन्हें देख रही थी । हरिराम ने उसे देखा पर कुछ नहीं बोले।बस दूर सड़क की तरफ देखते रहे।

तीसरे दिन सुबह जब बस चिरैया  मोड़ पर रुकी और संध्या उतरी, तो हरिराम  को सचमुच लगा जैसे किसी ने सूखे कुएं में फिर पानी छोड़ दिया हो।दो दिन के इंतजार में उन्होंने सबसे ज्यादा अकेलापन महसूस किया था ।

संध्या आज हल्के गुलाबी सूट में थी। बाल ढीले बंधे थे। आंखों के नीचे हल्की थकान थी, मगर मुस्कुराहट वही थी।

“नमस्ते गुरुजी।”

हरिराम ने इतनी जल्दी मुस्कुराया कि खुद चौंक गए।

आ गईं?

“हां,” उसने हंसकर कहा, 

“हमको तो लगा ट्रांसफर करवा लिया आपने।”

संध्या ने पहली बार उन्हें थोड़ी देर तक देखा।

“इतनी जल्दी पीछा छुड़ा लेंगे हमसे ?”

हरिराम के  दिल में भीतर कहीं रस से भर गया ।

मोटर साइकिल  आज कुछ अलग चल रही थी। या शायद  हरिराम का मन अलग  चल रहा था था।संध्या पहले की तरह पीछे बैठी थी, मगर आज उसके बैठने में एक सहजता थी। अब वह संभलकर दूरी बनाकर नहीं बैठती थी। रास्ते के गड्ढों पर उसका हाथ  हल्के से उनके कंधे को पकड़ लेता और वे उस स्पर्श में खो जाते ।

“कैसे रहे दो दिन?” उन्होंने पूछा।

“ठीक…संध्या कुछ देर चुप रही फिर बोली ।

असल में पिता जी बीमार रहते हैं… उन्हीं से मिलने गई थी उन्हें मेरी ज्यादा चिंता रहती है।”

“काहे?”

“बस… लड़की की जिंदगी का वही पुराना दुख।”

हरिराम  कुछ समझे, कुछ नहीं समझे।

मगर आवाज कुछ उदास लगी ।

“रमेश नहीं गया था साथ?”

“गये थे,” उसने धीमे स्वर में कहा, “मगर उन्हें वहां जाना पसंद नहीं।”

“क्यों?”

“उन्हें वह  कुछ भी पसंद नहीं जो मेरे मन का हो।”

हवा अचानक थोड़ी भारी लगने लगी। हरिराम  ने महसूस किया कि सुंदर औरतें हमेशा सुखी नहीं होतीं। लोग समझते हैं कि गोरा चेहरा मतलब अच्छी जिंदगी। जबकि कई बार सबसे सुंदर औरतें सबसे ज्यादा अकेली होती हैं।

स्कूल उस दिन भी समय से खुला।अब बच्चे भी नियमित आने लगे थे।क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि स्कूल में अब सचमुच पढ़ाई होती है। और यह भी कि माट साहब अब बिना वजह डांटते नहीं।

दोपहर में दोनों बरामदे में बैठे खाना खा रहे थे।फूलवती दूर से देख रही थी।अब उसे बेचैनी होने लगी थी।मर्द जब प्रेम में पड़ता है तो चेहरे पर चमक आ जाती है। औरत जब भावनात्मक रूप से खुलती है तो आवाज नरम हो जाती है।

संध्या ने डिब्बा आगे बढ़ाया।

“ये खाइए।”

“क्या है?”

“घर से लाई हूं। बेसन के लड्डू।”

माट साब ने लड्डू उठाया।

“हमको मोटा करोगी क्या?”

संध्या हंस पड़ी।

“आप पहले से कौन कम हैं।”

दोनों हंसने लगे।

शाम को लौटते समय आसमान में बादल थे।चंबल के ऊपर धूल भरी हवा चल रही थी।रास्ते में एक जगह हरिराम  ने मोटरसाइकिल खड़ी कर दी । सामने नदी दूर चमक रही थी।“यहां शाम अच्छी लगती है,” उन्होंने कहा।

संध्या चुप रही।

फिर धीरे से बोली—“… आपसे एक बात कहूं?”

“हां ..कहो”

“आप मुझे अच्छे लगते हैं।”

हरिराम  का हाथ हैंडल पर कस गया।उन्हें लगा मोटरसाइकिल कहीं फिसल न जाए। उन्होंने हंसकर बात हल्की करनी चाही—“अरे… हम हैं ही अच्छे है?”

“मजाक मत कीजिए,” संध्या बोली।उसकी आवाज इस बार गंभीर थी।

“आप कम से कम मेरी बात  सुनते तो हैं।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

फिर संध्या धीरे-धीरे खुलने लगी।जैसे बहुत दिनों से भीतर दबा कुछ बाहर आना चाहता हो।

“रमेश बाहर से बहुत अच्छा दिखता है,” उसने कहा, “सबको लगता है बहुत ख्याल रखता है।”पर घर में… हमेशा ऐसा नहीं होता।”

वे सुनते रहे।

“उसे मेरी नौकरी से भी दिक्कत है। पिता जी से मिलने जाऊं तो शक करता है। बात-बात पर चिढ़ जाता है।”

हवा में उसका दुपट्टा उड़ रहा था

संध्या हल्का मुस्कुराई “पति-पत्नी में सिर्फ साथ रहना काफी नहीं होता ।”

हरिराम  ने उसकी तरफ नहीं देखा।बस सुनते रहे।

“कई बार आदमी सिर्फ दिखावा करता है कि सब ठीक है।”

 हवा उस समय अजीब उदास थी।दूर कहीं बगुला उड़ रहा था ।सड़क सुनसान थी।संध्या बोले जा रही थी अचानक हरिराम   ने उसका हाथ पकड़ लिया...बहुत हल्के से।

संध्या ने हाथ नहीं छुड़ाया।

बस उनकी तरफ देखती रही।उसकी आंखों में थकान भी थी, अपनापन भी।

हरिराम  की आवाज भर्रा गई—

“तुम… खुश नहीं हो ?”

संध्या ने नजर झुका ली।

फिर धीरे से सिर हिलाया।

उस क्षण हरिराम  को लगा कि जीवन ने उन्हें देर से सही, मगर एक जिम्मेदारी दी है। हो सकता है यह उनका भ्रम हो मगर प्रेम में आदमी भ्रम और जिम्मेदारी का फर्क कहां समझता है।

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“जब भी पिता जी से मिलने जाना हो… चली जाया करो।”

संध्या ने उनकी तरफ देखा।

“लेकिन स्कूल?”

“उसकी चिंता मत करो।”

“छुट्टी?”

वे हल्का मुस्कुराए।

“सरकारी स्कूल  आधा आदेश के  भरोसे पर चलता है… बाकी आधा एडजस्टमेंट पर  ।”

संध्या हंस पड़ी।उसके गालों में गड्ढे पड़ रहे थे 

“तुम घर पर रमेश से  कह देना स्कूल जा रही हो। बाकी यहां  हम सब संभाल लेंगे।”

संध्या कुछ क्षण उन्हें देखती रही।

फिर बहुत धीमे से बोली—

“आप मेरे लिए इतना क्यों करते हैं?”

हरिराम  जवाब नहीं दे पाए, क्योंकि पचास के लपेटे का  आदमी प्रेम का नाम लेने से डरता है।हवा में धूल उड़ रही थी।और चंबल के बीहड़ों में दो अकेले लोग धीरे-धीरे एक-दूसरे की आदत बनते जा रहे थे।


संध्या अब महीने में मुश्किल से दस-बारह दिन आती। बाकी दिन “पिताजी की तबीयत”  खराब होने के कारण अपने गांव चली जाती। शुरू-शुरू में हरिराम घबराते थे। फिर प्रेम ने उन्हें सरकारी सिस्टम का असली उपयोग सिखा दिया।

आदमी जब अकेला होता है तो नियमों की बात करता है।जब प्रेम में पड़ता है “मैनेज”करने लगता  है।

जिन दिनों संध्या आती, स्कूल का पूरा वातावरण बदल जाता।सुबह  माट साब चिरैया मोड़ पर पहुंचते मोटरसाइकिल चमकती।बालों में तेल।शर्ट इस्त्री किया हुआ । संध्या उतरती। मुस्कुराती। पीछे बैठती।और हरिराम का पूरा दिन सफल हो जाता।लेकिन जिन दिनों वह नहीं आती…उन्हीं दिनों हरिराम  को पता चलता कि आदमी कितना अकेला प्राणी है।

उस दिन भी संध्या नहीं आई थी। सुबह से गर्म हवा चल रही थी। स्कूल के पीछेधूल उड़ रही थी । बरामदे में दो बच्चे बैठे मिट्टी से सांप बना रहे थे। एक लड़का हैंडपंप के नीचे नहा रहा था और माट साब रजिस्टर खोले बैठे थे।असल में वे रजिस्टर नहीं देख रहे थे।बस संध्या का नाम पढ़ रहे थे।

“संध्या…”उन्हें लगता था इस नाम में भी ठंडक है।

फूलवती दाल में पानी बढ़ाते हुए बोली—“आज फिर नहीं आईं?”

“अपने बाप के घर गई हैं बीमार हैं।”

“बीमार तो तुम लग रहे माट साब ?”

माट साब ने  उसे  घूरा।कुछ बोलते उससे पहले बाहर से जीप की आवाज आई।

धड़धड़धड़धड़…

रामकेश भागता हुआ आया।

“माट साहब! गाड़ी आई!”

जीप पर लिखा था—

‘खंड शिक्षा अधिकारी’

। माट साब का कलेजा हल्का-सा नीचे खिसक गया।

जीप से बीईओ साहब उतरे।

सफेद कमीज।  आंखों पर चश्मा। चेहरे पर वही भाव जो छोटे अफसरों के चेहरे पर होता है—जैसे देश उन्हीं के कंधे पर टिका हो। उनका ड्राइवर भी उतरा । वह बी ई ओ साहब की डायरी दबाए ऐसे चल रहा था जैसे संसद का बजट लेकर आया हो।

बीईओ ने चारों तरफ देखा।स्कूल की दीवार आधी टूटी थी ।बरामदे में बकरी बैठी जुगाली कर रही थी। उन्होंने पूछा—

“हेड मास्टर कौन  है?”

हरिराम  तुरंत सीधे हो गए।

“जी… हम।

बीईओ ने बच्चों की तरफ देखा।

“कितने बच्चे नामांकित हैं?”

“जी… छियासी।”

“और आए कितने हैं?”

उन्हेंने इधर-उधर देखा।

बारह।

इनमें से दो बच्चों को शायद पता भी नहीं था कि वे स्कूल में क्यों बैठे हैं।एक तो सिर्फ इसलिए आया था क्योंकि घर में आज सब्जी नहीं बनी थी और मिड डे मील में मिलने के चांस थे ।

बीईओ ने भौंह चढ़ाई।

“बाकी?”

 माट साब बोले—“गर्मी बहुत है सर।”

बीईओ ने व्यंग्य से कहा—

“अच्छा? बाकी जिले में शिमला पड़ा है ?”

पीछे ड्राइवर हंस दिया ।

साहब ने  ब्लैकबोर्ड देखा।

 आधे पर  लिखा था—‘भारत हमारा देश है’ ।बाकी जगह किसी बच्चे ने कोयले से मूंछ बना दी थी।

“ये पढ़ाई हो रही है?”

बीईओ ने रसोई देखी।

“आज क्या बना है?”

“दाल चावल ।”

बीईओ ने भगोने में झांका।

उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे गई। पतली दाल थी।

उन्होंने पूछा—“इसमें दाल कहां है?”

फूलवती बोली—“घुल गई साहब।”

फिर असली आफत आई।

रजिस्टर खुला।

बीईओ पन्ने पलटते रहे......अचानक रुक गए।

“ये संध्या मैडम कौन हैं?”

हरिराम  का गला सूख गया।

“जी… सहायक अध्यापिका।”

“कहां हैं?”

“जी… घर गई हैं।”

“छुट्टी?”

“जी…”

छुट्टी पोर्टल पर है ?”

हरिराम चुप।

बीईओ ने फिर रजिस्टर देखा।

“ 4 दिन से हस्ताक्षर ही नहीं हैं!”

अब उनके चेहरे पर चमक आ गई।अफसर को जब गलती मिलती है  तो उसे वही आनंद मिलता है जो शिकारी कुत्ते को खरगोश देखकर मिलता होगा।

“बहुत खेल चल रहा है यहां,” बीईओ बोले।

ड्राइवर तुरंत गंभीर हो गया। उसने डायरी खोली। जैसे अभी सीबीआई जांच शुरू होगी।

“सर, नोट कर लें?”

“हां।”

माट साब समझ गए मामला अब जेब तक जाएगा।

उन्होंने धीरे से कहा—

“सर… पिता जी बीमार हैं इनके।”

“तो छुट्टी  लगाइए!”

बीईओ कुर्सी पर फैल गए।

“तुम लोगों ने शिक्षा विभाग को नाटक बना रखा है। स्कूल है या सराय?”

हरीराम के भीतर अचानक गुस्सा उठा।

मन हुआ कह दें कि साहब, जिस विभाग में बच्चे से ज्यादा लेटर और  फाइलें चलती हों, वहां नाटक ही होगा।

मन हुआ पूछें—“आपको स्कूल की चिंता ज्यादा है या महीने की सेटिंग की?”

मगर नौकरी आदमी की रीढ़ धीरे-धीरे निकाल देती है।उन्होंने सिर्फ इतना कहा—

“गलती हो गई सर।”

बीईओ जाते-जाते बोले—

“शाम को ब्लॉक पर मिल लेना।”

इतना काफी था समझने के लिए ।सरकारी भाषा में यह वाक्य रिश्वत का निमंत्रण होता है।

शाम को हरिराम ब्लॉक दफ्तर पहुंचे।बीईओ साहब कमरे में बैठे समोसा खा रहे थे। पीछे गांधी जी की फोटो थी। नीचे टेबल के दराज में शायद पूरा लोकतंत्र रखा था।

“आओ गुरुजी,” बीईओ मुस्कुराए

हरिराम ने अखबार में लपेटे पांच हजार धीरे से टेबल के नीचे सरका दिए। बीईओ ने बिना देखे हाथ रख लिया। आदमी जिस काम का आदी हो जाए, उसमें नजर की जरूरत नहीं रहती।

उन्होंने चाय की चुस्की ली।

“देखो गुरुजी… काम नियम से करो।”

“जी।”

“रजिस्टर मेंटेन रखा करो।”

“जी।”

“नहीं तो किसी दिन निपटा दूंगा।”

हरिराम बहुत कुछ बोलना चाहते थे।मन हुआ कहें—पर  उन्होंने सिर्फ मुस्कुरा दिया।क्योंकि उन्हें नौकरी बचानी थी ...और .....संध्या को भी।

वापसी में हरिराम मोटरसाइकिल धीरे चला रहे थे।जेब हल्की थी।दिल भारी।मगर भीतर कहीं एक अजीब संतोष भी था।उन्हें लग रहा था जैसे उन्होंने किसी अपने को बचा लिया हो।

भले ही वह रिश्ता दुनिया की नजर में कुछ भी न हो।

उन्होंने रुक कर सिगरेट सुलगाई।लंबा कश लिया।और खुद से बोले—“हरिराम… प्रेम आदमी से क्या-क्या नहीं करवाता।”

फिर मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी ।


उस दिन संध्या कई दिनों बाद स्कूल आई। सुबह जब वह बस से उतरी तो हरिराम के चेहरे पर वही चमक लौट आई जो पिछले हफ्ते से गायब थी।

स्कूल  पहुंचते ही फूलवती ने मौका पकड़ लिया।वह वैसे भी गांव की औरत थी। और गांव की औरत के पेट में बात उतनी देर नहीं रुकती जितनी देर भगोने में खिचड़ी।जैसे ही संध्या ने बैग रखा, फूलवती पास आ गई।

“अरे मैडम जी… बड़ा बवाल हुआ आपके पीछे।”

संध्या चौंकी।

“क्या?”

फूलवती ने आंखें गोल कर लीं।

“डिप्टी साहब आए थे।”

“कौन डिप्टी?”

“अरे वही  अफसर जो स्कूल का मुआयना करते हैं।”

फिर आवाज धीमी कर बोली—

“माट साहब से पैसे लगे।”

संध्या का चेहरा उतर गया।

“क्या?”

“हां! रजिस्टर में आपके दस्तखत नहीं थे। खूब डांट पड़ी।”

संध्या तुरंत बरामदे की तरफ देखने लगी जहां हरिराम  बच्चों को पहाड़ा रटवा रहे थे—

“सात दूनी?”

“चौदह!”

संध्या कुछ देर उन्हें देखती रही।

फिर धीरे से पूछा—

“कितने पैसे देने पड़े?”

फूलवती बोली—“हमका का पता। मगर चेहरे से लग रहा था जेब कट गई।”


दोपहर तक संध्या असामान्य रूप से चुप रही।

आज उसने मजाक भी कम किया।

लंच में भी वह बस धीरे-धीरे रोटी तोड़ती रही। हरिराम बात हल्की करना चाहते थे।

आज दाल में नमक ज्यादा है 

संध्या  ने सिर उठाकर उन्हें देखा।

वे नजरें बचाकर खाने लगे।

लंच के बाद अचानक संध्या उठी और बोली—

“अच्छा बच्चों, आज जल्दी छुट्टी।”

पूरा स्कूल खुश।बच्चे  धूल उड़ाते भाग गए।फूलवती भी बर्तन समेटने लगी।जाते-जाते उसने संध्या की तरफ देखा।फिर माट साब की तरफ।

कुछ देर बाद स्कूल बिल्कुल शांत हो गया।बरामदे में सिर्फ हवा की आवाज थी।संध्या धीरे-धीरे चलकर  हरिराम के पास आकर बैठ गई।इतना पास कि उनकी कुहनी छू जाए। हरिराम का गला हल्का सूख गया।

“क्या जरूरत थी पैसे देने की?” उसने धीरे से पूछा।

हरिराम ने हंसने की कोशिश की।“अरे… ये सब चलता रहता है।”

“मुझसे छुपाइए मत।”

कुछ क्षण चुप्पी रही।फिर हरिराम  बोलने लगे उन्होंने बताया कैसे बीईओ आया, कैसे रजिस्टर पलटा, कैसे ड्राइवर मुस्कुरा रहा था जैसे मुर्गा पकड़ लिया हो, कैसे उन्होंने बात संभाली, बीच-बीच में थोड़ा मिर्च-मसाला भी लगाते रहे।

“हमने भी साफ कह दिया—साहब, हमे सब मालूम है रुपया पकड़ो और अपना काम करो ”

 आदमी जिस औरत को प्रभावित करना चाहता है, उसके सामने खुद को थोड़ा बहादुर जरूर बना लेता है।

संध्या चुपचाप सुनती रही। उसकी आंखें लगातार हरिराम पर थीं।

“आपने मेरे लिए इतना सब क्यों किया?” उसने धीरे से पूछा।

संध्या की आंखें हल्की भर आईं। मेरे लिए किसी ने कभी इस तरह लड़ाई नहीं की।”

हरिराम कुछ बोले नहीं।बरामदे में हवा चली।ब्लैकबोर्ड पर टंगा पुराना नक्शा फड़फड़ाया।और उस सुनसान स्कूल में अचानक दोनों के बीच की दूरी बहुत छोटी लगने लगी।

संध्या ने धीरे से अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया। हरिराम का पूरा शरीर जैसे एक पल को ठहर गया।उन्होंने उसकी तरफ देखा।संध्या भी उन्हें देख रही थी। शायद  सुरक्षित महसूस करती हुई।अचानक वह थोड़ा झुककर उनके कंधे से लग गई। हरिराम  हतप्रभ बैठे रहे। उन्हें लगा जैसे कोई सपना गलती से सच हो गया हो।कुछ क्षण बाद उनके हाथ भी धीरे-धीरे उठे।बहुत संकोच से।जैसे डर हो कि कहीं यह पल टूट न जाए और उन्होंने उसे हल्के से अपनी बाहों में भर लिया ।

वे धीरे से बोले -- तुम चिंता मत करो मैं सब मैनेज कर लूंगा ।

हरिराम ने मैनेज कर लिया था और पूरा खेल व्यवस्थित हो चुका था।सरकारी तंत्र में  जब भ्रष्टाचार नियमित हो जाए तो उसे लोग “व्यवस्था” कहने लगते हैं। संध्या महीने में मुश्किल से पांच-सात दिन स्कूल आती। कभी सोमवार, कभी गुरुवार, कभी अचानक बीच हफ्ते में। बाकी दिन “पिताजी की तबीयत” चलती रहती।पिताजी इतने बीमार थे कि महीनों से ठीक ही नहीं हो रहे थे। हर महीने संध्या की पूरी तनख्वाह समय से पहुंच जाती थी।हरिराम  अब बीईओ साहब से “सेट” हो चुके थे या उन्हें  सेट कर चुके थे ।

महीने के दस हजार , और बदले में शांति । न निरीक्षण , न सवाल , न रजिस्टर।

शिक्षा विभाग में इसे लोग  “समझदारी” कहते हैं।उस दिन शाम को ब्लॉक दफ्तर के पीछे चाय की दुकान पर बीईओ साहब खड़े चाय पी रहे  थे। हरिराम  ने धीरे से लिफाफा आगे बढ़ाया। बीईओ ने बिना देखे जेब में रख लिया।

“गुरुजी,” उन्होंने चाय सुड़कते हुए कहा, “आप भी बड़े खिलाड़ी निकले।”

हरिराम मुस्कुराए।

“सीख रहे हैं साहब।”

बीईओ हंसे।

“और वो नई मैडम?”

“अच्छी अध्यापिका हैं।

“हां, ये तो दूर से ही समझ आ गया था।”

हरिराम को यह बात अच्छी नहीं लगी।मगर रिश्वत लेने वाले आदमी से नैतिकता की उम्मीद करना फिजूल था 

उन्होंने बात बदल दी।

“बस साहब… थोड़ी दिक्कत में हैं बेचारी।”

“पति परेशान करता है?”

हरिराम  तुरंत गंभीर हो गए।

“बहुत।”

और फिर वही कहानी शुरू हो गई जिसने उनके अंदर रमेश के प्रति गुस्सा और संध्या के प्रति करुणामय प्रेम भर दिया था ।

कैसे रमेश निकम्मा है।

कैसे संध्या दुखी है।

कैसे बीमार बाप को देखने भी नहीं जाने देता।

कैसे उसकी कमाई पर कब्जा कर लेता है।

उन्हें  रमेश को गालियां देने में आनंद आता था।

 हरिराम  की हालत यह थी कि वे सुबह उठते ही संध्या के बारे में सोचते।स्कूल में उसकी खाली कुर्सी देखते ,  उसके छोड़े हुए कप में चाय का दाग देखते यहां तक कि एक दिन फूलवती ने देखा कि माट साब उस स्टील के डिब्बे को पकड़े खड़े हैं जिसमें पिछले हफ्ते संध्या खीर लाई थी ।  हरिराम कई बार अचानक क्लास में कोई रोमांटिक सा गीत गाने लगते या खुद से बातें करने लगते । प्रेम हरिराम को पागल बना रहाथा ।

उस दिन संध्या आई हुई थी।दोपहर की छुट्टी हो चुकी थी। बच्चे बाहर नीम के पेड़ के नीचे खेल रहे थे। बरामदे में हवा चल रही थी। संध्या कॉपियां समेट रही थी और हरिराम  उसे लगातार देखे जा रहे थे।

आज उनके भीतर कुछ तय हो चुका था। आज प्रेम अपनी निर्णायक अभिव्यक्ति को आतुर था  । आदमी जब अकेलेपन से बहुत लंबे समय तक लड़ता है, तो एक दिन प्रेम ,या प्रेम के भ्रम को  भी  सच मान लेता है।

उन्होंने गला साफ किया।

“संध्या…”

“हूं?”

“एक बात कहें?”

“कहिए।”

वे  कुछ क्षण चुप रहे .....फिर बोले—

“क्या ऐसा नहीं हो सकता… कि हम साथ रहने लगें?”

संध्या का हाथ वहीं रुक गया।

“क्या?”

माट साब बोलते चले गए। जैसे महीनों से भीतर जमा हुआ सब बाहर आ रहा हो।

“तुम रमेश से  तलाक ले लो।”

“गुरुजी…”

“अरे सुनो तो। बाकी सब हम देख लेंगे।  जो होगा मैनेज कर लेंगे।”

“आप समझ नहीं रहे…”

“सब समझ रहे हैं!”

अब उनकी आवाज में भावुकता आ गई थी। “तुम खुश नहीं हो वहां। हम देख रहे हैं। आदमी अगर औरत से प्रेम करे तो उसे दुख में थोड़े छोड़ता है।”

संध्या चुप हो गई। मगर भीतर उसका दिमाग तेजी से चलने लगा। वह हरिराम को कैसे बताए कि असलियत कुछ और थी ।संध्या का प्रेम और रमेश का “निकम्मापन” दरअसल काफी व्यवस्थित व्यवसाय था।बगल के जिस जिले से वह आती थी वहां रमेश और संध्या  का छोटा-सा कोचिंग सेंटर चलता था—

संध्या मैथ्स क्लासेज 

बाहर बोर्ड पर संध्या की मुस्कुराती फोटो लगी थी।अंदर पचास पचास  बच्चौं के चल रहे बैच । फीस समय से....न मिड डे मील...न रजिस्टर....न बीईओ...सिर्फ कैश और गणित।

रमेश  पूरा दिन रिसेप्शन पर  बैठता था। फीस लेता , एडमिशन करता। फेसबुक पर पोस्ट डालता—“हमारे संस्थान की होनहार डायरेक्टर मैडम संध्या जी ....

उधर स्कूल में कहानी दूसरी चलती थी—

“पति अत्याचारी है।”

“पिता बीमार हैं।”

“औरत बहुत दुखी है।”

संध्या को सरकारी नौकरी छोड़ने का इरादा नहीं था और कोचिंग को भी छोड़ना नहीं था।और एक बड़ी सुविधा थी—हरिराम जो प्रेम में पड़ चुके थे ...पूरी तरह।

उसे पहली बार सचमुच डर लगा। अब तक खेल आसान था।

थोड़ी मुस्कान।

थोड़ा दुख।

थोड़ी नजदीकी।

और छुट्टी पक्की। 

मगर अब मामला खतरनाक दिशा में जा रहा था।

उसने धीरे से कहा—“समाज भी कोई चीज होता है गुरुजी।”

हरिराम तुरंत बोले—

“समाज ने हमारे लिए क्या किया?”

“जात अलग है।”

“तो क्या?”

“लोग क्या कहेंगे?”

माट साब हंस पड़े “लोगों का काम है कहना। लोगों ने तो भगवान राम और सीता मैया को नहीं छोड़ा। 

संध्या ने उन्हें ध्यान से देखा , उसे अचानक महसूस हुआ ये आदमी सचमुच गंभीर हो चुका है। बहुत ज्यादा  इतना कि अब यह किसी दिन मुसीबत बन सकता है।

उसी समय बाहर बच्चे चिल्ला रहे थे—“माट साहब! गेंद छत पर चली गई!”

मगर बरामदे में बैठे दोनों किसी और दुनिया में थे।

 हरिराम अब लगभग सपने में बोल रहे थे—“देखो संध्या…अब मैं अपनी सारी जिंदगी तुम्हारे साथ बिताना चाहता हूं ।

संध्या के भीतर हल्की झुंझलाहट उठी , उसे लगा मामला हाथ से निकल रहा है।

उसने मन ही मन तय किया—अब “पिताजी” वाला अध्याय बंद करना पड़ेगा कुछ और कहानी रचनी होगी पर मास्टर को थोड़ा दूर रखना जरूरी हो चुका है ।क्योंकि प्रेम में पड़ा आदमी सिर्फ रोता नहीं—कभी-कभी बवाल भी कर देता है।

उस शाम लौटते समय मोटरसाइकिल पर  हरिराम उसे और अपने भविष्य को लेकर सपने बुनने और उसे संध्या को बताने में लगे थे  ।संध्या चुप थी ।हरिराम  भविष्य देख रहे थे और संध्या रास्ता।

 दोनों के बीच पहली बार प्रेम नहीं, हिसाब  था।एक तरफ अकेला आदमी था—जो प्रेम को आखिरी सच मान बैठा था।दूसरी तरफ एक औरत—जो प्रेम नहीं, सुविधा संभाल रही थी।

पूरा रास्ता हरिराम  बोलते रहे ।जब आदमी प्रेम में बोल रहा हो, तो उसे खुद भी पता नहीं चलता कि क्या-क्या बोल गया।

कभी भविष्य।

कभी समाज।

कभी अकेलापन।

कभी त्याग।

कभी यह कि “हम तुम्हारे बिना नहीं रह सकते।”

मोटरसाइकिल बीहड़ों के बीच धूल उड़ाती जा रही थी और हरिराम का दिल किसी पुराने हिंदी फिल्म के रेडियो की तरह लगातार बज रहा था।

“देखो संध्या,” वे बोले जा रहे थे, “आदमी को जिंदगी में एक साथी चाहिए। बाकी सब फालतू है।”

संध्या पीछे बैठी थी।

“हूं…”

बस इतना।

असल में उसने आधी बात भी नहीं सुनी। उसका दिमाग कहीं और दौड़ रहा था , बहुत तेजी से । उसे लग रहा था कि मामला हाथ से निकल सकता है। अब तक हरिराम  उपयोगी थे।

रजिस्टर संभालते थे।

बीईओ मैनेज करते थे।

स्कूल की अनुपस्थिति ढंक देते थे।

और इन सबके लिए वे पैसा ,समय और स्वयं सब को तल्लीनता से खर्च भी कर रहे थे।  मगर अब प्रेम आदमी को उपयोगी से खतरनाक बना रहा था और संध्या जानती थी—भावुक पुरुष सबसे ज्यादा अप्रत्याशित होते हैं।

बस अड्डा आ गया। पुरानी टूटी बस पहले से खड़ी थी।कंडक्टर दरवाजे पर लटका चिल्ला रहा था—भिंड ,भिंड

हरिराम  ने मोटरसाइकिल रोकी। संध्या उतरी। कुछ क्षण दोनों चुप रहे। हरिराम शायद और कुछ कहना चाहते थे। मगर शब्द नहीं मिले।संध्या ने बस इतना कहा—“चलती हूं गुरुजी ...ध्यान रखिएगा।”

यह वाक्य औरतें कई बार सिर्फ शिष्टाचार में कहती हैं।मगर पुरुष उसे प्रेमपत्र समझ बैठते हैं।

माट साब हल्का मुस्कुराए--“तुम भी।”

संध्या बस में चढ़ गई   खिड़की के पास बैठ गई। बस धीरे-धीरे आगे बढ़ी। हरिराम  कुछ देर उसे जाते देखते रहे , फिर मोटरसाइकिल मोड़ ली।उनके चेहरे पर वही उदास संतोष था जो मंदिर से लौटते बूढ़ों के चेहरे पर होता है। जैसे उन्होंने जीवन से देर से ही सही, मगर कुछ पा लिया हो।


बस मुश्किल से पांच किलोमीटर चली होगी कि अचानक जोर का धमाका हुआ।

धड़ाम! बस झटके से रुकी। कंडक्टर तुरंत नीचे कूदा। ड्राइवर ने इंजन खोला और उसी भाव से देखने लगा जैसे आदमी बीमार रिश्तेदार को देखकर सिर्फ सिर हिलाता है।

“क्या हुआ?” किसी ने पूछा।

ड्राइवर बोला—“पटा टूट गओ।” ऐसे बोला जैसे बस नहीं, शादी टूट गई हो।

सवारियां उतरने लगीं दूसरी बस की प्रतीक्षा करनी थी । गर्मी थी। धूल उड़ रही थी। सड़क सुनसान।एक बूढ़ा आदमी बड़बड़ा रहा था—“इस इलाके की बसें और नेता… दोनों भरोसे लायक नहीं।”

संध्या भी उतरकर सड़क किनारे नीम के पेड़ के नीचे खड़ी हो गई।उसका दिमाग अब भी तेज चल रहा था।उसे हरिराम से दूरी बनानी थी। मगर कैसे ?

उसी समय दूर से एक बोलेरो आती दिखाई दी। सफेद।धूल उड़ाती हुई।गाड़ी पर लाल अक्षरों में प्लेट लगी थी—‘क्षेत्र पंचायत सदस्य’ संध्या ने उधर देखा और अगले ही पल पहचान गई।

भंवरपाल सिंह। वही नेता जिसे उसने दद्दा  के मंगौड़ों वाले ठेले पर देखा था।

काला रंग ,सफेद शर्ट।सफेद पैंट।आंखों पर काला चश्मा।उंगलियों में इतनी अंगूठियां कि लगता था ज्योतिष और भ्रष्टाचार ने मिलकर इस आदमी को बनाया हो।

गाड़ी धीरे-धीरे उसके पास आकर रुकी। भंवरपाल ने काला चश्मा थोड़ा नीचे खिसकाया। मुस्कुराया,  वही मुस्कान जिसमें मिठास कम और हिसाब ज्यादा होता है।

“नमस्ते मैडम जी,” वह बोला, “पहचाना?”

संध्या मुस्कुराई - “नमस्ते।”

“ कैसी चल रही है शिक्षा क्रांति?” वह हंसा।

संध्या भी हल्का मुस्कुरा दी। नेता लोग मजाक इसलिए करते हैं ताकि सामने वाला भूल जाए कि वे असल में क्या हैं।

“स्कूल से लौट रही हैं?”

“जी। बस खराब हो गई।”

भंवर पाल ने अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला । आइए हम उधर ही जा रहे हैं । छोड़ देंगे।”

संध्या ने हल्का संकोच दिखाया --“अरे नहीं… आप क्यों परेशान होंगे।”

असल में उसका दिमाग उसी समय नई योजना बना रहा था।औरतें कई बार जवाब देने से पहले पूरी अगली कहानी सोच लेती हैं।

भंवरपाल मुस्कुराया -- “हम तो जनता के सेवक हैं मैडम जी।” फिर थोड़ा झुककर बोला—“और आप तो हमारे इलाके के बच्चों को पढ़ाती हैं। आपके लिए इतना भी नहीं कर सकते क्या?”

संध्या ने एक पल उसे देखा।नेता की आंखों में वही पुरानी भूख थी जिसे वह पहचानती थी।मगर उसके साथ एक और चीज थी—सत्ता ,और सत्ता प्रेम से ज्यादा उपयोगी होती है। उसे अचानक लगा—शायद यही रास्ता आसान है।

उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा—“ठीक है।

“आइए मैडम जी।”

संध्या गाड़ी में बैठ गई।

बोलेरो फिर धूल उड़ाती आगे बढ़ गई। सड़क किनारे खड़े लोग उसे जाते देखते रहे। और दूर कहीं, उसी समय, हरिराम   अपनी पुरानी मोटरसाइकिल पर बैठे शायद अब भी भविष्य के सपने देख रहे थे।

बोलेरो चंबल के पुल के ऊपर से निकल रही थी।डैशबोर्ड पर हनुमान जी की छोटी मूर्ति चिपकी थी जो हर गड्ढे पर हिल रही थी। सामने शीशे के ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—“जनसेवा ही धर्म है”

भंवरपाल सिंह आराम से सीट पर फैलकर बैठा था। एक हाथ खिड़की पर। दूसरे में मोबाइल।वह बीच-बीच में चोरी से संध्या को देख लेता।संध्या यह नोटिस कर रही थी।और उसे कोई असुविधा नहीं थी बल्कि उसका दिमाग अब तेजी से हिसाब लगा रहा था।

भंवरपाल ने गला साफ किया --“बहुत कष्ट होता होगा आपको यहां?”

“किस बात का?”

“अरे… ये बीहड़। ये जंगल। ये टूटा स्कूल। आदमी दो दिन में पागल हो जाए।”

संध्या हल्का हंसी --“अब नौकरी है तो आना पड़ता है।”

भंवरपाल मुस्कुराया -- “नौकरी तो बहुत लोगों की है मैडम जी। मगर सब आते थोड़ी हैं,सब मैनेज हो जाता है।”

संध्या ने ऐसे अभिनय किया जैसे पहली बार यह ज्ञान सुन रही हो ---“अच्छा?”

“अरे! आप नई हैं इसलिए नहीं जानतीं। यहां आधा सरकारी सिस्टम कागज पर चलता है… आधा पहचान पर।”

ड्राइवर हंस पड़ा --“और बाकी का पैसों पर,” उसने जोड़ा।

तीनों हंस दिए।

भंवरपाल अब पूरी तरह मूड में आ चुका था।उसे लग रहा था कि सामने बैठी औरत प्रभावित हो रही है।और सत्ता में बैठे छोटे नेताओं की सबसे बड़ी कमजोरी यही होती है—उन्हें जल्दी लगता है कि हर कोई उनसे प्रभावित है।

“आप कहें तो,” वह थोड़ा झुककर बोला, “हम शिक्षा अधिकारी से बात कर दें।”

संध्या ने भौंह उठाई --“ऐसा हो जाता है क्या?”

भंवरपाल जोर से हंसा --“मैडम जी, आजकल क्या नहीं होता?”

फिर आवाज धीमी कर ली --“आखिर सत्ता पक्ष में हैं हम। हमारी बात सुननी पड़ती है।” यह कहते वक्त उसके चेहरे पर वही गर्व था जो गांव के दबंग को अपनी लाइसेंसी बंदूक पर होता है।

संध्या चुप रही। मगर भीतर मुस्कुराई। उसे समझ आ गया था—मछली कांटे के आसपास घूमने लगी है।

भंवरपाल अब और खुल गया - “देखिए,” उसने कहा, “इतनी दूर आने की क्या जरूरत है? महीने में एक दो दिन आइए। बाकी हम संभाल लेंगे।”

संध्या ने अभिनय जारी रखा - “नहीं-नहीं… ऐसा ठीक नहीं है।”

भंवरपाल हंसा - “सरकारी नौकरी में ‘ठीक’ वही होता है जो पकड़ में न आए।”

ड्राइवर फिर हंस पड़ा।लगता था नेता के हर वाक्य पर हंसना उसकी नौकरी का हिस्सा है।कुछ देर चुप्पी रही।फिर भंवरपाल मुस्कुराया।

“हां… मगर काम हो जाने पर हमारी भी छोटी-सी फीस है।”

संध्या ने आंखें गोल कीं - “क्या?”

भंवरपाल ने नकली संकोच से कहा—“बस… कभी घर बुलाकर एक कप चाय पिला दीजिएगा।”

संध्या हंस पड़ी ....और उसके गालों में वही छोटे गड्ढे पड़े जिन्हें देखकर हरिराम  का दिल डूब जाता था और  इस समय वे गड्ढे भंवरपाल सिंह को दिखाई दे रहे थे।

“रहने दीजिए। हरिराम माट साब खिच खिच करेंगे।”

भंवरपाल तुरंत चौकन्ना हुआ। पुरुष चाहे नेता हो या मास्टर—दूसरे पुरुष का नाम आते ही कान खड़े हो जाते हैं।

“कौन? वो सनकी मास्टर ?”

संध्या ने जानबूझकर हल्की मुस्कान दबाई --“हां… वही।”

भंवरपाल होंठ टेढ़े कर हंसा -“ खोचड़ी आदमी हैं।”

“खोचड़ी?”

“हां! खुद को बहुत होशियार समझता है ।”

संध्या ने धीरे से कहा—“होशियार तो हैं…”

बस।  ...इतना काफी था।फंदा अब गले तक पहुंच चुका था।

भंवरपाल ने तुरंत पूछा—“काहे? बहुत मदद करते हैं क्या?”

संध्या ने सीधे जवाब नहीं दिया। औरत अगर किसी पुरुष को उलझाना चाहती है तो पूरी बात कभी नहीं बोलती।बस उतना छोड़ती है जितने में सामने वाला खुद कहानी बना ले।वह खिड़की से बाहर देखते हुए बोली—“अकेले आदमी हैं… थोड़ा भावुक भी।”

भंवरपाल की आंखों में चमक आई -- “अच्छाss…” अब उसके दिमाग में दूसरी फिल्म चलने लगी थी।अब भंवरपाल सोच रहा था मास्टर को हटाना पड़ेगा 

संध्या ने हल्की उदासी का अभिनय किया “… कभी-कभी बहुत दखल देने लगते हैं।”

"कैसा दखल" 

"यही की ये मत करो ,वो मत करो ,समय से आओ ,घर परिवार बाद में नौकरी पहले, और कभी कभी तो मुझे ऐसे देखते हैं कि मुझे उलझन होने लगती है।"

"अच्छा ,ये हरकत करता है ।जेल भेजवा देंगे साले को। आप चिंता मत कीजिए अब आपने हमे बता दिया हम देखते हैं । " यह वाक्य पुरुष प्रायः तब बोलते हैं जब उन्हें लगता है कि सामने वाली औरत अब उन पर निर्भर होने वाली है।

संध्या ने उसकी तरफ देखा और धीरे से मुस्कुराई।“आप बहुत मदद कर देंगे हमारी?”

भंवरपाल लगभग पिघल गया -“आप कहकर तो देखिए।”

बोलेरो सड़क पर आगे बढ़ती रही। बाहर बीहड़ फैले थे।अंदर बातचीत।दोनों अपने-अपने हिसाब लगा रहे थे।

भंवरपाल सोच रहा था—“मास्टरनी फंस रही है।”

संध्या सोच रही थी—काम हो जाएगा 

लोग सिर्फ बंदूक से शिकार नहीं करते।कई बार मुस्कान से भी कर लेते हैं।

बातों-बातों में बोलेरो भिंड पहुंच गई। शहर शुरू होते ही सड़क का चरित्र बदल गया। बीहड़ों की धूल की जगह दुकानों के बोर्ड आ गए। पान मसाले के पोस्टर। मोबाइल रिपेयरिंग की दुकानें। स्टैंड के पास हमेशा की तरह भीड़ थी।

“यहीं उतार दीजिए।”संध्या ने कहा 

“अरे! घर तक छोड़ देते हैं।”भंवर पाल बोला। उसकी आवाज में  उत्साह था ।

संध्या हल्का मुस्कुराई।

“नहीं… ठीक है।”

फिर थोड़ा झुककर, आवाज धीमी करते हुए बोली—“घर पर हसबैंड होंगे।”

बस।इतना काफी था।पुरुषों को कई बार पूरी कहानी नहीं चाहिए होती। आधा संकेत ही उन्हें रात भर सपने दिखाने को काफी होता है।भंवरपाल के भीतर जैसे किसी ने पटाखा फोड़ दिया।

उसे लगा—“मतलब मामला सेट हो रहा  है।”

उसने तुरंत ड्राइवर की तरफ देखा। ड्राइवर सड़क देख रहा था, मगर कान पीछे ही थे।ड्राइवर सड़क से ज्यादा मालिक की जिंदगी पर नजर रखते हैं।

संध्या उतरने लगी।

भंवरपाल जल्दी से बोला—“अरे नंबर तो दीजिए।”

संध्या रुकी।एक पल को उसने उसे देखा।फिर मुस्कुराई।और वही मुस्कान सबसे खतरनाक थी।क्योंकि उसमें साफ “हां” नहीं थी।मगर “ना” भी नहीं थी।उसने पर्स से छोटा कागज निकाला।नंबर लिखते समय उसके बाल हल्के से चेहरे पर आए। भंवरपाल उसे देखता रह गया।उसे अचानक याद ही नहीं रहा कि वह कौन है।उसे बस इतना याद था कि सामने एक खूबसूरत औरत खड़ी है जो उससे धीमी आवाज में बात कर रही है।

संध्या ने नंबर देते हुए कहा—“लेकिन…”

“हां?”

“फोन शाम को सात से आठ के बीच ही कीजिएगा।”

संध्या ने हल्की नजर ड्राइवर पर डाली।फिर धीमे से बोली—“बाकी समय थोड़ा मुश्किल रहता है।”

 भंवरपाल को  लगा जैसे कोई गुप्त दरवाजा खुल रहा है।उसका दिल सचमुच बल्लियों उछल रहा था।वह बाहर से संयत बना रहा। वैसे भी नेता लोग भावनाएं छुपाने में माहिर होते हैं। चुनाव उन्हें अभिनय सिखा देता है। “अच्छा…” उसने सामान्य बनने की कोशिश की, “ठीक है।”

संध्या मुस्कुराई--“और हां…स्कूल वाली बात…”

“अरे! वो आप हम पर छोड़ दीजिए।”

भंवरपाल ने तुरंत सीना चौड़ा किया --“आपको अब इतनी दूर आने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

संध्या ने भंवरपाल की आंखों में देखते हुए कहा “थैंक यू।”

बस। भंवरपाल खतम।

संध्या भीड़ में आगे बढ़ गई।भंवरपाल उसे जाते हुए देखता रहा।जब तक वह भीड़ में गायब नहीं हो गई।फिर भी कुछ सेकंड तक देखता रहा।जैसे आंखें मानने को तैयार न हों कि दृश्य खत्म हो चुका है ।  उसके दिमाग में पूरी फिल्म चल रही थी--

संध्या का मुस्कुराना।

धीमी आवाज में बोलना।

“घर पर हसबैंड होंगे…”

शाम सात से आठ।

 औरतें तो उसने बहुत देखी थीं।ब्लॉक प्रमुख की रिश्तेदार ,आंगनबाड़ी वाली, नई पंचायत सचिव मगर ये अलग थी।

भंवरपाल ने जेब से मोबाइल निकाला।नंबर फिर देखा।सहेजा—“संध्या मैडम”

फिर कुछ सोचकर नाम बदला—“एस”

राजनीति आदमी को सतर्क बना देती है। उसने मोबाइल जेब में रखा। उसे लगा संध्या मैडम उसे पसंद करती है । सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं होती भ्रम होता है । 

अब भंवरपाल सिंह की जिंदगी दो हिस्सों में बंट चुकी थी।

पहला हिस्सा राजनीतिऔर दूसरा शाम के सात से आठ बजे।दिन भर वह कहीं न कहीं घूमता रहता—कभी ब्लॉक दफ्तर, कभी तहसील, कभी किसी कार्यक्रम में माला पहनता, कभी किसी मरियल सड़क का उद्घाटन करता कभी विधायक के साथ घूमता  मगर शाम होते-होते उसका ध्यान मोबाइल पर टिक जाता। ठीक सात बजे मोबाइल हाथ में लेकर बैठ जाता जैसे कोई विद्यार्थी रिजल्ट देखने वाला हो।

पहली घंटी।

दूसरी घंटी।

और फिर—

“हेलो…”

भंवरपाल का पूरा दिन सफल हो जाता।

हल्की मिठास

“क्या कर रही थीं?”

“कुछ नहीं… रसोई में थी।”

“खाना बना रही हैं?”

“हूं…”

फिर दोनों बातें करते।

स्कूल।

बीहड़।

गांव।

राजनीति।

चुटकुले 

और बीच-बीच में वे चुप्पियां जो शब्दों से ज्यादा खतरनाक होती हैं।

कई बार अचानक संध्या धीमे से कहती—“रखती हूं… ये आ गए।”

और फोन कट।

भंवरपाल कुछ सेकंड मोबाइल देखता रह जाता।  उसके भीतर अजीब उत्तेजना दौड़ जाती। उसे लगता—“औरत डरते-डरते  छुप छुप कर मुझसे बात कर रही है।”

पुरुषों को यह  बहुत रोमांचक लगता है।

कई बार फोन उठता ही नहीं। भंवरपाल बेचैन हो जाता।दस मिनट बाद फिर करता।

फिर।

फिर।

जब कॉल वापस आती तो वह लगभग राहत की सांस लेता।

“क्या हुआ था?”

“हसबैंड घर में थे।”

बस .....भंवरपाल फिर पिघल जाता।

राजनीति आदमी को झूठ बोलना सिखाती है। प्रेम उसे झूठ पर विश्वास करना।

उधर हरिराम  की हालत धीरे-धीरे खराब हो रही थी।अब संध्या उनके फोन कम उठाती।उठाती भी तो बस—

“हां गुरुजी…”

“हूं…”

“ठीक है…”

“बाद में बात करती हूं।”

हरिराम देर तक मोबाइल देखते रहते।

उन्हें समझ नहीं आता—जो औरत पहले घंटा घंटा बात करती थी, अब दो मिनट में क्यों कट जाती है? मगर प्रेम में पड़ा आदमी सच्चाई सबसे आखिर में समझता है। शायद  वह समझना ही नहीं चाहता।

जब-जब संध्या स्कूल आती, हरिराम फिर जवान हो उठते। सुबह से बालों में तेल, नई शर्ट  । सरकारी व्यवस्था में कई बार शिक्षा सुधारने के लिए सिर्फ एक सुंदर अध्यापिका काफी होती है

इसी तरह लगभग महीना भर निकल गया।

उस दिन स्कूल में अजीब सन्नाटा था। संध्या नहीं आई थी।बच्चे जल्दी भाग गए थे। फूलवती भी खाना बनाकर जा चुकी थी। हरिराम बरामदे में अकेले बैठे थे। हाथ में बीड़ी , नजर कहीं दूर। असल में उनका मन अब स्कूल में कम, संध्या में ज्यादा रहता था।तभी बाहर से आवाज आई—“गुरुजी!”

मंगल सिंह था। हाथ में बीड़ी और चेहरे पर वही मुस्कान जो आदमी मुफ्त तमाशा देखने के बाद लाता है।

“आओ,” हरिराम बोले।

मंगल सिंह बैठ गया। कुछ देर चुप रहा  फिर होंठ दबाकर बोला—

“गुरुजी… चिड़िया उड़ गई।”

माट साब ने भौंहें सिकोड़ दीं।

“क्या बक रहा है?”

मंगल सिंह हंसा।

“अरे… हम तो बस खबर दे रहे।”

“सीधे बोल।”

मंगल सिंह थोड़ा पास खिसका। आवाज धीमी कर ली।

“वो मास्टरनी…”

हरिराम का दिल हल्का धड़का-“क्या हुआ?”

“कल देखे हम।”

“क्या?”

“भंवरपाल की गाड़ी में जा रही थी।”

हरिराम चुप।

मंगल सिंह ने मजा लेते हुए दूसरा वार किया—

“और कल पही  बार नहीं…  दो बार पहले भी देखा है ”

बरामदे में अचानक सन्नाटा जम गया।

दूर कहीं कौआ बोला।

हरिराम के भीतर जैसे किसी ने धीरे से गरम लोहे की छड़ घुसा दी।पहले अविश्वास आया। फिर जलन। फिर गुस्सा।उन्हें लगा जैसे मंगल उनका मजाक उड़ा रहा हो।

“झूठ बोल रहा है।”

“हम क्यों झूठ बोलेंगे गुरुजी?”

“तूने ठीक से देखा?”

“अरे अपनी आंखों से देखा। बोलेरो में आगे बैठी थी। हंस-हंस के बात कर रही थी।”

हरिराम की उंगलियां बीड़ी पर कस गईं। धुआं सीधा आंखों में चला गया। मगर उन्हें एहसास तक नहीं हुआ।

मंगल सिंह अब पूरी तरह आनंद ले रहा था। दूसरे आदमी का प्रेम टूटना भी मनोरंजन होता है। वह बोला—

“गुरुजी… नेता लोग बड़े तेज होते हैं।”

हरिराम के भीतर गुस्सा फूटने लगा था।उन्हें अचानक पिछले महीने की सारी बातें याद आने लगीं।

कम फोन उठाना।

जल्दी काट देना।

बस स्टैंड पर भंवरपाल की बोलेरो दिखना ।

धीमी मुस्कानें।

सब।

और सबसे ज्यादा उन्हें खुद पर गुस्सा आ रहा था। उन्हें लगा जैसे पूरा गांव उन पर हंस रहा है।

मंगल सिंह उठते हुए बोला—“हम तो बस अपना फर्ज निभाए गुरुजी।”

फिर जाते-जाते हंसा—“बीहड़ में पानी और औरत… दोनों को बांधना मुश्किल है।”

हरिराम ने कुछ नहीं कहा।वे बरामदे में बैठे रहे। बीड़ी बुझ चुकी थी।और पहली बार उन्हें लगा—शायद उन्हें  प्रेम नहीं किया गया …उनसे खेल खेला गया है।

जब से मंगल सिंह ने वह बात बताई थी, हरिराम  के भीतर कुछ लगातार टूट रहा था।वे अब पहले वाले आदमी नहीं रहे थे।पहले वे आलसी थे, बेपरवाह थे, सरकारी मास्टरी को मजाक की तरह लेते थे। मगर अब वे चुप रहने लगे थे  दुनिया ने उन्हें मूर्ख बना दिया था ।रात को उन्हें नींद नहीं आती।चारपाई पर लेटे-लेटे वे छत देखते रहते।कभी संध्या का हंसना याद आता।कभी मोटरसाइकिल पर उसका पीछे बैठना।कभी मंगौड़े खाते समय गालों में पड़ते गड्ढे।और अब हर याद के साथ एक नया दृश्य जुड़ जाता—

सफेद बोलेरो,भंवरपाल।

धीमे फोन।

कटती कॉल।

उन्हें लगता जैसे किसी ने उनकी यादों पर थूक दिया हो।वे कई बार रात में फोन उठाते।संध्या को कॉल करते।

पहली घंटी।

दूसरी।

फिर फोन कट, या फिर सीधा बंद।

कभी उठ भी जाता तो बस—

“हां?”

“कहां हो?”

“घर पर।”

“फोन क्यों नहीं उठा रही थीं?”

“काम था।”

और फोन कट। हरिराम देर तक मोबाइल देखते रह जाते।उन्हें लगता जैसे किसी ने उनके भीतर नुकीली चीज घुसेड़ दी हो।हरिराम अब पढ़ाने का अभिनय भी ठीक से नहीं कर पा रहे थे।बच्चे बैठे रहते वे बीड़ी पीते रहते।कभी-कभी ब्लैकबोर्ड पर बिना मतलब कुछ लिखते और फिर मिटा देते।

फूलवती एक दिन बोली—“माट साहब, तबीयत खराब है क्या?”

हरिराम ने चिढ़कर कहा—“तुम  डॉक्टर हो?”

फूलवती चुप हो गई। मगर  औरतें आदमी का दुख पहचान लेती हैं।

उधर भंवरपाल सिंह का आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था।अब उसे लगने लगा था कि खेल उसके हाथ में है। एक शाम वह सीधे खंड शिक्षा अधिकारी के दफ्तर पहुंचा।सरकारी दफ्तरों में शाम का समय सबसे ईमानदार होता है।क्योंकि उस समय तक काम खत्म हो चुका होता है और सिर्फ असली काम बचता है।बीईओ साहब कमरे में बैठे थे। भंवरपाल अंदर घुसा।

“नमस्कार बी ओ साहब।”

बीईओ तुरंत सीधे हो गए --“अरे भंवरपाल जी! आइए-आइए।”

चाय आई। दोनों  कुछ देर इधर-उधर की बातें करते रहे।

फिर भंवरपाल धीरे से मुद्दे पर आया।

“वो पथरिया का पुरा स्कूल…”

बीईओ ने तुरंत मुंह बनाया।

“अरे मत पूछिए। वहां तो भगवान भरोसे सब चल रहा है।”

भंवरपाल मुस्कुराया -- “चल भी क्या रहा है?” फिर थोड़ा झुककर बोला—“हरिराम को हटाना पड़ेगा।”

बीईओ ने आंखें सिकोड़ दीं -“क्यों?”

“बहुत शिकायतें हैं।”

“किस बात की?”

“बच्चे नहीं पढ़ाता। स्कूल बंद रखता है। गांव वालों से अभद्रता करता है।”फिर थोड़ा रुककर बोला—“औरतों के मामले भी हैं।”

“अच्छाss…”

भंवरपाल ने कुर्सी पर पीठ टिकाई - “इलाके में माहौल खराब है।”

राजनीति में “माहौल खराब” सबसे उपयोगी वाक्य होता है। इसका मतलब कुछ भी हो सकता है।

बीईओ ने धीरे से कहा—l“मगर वहां से हटाएंगे तो स्कूल बंद हो जाएगा।”

भंवरपाल तुरंत बोला—“अरे किसी शिक्षा मित्र को अटैच कर दीजिए।”

“वो स्कूल संभालेगा?”

“जितना संभल रहा है उससे ज्यादा खराब क्या होगा?”

दोनों हंस दिए। 

फिर बीईओ थोड़ा गंभीर हुए “कार्रवाई करनी पड़ेगी।”

“करिए।”

“कुछ अभियोग चाहिए।”

भंवरपाल ने बिना पलक झपकाए कहा—“वो हम पर छोड़ दीजिए।”

“मतलब?”

“शिकायत भी आ जाएगी। गवाह भी।”

बीईओ अब पूरी तरह समझ चुके थे।उन्होंने कुर्सी पर शरीर ढीला छोड़ दिया --“आप लोग भी…”

भंवरपाल मुस्कुराया।“सिस्टम ऐसे ही चलता है साहब।”

कमरे में कुछ सेकंड चुप्पी रही।फिर बीईओ ने धीरे से पूछा—“मामला क्या है असल में?”

भंवरपाल ने सिगरेट निकाली ,जलाते हुए बोला—“अपनी औकात भूल गया है ।”धुआं छोड़ा “अब समझाना पड़ेगा।”

बीईओ ने ज्यादा पूछना ठीक नहीं समझा।सरकारी अफसरों की एक खास प्रतिभा होती है—वे उतना ही जानते हैं जितना बाद में मुकर सकें।उन्होंने बस इतना कहा—“देखिए… नाम हमारा न आए।”

भंवरपाल हंसा- बेफिक्र रहिए ।

 उसी समय हरिराम अपने कमरे में अकेले बैठे थे। पुरानी चारपाई , बुझती बीड़ी और सामने दीवार पर टंगी संध्या की वह धुंधली-सी तस्वीर जो स्कूल के किसी कार्यक्रम में बच्चों के साथ खिंची थी।वे उसे देखते रहे।फिर अचानक उठे , मोबाइल उठाया ,कॉल किया।

फोन बजा।

एक बार ...दो बार ...तीन बार....फिर कट।

कुछ सेकंड बाद मैसेज आया—“Busy हूँ.”

हरिराम ने मोबाइल धीरे से नीचे रख दिया।

उस बार जब संध्या स्कूल आई तो हरिराम  को सब कुछ बदला हुआ लगा  मुस्कान जो पहले फूल लगती थी, अब एक चाल लगी ।उन्होंने आज  न मजाक किया , न बच्चों पर चिल्लाए ,न फूलवती से बहस की बस चुप।

संध्या आज हल्की  गुलाबी साड़ी में थी ।बाल पीछे बंधे।हाथ में वही बैग।

“नमस्ते गुरुजी।”

“हूं।” बस इतना।

संध्या समझ गई।उसे आश्चर्य नहीं हुआ।असल में वह पिछले कई दिनों से इस बातचीत की तैयारी कर चुकी थी।औरतें भावनात्मक युद्ध में अक्सर पुरुषों से दो कदम आगे होती हैं।लंच के समय भी संध्या धीरे-धीरे खाना खाती रही जैसे कुछ हुआ ही न हो।

आखिर छुट्टी के बाद बरामदे में दोनों अकेले रह गए । दूर बच्चों की आवाज धीरे-धीरे खत्म हो रही थी। ब्लैकबोर्ड पर आधा मिटा पहाड़ा अभी भी लिखा था—हरिराम काफी देर तक चुप बैठे रहे फिर अचानक बोले—“तुम भंवरपाल के साथ आती-जाती हो?”

सीधा।बिना भूमिका।

संध्या ने उनकी तरफ देखा।और बिल्कुल शांत स्वर में कहा—

“हां।”

हरिराम को  उम्मीद थी कि वह झूठ बोलेगी घबराएगी ,सफाई देगी।मगर यह सीधा “हां” उनके भीतर हथौड़े की तरह लगा।

“क्यों?”“बसें नहीं चलतीं क्या ।”

“तो? जब वो उधर जाता है, बैठ जाती हूं।”

इतनी सहजता ।इतनी सामान्य आवाज जैसे बात कुछ भी न हो।

हरिराम के भीतर जलन और तेज हो गई।

“तुम उसके साथ नहीं जाओगी।”

अब आवाज में आदेश था।

संध्या ने भौंह उठाई।

“क्यों?”

“मैं कह रहा हूं इसलिए।”

कुछ सेकंड चुप्पी रही फिर संध्या धीरे से हंसी।मगर इस बार वह मुस्कान मुलायम नहीं थी -“आप कह ही क्यों रहे हैं?”

हरिराम का गुस्सा अब ऊपर आने लगा -“बहुत जुबान चलने लगी है तुम्हारी।”

“और आपकी?”

“मतलब?”

“आप मुझे आदेश देंगे अब?”

हरिराम खड़े हो गए -“आदेश नहीं दे रहे। समझा रहे हैं।”

“मुझे?”

“हां तुम्हें!” अब उनकी आवाज भारी हो चुकी थी। “पूरा गांव बातें कर रहा है।”

संध्या ने बैग बंद किया - “तो करने दीजिए।”

“इतनी सीधी मत बनो संध्या। हम भी दुनिया देखे हैं।”

“दुनिया आपने देखी होगी। जिंदगी हमने भी देखी है।”

हरिराम हंसे। सूखी, कड़वी हंसी -“हां…  दिख  रहा है ।”

संध्या ने पहली बार तेज स्वर में कहा—“सीधे-सीधे बोलिए क्या कहना चाहते हैं।”

बस यही चाहिए था और हरिराम फट पड़े - “क्या बोलें?” वे लगभग चीख पड़े, “पूरा महीना स्कूल नहीं आओ। रजिस्टर हम भरें। अफसर हम मैनेज करें। गांव वालों की बातें हम सुनें। और तुम नेताजी की गाड़ी में घूमो!”

संध्या की आंखें सिकुड़ गईं - “तमीज से बात कीजिए।”

“तमीज?” हरिराम हंसे, “तमीज की बात तुम कर रही हो?”...“बहुत खेल खेल लिया तुमने!”

संध्या अब खड़ी हो चुकी थी। “देखिए गुरुजी—”

“गुरुजी मत बोलो हमको!” हरिराम गरजे, “समझ क्या रखा है? बेवकूफ बना लोगी?”

बरामदे में हवा तेज चलने लगी थी।संध्या की आवाज अब ठंडी हो गई - “आप अपनी हद में रहिए।”

“हद?” हरिराम आगे बढ़े, “हद तब याद नहीं रही जब हमारे सामने रो-रो के पति की कहानी सुनाती थीं?”

“ वो मेरी जिंदगी है!”

“अरे जिंदगी नहीं… नाटक है सब! तीन तीन खसम लिए घूमती हो ”

संध्या का चेहरा बदल गया - “बस बहुत हो गया।”

हरिराम बेकाबू थे - “हमको इस्तेमाल किया तुमने!”

“आप पागल हो रहे हैं।”

“हां! पागल ही हो गए थे तुम्हारे पीछे!” वे कांप रहे थे। “क्या कमी छोड़ी हमने? पैसा लगाया। तुम्हारी नौकरी बचाई। तुम्हे सब सुविधा दी और तुम…” वे रुक गए।मुंह से गाली लगभग निकल ही गई थी। “तुम क्या समझती हो अपने आपको?”

संध्या ने सीधा जवाब दिया—“आपको ऐसा कहने का कोई हक नहीं।”

“हक?” हरिराम का चेहरा लाल पड़ गया, “हक तब नहीं याद आया जब हमारी मोटरसाइकिल पर चिपक के बैठती थीं?”

“बस!”

“क्यों? गलत कह रहे हैं?”

“अपनी भाषा संभालिए।”

“भाषा?” हरिराम अब लगभग टूट चुके थे, “अरे तुम जैसी औरतें आदमी को कहीं का नहीं छोड़तीं।”

संध्या की आंखों में अब ठंडापन आ गया कुछ  सेकंड दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर संध्या ने बहुत शांत स्वर में कहा—“रोकेगा तो मेरा हसबैंड रोकेगा। आप कौन?”

बस। यहीं सब खत्म हो गया। हरिराम जैसे पत्थर हो गए उन्हें लगा किसी ने सबके सामने तमाचा मार दिया हो।

वे कांपती आवाज में बोले—“तो उसे भी आज ही मालूम पड़ जाएगा , उसका नंबर है मेरे पास ”

संध्या चुप रही ।

वे मोबाइल पर रमेश का नंबर लगाने लगे । उन्हें याद नहीं रहा कि वहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता ।

संध्या मुस्कुराई।

धीमी।

तिरछी।

“हम जा रहे हैं ,और अपनी जिंदगी में हम क्या करेंगे इसका फैसला हम ही लेंगे ,आप नहीं ।”

उसने बैग उठाया ,कंधे पर डाला और तेजी से बाहर निकल गई।

हरिराम बरामदे में खड़े उसे जाते देखते रहे। हवा तेज चल रही थी।हरिराम का हृदय चीत्कार कर रहा था कुछ सेकंड तक उन्हें लगा कि वे दौड़कर रोक लें।

कुछ कह दें।

माफी मांग लें।

या चीखें।

मगर वे जड़ बने खड़े रहे।

आदमी जब भीतर से टूटता है तो शरीर कुछ देर काम करना बंद कर देता है।

संध्या अभी उनकी आंखों से पूरी ओझल भी नहीं हुई थी कि सामने सड़क पर धूल उड़ती दिखाई दी । और फिर  सफेद बोलेरो दिखाई देने लगी थी । हरिराम बरामदे में खड़े देख रहे थे बोलेरो आगे बढ़ती जा रही  संध्या के पास आकर रुकी । बैक हुई । संध्या उसमें बैठी और पीछे एक धूल का गुबार फिर उठा ।दूर गाड़ी आगे बढ़ती जा रही थी और हरिराम दबरामदे में अकेले रह गए थे ।उनके पीछे टूटा स्कूल था।सामने जाता हुआ भ्रम।और बीच में वे खुद

 अगले दिन सुबह हरिराम हमेशा से पहले स्कूल पहुंच गए।रात भर उन्हें ठीक से नींद नहीं आई थी।स्कूल में लगे आईने में अपना चेहरा देखा तो खुद ही घबरा गए। आंखों के नीचे काले घेरे। दाढ़ी आधी सफेद, आधी पीली। दिल में अजीब घबराहट थी।

संध्या उस दिन आई हुई थी।दोनों के बीच कोई बात नहीं हो रही थी ।करीब ग्यारह बजे दूर सड़क पर धूल उठी।

फूलवती ने सबसे पहले देखा।“अरे माट साहब… सरकारी गाड़ी लग रही।”

हरिराम का दिल धक से हुआ।कुछ सेकंड बाद सफेद बोलेरो स्कूल के सामने आकर रुकी। बीईओ साहब तेजी से स्कूल में दाखिल हुए ।आज चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।हरिराम तुरंत कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए।

“नमस्ते साहब।”

बीईओ ने जवाब नहीं दिया बस घूरते रहे ऐसे जैसे सामने पुराना अपराधी खड़ा हो।

“तुम्हारी शिकायत मिली है।”

आवाज ठंडी थी।

हरिराम का गला सूख गया।

“क… कैसी शिकायत साहब?”

बीईओ अचानक भड़क उठे - “इतनी उम्र हो गई तुम्हारी और ये कारनामे तुम्हारे?”

स्कूल में खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। फूलवती दूर खड़ी मुंह पर आंचल रखे सब देख रही थी।

हरिराम हक्का-बक्का - “साहब… हम समझे नहीं…”

समझाते हैं पिछले 3 वर्ष के आय व्यय रजिस्टर निकालो ।

इतना कह कर वे उस कमरे की ओर बढ़ गए जहां संध्या बच्चों को कॉपियों पर कुछ काम दे रही थी ।

“मैडम।”

संध्या मुड़ी।

“जी सर?”

बीईओ ने जेब से एक कागज निकाला।सीधे उसकी तरफ बढ़ाया।आवाज धीमी करते हुए बोले 

“इस पर जल्दी दस्तखत कर दीजिए।”

संध्या  ने कागज लिया।

कागज पर टाइप किया हुआ था विद्यालय के प्रधानाध्यापक हरिराम मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं , गलत व्यवहार करते हैं और अकेला पाकर छेड़ छाड़ करने की कोशिश करते हैं.........

संध्या ने एक पल को हरिराम को देखा जो आय व्यय के रजिस्टर अल्मारी से निकाल रहे थे ।उसने एक पल को आंखें बंद कीं।एक ठंडा फैसला लिया  पेन उठाया।और दस्तखत कर दिए।

बीईओ कागज लेकर बाहर आ गए थे । बाहर गांव के  कुछ लोग और आ कर खड़े हो गए थे ।

हरिराम ने सब रजिस्टर निकल कर मेज पर रख दिए थे 

बोले - " साहब हम से क्या गलती हो गई "

बीईओ ने फाइल  से कागज निकाला और जोर से पढ़ना शुरू किया—

“विद्यालय समय पर नहीं खुलता।

बच्चों के साथ दुर्व्यवहार होता है ।

मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी।

और साहब ने  संध्या द्वारा  दस्तखत किया हुआ कागज उन कागजों के ऊपर रखते हुए कहा  "" कार्यरत महिला शिक्षिका के साथ अनुचित व्यवहार…”

आखिरी लाइन सुनते ही हरिराम के पैरों तले जमीन खिसक गई।

उन्हें लगा किसी ने बीच बाजार कपड़े उतार दिए हों। भीड़ अब और बढ़ने लगी थी।

लो पढ़ो साहब ने कागज हरिराम की तरफ ऐसे बढ़ाए जैसे मुंह पर दे मारेंगे ।

हरिराम हकलाए—

“साहब… झूठ है…”

बीईओ गरजे—

“चुप!”

हरिराम के कानों में भनभनाहट होने लगी।उन्हें लगा जैसे पूरा कमरा घूम रहा है। वे एक कदम आगे बढ़े।

“संध्या… ये क्या है?”

उनकी आवाज टूट रही थी।

संध्या चुप रही।

हरिराम लगभग विनती की तरह बोले—“तुम जानती हो ये सब झूठ है…”

बीईओ तुरंत बीच में बोले— “चुप रहो!” मैडम आप बेफिक्र हो कर बताइए क्या यह सब कुछ जो आपने लिखा है यह सच है । बिल्कुल डरने की जरूरत नहीं है पूरा विभाग आपके साथ है ।

" संध्या "   हरिराम हकलाए 

संध्या ने एक क्षण को हरिराम को देखा उसके चेहरे पर कोई घबराहट नहीं थी । उसने हल्के से कहा" हां " और चुप हो गई । 

फूलवती एक दम से सामने आई माट साहब बेकसूर हैं साहब

"चुप रहो तुम ,जब कुछ पूछा जाए तब बताना " बीईओ साहब ने फूलवती को झाड़ दिया । उन्होंने गांव के कुछ और लोगों से पूछताछ की जो अचानक उस दिन स्कूल आ गए थे । सब के दस्तखत कागज पर लिए और हरिराम से बोले “अब विभागीय कार्रवाई होगी।  शुक्र करो इस भली महिला का जो ये पुलिस में नहीं गई नहीं तो जेल की हवा खाते।" 

बीईओ बाहर निकल गए और भीड़ उनके पीछे-पीछे।

अगले दिन से  संध्या 20 दिन के मेडिकल लीव पर थी । हरिराम को ढेर सारे आरोपों के साथ निलंबित कर दिया गया था । चूंकि हरिराम निलंबित हो गए थे और सहायक अध्यापिका अस्वस्थ थी । डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी थी अतः पास के स्कूल से एक शिक्षा मित्र रौशन लाल को प्राथमिक विद्यालय पथरिया के पुरा में अग्रिम आदेशों तक संबद्ध कर दिया गया था ।भंवरपाल प्रफुल्लित मन से आज संध्या के घर चाय पीने जा रहा था । फूलवती दुखी थी और गांव के कुछ लोगों के लिए उसके मन से गालियां निकल रहीं थी । मंगल सिंह ने अभी बीड़ी का एक कश लिया था और उसका मन आज गाने का कर रहा था । उसने तान छेड़ दी थी 

माया§§§§§

महा ठगनी हम जानी ।




शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

गायत्री

 गायत्री छठवीं कक्षा में पढ़ती थी।नाम के अनुरूप उसमें कभी एक सहज उजाला था—वैसा उजाला, जो किसी दीपक से नहीं, भीतर की जिद से निकलता है। साँवला रंग, बड़ी-बड़ी आँखें… और उन आँखों में हमेशा कुछ पाने की बेचैनी। वह उन बच्चों में से थी जो सपने देखते नहीं, उन्हें पकड़ने दौड़ पड़ते हैं।लेकिन अब… वह चमक बुझ नहीं गई थी, बस जैसे किसी ने उस पर राख डाल दी हो।

दोपहर की धूप कुछ ढलने लगी थी, पर गर्मी अभी बाकी थी। स्कूल की घंटी बजी और जैसे किसी ने बंद बोतल का ढक्कन खोल दिया हो ।लड़कियाँ एक साथ मैदान की ओर उमड़ पड़ीं।

“खो… खो… खो… पकड़ उसको!”

“अरे दाईं तरफ से जा, बेवकूफ!”

हँसी, चीख, धूल… सब कुछ एक साथ उड़ रहा था।

दो टीमें बन चुकी थीं। एक तरफ बैठी लड़कियाँ, दूसरी तरफ दौड़ती हुई—पीछे से ‘खो’ देतीं, आगे वाली झपटतीं। खेल में वही पुराना जोश था—पर उसमें एक कमी थी, जो सिर्फ कुछ आँखों को दिख रही थी।मैदान के एक कोने में, नीम के पेड़ की आधी छाँव में, गायत्री बैठी थी।घुटनों को बाँहों में जकड़े, जैसे खुद को टूटने से बचा रही हो। ठुड्डी टिकाए, आँखें सामने… पर देख कहीं और रही थीं।उसके आसपास की दुनिया जैसे उससे अलग हो गई थी।

रानी ने दौड़ते-दौड़ते उसे देखा और अचानक रुक गई—

“अरे! तू यहाँ क्यों बैठी है?”

वह उसके पास आई, हाँफते हुए—

“चल न… तेरे बिना तो खेल अधूरा लगता है!”

गायत्री ने सिर उठाया। आँखों में वही पुरानी चमक खोजने की कोशिश की, पर सिर्फ थकान थी।

“मन नहीं है…” उसने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि जैसे खुद से कह रही हो।

रानी हँस पड़ी—

“मन नहीं है? ये भी कोई बात हुई! तू तो हमारी सबसे तेज खिलाड़ी है!”

गायत्री ने कुछ नहीं कहा।

रानी ने ध्यान से उसे देखा। यह वही लड़की नहीं थी जो हारने पर मिट्टी पर मुक्का मार देती थी और जीतने पर सबको खींच-खींचकर गले लगा लेती थी।

“तू ठीक तो है?” उसने इस बार गंभीर होकर पूछा।

गायत्री ने सिर हिलाया।

यह ‘हाँ’ था या ‘नहीं’—रानी समझ नहीं पाई। शायद गायत्री खुद भी नहीं।

कुछ पल दोनों चुप रहीं।

फिर मैदान से आवाज़ आई—

“रानी! जल्दी आ… तेरी बारी है!”

रानी ने एक बार फिर गायत्री को देखा। जैसे कुछ कहना चाहती हो—पर शब्द नहीं मिले।

“ठीक है… मत आ…” उसने हल्के से कहा, “पर ऐसे बैठ मत… अजीब लग रहा है।”

वह भाग गई।

और गायत्री फिर अकेली रह गई।

मैदान अब और शोर से भर गया था।

एक लड़की गिर पड़ी—सब हँस पड़ीं।

दूसरी ने लंबी दौड़ लगाई—तालियाँ बजीं।

सब कुछ सामान्य था।सिर्फ गायत्री नहीं।

वह चुपचाप बैठी रही। उसकी उंगलियाँ मिट्टी कुरेद रही थीं—बिना किसी मकसद के। जैसे वह खुद को जमीन में गाड़ देना चाहती हो।

उसने एक बार खेल की तरफ देखा।उसी जगह… जहाँ कभी वह खुद दौड़ती थी।उसे याद आया—

“खो!” कहकर वह कैसे बिजली की तरह निकलती थी।

पीछे वाली लड़की उसे पकड़ ही नहीं पाती थी।

पूरा मैदान चिल्लाता था—“गायत्री! भाग… भाग!”

और वह हँसती हुई और तेज भागती।उसके पैर जैसे जमीन को छूते ही नहीं थे।आज… वही पैर जैसे किसी अदृश्य बोझ से बँधे थे।

उसने आँखें बंद कर लीं।शोर कम नहीं हुआ… पर उससे उसका रिश्ता टूट गया।अब उसे सिर्फ अपने अंदर की आवाज़ सुनाई दे रही थी—

“भागो…”

“तेज…”

“पकड़ो…”

पर ये आवाज़ें बाहर की नहीं थीं।ये यादें थीं।और यादें, जब वर्तमान से टकराती हैं, तो दर्द पैदा करती हैं।

गायत्री ने आँखें खोलीं।

उसके सामने लड़कियाँ दौड़ रही थीं—जैसे जिंदगी आगे बढ़ रही हो।और वह… पीछे छूट गई थी।

“तू क्यों नहीं खेल रही?”

पास से गुजरती एक छोटी क्लास की लड़की ने पूछा।

गायत्री ने उसकी तरफ देखा—

“बस… ऐसे ही…”

“तुझे चोट लगी है क्या?” उसने मासूमियत से पूछा।

गायत्री के होंठ हल्के से हिले—

“हाँ… लगी है…”

लड़की ने तुरंत उसके पैर की तरफ देखा—

“कहाँ?”

गायत्री ने कोई जवाब नहीं दिया।

लड़की समझ नहीं पाई और आगे बढ़ गई।

घंटी बजी।खेल खत्म।

लड़कियाँ हाँफती हुई, हँसती हुई, एक-दूसरे को धक्का देती हुई क्लास की तरफ लौटने लगीं।

रानी फिर उसके पास आई—

“चल, अब तो उठ…”

गायत्री उठी।

धीरे-धीरे।जैसे हर कदम सोच-समझकर रख रही हो।

“कल खेलेगी ना?” रानी ने उम्मीद से पूछा।

गायत्री ने जवाब नहीं दिया। बस चलती रही।

उस दिन पहली बार रानी को लगा—

गायत्री सिर्फ खेल से नहीं, खुद से दूर हो रही है।और शायद… यह दूरी इतनी आसान नहीं होगी कि अगले दिन मिट जाए।


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गणित की कक्षा चल रही थी।

“गायत्री!”

मैडम की आवाज़ इस बार सिर्फ पुकार नहीं थी—एक तरह की खीझ थी, जो पिछले कई दिनों से जमा हो रही थी।

गायत्री चौंकी। जैसे किसी ने उसके भीतर चल रही सोच को अचानक झकझोर दिया हो।

“कहाँ खोई रहती हो आजकल?”

मैडम ने चश्मा थोड़ा ऊपर चढ़ाया, “बोर्ड पर आओ… और ये सवाल हल करो।”

क्लास में हलचल थम गई।गायत्री उठी।

धीरे-धीरे।

ऐसे जैसे किसी ने उसके पैरों में अदृश्य वजन बाँध दिया हो। पहले वह फुर्ती से उठती थी—आधी क्लास से पहले बोर्ड तक पहुँच जाती थी। आज हर कदम नापा हुआ था, थका हुआ।पीछे से कुछ लड़कियाँ एक-दूसरे को देख रही थीं।किसी ने फुसफुसाया—

“देखते हैं आज…”

गायत्री ने सुना… या शायद नहीं सुना। अब फर्क नहीं पड़ता था।वह बोर्ड के सामने खड़ी हो गई।चॉक उसके हाथ में था—पर पकड़ ढीली थी।

सवाल लिखा था—सरल भिन्नों का। वही तरह का सवाल, जिसे वह कभी बिना सोचे हल कर देती थी।

मैडम ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा—

“जल्दी करो।”

गायत्री ने सवाल पढ़ा।

एक बार।.....फिर दोबारा।

अक्षर साफ थे… संख्याएँ भी… पर अर्थ जैसे गायब था।उसका दिमाग कहीं और चला गया—

रात का दृश्य…

चारपाई पर लेटे पिता…

माँ की सिसकियाँ…

भाई का थका चेहरा…

“गायत्री!” मैडम की आवाज़ फिर आई।

वह चौंकी।

“हाँ…”

“लिखो।”

उसने चॉक बोर्ड पर रखा।

हाथ काँप नहीं रहा था… पर स्थिर भी नहीं था।

उसने पहला कदम लिखा…फिर दूसरा…और वहीं गलती हो गई।

मैडम तुरंत उठीं—

“रुको!”

उनकी आवाज़ तेज थी, सीधी।

“ये क्या कर रही हो तुम?”

गायत्री ने हाथ वहीं रोक लिया। चॉक बोर्ड से सटा हुआ था… जैसे वह भी आगे बढ़ने से हिचक रहा हो।

मैडम उसके पास आईं।उन्होंने बोर्ड की तरफ देखा… फिर गायत्री की तरफ।

“इतना आसान सवाल भी नहीं आता अब?”

आवाज़ में सिर्फ झुंझलाहट नहीं थी—एक तरह की निराशा थी।

गायत्री चुप रही।

“पहले तो तुम क्लास में सबसे आगे रहती थीं…”

मैडम ने धीरे-धीरे कहा, “हर सवाल सबसे पहले हल करती थीं… और अब?”

कोई जवाब नहीं।

सिर्फ झुकी हुई आँखें।ऐसी आँखें, जो किसी से मिलना नहीं चाहतीं।

क्लास में सन्नाटा था।अब कोई हँस नहीं रहा था।सब देख रहे थे—एक गिरावट… जो धीरे-धीरे सबके सामने खुल रही थी।

मैडम ने कुछ पल उसे देखा।फिर गहरी साँस ली।

“बैठ जाओ।”

इस बार आवाज़ में पहले वाली कठोरता नहीं थी। जैसे उन्हें अचानक एहसास हुआ हो कि डाँट से कुछ नहीं होगा।

गायत्री ने चॉक नीचे रखा।उसकी उँगलियों पर सफेद धूल लग गई थी।वह मुड़ी… और अपनी सीट की तरफ चल दी।पीछे से कई नजरें उसका पीछा कर रही थीं।कुछ में जिज्ञासा थी…कुछ में दया…और कुछ में वह हल्की-सी संतुष्टि, जो अक्सर दूसरों की गिरावट देखकर मिलती है।

वह अपनी जगह पर बैठ गई।...धीरे से।जैसे कोई आवाज़ भी न हो।

पास बैठी पिंकी झुकी—

“तू पढ़ती नहीं क्या अब?”

उसका लहजा सीधा था… पर उसमें हल्की-सी चुभन थी।

गायत्री ने उसकी तरफ नहीं देखा।उसने खिड़की की ओर नजर घुमा ली।बाहर पेड़ हिल रहे थे।हवा चल रही थी।सब कुछ सामान्य था।सिर्फ उसका मन नहीं।

“पढ़ती हूँ…” उसने धीरे से कहा।इतना धीरे… कि जैसे वह खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रही हो।

पिंकी ने होंठ सिकोड़े—

“फिर ऐसा कैसे?”

गायत्री ने कोई जवाब नहीं दिया।क्योंकि इस “कैसे” का जवाब किताबों में नहीं था।यह सवाल गणित का नहीं था।और इसका हल… उसके पास नहीं था।गायत्री सिर्फ सवाल नहीं भूल रही थी… वह खुद को खो रही थी।

शाम को जब गायत्री घर पहुँची, तो दरवाज़ा वैसा ही था—पुराना, हल्का-सा टेढ़ा, जिसकी कुंडी हमेशा अटकती थी। उसने आदत से दरवाज़े को थोड़ा ज़ोर से धक्का दिया। वही चरमराहट हुई।

सब कुछ वैसा ही था। और… कुछ भी वैसा नहीं था।

आँगन में धूप का एक टुकड़ा पड़ा था, जो धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ रहा था। पहले इसी समय घर में हलचल होती थी—बर्तन खड़कते, माँ की आवाज़, और सबसे ऊपर… पिता की हँसी।

“गायत्री आ गई!”

उनकी भारी, खुश आवाज़ गूंजती थी।

आज…आवाज़ नहीं थी।खामोशी थी—गाढ़ी, चिपचिपी, जैसे हवा में ही जम गई हो।गायत्री ने एक कदम अंदर रखा, फिर दूसरा… और वहीं रुक गई।आँगन के कोने में चारपाई पड़ी थी।वही पुरानी चारपाई जिस पर कभी पिता शाम को बैठकर चाय पीते थे, रेडियो सुनते थे, और मोहल्ले के लोगों से ऊँची आवाज़ में बहस करते थे।आज उसी चारपाई पर वे लेटे थे। .....सीधे,  ...बिल्कुल स्थिर।उनका चेहरा अंदर की तरफ था, पर आँखें खुली थीं—छत को घूरती हुई।

गायत्री की नज़र अनायास नीचे खिसकी…और वहीं अटक गई।

जहाँ कभी उनके पैर होते थे… वहाँ अब कुछ नहीं था।कंबल समतल पड़ा था—अजीब तरह से समतल।जैसे किसी ने कहानी के बीच से एक पूरा अध्याय फाड़ दिया हो।गायत्री के गले में कुछ अटक गया।उसने तुरंत नज़र हटा ली। जैसे देखना ही कोई गलती हो।उसके कदम अपने आप धीमे हो गए। वह चाहती थी कि उसके चलने की आवाज़ भी न हो। जैसे आवाज़ होगी तो सच और भारी हो जाएगा।

चारपाई पर पड़े उसके पिता ने हल्की-सी हरकत की। शायद उन्हें उसके आने का आभास हुआ था।

“आ गई…” उन्होंने कहा।

आवाज़ वही थी… पर उसमें कुछ टूट गया था।

पहले यह आवाज़ भर देती थी—घर को, मन को।आज वही आवाज़ खाली लग रही थी।गायत्री ने जवाब नहीं दिया।उसने सिर्फ हल्का-सा सिर हिलाया—जो उन्होंने देखा भी नहीं।

अंदर से माँ की आवाज़ आ रही थी—

“हे भगवान… क्या बिगाड़ा था हमने…”

वह रो नहीं रही थीं अब। यह रोने के बाद की आवाज़ थी—थकी हुई, सूखी, जिसमें आँसू खत्म हो जाते हैं पर दर्द नहीं।

“किसका पाप था… जो ये दिन दिखाया…”

गायत्री ने एक पल को आँखें बंद कर लीं।

यह आवाज़ अब नई नहीं थी। पिछले कुछ दिनों से यह घर की दीवारों में बस गई थी—जैसे पुराना दाग, जो धुलता नहीं।

वह चुपचाप अंदर गई।

बैग कंधे से उतारा। पहले वह बैग फेंक देती थी—सीधे चारपाई पर या कोने में। आज उसने उसे धीरे से रखा।जैसे किसी चीज़ को संभालकर रखना जरूरी हो गया हो।वह दीवार के सहारे बैठ गई।घुटने मोड़कर।ठीक वैसे ही जैसे मैदान में बैठी थी। यहाँ शोर नहीं थायहाँ खामोशी थी—और खामोशी में हर आवाज़ और साफ सुनाई देती है।

चारपाई की हल्की चरमराहट…

माँ की टूटी हुई बुदबुदाहट…

और बीच-बीच में पिता की धीमी साँसें…

गायत्री ने एक बार फिर चोरी-छिपे उनकी तरफ देखा।उनका चेहरा अब पहले जैसा नहीं था। उसमें एक अजीब-सी हार थी ।जैसे आदमी नहीं, उसकी परछाईं बची हो।वह आदमी जो कभी पूरे घर को चलाता था… अब खुद हिल नहीं सकता था।

गायत्री की आँखें फिर नीचे जाने लगीं…वह तुरंत सीधी बैठ गई।नहीं देखना था।क्योंकि जितना देखती… उतना ही सच अंदर उतरता।और वह सच भारी था—इतना भारी कि एक छठवीं की लड़की के कंधे उसे उठा नहीं सकते थे।

अंदर से माँ बाहर आईं।आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए।

उन्होंने गायत्री को देखा—

“आ गई?”

“हाँ…” गायत्री ने धीमे से कहा।

“खाना खा ले…”

यह आदेश नहीं था। न ही प्यार। यह सिर्फ एक आदत थी—जो हालात के बावजूद चल रही थी।

गायत्री उठी नहीं।वह वैसे ही बैठी रही।

माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।फिर अचानक जैसे भीतर का दर्द फिर उभर आया—

“देख लिया ना… क्या हो गया…”

उनकी आवाज़ काँपी।

“कितना समझाया था… पर सुनता कौन है…”

गायत्री चुप रही।वह जानती थी—यह बातें अब किसी के लिए नहीं थीं। न पिता के लिए, न उसके लिए।यह सिर्फ दर्द था… जो बाहर आ रहा था।

चारपाई पर पड़े उसके पिता ने करवट लेने की कोशिश की।शरीर हिला… पर अधूरा।उन्होंने दाँत भींचे।

“चुप कर…” उन्होंने धीमे से कहा, माँ की तरफ देखे बिना।

आवाज़ में झुंझलाहट नहीं थी… थकान थी।

माँ चुप हो गईं।घर फिर खामोश हो गया।

गायत्री ने दीवार पर नजर टिकाई।दीवार पर एक पुराना कैलेंडर टंगा था। तारीखें बदल रही थीं।पर उसके जीवन की तारीख… जैसे वहीं अटक गई थी—उस दिन पर, जिस दिन सब बदल गया था।

उसने धीरे से अपनी उंगलियाँ आपस में कस लीं।जैसे खुद को संभाल रही हो।पर भीतर कहीं…कुछ टूट चुका था।और वह जानती थी—यह टूटना अब आसानी से नहीं जुड़ेगा।

उसे सब याद था।

यादें भी अजीब चीज़ होती हैं—जब वर्तमान सहने लायक नहीं रहता, तो वही बीते हुए दिन बार-बार लौटकर आते हैं। जैसे कोई पुराने घाव पर उँगली रख-रखकर पूछ रहा हो—“दर्द यहीं है न?”

गायत्री की यादों में उसके पिता हमेशा हँसते हुए ही आते थे।

वे टेम्पो चलाते थे। सुबह अँधेरा रहते ही निकल जाते—कंधे पर गमछा, और हाथ में चाभी

“चल बिटिया, पढ़-लिख ले… हम चलते हैं रोटी कमाने।”

गायत्री उनींदी आँखों से दरवाज़े तक जाती—

“जल्दी आना…”

“तेरे लिए कुछ लाऊँगा,” वे कहते

दिन भर की धूल, पसीना और शहर की धक्कामुक्की लेकर जब वे शाम को लौटते, तो उनके कपड़ों से मेहनत की गंध आती थी, कठोर, पर सच्ची, और जैसे ही उनकी नज़र गायत्री पर पड़ती…चेहरा खिल उठता।थकान जैसे दरवाज़े पर ही उतर जाती।

“आ गई मेरी अफसर!” वे ऊँची आवाज़ में कहते।

गायत्री दौड़कर उनसे लिपट जाती—

“आज क्या लाए?”

कभी टॉफी, कभी संतरा, कभी कुछ नहीं—पर हर दिन एक जैसा उत्साह।

“मेरी बिटिया तो एक दिन अफसर बनेगी!”

वे अक्सर कहते, जैसे यह कोई भविष्यवाणी नहीं, पक्की सच्चाई हो।

गायत्री भी कम नहीं थी—

“हाँ! और आपको सलाम करवाऊँगी!”

“हमसे?” वे हँसते।

“हाँ, रोज़!”

वह गर्दन तानकर खड़ी हो जाती—“सलाम करो!”

वे तुरंत खड़े हो जाते, मज़ाक में सीना तानकर—

“जी हुज़ूर!”

दोनों हँसते।

माँ रसोई से झल्लाकर कहती—

“बाप-बेटी दोनों पागल हैं!”

पर उनके चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ जाती।

लेकिन यह सब रात के पहले तक था।जैसे ही अँधेरा घिरता…कुछ बदलने लगता।पिता पहले हाथ-मुँह धोते… फिर कुछ देर इधर-उधर बैठते… और फिर बिना कुछ कहे बाहर निकल जाते।

गायत्री जानती थी—कहाँ।

माँ भी जानती थी।

वह चुप नहीं रहती थी।

“फिर जा रहे हो?”

आवाज़ में तंज होता था।

पिता टालते—

“अरे, बस ऐसे ही… दोस्तों के पास…”

“दोस्त नहीं, दारू के पास!” माँ तीखी हो जाती।

पिता हँस देते—

“अरे थोड़ा-सा ही तो…”

यह “थोड़ा-सा” हर दिन वही रहता था—पर उसका असर हर दिन थोड़ा और गहरा होता जाता था।माँ का धैर्य भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा था।

“यही थोड़ा-थोड़ा एक दिन सब खत्म कर देगा!”

वह गुस्से में कहती।

पिता उस वक्त सुनते नहीं थे… या सुनना नहीं चाहते थे।

रात को जब वे लौटते, तो कदम लड़खड़ाते नहीं थे हमेशा, पर आवाज़ बदल जाती थी। आँखें लाल होती थीं। और सबसे ज़्यादा… गंध। शराब की तीखी, कड़वी गंध।

गायत्री को वह गंध बिल्कुल पसंद नहीं थी।वह नाक सिकोड़ लेती—

“दूर रहो… बदबू आती है!”

पिता हँसते—

“अरे, इतना भी क्या…”

“मैं बात नहीं करूँगी आपसे!”

वह मुँह फेर लेती।उसकी नाराज़गी सच्ची होती थी—बचपने वाली, पर साफ।

पिता उसके पास बैठते—

“अच्छा बाबा, नहीं पियेंगे… पक्का।”

“सच?”

“हाँ, तेरी कसम।”

गायत्री थोड़ी देर उन्हें देखती… फिर धीरे-धीरे पिघल जाती।

“ठीक है… आखिरी बार।”

“आखिरी बार,” वे दोहराते।

लेकिन यह ‘आखिरी बार’ कभी आखिरी नहीं होता था।अगले दिन फिर वही।सुबह फिर … वही हँसी… वही वादे…और शाम होते-होते फिर वही रास्ता।

माँ की झुंझलाहट अब आदत बन चुकी थी।

“कहते-कहते थक गई हूँ…”

वह बड़बड़ाती।

“तुम भी तो हर दिन कहती हो,” पिता हँसते हुए जवाब देते।

“और तुम हर दिन सुनकर भी नहीं सुनते!”

माँ तड़प जाती।

गायत्री बीच में खड़ी रहती।

एक तरफ माँ का गुस्सा…दूसरी तरफ पिता की हँसी…और वह तय नहीं कर पाती थी—किसे सही माने।उसे बस इतना समझ आता था—

पापा अच्छे हैं… लेकिन ये दारू बुरी है।और यह बुरी चीज़ धीरे-धीरे उसके अच्छे पापा को खा रही थी।

कभी-कभी वह सोचती अगर दारू एक इंसान होती, तो वह उससे लड़ती ,उससे कहती—

“मेरे पापा को छोड़ दो।”

पर दारू कोई इंसान नहीं थी।वह एक आदत थी।और आदतें… धीरे-धीरे आदमी को अपने जैसा बना देती हैं।

आज जब वह चारपाई पर पड़े अपने पिता को देखती है…तो उसे वही हँसता हुआ चेहरा याद आता है।और फिर वही सवाल—क्या यह वही आदमी है?या वह आदमी कहीं रास्ते में… उसी “थोड़ा-सा” में खो गया?

उसे वह हादसा याद था ।उस दिन बारिश हो रही थी।वैसी बारिश नहीं, जो खेतों को हरियाली दे—यह शहर की बारिश थी। गंदी, चिपचिपी, सड़कों को कीचड़ में बदल देने वाली। आसमान से गिरता पानी जैसे सिर्फ भीगाता नहीं था, फिसलाता भी था।सड़क चमक रही थी ।ऐसे मौसम में समझदार आदमी गाड़ी धीरे चलाता है।पर उस दिन समझदारी किसी के पास नहीं थी।पिता नशे में थे।नशा ऐसा नहीं था कि आदमी गिर पड़े—बस इतना था कि उसे लगे वह सब संभाल सकता है।और यही सबसे खतरनाक होता है।

टेम्पो स्टार्ट हुआ। इंजन ने घर्र-घर्र की आवाज़ की।बारिश की बूँदें शीशे पर पड़ रही थीं—टक… टक… टक…वाइपर चल रहा था, पर हर बार साफ करने के बाद भी पानी फिर भर जाता।दुनिया धुंधली थी।और धुंधली दुनिया में आदमी अक्सर गलत फैसले लेता है।

पिता ने एक्सीलेरेटर दबाया।टेम्पो आगे बढ़ा—थोड़ा डगमगाता हुआ, पर चल रहा था।सड़क पर गड्ढे थे। पानी भरा था।कहाँ गड्ढा है, कहाँ सड़क—समझना मुश्किल था।पर नशे में आदमी को लगता है—सब साफ दिख रहा है।

एक मोड़ आया।साधारण-सा मोड़।जिसे पिता सैकड़ों बार पार कर चुके थे।पर उस दिन वह मोड़ वही नहीं था।या शायद… पिता वही नहीं थे।टेम्पो तेज था।थोड़ा ज़्यादा तेज।

टायर ने पकड़ खोई।

बस एक पल।एक छोटा-सा पल—जो जिंदगी और बर्बादी के बीच होता है।

फिसलन।

स्टीयरिंग घूमता है… हाथ संभाल नहीं पाते…

और फिर—

धड़ाम।

टेम्पो सड़क छोड़कर नीचे खड्ड में चला गया।

आवाज़ गूँजी।

बारिश चलती रही।

कुछ सेकंड के लिए सब शांत।

फिर…शोर।

“अरे! गिर गया!”

“जल्दी देखो!”

“कोई है अंदर!”

लोग दौड़े।

किसी ने टॉर्च निकाली।

किसी ने फोन किया।

टेम्पो उल्टा पड़ा था।लोहे का ढांचा मुड़ गया था—जैसे कागज़ हो।अंदर… पिता फँसे थे।खून बह रहा था।बारिश उस खून को धो रही थी—पर खत्म नहीं कर पा रही थी।

“साँस चल रही है!”किसी ने कहा।

“जल्दी निकालो!”

हाथ बढ़े। शरीर खींचा गया।कपड़े फटे। खून और कीचड़ एक हो गए।

पिता बेहोश थे।शायद उन्हें दर्द का अंदाज़ा नहीं था।या शायद… शरीर इतना टूट चुका था कि दर्द भी हार मान चुका था।

अस्पताल..सफेद दीवारें....तेज रोशनी....दवाइयों की गंध....और इंतज़ार।

माँ वहाँ पहुँची। भीगी हुई… बिखरी हुई… साँसें तेज।

“कहाँ हैं?”

उसने घबराकर पूछा।

किसी ने इशारा किया।

स्ट्रेचर पर पड़े थे पिता।

चेहरा पीला...आँखें बंद....नीचे चादर भीगी हुई… लाल।

माँ की चीख निकली—

“हे भगवान!”

वह उनके पास दौड़ी।

“ये क्या कर दिया तुमने…”

यह सवाल नहीं था...यह टूटन थी।

डॉक्टर आए।

सफेद कोट… ठंडा चेहरा… व्यस्त आँखें।

उन्होंने जल्दी-जल्दी जाँच की।

एक-दूसरे से धीमी आवाज़ में बात की। फिर माँ की तरफ मुड़े।

“देखिए…”

उनकी आवाज़ सीधी थी, बिना भाव के—

“चोट बहुत गंभीर है।”

माँ कुछ समझ नहीं पाई।

“क्या मतलब?”

डॉक्टर ने एक पल को रुककर कहा—

“जान बचानी है तो… दोनों पैर काटने होंगे।”

कमरे में जैसे आवाज़ जम गई।

माँ ने सुना… पर समझ नहीं पाई।

“क्या…?”

“गैंगरीन फैल जाएगा… खून रुक नहीं रहा… देर हुई तो मरीज नहीं बचेगा।”

सीधी, साफ भाषा।जैसे कोई गणित का सवाल समझा रहा हो।पर यह गणित नहीं था।यह जिंदगी थी।

माँ की आँखें फैल गईं।

“नहीं… नहीं… ऐसा मत कहिए…”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

“कोई और रास्ता…”

डॉक्टर ने सिर हिला दिया—

“नहीं है।”

एक शब्द।

कठोर।

अंतिम।

माँ वहीं बैठ गई जमीन पर।

“हे भगवान…”

उसकी चीख इस बार अंदर से निकली।

गायत्री पास खड़ी थी...छोटी...चुप।

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

“पैर काटने होंगे” — यह वाक्य उसके कानों में गूँज रहा था।

पर उसका मतलब वह नहीं समझ पा रही थी।

उसने माँ को रोते देखा… डॉक्टर को जाते देखा… लोगों को फुसफुसाते देखा…

और फिर स्ट्रेचर को ऑपरेशन थिएटर की तरफ जाते देखा।

दरवाज़ा बंद हुआ...लाल बत्ती जल गई।...उस रात… कुछ खत्म हो गया....और कुछ ऐसा शुरू हुआ… जिसका नाम भी गायत्री नहीं जानती थी।उसे बस इतना समझ आया—अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।

गायत्री का एक बड़ा भाई है—राहुल। दसवीं में पढ़ता था।

“था”—क्योंकि अब वह सिर्फ कागज़ पर छात्र है, ज़िंदगी में नहीं।

पढ़ने-लिखने में तेज। उन लड़कों में से, जो किताब खोलते हैं तो शब्द उनके लिए अजनबी नहीं होते। मास्टर लोग नाम लेकर सवाल पूछते थे—

“राहुल, तुम बताओ…”

और वह बिना हड़बड़ाए जवाब दे देता था। गणित उसका खेल था।

गायत्री को वह रोज़ बैठाकर सवाल समझाता—

“देख, ऐसे मत सोच… ये लंबा तरीका है। शॉर्टकट पकड़।”

वह कागज़ पर दो-तीन लाइन लिखता… और जवाब सामने।

गायत्री की आँखें चमक उठतीं—

“इतनी जल्दी?”

“दिमाग लगाना पड़ता है,” वह हँसता, “रटने से कुछ नहीं होता।”

कभी-कभी वह अंग्रेज़ी भी सिखाता—

“बोल—My name is Gayatri.”

गायत्री हँसती—

“माय नेम इज… गायत्री।”

“अरे ‘इज’ नहीं, ‘इज़’… ज़ोर से बोल!”

“इज़!”

दोनों हँस पड़ते।

“एक दिन तू अंग्रेज़ी में ही बात करेगी,” राहुल कहता।

“और तुम?”

“मैं? मैं तो मास्टर बनूँगा… ”

उसकी आँखों में सपने थे—साफ, सधे हुए।उसे रास्ता दिखता था।लेकिन रास्ते हमेशा सीधे नहीं रहते।कभी-कभी एक हादसा पूरे नक्शे को बदल देता है।

अब राहुल सुबह किताब लेकर नहीं बैठता।सुबह वह जल्दी उठता है—पर पढ़ने के लिए नहीं...काम पर जाने के लिए।हाथ-मुँह धोकर, बिना कुछ बोले, वह बाहर निकल जाता है।उसके कपड़े अब स्कूल यूनिफॉर्म नहीं हैं—ढीली-सी पैंट, पुरानी शर्ट, जिस पर धूल जमी रहती है।

वह सुखविंदर सिंह के ट्रक पर क्लीनर है।“क्लीनर”—नाम छोटा है, काम लंबा। ट्रक साफ करना, टायर देखना, ड्राइवर के इशारे समझना, बीच-बीच में सामान लोड करवाना… और सबसे ज़्यादा—चुप रहना।

सुखविंदर सिंह मोटा आदमी है, ऊँची आवाज़ वाला।

“ओए राहुल! जल्दी कर… टाइम नहीं है!”

वह गरजता है।

राहुल “हाँ सरदार जी” कहता है और दौड़ पड़ता है।

पहले वह दौड़ता था मैदान में।अब वह दौड़ता है काम के पीछे।

फर्क सिर्फ इतना नहीं है, पहले दौड़ में खुशी थी...अब मजबूरी है।

ट्रक के नीचे घुसकर जब वह ग्रीस से सने हिस्सों को छूता है, तो उसकी उँगलियाँ काली हो जाती हैं,   वही उँगलियाँ, जो कभी कॉपी पर साफ-सुथरे अक्षर लिखती थीं। वह कभी-कभी हाथ देखता है… और एक पल के लिए ठहर जाता है,   फिर खुद ही हँस देता है—

“काम करने से कोई छोटा नहीं होता…”

यह बात उसने कहीं सुनी थी।अब खुद को समझाने के काम आती है।शाम को जब वह घर लौटता है, तो थका हुआ होता है।शरीर से भी… और थोड़ा-सा भीतर से भी।

गायत्री उसे देखती है।पहले वह आते ही कहता था—

“चल, आज नया सवाल सिखाता हूँ!”

अब वह बैठ जाता है।

चुपचाप।

माँ पूछती है—“कुछ खाएगा?”

“जो है दे दो,” वह कहता है।

सीधा जवाब। बिना मांग के।

गायत्री धीरे से उसके पास बैठती है—

“भइया… ये सवाल समझा दो…”

राहुल कॉपी लेता है। देखता है। समझाता भी है—

“देख, ऐसे…”

पर उसकी आवाज़ में पहले वाली चमक नहीं है।वह बीच-बीच में रुक जाता है।जैसे दिमाग कहीं और चला जाता हो।

गायत्री देखती है—

“भइया… आप ठीक हो?”

राहुल एक पल उसे देखता है।फिर मुस्कुरा देता है—

“हाँ, बिल्कुल।”

यह वही मुस्कान है… जो लोग दूसरों को दिलासा देने के लिए पहन लेते हैं।

एक दिन गायत्री ने पूछा—

“आप स्कूल नहीं जाओगे अब?”

सवाल सीधा था।

राहुल ने कुछ पल चुप रहकर जवाब दिया—

“देखेंगे…”

“मतलब?”

“मतलब… अभी घर ज़रूरी है।”

इतना कहकर वह उठ गया।बात वहीं खत्म हो गई।पर गायत्री के अंदर नहीं।

मोहल्ले में लोग कहते हैं—

“अच्छा लड़का है राहुल… जल्दी ड्राइवर बन जाएगा।”

यह तारीफ़ है… या तसल्ली—कोई तय नहीं करता।राहुल भी नहीं।

उसे पता है—ड्राइवर बनना बुरा नहीं है। पर यह उसका सपना नहीं था।सपना कुछ और था।और अब…सपनों को उसने मोड़कर कहीं रख दिया है—जैसे पुरानी किताब, जो अभी काम की नहीं।

रात को कभी-कभी वह छत पर चला जाता है।आसमान देखता है।कुछ सोचता है।शायद हिसाब लगाता है—कितना कमाना है…कितना बचाना है…घर कैसे चलेगा…

या शायद वह कुछ नहीं सोचता।

सिर्फ देखता है। क्योंकि कुछ सवाल ऐसे होते हैं…जिनका जवाब सोचना भी थका देता है।

गायत्री उसे देखती है।

उसे याद आता है—वही राहुल जो उसे “इज़” और “इज” का फर्क सिखाता था।

और अब…

वह खुद ज़िंदगी का फर्क सीख रहा है—

पढ़ाई और पेट के बीच का फर्क।

और यह फर्क…किसी किताब में नहीं पढ़ाया जाता।


सब सो गए थे।

या शायद—सबने आँखें बंद कर ली थीं। नींद किसी को आई थी या नहीं, यह अलग बात थी।घर में अँधेरा था। बस एक कोने में जलती मद्धम-सी बल्ब की रोशनी, जो दीवार पर पीला धब्बा बनाकर रह गई थी। उसी धब्बे के नीचे गायत्री लेटी थी।

आँखें खुली हुई।छत को देखती हुई।पंखा घूम रहा था—धीमे… थका हुआ… जैसे उसे भी जल्दी नहीं है कहीं पहुँचने की।उसकी हर घुमाव के साथ एक हल्की-सी आवाज़ आती—

टक… टक… टक…

और उस आवाज़ के बीच… गायत्री के मन में शोर था।बिना आवाज़ का शोर।

“भइया अब पढ़ नहीं पाएंगे…”

उसने सोचा।

राहुल का चेहरा सामने आया—धूल से भरा, थका हुआ, पर मुस्कुराने की कोशिश करता हुआ।वही राहुल, जो कहता था—

“दिमाग लगाना पड़ता है…”

अब वही दिमाग… शायद पैसों का हिसाब लगाने में लग रहा था।घर तो चलना ही पड़ेगा ।

“पापा काम नहीं कर सकते…”

चारपाई की तरफ उसका ध्यान गया।अँधेरे में भी वह आकृति दिख रही थी—स्थिर, भारी, अधूरी।वह आदमी, जो कभी पूरे घर का सहारा था… अब खुद सहारे पर था।

“माँ अकेली है…”

माँ की धीमी साँसों की आवाज़ आ रही थी। शायद सो गई थीं।या शायद थककर चुप हो गई थीं।दिन भर रोने के बाद… शरीर भी हार मान लेता है।

“और मैं?”

यह सवाल बाकी सब सवालों से बड़ा था।गायत्री ने करवट बदली।छत वही थी।पर अब उसे लग रहा था—वह नीचे दब रही है।उसका गला भर आया।आँखों से आँसू बह निकले।कोई आवाज़ नहीं।बस गीली होती हुई तकिया।

उसने होंठ भींच लिए।जैसे रोना भी अब किसी को सुनाना नहीं है।

“मेरी आगे की पढ़ाई कैसे होगी?”

यह सवाल उसने पहली बार नहीं सोचा था।पर आज… यह सवाल उसके भीतर अटक गया था।जैसे गले में फँसी हड्डी।न निकलती है… न निगली जाती है।उसने आँखें बंद कीं पर अँधेरा और गहरा हो गया।

उसे स्कूल याद आया।

मैदान…

खो-खो…

रानी…

मैडम…

और बोर्ड पर खड़ा वह सवाल।

सब कुछ धुंधला था।सिर्फ एक चीज़ साफ थी—वह पीछे छूट रही है।

 उसने हाथ बढ़ाकर अपनी कॉपी उठाई।

अँधेरे में ही।

पन्ने पलटे।

एक सवाल सामने था—अधूरा।वही सवाल… जो उसने शाम को नहीं समझा था।

उसने उसे देखा।

अक्षर धुंधले थे—आँसुओं की वजह से… या अँधेरे की वजह से… पता नहीं।

उसने उँगली से उन संख्याओं को छुआ।धीरे-धीरे,जैसे किसी पुराने दोस्त को पहचानने की कोशिश कर रही हो।

उसे राहुल की आवाज़ याद आई—

“शॉर्टकट पकड़…”

मैडम की आवाज़—

“ध्यान लगाओ…”

पिता की आवाज़—

“मेरी बिटिया अफसर बनेगी…”

तीनों आवाज़ें एक साथ गूँज उठीं।

उसने आँखें खोलीं।

अँधेरा वैसा ही था।

पर उसके भीतर कुछ हल्का-सा हिला।

बहुत छोटा।

बहुत कमजोर।

पर था।

वह उठकर बैठ गई. धीरे से।चारों तरफ देखा।कोई नहीं जागा।अच्छा है।कुछ चीज़ें अकेले ही शुरू होती हैं।

उसने फिर कॉपी खोली।इस बार ध्यान से देखा।सवाल वही था। उसने चॉक की जगह उँगली से हवा में हल करना शुरू किया।

पहला कदम।

गलत।

दूसरा।

फिर गलत।

वह रुकी।

एक पल को लगा—छोड़ दे।

जैसे सब छोड़ रहे हैं।

पर फिर…

पता नहीं क्यों…

उसने फिर कोशिश की।

तीसरी बार...धीरे-धीरे...संभलकर।

और इस बार…

कुछ ठीक बैठा।

पूरा नहीं।

पर थोड़ा।

उसने हल्की-सी साँस ली।जैसे किसी ने भीतर से कसाव ढीला किया हो।उसी वक्त बाहर से हल्की-सी आवाज़ आई।

मुर्गे की पहली बांग।

सुबह होने की सूचना।बहुत हल्की।पर साफ।गायत्री ने खिड़की की तरफ देखा।अभी अँधेरा था।पर कहीं दूर… बहुत दूर…एक हल्की-सी रेखा उभर रही थी।सुबह की।

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