अध्याय 1 — दिल्ली की हवा _इत्र भी, बारूद भी ।
दिल्ली की सुबह का रंग बड़ा धोखे बाज़ था ।दूर से देखो तो हवा में शरबत की सी मिठास लग रही थी ,क़रीब जाओ तो वही हवा धूल, और उधड़े साम्राज्य की बू लिए हुए थी ।लाल क़िले की बुर्ज़ियों पर बैठे कबूतर जैसे हर रोज़ यह तमाशा देखते-देखते थक चुके हों। किले की दीवारों में इतनी दरारें पड़ चुकी थीं कि अगर कोई बच्चा भी ठीक से उँगली फेर दे तो शायद ईंटों के नीचे छुपी सदी भर की शर्म बाहर गिर पड़े।
बहादुर शाह ज़फ़र—हिंदुस्तान का बादशाह, मुगलिया ख़ून का आख़िरी चिराग़,और असल में एक ऐसा बूढ़ा आदमी जिसकी ताक़त उसके लिखे शेरों में ज़्यादा थी,बजाए उसके राज-पाट में।
सुबह-सुबह वह अपने कमरे से निकल कर धीमी चाल से किले के गलियारों के बीच चलता रहा।उनकी चाल में वही भारीपन था जो किसी ऐसे शख़्स में होता है जिसका मुक़द्दर दूसरों ने तय कर रखा हो।
“हुज़ूर, आपकी तबीयत कैसी है आज?”
ख़्वा_जासरा मुबारक ने नर्म आवाज़ में पूछा।
ज़फ़र ने चेहरे पर हल्की सी मुस्कान चिपकाई—वही मुस्कान जो लोग बीमारी में डॉक्टर को दिखाते हैं और ग़रीबी में महाजन को।
“तबीयत?” ज़फ़र ने कहा, “जब इंसान के इख़्तियार छिन जाए तो तबीयत और तख़्त—दोनों एक जैसे लगते हैं,
खाली और बेकार।”
मुबारक के पास कोई जवाब नहीं था। वह बस इतना जानता था कि ज़फ़र अपने ही साम्राज्य के किरायेदार की तरह रह गए थे।
बाहर चाँदनी चौक की तरफ़ से आवाज़ें आ रही थीं—
ताँगे वाले की गाली, किसी कबाड़ी की आवाज़,रंगरेज़ की दुकान से उठती सस्ती इत्र की महक,और इन सबके बीच एक ऐसा बेचैन सन्नाटा जो दिल्ली की नसों में धीरे-धीरे फैल रहा था।
ज़फ़र ने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा। कबूतरों का झुंड उड़ता हुआ गुज़र रहा था। उन्होंने बुदबुदाकर कहा—“इन पर कोई सल्तनत नहीं चलती।ना कोई कंपनी, ना कोई फ़रमान।सच कहूँ, मुबारक…इन पर मुझे रश्क आता है।”
मुबारक ने हल्का सा सिर हिलाया।कभी-कभी उसे लगता था कि ज़फ़र अपनी पूरी ज़िंदगी बस यही सोचते रह गए—कि उन्हें किसने बादशाह बना दिया और क्यों।
नीचे से एक हकीम आया। बादशाह की नाड़ी देखी, दवा लिखी, और बोला—“हुज़ूर, चिन्ता कम कीजिये।”
ज़फ़र हँसे—वही हँसी जिसमें थोड़ा फ़लसफ़ा था ,थोड़ा मज़ाक,और थोड़ा सा वह दर्द जो पर्दे के पीछे ही अच्छा लगता है।
“चिन्ता कम कर लूँ ? हकीम साहब…जब आपकी उम्र काग़ज़ की तरह पतली हो जाए तो उस पर डर की स्याही जल्दी फैलती है।”
हकीम चुप।
ज़फ़र धीमे स्वर में बोले—
“कई दिनों से दिल्ली की हवा में अजीब-सी गंध है,जैसे कोई आग छुपकर सुलग रही हो…मुबारक, क्या तुम्हें भी महक आती है ?”
मुबारक ने दुआ की तरह हाथ जोड़े—
“हुज़ूर, ये शहर हमेशा कुछ न कुछ पकाता रहता है।कभी अमन, कभी फ़ितना, कभी ख्वाब।”
ज़फ़र ने आँखें बंद कर लीं।उन्हें नहीं पता था कि जिस आग की महक वे महसूस कर रहे हैं वह उनके अपने पाँवों की तरफ़ ही बढ़ रही है।
दिल्ली की हवा इतनी मुलायम भी नहीं थी और इतने शराफ़त वाली भी नहीं—कि बादशाह को यूँ ही छोड़ देती।
किले के बाहर, भीड़ की रगों में एक हल्का कंपन उठ रहा था।
और किले के अंदर,
एक बीमार बूढ़े बादशाह के दिल में बेचैनी का कीड़ा धीरे-धीरे जाग रहा था।उस सुबह ज़फ़र को अंदाज़ा नहीं था—कि महक चाहे इत्र की होया बारूद की—हवा कभी बेकार नहीं जाती।वह किसी न किसी का नाम ज़रूर लेती है।
और इस बार हवा ने जो नाम चुना था…वह एक ऐसा नाम था जो खुद अपनी ही ज़िंदगी से बेख़बर था—और वह नाम था
बहादुर शाह ज़फ़र।
अध्याय 2 — मेरठ का धुआँ, दिल्ली की बेकरारी
दिल्ली से कुछ ही कोस दूर मेरठ की फिज़ा में एक अजीब-सी खड़खड़ाहट थी—जैसे किसी ने रात के सन्नाटे में पुरानी दराँती पत्थर पर घिस दी हो। लोग कहते थे हवा में चिंगारी है,पर किसे पता था कि वो चिंगारी इतनी दूर तक जाएगी कि दिल्ली की दीवारें भी सुलग उठेंगी।
शाम ढल चुकी थी।
दिल्ली शहर ने अपने चिर-परिचित शोर को धीरे-धीरे समेट कर रात की टोपी में बंद कर दिया था।लेकिन उस रात असमान पर तारों से ज्यादा अफवाहें चमक रही थीं।
चाँदनी चौक के नुक्कड़ पर महिंदर हलवाई ने दुकान समेटते हुए कहा,
“सुना है मेरठ में कुछ गड़बड़ हुई है।”
उसके पड़ोसी चूड़ी वाले ने तंज़ किया—
“गड़बड़? अरे मियाँ, जब हिन्दुस्तान की रगों में कंप कंपी उठती है न, तो सबसे पहले ऐसे ही ‘सुना है’ सुनाई देता है।कल तक ‘देखा है’ भी हो जाएगा।”
पास में बैठे एक बुज़ुर्ग ने हुक्का सुलगाया और धुआँ छोड़ते हुए बोला,
“बेटा, यह शहर ऐसे वक्तों में खुद से भी झूठ बोलने लगता है। दिल्ली को लगता है उसके सिर पर आसमान है…पर असल में आसमान बहुत पहले गिर चुका है।”
नज़दीक ही एक ख़ानसामे ने फुसफुसाकर कहा—
“कहते हैं सिपाहियों ने कंपनी के ख़िलाफ़ बंदूक उठा ली।”
किसी ने मज़ाक उड़ाया,
“अरे छोड़ो भी, ये सिपाही किसके लिए लड़ेंगे? अपनी बीवी-बच्चा तो पाल नहीं पाते, कंपनी क्या गिराएँगे!”
पर जैसे-जैसे रात आगे बढ़ती गई लोगों की ज़ुबान धीमी और आँखें चौड़ी होती गईं।अफवाहें अब धुआँ नहीं—लपटें थीं।
लाल क़िले के भीतर मुबारक बादशाह ज़फ़र के कमरे की तरफ़ भागता हुआ आया।चौकीदार रोकना चाहता था,पर मुबारक की आँखों की हड़बड़ाहट किसी फ़रमान से कम नहीं थी।
“हुज़ूर… बात कुछ ठीक नहीं।”
ज़फ़र उस वक़्त अपने में खोए हुए बैठे काग़ज़ पर किसी अधूरी ग़ज़ल का मिसरा घिस रहे थे।
उन्होंने पूछा —“अब क्या हुआ?
दिल्ली में किसी का मटका टूट गया,या किसी पानवाले की बीवी भाग गई?”
मुबारक ने गहरी साँस ली।
“बादशाह सलामत…ये मसला मटके का नहीं, फौज का है।”
ज़फ़र की उँगलियों में पकड़ा कलम ऐसे हिला जैसे अचानक किसी ने उनके सीने में ठंडी हवा भर दी हो।
“फौज?” उन्होंने दोहराया। “तुम्हारा मतलब… कंपनी की फौज?”
मुबारक ने सिर हिलाया।
“जी हुज़ूर।
शायद सिपाहियों ने बग़ावत कर दी है।”
ज़फ़र ने आँखें बंद कर लीं। उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने
उनके कानों में गरम तेल डाल दिया हो—
धीरे-धीरे जलता हुआ।
“बग़ावत?”
उनकी आवाज़ में आश्चर्य नहीं था, बस थकान थी।
“हुज़ूर…” मुबारक ने धीमे से कहा,
“ख़बर आई है कि कई सिपाही मेरठ से निकले हैं। कुछ लोग कहते हैं कि उनकी रवानी दिल्ली की तरफ़ है।”
ज़फ़र ने एक पल को दीवारों की तरफ़ देखा—जैसे पूछ रहे हों कि क्या ये बूढ़ी दीवारें भी आज उनका साथ छोड़ देंगी?
उन्होंने पेच दार आवाज़ में पूछा—
“अगर सच में बग़ावत है…तो यह दिल्ली क्यों आएगी? और मुझ बूढ़े बादशाह का इससे क्या लेना-देना?”
मुबारक ने कुछ कहना चाहा पर शब्द गले में अटक गए।
क्योंकि सवाल ज़फ़र का सही था—
जिस शख्स के हाथ में तलवार नहीं सिर्फ़ कलम रही हो,ऐसा बादशाह बग़ावत में क्या करेगा ?
लेकिन मुबारक जानता था—
बग़ावतें वजह नहीं देखतीं , नाम ढूँढती हैं।और ज़फ़र का नाम इतिहास से ज़्यादा जनता के दिल में बसा हुआ था।
बाहर हवाएँ तेज़ हो गयी थीं।दरवाज़े की चौखटें काँप रही थीं,जैसे दिल्ली किसी अनहोनी को सूंघ रही हो।
ज़फ़र ने खिड़की पर हाथ रखा—दिल्ली पर रात उतर चुकी थी, पर रात की स्याही में कहीं-कहीं लाल रंग चमक रहा था।
“मुबारक,” उन्होंने फुसफुसाया,
“यह हवा…आज कुछ बदली-बदली लग रही है।”
मुबारक ने सिर झुकाकर कहा—
“हुज़ूर, हवा का मिज़ाज तब बदलता है जब दूर कहीं आग भड़कती है।”
ज़फ़र ने ठंडी साँस ली—
“कहीं वो आग…मेरी तरफ़ तो नहीं आ रही?”
और यह सवाल पूछते वक़्त उन्हें खुद भी पता नहीं था
कि मेरठ के सिपाहियों की टापें उनकी तरफ़ ही बढ़ रही थीं।
दिल्ली की हवा में अब इत्र कम, बारूद ज़्यादा था।
अध्याय 3 — सिपाहियों का सैलाब दिल्ली में दाख़िल
भोर का उजाला अभी आसमान की दहलीज़ पर ही था लेकिन दिल्ली शहर की नींद किसी बच्चे की तरह अचानक टूट गई—घोड़ों की टापें, दौड़ते कदमों की धूल,और बेचैन फुसफुसाहटें ,शहर की तंग गलियों में इस तरह फैल गईं जैसे किसी ने खौलते पानी में अचानक नमक गिरा दिया हो।
सबसे पहले खबर कश्मीरी गेट से अंदर आई।एक चौकीदार, जिसने रात की आखिरी पहर किसी तरह आँखें खोलकर निभाई थी भागता हुआ चाँदनी चौक पहुँचा और चिल्लाया—
“बगावत के सिपाही आ गए! मेरठ वाले… सबके सब! तलवारें चमका रहे हैं, बंदूकें ताने हुए हैं ”
बाज़ार के दुकानदार जो दो पल पहले तक अलसाई जम्हाई के साथ दुकान की कुंडी खोल रहे थे, एक झटके में चौकन्ने हो गए। हलवाई ने अपने कड़ाह पर ढक्कन रख दिया । चूड़ीवाले ने रंगीन चूड़ियाँ उठाकर भीतर रख दीं—
उधर क़िले की तरफ़ सुरंग की तरह जाती पतली सड़क पर सैकड़ों सिपाही ऐसे बढ़ते आ रहे थे जैसे किसी सूखी नदी में अचानक तेज़ बाढ़ उतर आई हो। धूल हवाओं में तैर रही थी।सिपाहियों की पोशाकों पर बारूद और पसीने की मिली जुली बदबू दिल्ली की सुबह को दूषित कर रही थी। एक सिपाही ने दौड़ते-दौड़ते चिल्लाया—
“दिल्ली वालों! हम बादशाह के झंडे तले लड़ेंगे! आज से अंग्रेज़ का राज ख़त्म!”
उसकी आवाज़ में रोशनी कम, राख ज़्यादा थी। क्योंकि क्रांति की आग में उम्मीद से पहले निराशा जलती है। कुछ लोग घरों की छतों पर चढ़ कर यह सैलाब देख रहे थे।
एक बुज़ुर्ग ने अपने पोते से कहा—“बेटा, ये लोग जिसे ढूँढ रहे हैं वो खुद नहीं जानता कि उसे ढूँढा जा रहा है।”
पोता हैरान हुआ।
“दादा, किसकी बात कर रहे हो?”
बुज़ुर्ग ने लंबी साँस ली—
“हमारे बूढ़े बादशाह की, जो ग़ज़ल में खोया है और इतिहास उसे पकड़कर जगा देना चाहता है।”
लाल क़िले के फाटक पर सिपाहियों ने नारा लगाया—
“बादशाह ज़फ़र जिंदाबाद!
हिंदुस्तान आज़ाद!”
किले के पहरेदार पहले तो हक्के-बक्के रह गए।उन्होंने अब तक की उम्र में ऐसे नारे कभी नहीं सुने थे—और यह नारे किसी जनसभा के नहीं,भागे हुए सैनिकों के थे। एक सिपाही जिसकी आँखों में पिछली रात की आग अभी तक सुलग रही थी, आगे बढ़कर गरजा—
“दरवाज़ा खोलो!
हम अपने बादशाह से मिलना चाहते हैं!”
किले के सरदार ने धीरे से कहा—“बादशाह से?
किस लिए?”
सिपाही ने होंठ भींच लिए।
“उन्हें अपना रहनुमा बनाने के लिए।”
सरदार का चेहरा ऐसे बदल गया जैसे किसी ने अचानक सर्दी की रात में अंगीठी बुझा दी हो।
“वो… रहनुमा ?”
उसकी आवाज़ में संदेह नहीं, सीधा-सीधा आश्चर्य था।
अंदर, मुबारक दौड़ते-हांफते बादशाह ज़फ़र के पास आया।
“हुज़ूर… सिपाही… किले तक पहुँच गए हैं! कुछ ही देर में भीतर घुसेंगे!”
ज़फ़र उसी ग़ज़ल के मिसरे पर अब भी अटके हुए थे—उर्दू के किसी शब्द को इधर-उधर पलटते हुए,
जैसे शेर में जान डालना बग़ावत रोकने से ज़्यादा ज़रूरी हो।
उन्होंने जैसे खोए हुए कहा —
“तो आने दो मुबारक। शायरी पर चर्चा करनी होगी?”
मुबारक लगभग रो पड़ा।
“हुज़ूर!
वो शायरी नहीं , आपकी सरदारी चाहते है! वो समझते हैं कि आप…
उनके सरदार बनेंगे!”
ज़फ़र की साँस अटक गई।
उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शिकन थी—
कुछ डर, कुछ अविश्वास, और थोड़ा-सा वह दर्द जो एक बूढ़ा आदमी तब महसूस करता है जब अचानक उससे कहा जाए , कि वो पहाड़ उठाए।
उन्होंने धीरज से पूछा—
“मुबारक…
क्या लोगों को पता नहीं कि मैं अब… क्या हूँ?
न राज, न ताक़त, न फौज…मैं तो बस दिल्ली की मिट्टी में धीरे-धीरे घुलता हुआ एक बूढ़ा शायर हूँ।”
मुबारक ने नम आँखों से कहा—
“पर हुज़ूर—बग़ावत को किसी न किसी नाम की तलाश होती है।वो किसी को भी अपना नेता बना लेती है…
चाहे वो बूढ़ा हो, थका हो, या खुद बग़ावत से घबराता हो।”
ज़फ़र ने सिर थाम लिया। तो मैंने क्या किया?क्यों मेरे पीछे चले आ रहे हैं ये लोग?”
मुबारक ने गहरी साँस ली।
“हुज़ूर… कभी-कभी इतिहास आपको चुन लेता है।
चाहे आप चाहें ,या न चाहें।
ठीक उसी वक्त किले के बाहर से सिपाहियों का नारा गूँजा—
“बादशाह सलामत बाहर आएँ! हम उनके हुक्म के इंतज़ार में हैं!”
बादशाह का चेहरा उसी पल बुझ गया।जैसे उन्होंने समझ लिया हो—अब यह कहानी उनकी मर्ज़ी से नहीं चलेगी। अच्छे-अच्छे सिपाही भी इतनी तेज़ी से तलवार नहीं खींचते, जितनी तेज़ी से ज़िम्मेदारी उनके सिर पर रखी जा रही थी।
ज़फ़र ने खोखली सी आवाज़ में कहा—
“लगता है…मैं ख़ुद-ब-ख़ुद इस बग़ावत का सरदार बनने वाला हूँ…”
और यह वाक्य कहते में उनके अंदर कहीं ग़ज़ल का एक मिसरा टूट कर गिर गया।
अध्याय 4 — जब ज़फ़र को ज़बरदस्ती तख़्त पर बिठा दिया गया
लाल क़िले के दीवारों के बाहर , सिपाहियों की हलचल अब किसी मेले जैसी लग रही थी—पर वो मेला जिसमें हँसी कम और खून की गंध ज़्यादा होती है।
किसी ने घोड़े की लगाम खींची, किसी ने तलवार खटखटाई, और किसी ने आसमान की तरफ़ देखकर ऐसा नारा लगाया जैसे ख़ुदा से पूछ रहा हो कि क्या आज की सुबह सच में किसी बादशाह का जन्म-दिन है या मौत का दिन।
क़िले का फाटक खुला और सैकड़ों सिपाही भीतर घुस आए—हांफते हुए, गुस्से के साथ,और उस जोश के साथ जो अक्सर समझ से ज़्यादा भ्रम पर टिका होता है। सबसे आगे बढ़ा हुआ एक नौजवान सिपाही,मुंह पर धूल , आँखों में धुआँ, और दिल में आग लेकर,सीधे बादशाह ज़फ़र के कमरे की ओर भागा।
पीछे से सब चिल्ला रहे थे—
“बादशाह ज़फ़र ज़िंदाबाद!”
“आप हमारे सरपरस्त हैं!”
“आज से आप ही हमारा अलम और ईमान!”
बादशाह के लिए यह नारे ऐसे थे जैस किसी बूढ़े दरख़्त पर अचानक बिजली गिर पड़े—रोशनी भी, आवाज़ भी, पर दोनों ही बेमतलब।ज़फ़र इस अफ़रा तफ़री में किसी डरे हुए उस्ताद की तरह अपने कमज़ोर कंधों को दुपट्टे से ढकते हुए मुबारक के पीछे-पीछे चल रहे थे।
“मुबारक,” उन्होंने धीरे से कहा, “इनसे कहो मैं इनका सालार नहीं।मैं बस…बस एक बूढ़ा शायर हूँ।”
मुबारक ने दुखी मुस्कान से कहा—
“हुज़ूर, शायर लोग किताब में क़ैद रहते हैं। इतिहास उन्हें जब चाहे किताब से निकालकर तख़्त पर बैठा देता है।”
ज़फ़र ने गर्दन झुकाई—
“पर मैं यह तख़्त नहीं चाहता।”
मुबारक ने आँखें नीचे कर लीं—“हुज़ूर, यह तख़्त आपको चाहता है या नहीं—ये तो बाद में पता चलेगा…पर सिपाही आपको ज़रूर चाहते हैं। उनकी उम्मीदें अभी तेज़ हैं और दिमाग़ गरम।”
दरबार-ए-आम में सैकड़ों सिपाही जमा थे।उनकी चीखें दीवारों से टकराकर ऐसी लग रही थीं जैसे क़िले की ईंटें भी कांप रही हों।
“हमारे बादशाह को बुलाओ!”
“हमें रहनुमाई चाहिए!”
“अंग्रेज़ को दिल्ली से खदेड़ देंगे!”
जब ज़फ़र वहाँ पहुँचे तो भीड़ ऐसे चीखी जैसे किसी मज़ार पर अचानक चिराग़ जल उठे हो।
ज़फ़र ने धीरे से हाथ उठाया—
लोगों ने शोर शांत किया,पर आँखों में वही आग थी।
ज़फ़र बोले—
“अरे भई,मेरे पास न फौज है, न ताक़त, न ख़ज़ाना…और उम्र इतनी कि सीढ़ियाँ चढ़ते हुए साँस फूल जाती है…तुम लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हो?”
भीड़ में से एक सिपाही चिल्लाया—
“क्योंकि दिल्ली को एक नाम चाहिए!”
दूसरा बोला—
“आप बादशाह है !हम आपके झंडे तले लड़ेंगे!”
एक और सिपाही,
जिसके हाथ में तलवार चमक रही थी आगे बढ़कर बोला—
“बादशाह सलामत,अंग्रेज़ों ने हमारी इज़्ज़त छीनी है।अब हम किसी अंग्रेज़ को अपना मालिक नहीं मानेंगे।आप कहें तो हम जान दे देंगे!”
ज़फ़र ने आँखें बंद कर लीं—
इस भीड़ में जोश था, दर्द था, पर समझ कहीं नहीं थी।
उन्होंने धीरे से कहा—
“तुम्हें मालूम भी है बग़ावत कितनी बड़ी चीज़ होती है?
अंग्रेज़ बहुत ताक़तवर हैं…”
एक सिपाही आगे कूदा—
“ताक़तवार? तो हम क़मज़ोर हैंगे क्या?आप हमारे साथ हों तो हम हर क़िला फतह कर लेंगे!”
ज़फ़र ने नाख़ुश होकर मुबारक की तरफ़ देखा—
जैसे कह रहे हों,ये लोग मेरे बारे में कितना गलत सोचते हैं।”अचानक भीड़ का एक हिस्सा आगे बढ़ा और बिना इजाज़त ज़फ़र की बाजू पकड़ ली।
“आइए हुज़ूर,”एक सिपाही बोला, हमने आपके लिए तख़्त सजाया है।आज आपको ताज पहनाया जाएगा!”
“ताज?
या अल्लाह …”
ज़फ़र के मुँह से अनजाने में निकला।लेकिन इतनी ज़ोर की भीड़ में
यह वाक्य केवल मुबारक ने सुना और वह भीतर ही भीतर डूब गया।
ज़बरदस्ती ज़फ़र को दरबार-ए-ख़ास ले जाया गया। तख़्त के सामने
लाल कालीन बिछा था—जो उन्होंने खुद आखिरी बार कई साल पहले देखा था।
ज़फ़र ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मैं इस पर नहीं बैठ सकता…बैठा तो समझो
मौत की तरफ़ पहला क़दम रख दिया।”
मुबारक ने कहा
“हुज़ूर, यह मौत नहीं—इज़्ज़त का रास्ता है।”
लेकिन ज़फ़र जानता था—
जिस इज़्ज़त को किसी और की तलवार चाहिए,वो असल में क़ब्र की तरफ़ ही ले जाती है।आखिर में कई हाथों ने पकड़कर ज़फ़र को तख़्त पर बिठा दिया।उनकी पीठ सीधी नहीं हो पा रही थी,चेहरा बुझा हुआ था,और आँखें…आँखें ऐसे थीं जैसे कोई व्यक्ति अपनी खुद की किस्मत को ग़ैरों के हाथों में गिरते हुए देख रहा हो।
सिपाही चिल्लाए—
“हमारे बादशाह!
हमारी उम्मीद!
हमारी राहनुमाई!”
और उस शोर में ज़फ़र के होंठों से एक फुसफुसाहट निकली—
“ख़ुदाया…
ये तख़्त नहीं…मेरी बेड़ियाँ हैं।”
इतिहास ने वही पल चुन लिया जब एक थका हुआ बूढ़ा अनचाहा बादशाह अपनी इच्छा के खिलाफ क्रांति का नेता बन बैठा—वह भी इत्तेफ़ाकन।
अध्याय 5 — जब दिल्ली ने पहली बार अंग्रेज़ की नींद उड़ा दी
दिल्ली की सुबह आमतौर पर कबूतरों की गुटर गूँ, हकीमों की खाँसी, और मस्जिदों की अज़ान में पिघलती थी।लेकिन उस दिन शहर की फिज़ा में अजीब-सा कंपन था—जैसे पंखों के बजाय हवा में लोहे की चिड़ियाँ उड़ रही हों।
कश्मीरी गेट की ओर से धूल का गुबार उठता दिखा।वहीं पास की कोठी में कैप्टन डगलस ने अपनी सुबह की चाय के साथ बैठा था — उसे दूर से घोड़ों की टापें नहीं,एक उबलती हुई भीड़ की धड़कन सुनाई दे रही थी।उसने खिड़की से झाँका।
“ब्लडी हेल… ये क्या होता जा रहा है?”
वह बुदबुदाया।
उसकी आँखों के सामने सैकड़ों सिपाही बदलते हुए मौसम की तरह तेज़ी से दिल्ली में उतर रहे थे।कुछ के हाथ में तलवार, कुछ के हाथ में बंदूक, और कुछ के हाथ में सिर्फ़ बदले की पुकार।
एक अंग्रेज़ अफ़सर ने भागते हुए कहा—सर, मेउटिनी फैल रही है!सिपाही दिल्ली में घुस चुके हैं!”
डगलस ने दाँत भींचे—
“Idiots… हमने इन्हें बहुत ढील दे दी थी।अब भुगतना तो पड़ेगा ही!”
दूसरी ओर दिल्ली की गलियों में एक बोझिल पर उत्साहित बेचैनी फैल रही थी। लाल कुर्ती की दालान पर एक बुज़ुर्ग महिला बोली—
“अंग्रेज़ भाग रहे हैं क्या?”
पास खड़े धोबी ने हँसकर कहा—“भागेंगे भी, तो दिल्ली से बचकर नहीं निकलेंगे, अम्माँ।”
हलवाई ने कड़छी चलाते हुए कहा—“उम्मीद है, इस बग़ावत में
कोई मेरे उधार वाले खाते न जलाए ।”
और इन बकवासों के बीच एक पतला-दुबला लड़का,
क़ासिम,बड़ी चमकती आँखों से भीड़ को देख रहा था।
“अब्बा, ये लोग किले क्यों गए हैं?”
उसके बाप ने,जो ऊँट गाड़ी हाँकता था,धीरे से कहा—
“बेटा, किले में आज एक बादशाह ने बगावत की सरदारी कबूल कर ली है ।
क़ासिम ने भोलेपन से पूछा—“तो वो अंग्रेज़ों को भगा देगा?”
बाप ने ठंडी साँस ली—बेटा, अगर शायरी से फौजें भागतीं ,तो ये दुनिया बहुत पहले आज़ाद हो चुकी होती।”
उधर लाल क़िले में ज़फ़र को तख़्त पर बैठा देने के बाद सिपाहियों ने एक-एक कर अंग्रेज़ अड्डों पर चढ़ाई शुरू कर दी।सबसे पहले निशाना बना—टेलीग्राफ़ ऑफिस। क्योंकि अफ़वाहें दिल्ली में बिजली की तरह फैलती थीं,पर कंपनी के फ़ोन तार उन अफ़वाहों को हथियार बना देते थे।
सिपाही ज़ोर से चिल्लाए—
“तार काट दो!”
“कंपनी को खबर न जाए!”
एक जवान सिपाही ने अंग्रेज़ अफ़सर को पकड़ते हुए कहा—
“अब बता, कौन-सा बटन दबाकर तू हमारे मंसूबों को कंट्रोल करता है?”
अफ़सर डर के मारे अपनी भाषा भी भूल गया।
मुँह से सिर्फ़ इतना निकला—“I’m just the operator!”
सिपाही ने हँसकर कहा—
“तू ऑपरेटर हो, तो आज से हम तुम्हारा स्विच ऑफ़ कर रहे हैं।”
और टेलीग्राफ़ का तार और अफसर की गर्दन एक ही झटके में काट दिए गए—
कंपनी की नींद यहीं से उड़ना शुरू हुई। कैप्टन डगलस ने अपनी टुकड़ी इकट्ठा की और गुस्से से बोला—
“आज दिल्ली को दिखा देंगे यहां किसका राज चलता है!”
लेकिन उससे पहले ही किले से निकली एक भीड़ ने डगलस की टुकड़ी पर हमला बोल दिया।
धूल, तलवारें, बारूद की बदबू, और इंसानी चीखों का संगीत आसमान में भर गया।दिल्ली पहली बार ईतनी ज़ोर से दहाड़ी थी।
डगलस ने घोड़े को घुमाया—
“Fall back!
Fall back!!”
लेकिन दिल्ली की गलियाँ वापसी का रास्ता नहीं देतीं।वो सिर्फ़ अपने हिसाब से कहानी लिखती हैं।
दोपहर होते-होते दिल्ली शहर एक खुली घोषणा कर चुका था—अंग्रेज़ अब सुरक्षित नहीं। बाज़ारों की दीवारों पर नारे उभर आए थे—
“हिंदुस्तान हमारा है ”
“बादशाह ज़फ़र को सलाम!”
लेकिन लाल क़िले के भीतर ज़फ़र उदास बैठे थे।उनके होंठों से एक दर्द भरा मिसरा निकला—
किसी और ने की थी बग़ावत ,सज़ा मेरे हिस्से क्यों आए…”
बाहर शहर जल रहा था।अंदर बादशाह का दिल।
इस तरह पहली बार दिल्ली में अंग्रेजों की रात कटी—और अंग्रेज़ों ने समझ लिया कि अब ये शहर ग़ज़ल नहीं, आग बोल रहा है।
अध्याय 6 — बग़ावत की दरारें
दिल्ली की हवा में अभी भी बग़ावत का धुआँ तैर रहा था,लेकिन भीतर ही भीतर वही धुआँ आँखें जलाने लगा था। शहर की हर गली में जोश की आंधी तो थी पर सूझ-बूझ की बारिश कहीं नहीं।लाल क़िले के बाहरी हिस्से में सिपाही अपनी जीत के किस्से ऐसे सुना रहे थे मानो अंग्रेज़ की हुकूमत खत्म हो चुकी हो ।
एक नौजवान चिल्लाया—
“अंग्रेज़ तो भाग गए! अब हम दिल्ली के मालिक हैं ”
दूसरा बोला—
“बादशाह ज़फ़र हमारे सरदार, अब दिल्ली हमारी मुठ्ठी में!”
ये सब सुनकर वहीं खड़े एक बुज़ुर्ग फ़कीर ने अपनी जर्जर छड़ी ज़मीन पर टेकी
और तंज़ में कहा—
“बेटों, हुज़ूर का नाम तो ले रहे हो,किसी ने उनसे पूछा कि वो ‘सरदार’ बनने का इरादा रखते भी हैं या नहीं?”
लड़कों ने हँसते हुए जवाब दिया—
“अरे बाबा, इरादा नहीं—हमने बना दिया!”
फ़कीर मुस्काया—
वो मुस्कान जो अक़्ल नहीं, तजुर्बे से पैदा होती है।
“बग़ावत जब किसी को ज़बरदस्ती सरदार बनाती है, तो दरारें शुरू उसी दिन हो जाती हैं।”
क़िले के अंदर ज़फ़र का कमरा एक अजीब-सी बेचैनी से भर गया था। सिपाही आते-जाते उन्हें ‘हुज़ूर’और ‘जहाँपनाह’ कहकर पुकारते,और हर बार ज़फ़र का दिल ऐसे सिकुड़ता जैसे किसी ने ग़ज़ल की किताब में बारूद की डिब्बी रख दी हो।
मुबारक धीरे से बोला—
“हुज़ूर, बाहर लोग आपसे मिलने को बेकरार हैं। सब आपका हुक्म चाहते हैं।”
ज़फ़र ने तीखी साँस खींची—
“हुक्म?
मुबारक, मेरे पास कौन-सा हुक्म है? खज़ाना तो कब का खाली है,फौज अपनी नहीं,और जो लोग मुझे रहनुमा बना रहे हैं वो खुद नहीं जानते कि बग़ावत लानी कैसे है।”
मुबारक चुप रहा।
क्योंकि शायर की बात कभी-कभी तलवार से ज़्यादा सच्ची होती है।
--
दरबार-ए-आम में बग़ावत की पहली दरार खुलकर सामने आई।
कुछ सिपाही
बंगाल के थे,कुछ अवध के,कुछ रोहतक के,कुछ झाँसी के—हर किसी के अपने दुख
झाँसी के दो जवान बोले—हम कोतवाली फूँक देंगे! अंग्रेज़ वहीं से सब चलाते हैं!”
और रोहतक का एक सिपाहीहँसते-हँसते बोला—“पहले शराबख़ाना खोलो भाई!दिल्ली जीत ली है,जश्न तो बनता है!”
अवध वाला ग़ुस्से में चिल्लाया—यह जश्न मनाने का वक़्त है क्या?हमें मिलकर लड़ना है!”
बंगाली बोला—
“तुम सीखाओगे? पहले खुद तय कर लो कि करना क्या है!”
और कुछ ही पलों में शब्द तलवार बन गए—चीखें, गालियाँ,और यह समझ कि बग़ावत एक नाव है जिसमें सब बैठे हैं, लेकिन कोई दिशा पकड़ने को तैयार नहीं।
---
उधर शहर में कुछ अराजक तत्व बग़ावत को लूट का मौका समझ बैठे।कहीं दुकान लूटी,कहीं गोदाम फूँका, कहीं दो व्यापारी आपस में लड़ पड़े—“अंग्रेज़ भाग गया, अब दुकान मेरी!”
इन घटनाओं की खबर
क़िले तक पहुँची तो सिपाहियों में एक और दरार उभर आई।
“ये लोग हमारे नाम पर
लूट मचा रहे हैं!”एक सिपाही गरजा।
दूसरा बोला—
“अरे छोड़ो भी,लोग तो मौक़ापरस्त होते ही हैं।”
तीसरा बोला—“अगर यह सब हुआ,तो अंग्रेज़ वापस आते ही कहेंगे
कि हम गँवार और लुटेरे हैं!”
चौथा हँस पड़ा—“वो तो कह ही चुके हैं साहब,
अब हम चाहे गुलाब उगाएँ, उनको तो काँटे ही दिखेंगे।”
---
शाम होते-होते एक और बड़ी ग़लती हो गई—
सिपाहियों ने किले के खज़ाने के कमरे को खोल लिया।
कुछ ने सरदारों से पूछा—“बादशाह सलामत को देना चाहिए?”
कुछ ने कहा—“क्या फायदा?हम लड़ रहे हैं, हमें चाहिए!”
कुछ बोले—“पहले हथियार खरीदें!”
और कुछ छुपकर जेब भरने लगे।
मुबारक ने यह देखा
तो दौड़कर ज़फ़र के पास पहुँचा।
“हुज़ूर, खज़ाना खुल गया!” वो काँपते हुए बोला।
“लोग ऊपर-नीचे कर रहे हैं सब!”
ज़फ़र की आँखों में गहरी थकान उतर आई।
“मुबारक,” उन्होंने कहा,“ख़ज़ाना खुले या बंद हो… इस बग़ावत में सब अपना-अपना हिसाब देख रहे हैं।किसी को हिंदुस्तान याद नहीं—बस अपना हिस्सा।”
मुबारक की आँखें भर आईं।
“तो फिर हुज़ूर…क्या यह बग़ावत टिकेगी?”
ज़फ़र ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मुबारक, बग़ावत ताक़त से नहीं,दिमाग़ से चलती है।और मुझे डर है कि यह भीड़ तलवार तो उठाना जानती है—पर समझ…कहीं गुम गई है।”
बाहर नारे गूँज रहे थे।अंदर बादशाह की आवाज़ खो रही थी।
दिल्ली ने अंग्रेज़ को डराया जरूर था, पर अब बग़ावत खुद अपनी परछाइयों से डरने लगी थी।यही थीं पहली दरारें—छोटी-छोटी,लेकिन इतनी गहरी कि आगे चलकर पूरी दीवार गिराने वाली थीं।
अध्याय 7 — दिल्ली का डर और ज़ुल्मत का पहला क़दम
दिल्ली ने कई बादशाह देखे थे—ग़ाज़ी, जालिम, कमज़ोर, दार्शनिक—लेकिन ऐसा बादशाह दिल्ली ने कभी नहीं देखा था जो ख़ुद अपनी ही सल्तनत में एक मुसाफ़िर-सा महसूस करे।
ज़फ़र सुबह की नमाज़ के बाद क़िले की छत पर निकले।
पूरब की तरफ़ सूरज उग रहा था,लेकिन रोशनी में भी दिल्ली धुँधली सी लगती—जैसे किसी ने शहर की रूह पर कोई भारी गीली चादर डाल दी हो। नीचे दूर तक धुआँ उठ रहा था—कहीं रसोई से नहीं,बग़ावत की आग से।एक बूढ़ा कबूतर ज़फ़र के पास आकर बैठ गया। ज़फ़र ने उसके परों को छुआ और बुदबुदाए—
“तेरे पंखों में आज़ादी है, मेरे कंधों पर बोझ।”
मुबारक, जो चुपचाप पीछे खड़ा था, धीरे से बोला—
“हुज़ूर… ज़माना बदल रहा है।”
ज़फ़र मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान उधार की लगती थी।
“बदल रहा है, मुबारक…
लेकिन इसमें मेरा क्या क़सूर था कि ये लोग मुझे भी इस तूफ़ान में खींच लाए?”
---
क़िले के अहाते में सिपाहियों की मीटिंग आज कुछ ज़्यादा ही शोर-गुल वाली थी।जोश कम नहीं था, लेकिन अब उसमें बदनज़मी का रंग घुल रहा था।
एक सिपाही चिल्लाया—
“हमने अंग्रेज़ों को काट भगाया है, अब दिल्ली हमारा क़िला है!”
दूसरा बोला—
“अर्रे, दिल्ली तो है,पर खाने को क्या मिलेगा?
गोला-बारूद कहाँ से आएगा?”
तीसरा, जो कुछ ज़्यादा ही अक़्लमंद बन रहा था,
बोला—हम बादशाह से कहेंगे कि हमें तनख़्वाह दी जाए!
बग़ावत तो हमने उठाई है उनके नाम पर!”
यह सुनते ही चारों तरफ़
हँसी फ़ैल गई।
“अरे बेवकूफ ,”किसी ने कहा,“बादशाह के पास खुद के लिए पैसे नहीं, हमें काय को देंगे?”
“तो फिर इतने दिन क़िले में बैठ कर क्या मिलेगा?
जो मिलेगा, वो हम ख़ुद लेंगे!”
यह वाक्य थोड़ा-सा, बहुत थोड़ा-सा, लेकिन इतना काफ़ी था कि बग़ावत को भीतर से खोखला कर दे।
डर की पहली रेखा सिपाहियों के चेहरों पर नहीं,उनकी आवाज़ों में उतरने लगी थी।
---
उधर शहर में अफ़वाहों ने हवा पकड़ ली थी।
किसी ने कहा—अंग्रेज़ अंबाला से चल पड़े हैं!”
दूसरा बोला—
“नहीं, मेरठ की टुकड़ियाँ करीबी चौक तक पहुँच गई हैं!”
तीसरे ने तड़का लगाया—
“भैया, जनाना मोहल्ले में खबर है कि अंग्रेज़ों ने कसम खाई है—इस बार दिल्ली को माटी कर देंगे!”
फिर लोगों ने अपने-अपने अंदाज़ में इन अफ़वाहों को दस गुना बढ़ाकर सुनाना शुरू किया।
कहीं दुकानदार जूते बेचते हुए कह रहा था—
“जल्दी ले लो, कल अंग्रेज़ आए तो बाज़ार जला देंगे!”
कहीं पान वाला बोला—
“सुब्ह सुब्ह बीबी साहिबा कह रही थीं, किले की तरफ़ से रोने की आवाज़ें आ रही हैं!”
अफ़वाहें दिल्ली की नसों में ख़ून से तेज़ बहने लगी थीं—और हर अफ़वाह दिलों पर एक चोट थी ।
---
क़िले के भीतर सिपाहियों का एक हुजूम दरबार-ए-ख़ास की तरफ़ बढ़ा। ज़फ़र को बुलाया गया। उनके आते ही एक नौजवान चिल्लाया—
“जहाँपनाह, हमें हथियार चाहिए! गोलों की कमी है!”
दूसरा बोला—“हमारे खान-पान का इंतज़ाम किया जाए!”
तीसरा गरजा—“और हमारी रोज़ की तनख़्वाह भी तय की जाए!”
ज़फ़र ने एक-एक चेहरा देखा—ग़रीबी, भूख, ग़ुस्सा,और सबसे भयानक—अक़्ल की कमी।
उन्होंने गहरी साँस लेकर कहा—
“बेटों, मेरे पास न खज़ाना है,न सेना,न कोई इंतज़ाम।तुमने मुझे सरदारी दी है ,लेकिन तुम ही बता दो—मैं तुम्हारे लिए कहाँ से आसमान तोड़ लाऊँ?”
सिपाहियों के चेहरे उतर गए। कुछ बड़बड़ाए। कुछ गुर्राए। कुछ ने निगाहें चुरा लीं।
और उसी पल इस बग़ावत के दिल में एक और दरार पड़ गई—बादशाह और उसके सिपाहियों के बीच की दरार।
ज़फ़र ने धीरे से कहा—
“तुम लड़ रहे हो मेरे नाम पर,मगर मेरे पास उस नाम को संभालने की ताक़त नहीं।यह नाम तो सिर्फ़ किसी शायर के पास ही अच्छा लगता है।”
मुबारक ने यह सुना तो उसकी आत्मा काँप गई।
---
शाम ढली तो दिल्ली की गलियाँ अजीब-सी ख़ामोशी से भर गईं—जैसे शहर अपनी साँस रोककर आने वाले तूफ़ान का इंतज़ार कर रहा हो।
कूचे-कूचे में लोग बंद दरवाज़ों के पीछे फुसफुसा रहे थे।कभी हँसते हुए,कभी रोते हुए,और कभी बस डरते हुए।
और उस रात लाल क़िले की दीवारों पर पहली बार ज़फ़र को लगा कि यह बग़ावत एक अंधेरी नदी है—जिसे उसने न देखा, न चाहा,न बुलाया। लेकिन फिर भी वह उसी के बीच डुबकी लगाता जा रहा है।
कुछ आवाज़ें किले की दीवारों से टकराईं—कुत्तों का भौंकना,लोगों का छुपा हुआ सिसकना, और कहीं दूर से कोई पुकार—
“अंग्रेज़ आ रहे हैं…”
ज़फ़र ने आँखें बंद कर लीं।
दिल्ली की रूह डर से काँप रही थी,और ज़ुल्मत की पहली रात अपने लिबास में शहर को लपेटने लगी थी।
अध्याय 8 — अंग्रेज़ों की साज़िश, दिल्ली की बेचैनी
दिल्ली की फिज़ा मे आज कुछ और ही बेचैनी थी।हवा भारी— जैसे बादलों में पानी नहीं, बल्कि डर भरा हो। लोगों के चेहरे उस चिड़िया की तरह लगती जो उड़ तो सकती है पर उसे ख़ुद नहीं मालूम कहाँ जाना है।
किसी ने खिड़की से झाँक कर कहा—आज अंग्रेज़ ज़रूर कुछ करेंगे।”
दूसरे ने जवाब दिया—“क्यों, क्या सुबूत है तुम्हारे पास?”
“भाई, सुबूत तो नहीं…पर सन्नाटा ही काफ़ी है।”
शहर में ये बात फैल गई कि अंग्रेज़ अपने डाक ख़ानों, टेलीग्राफ़ लाइनों और चौकियों से इकट्ठा होकर दिल्ली की तरफ़ धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।
पूरी साफ़-शफ़्फ़ाक़ साज़िश—लेकिन इतनी चुपचाप कि दिल्ली को उसकी आहट भी देर से मिली।
काले बादलों की तरह अंग्रेज़ी फ़ौज का फैलता हुआ ख़तरा ज़फ़र को भीतर ही भीतर सिकोड़ रहा था।
आज सुबह उन्हें खबर दी गई—“हुज़ूर, अंग्रेज़ करनाल से आगे निकल आए हैं।”
ज़फ़र की नसें तन गईं।
धीमे स्वर में बोले—“मुबारक, कितनी फौज है उनके पास?”
मुबारक ने डरते-डरते कहा—
“सुना है… कुछ सौ होंगे।”
ज़फ़र की आँखें चौड़ी हो गईं—
“कुछ सौ? और अभी दिल्ली की दीवारों के बाहर हमारे कितने सिपाही हैं?”
मुबारक ने फुसफुसाकर कहा—
“हमारे उन से बहुत ज्यादा ”
ज़फ़र ने कड़वाहट से हँस दिया—“तो फिर डर किस बात का?”
मुबारक ने जवाब नहीं दिया।क्योंकि डर का नाम अक्सर दुश्मनी की तादाद से नहीं, उसके इंतज़ाम से तय होता है—और अंग्रेज़ इंतज़ाम में उस्ताद थे।
---
उधर सिपाहियों में एक और बवाल खड़ा हो गया।
कुछ लोगों ने सुना कि अंग्रेज़ अपनी पॉलिसी सबको माफ़ कर दो, बस बादशाह को पकड़ लो’जैसी बात फैला रहे हैं।
एक जवान बोला—
“देखा? अंग्रेज़ हमें नहीं,सिर्फ़ बूढ़े शायर को पकड़ना चाहते हैं।हम क्यों जान दें?”
दूसरा गरजकर बोला—
“ये सब उनकी चाल है!वो एक-एक करके हमें काटने वाले हैं!”
तीसरा बोला—
“काटें या माफ़ करें—दिल्ली में खाने को कुछ नहीं, हथियार टूट रहे हैं। कैसे लड़ेंगे?”
लोगों की सोच अब हथियारों से ज़्यादा अपने पेट और जान की तरफ़ झुक रही थी।बग़ावत की आग अब धुएँ में बदल रही थी—और धुआँ आँखों में चुभने लगा था।
---
दिल्ली की गलियों में एक नई अफ़वाह फैली—
“अंग्रेज़ों ने बहादुर शाह ज़फ़र को कमज़ोर घोषित कर दिया है।उनका कहना है—अगर दिल्लीवाले बचना चाहते हैं तो बादशाह से दूरी बना लें।”
ये सुनकर कुछ दकियानूस लोग बिल्ली की तरह डरकर बोले—
“बादशाह पर तो हमेशा ही हमारे पीर का साया रहता है।”
एक मौलवी ने कहा—
“बेटा, नेता अगर कमज़ोर हो तो उसकी बग़ावत अल्लाह भी नहीं बचा सकता।”
एक दुकानदार ने जोड़ दिया—
“किसी ने आज तक उल्टी किस्मत के सहारे जंग नहीं जीती।”
ये बातें धीरे-धीरे लाल क़िले की मस्सामी दीवारों तक पहुंचने लगीं।
---
जब ज़फ़र को अंग्रेज़ों की इस साज़िश का अंदाज़ा हुआ तो उन्होंने अजीब-सी हंसी हँसी।
मुबारक,” उन्होंने कहा, “देखा? जिन्हें मैंने ग़ज़लों में कोसा,उनको पता है कि मैं उनके ख़िलाफ़ हथियार नहीं उठा सकता। इसलिए वो मुझे ही कमजोर साबित कर लोगों की हिम्मत तोड़ रहे हैं।”
मुबारक ने धीरे से कहा—
“हुज़ूर… आप कमज़ोर नहीं हैं। हालात कमज़ोर हैं।”
ज़फ़र ने उसे देखा—ऐसे जैसे कोई शायर एक झूठी तारीफ़ को पहचान लेता है।
नहीं मुबारक…मैं कमज़ोर हूँ। सच कहूँ तो मैं जंग के लायक़ हूं ही नहीं। मैं तो बस किस्मत का मज़ाक़ बन गया हूँ—एक बुज़ुर्ग आदमी जिसे बग़ावत ने अनजाने में सरदार बना दिया।”
मुबारक के पास कहने को कुछ नहीं था।
---
शाम को दिल्ली के चांद की रोशनी अजीब-सी उदासी लिए शहर पर गिर रही थी। दूर-दूर तक कुत्ते भौंक रहे थे। कुछ दरवाज़े धीरे-धीरे बंद हो रहे थे। कुछ घरों में चूल्हे नहीं जले—क्योंकि लोग डर से बाहर निकलकर राशन नहीं ला पाए। और इस गहरी होती बेचैनी में एक क़ब्रिस्तान-सी ख़ामोशी थी।
दिल्ली हिचकिचा रही थी। बग़ावत थक रही थी।अंग्रेज़ तैयार हो रहे थे। और ज़फ़र—वो बस अपनी उम्र की तरह धीरे-धीरे घुल रहे थे।यह रात लंबी थी। बहुत लंबी। इतनी कि दिल्ली की रूह भी थककर काँपने लगी थी
कल क्या होगा—इसे जानने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
अध्याय 9 — क़रीब आती अंग्रेज़ी फौजें और टूटता हुआ यक़ीन
सुबह की पहली किरण अभी दीवारों पर चढ़ी भी नहीं थी कि दिल्ली ने ऐसी आह भरी जैसे किसी बूढ़ी हड्डियों वाला शहर तूफ़ान से पहले अपना दर्द छुपाने की कोशिश कर रहा हो।
लाल क़िले की बुर्जियों पर आज पहरेदार कुछ ज़्यादा ही चौकन्ने थे।हवा में पत्तों की सरसराहट से ज़्यादा दूर से आती घोड़ों के टापों की गूंज थी—धुँधली, भारी, लेकिन बिल्कुल सटीक
अंग्रेज़ आ रहे थे।और दिल्ली के सीने में इतनी जगह ही कहाँ थी कि एक और डर समा सके?
---
नजफगढ़ की तरफ़ से खबर आई—“अंग्रेज़ी टुकड़ी जंगल में डेरा डाल चुकी है।”
एक दूत थका-हारा, धूल में लिपटा क़िले में घुसा और चिल्लाया
“हुज़ूर! गोरे सिपाहियों ने नदी पार कर ली है! लोग भाग रहे हैं…हर कोई कह रहा है दिल्ली पर आज-कल में चढ़ाई होगी!”
यह सुनकर दरबार में बैठे सिपाहियों का चेहरा ऐसे बदल गया जैसे किसी ने जोश को भूख से बदल दिया हो।
एक सिपाही बोला—“अरे तो आ जाने दो!हम क्या कम हैं?”
दुसरा सिपाही धीमी आवाज़ में बोला—
“कम नहीं हैं…पर हमारे पास गोलियाँ कितनी हैं?”
किसी ने जवाब दिया—
“पाँच।”
भीड़ में सरगर्मी फैल गई।
“क्या?”
फिर पता चला—कुछ टुकड़ियों के पास तीन-तीन गोलियाँ हैं।किसी के पास राइफ़ल है तो उसमें चकमक नहीं। किसी के पास तलवार है पर धार टूट चुकी है।
लोगों का जोश अब धीरे-धीरे एक तेज़ बुखार जैसा लगने लगा जिसमें शरीर गर्म और हिम्मत ठंडी हो जाती है।
उधर ज़फ़र अपनी दरी पर बैठे किसी पुरानी तस्बीह को धीरे-धीरे टटोल रहे थे। मुबारक बाहर से दौड़ता हुआ आया—
“हुज़ूर, अंग्रेज़ बहुत पास आ गए हैं।”
ज़फ़र ने सिर उठाया। उनकी आँखें एक ऐसे आदमी की थीं जिसे अपने मरने से नहीं, अपनी मजबूरी से डर लगता है।
“कितना पास मुबारक?”
“बस… दो दिन का रास्ता।”
ज़फ़र ने गहरी साँस भरी—
“दो दिन का रास्ता…और जो लोग इस क़िले में हैं, उनके पास दो घंटे का सब्र भी नहीं।”
मुबारक ने कुछ कहना चाहा पर वही रुक गया। क्योंकि उसे समझ आ गया था—ज़फ़र की आवाज़ अब शायर की नहीं,एक बेहद थके हुए पिता की थी जो अपने बिगड़ते हुए बच्चों को रोकना तो चाहता है पर रोक नहीं सकता।
---
क़िले के आंगन में सिपाहियों की एक और बहस शुरू हो गई थी।
“हमें क़िले से बाहर निकलकर अंग्रेज़ों पर हमला करना चाहिए!”एक जवान गरजा।
दूसरा बोला—“अरे पागल हो क्या? हम क़िले के अंदर सुरक्षित हैं ।बाहर गए तो तोपें हमें चूर कर देंगी!”
तीसरा बोला—
“तो क्या करें? यहीं बैठे-बैठे मर जाएँ?”
चौथा हँस पड़ा—मरेंगे क्यों? बादशाह हैं न हमारे सरपरस्त!”
यह तंज़ ज़फ़र के दिल तक पहुँचा हालाँकि वो पास नहीं थे।शायद दिल कभी-कभी दिवारें पारकर अपना अपमान ढूँढ ही लेता है।
---
इसी बीच दिल्ली के कुछ सरदार लाल क़िले में आए।उनके चेहरे पर कुतर-कुतर कर खाई हुई उम्मीद थी।
“जहाँपनाह,” उनमें से एक बोला, “लोग कहते हैं, अंग्रेजों का मुकाबला अब नामुमकिन है। अगर आप शहर छोड़ दें…तो शायद दिल्ली बच जाए।”
ज़फ़र थम गए। उनकी आँखें दर्द और तंज़ की अजीब-सी मिलावट थीं।
“मैं शहर छोड़ दूँ? और क्यों? ताकि अंग्रेज़ यह साबित कर दें कि एक बूढ़ा शायर ही इस बग़ावत का गुनहगार है?”
एक और सरदार बोला—
“जहाँपनाह, हम आपको इल्ज़ाम नहीं दे रहे।हम बस यह कह रहे हैं कि दिल्ली में आपकी मौजूदगी अंग्रेज़ों के गुस्से को बढ़ा देती है।”
ज़फ़र ने धीमी हँसी में पूछा—तो क्या मैं कहीं और जाकर तवायफ़ें देखता रहूँ?”
किसी में हिम्मत नहीं थी उत्तर देने की।
ज़फ़र फिर बोले—
“जाओ, सब को बता दो—मैं कहीं नहीं जाऊँगा। कमज़ोर हूँ, थका हूँ,मजबूर हूँ—पर भगोड़ा नहीं।”
इन शब्दों में ज़फ़र का साहस नहीं, उनकी नियति थी—एक ऐसी नियति जो आदमी को नहीं, उसकी बेबसी को अमर करती है।
--
रात होते-होते अंग्रेज़ी फ़ौज की पहली तोप इतनी पास आ गई कि उसकी गरज दिल्ली के कानों तक साफ़-साफ़ पहुँची।
एक बच्चे ने अपनी माँ से पूछा—“अम्मी, ये क्या था?”
माँ कांपकर बोली—“बेटा…
ये जंग की पुकार है।”
उस रात दिल्ली सोई नहीं। बस हिचकियों और दुआओं के बीच लटकी रही—जैसे कोई सज़ा फैसले से पहले अपना वक़्त खींच रही हो।
और किले की ऊंची-ऊंची दीवारों के पीछे बहादुर शाह ज़फ़र बैठा था—कमज़ोर, बेबस, और अपनी किस्मत से हारता हुआ। पर फिर भी… भागने से इनकार करता हुआ। क्योंकि कभी-कभी कमज़ोरी भी अपना एक अलहदा ज़िद का वजूद रखती है।
अध्याय 10 — पहली तोप और दिल्ली पर मौत का साया
सुबह होने से पहले ही दिल्ली ने वह आवाज़ सुनी जो सदियों तक किताबों और किस्सों में गूंजती रही—अंग्रेज़ी तोप का पहला धमाका।
ना अज़ान, ना घुड़सवारों की टाप, ना बाज़ार की हलचल— बस एक लंबी, भारी, अजीब-सी गूँज जिसने जैसे दिल्ली की रूह में दरार डाल दी हो।
किले की दीवारें काँपीं, कबूतर उड़े, और कुछ ही पलों में हर गली, हर मुहल्ला इस आवाज़ का मतलब समझ गया—जंग शुरू हो चुकी थी।
---
लाल क़िले के बुर्ज पर पहरेदार झुककर बोले—“हुज़ूर! अंग्रेज़ों का दस्ता किले के पास खाइयाँ खोद रहा है। तोपें जमाई जा रही हैं!”
नीचे दरबार में सिपाहियों में खलबली मच गई।
एक जवान ने फुसफुसाकर कहा—
“अगर तोप के गोले दीवारें गिरा दें तो?”
दूसरा बोला—“गिरा ही देंगे…
अंग्रेज़ आए किसलिए हैं—तलवारें चूमने के लिए?”
तीसरे ने गुस्से में कहा—“कायरों! हम यहाँ लड़ने आए हैं!”
पर उसकी आवाज़ भी किसी बुझती लालटेन की लौ जैसी काँप रही थी।
---
ज़फ़र को जब पहला धमाका सुनाई दिया तो वे धीरे से उठे। न कोई घबराहट, न कोई चीख— बस एक ऐसी थकान जो इंसान पर सिर्फ़ तब उतरती है जब वो जान ले कि अब लड़ाई उसे नहीं, उसकी किस्मत को लड़नी है।
मुबारक ने जल्दी से आकर कहा—
“हुज़ूर, किला निशाने पर है!”
ज़फ़र ने खिड़की से बाहर देखा। लग रहा था मानो धुंध के पीछे आग का कोई दैत्य धीमे-धीमे दिल्ली पर झुक रहा हो।
“मुबारक,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, “ये जो तोपें चल रही हैं—इनमें अंग्रेज़ की ताक़त कम, हमें डराने का मंसूबा ज़्यादा है।”
मुबारक बोला—
“तो क्या हम लड़ेंगे?”
जफर ने कहा
उम्मीदें ज़्यादा देर तक नहीं लड़ पाएँगी।”
यह बात किसी तलवार से ज़्यादा काटदार थी।
---
दोपहर तक अंग्रेज़ों की तोपें क़िले की दीवारें हिला चुकी थीं।
क़िले की बाहर की तरफ़ से दूसरा धमाका हुआ। दीवार का एक हिस्सा गिर पड़ा। धूल के बादल उठे— और दिल्ली की भीड़ ने दौड़कर अपने दरवाज़े बंद कर लिए।
एक बच्चे ने रोते हुए पूछा—“अब्बू, अंग्रेज़ अंदर आ जाएँगे?”
उसके पिता ने काँपते हाथों से उसे सीने से लगाया—“अल्लाह जाने बेटा, अल्लाह जाने…”
लोग जैसे अपनी ही जमीन पर पराये हो गए थे।---
क़िले में सिपाहियों की मीटिंग बुलाई गई।
एक सरदार चिल्लाया—“हम क़िला छोड़कर अंग्रेज़ों पर धावा बोलते हैं!
दूसरा बोला—
“पागल हो गए हो क्या? मारे जाओगे!”
तीसरा गुर्राया—“तो क्या यहीं बैठे-बैठे मर जाएं ?”
झगड़ा बढ़ते-बढ़ते इतना तेज़ हो गया कि कई सिपाही हथियार उठाकर एक-दूसरे पर झपट पड़े।
यह देख मुबारक गुस्से से दहाड़ा—
“ओ बद दिमाग़ो! अंग्रेज़ बाहर खड़ा है और तुम लोग आपस में लड़ रहे हो?”
सभी पर थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गई।
यह चुप्पी बग़ावत की सबसे डरावनी निशानी थी ।
---
शाम होते-होते अंग्रेज़ों की तीसरी तोप चली। इस बार धमाका इतना भारी था कि किले का फ़र्श भी हिल उठा।
ज़फ़र ने आँखें बंद कर लीं। उन्होंने शायर की तरह नहीं,एक बूढ़े आदमी की तरह सोचा—
“शायद ये वही दिन है जिससे मैं बरसों से डरता रहा हूँ…”
मुबारक ने धीमे स्वर में पूछा—
“हुज़ूर, क्या हम कहीं और चलें? किले की दीवारें कमजोर पड़ रही हैं।”
ज़फ़र ने कहा—
“मुबारक, मैंने दिल्ली को छोड़ा तो मेरी कहानी ख़त्म।और अगर मैं रहा…तो शायद दिल्ली की कहानी ख़त्म।”
उनके शब्द इतने कड़वे और इतने सच्चे थे कि मुबारक की आँखें भर आईं।
ज़फ़र ने जोड़ा—“मगर जाऊँगा नहीं। अगर अंजाम यही है तो यहीं सही। इज्जत की मौत मरना बेइज़्ज़त ज़िंदगी से बेहतर होता है।”
मुबारक कुछ नहीं बोला।उसके पास बोलने को कुछ बचा भी नहीं था।
---
उस रात दिल्ली के ऊपर एक भारी सन्नाटा उतर आया— अंग्रेज़ी तोपों का सन्नाटा। गली-गली में कुत्ते डर के मारे रो रहे थे। लोग अपने घरों में दीये नहीं जला रहे थे— डर था कि रोशनी गोली का निशाना बन जाएगी।
और दूर कहीं
अंग्रेज़ी फौज की तरफ़ से एक आदेश की आवाज़ आई—“Prepare the breach!”
किसी ने यह सुनकर कंपते हुए कहा—
“तोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।”
किसी ने पूछा—
“क्या?”
दबी हुई आवाज़ में उत्तर आया—
“दिल्ली को।”
और इसी के साथ ज़फ़र का दिल एक पुराने दीपक की तरह थोड़ा और बुझ गया।
दिल्ली पर मौत का साया अब सिर पर नहीं, सीने पर आ खड़ा था।
अध्याय 11 — क़िले की दरारें और अंदरूनी ग़द्दारी
सबसे पहले दरार दीवारों में नहीं,दिलों में पड़ी थी— और यह बात ज़फ़र आख़िरी तक समझ नहीं पाए।
सुबह की नम हवा में धूल और बारूद की गंध मिलकर फैल रही थी।किले की दरारों से चमकते सूरज की किरणें नहीं,अंग्रेज़ी खाइयों की चमचमाती तोपें नज़र आ रही थीं।
मुबारक ने दौड़कर कहा—
“हुज़ूर! क़िले के बाहर हमारी तरफ़ से जवाबी हमला तय हुआ था…मगर सिपाही लौट आए!”
ज़फ़र ने हैरानी से पूछा—
“लौट आए?
लड़े नहीं?”
मुबारक ने सिर झुका लिया—
“जनाब, कुछ बोले— गोली नहीं चल रही’, कुछ बोले—तोपें कमज़ोर हैं’, और कुछ…कुछ तो कह रहे थे कि हमारे ही बीच कोई अंग्रेज़ों को ख़बर दे रहा है।”
ज़फ़र की आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं—जैसे किसी ने उनकी रगों पर ठंडी उँगली रख दी हो।
---
किले के भीतर एक मीटिंग बुलाई गई। सैकड़ों सिपाही,जमा थे
एक बुज़ुर्ग सिपाही बोला—
“हमारे इलाक़े में रात को कुछ लोग घूमते दिखाई दिए।अंग्रेज़ी बोलते थे, पर कपड़े देसी पहन रखे थे।”
एक लड़ाका गरजा—“अगर हाथ लग जाएँ तो गला मरोड़ देंगे!”
पर तुरंत ही
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई—
“भाई, ग़द्दार हमारे कपड़ों में भी छिपे हो सकते हैं।”
सन्नाटा फैल गया। किले की हवा भारी हो गई—इतनी भारी कि हर शख़्स ने दसरे के चेहरे में शक का एक धब्बा देख लिया।
ज़फ़र को यह माहौल बेहद बुरा लगा। उन्होंने धीरे से कहा—
“जंग में तलवार से ज़्यादा शक मारता है।”
मगर सिपाहियों को अब तलवारों से ज़्यादा डर अपने ही साथियों से लगने लगा था।
---
उधर,मुगल सिपाहियों की एक टोली रात में किसी कोठी की तरफ़ जाती देखी गई। सुबह तक अफ़वाह फैल गई—वो अंग्रेज़ों को अंदर की सारी रिपोर्ट दे रहे हैं।”
किसी ने सच देखा नहीं, पर हर कोई अपनी-अपनी कहानियाँ जोड़ रहा था।
एक नौजवान ने चिल्लाकर कहा—“अगर किले की दीवारें गिर रही हैं तो उन ग़द्दारों की वजह से!”
दूसरा बोला—“चलो पकड़ते हैं!”
भीड़ दीवारों के टूटने से पहले ख़ुद टूटने लगी थी। अफ़वाहें बारूद से ज़्यादा तेजी से फैल रही थीं।
मुबारक ने हुक्म दिया—
“किसी को हाथ मत लगाना! जाँच होगी!”
पर भीड़ को कब आदेश समझ आता है? वे चारों तरफ़ फैल गए—
किसी की दाढ़ी देखकर किसी को अंग्रेज़ों का आदमी बताते,किसी के कपड़ों को राज़दार कहते, और किसी को सिर्फ़ इसलिए ग़द्दार क्योंकि वो बहुत चुप था।
ज़फ़र ने सिर पकड़ लिया—
“यह कौन-सी जंग है, मुबारक? जिसमें अपना ही आदमी दुश्मन समझ में आ रहा है?”
मुबारक बोला—
“हुज़ूर…जब दिलों में डर बस जाए तो ग़लत-सही की पहचान ख़त्म हो जाती है।”
---
शाम तक किले के अंदर की हवा इतनी ज़हरीली हो चुकी थी कि अकेले पल भर बैठना ख़तरनाक लगता। सिपाही कैदियों की तरह एक-दूसरे पर नज़र रख रहे थे। रात के चौकीदार बुझी हुई मशालें लिए खामोश गलियों में आवाज़ तक नहीं करते थे।
और इस सब के बीच किले की दीवार एक और धमाके में बड़ी दरार से फट गई। धूल के साथ लोगों की चीखें उठीं—
“दीवार गिर रही है…!”
मुबारक दौड़ पड़ा।
ज़फ़र भी छड़ी का सहारा लेते हुए बाहर आए।
दीवार का एक हिस्सा टूट कर गिरा था—जैसे क़िले की हड्डी उम्र से कमजोर होकर चटाख से टूट गई हो।
ज़फ़र ने धीमी आवाज़ में कहा—
“मुबारक…अगर बाहर से तोपें क़िले की दीवार गिरा रही हैं, तो अंदर से हम खुद को गिरा रहे हैं।”
मुबारक चुप हो गया।
कहने को क्या बचा था ?
---
रात के दूसरे पहर किले के पीछे वाले हिस्से में दो परछाइयाँ धीरे-धीरे रेंगती दिखीं।
पहरेदार चिल्लाया—“कौन?”
आवाज़ आई—
“हम अपने ही हैं!”
पर पहरेदार अब यह बात मुफ़्त में नहीं मानते थे। उन्होंने घेर लिया।जब परछाइयाँ उजाले में आईं, तो उनका राज़ खुला—उनमें से एक के कपड़े के अन्दर किले का नक्शा छिपा था।
पहरेदार ने मुबारक को बुलाया।
नक्शा देखकर मुबारक का चेहरा कस गया।
ज़फ़र भी आए। उन्होंने काँपते हाथों से नक़्शा छुआ—
“तो ये सच है…ग़द्दार हमारे ही बीच हैं।”
उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर इतना बोझ लेकर बोली कि जैसे सदियों का दुख इन दो लफ़्ज़ों में उतर आया हो।
मुबारक ने पूछा—
“हुज़ूर, अब क्या करें?”
ज़फ़र ने कुछ पल सोचा और कहा—
“अब? अब जो अंग्रेज़ नहीं कर रहे वो हमारे ग़द्दार कर देंगे—क़िले का दरवाज़ा खोल देंगे।”
फिर उन्होंने एक लंबी ठंडी साँस ली—
“आज जो टूट रहा है वो दीवार नहीं…दिल है, मुबारक।”
और बाहर, अंग्रेज़ी फौज की तरफ़ से
एक और आदेश की गूँज आई—
“Ready the storming parties!”
जिसका मतलब हर कोई समझ गया था—किला अब टूटने ही वाला है।
अध्याय 12 — अंग्रेज़ों का धावा, अफ़रातफ़री और ज़फ़र का टूटता यक़ीन
सुबह की पहली किरण अभी आसमान में ढंग से फैली भी न थी कि अंग्रेज़ी फ़ौज की तरफ़ से एक ऐसी गर्जना उठी जिसने दिल्ली के रग-रग को काँपते हौसलों के हवाले कर दिया।
तोपें इक-के-बाद-इक इस तरह दागी गईं जैसे कोई पागल दर्जी किसी पुराने कपड़े को बिना रहम के चीरता चला जाए।
किले की हवा बारूद की बदबू से गाढ़ी और भारी हो चुकी थी—इतनी भारी कि सांस लेना भी किसी मजबूर इबादत जैसा लग रहा था।
---
मुबारक ने दौड़कर खबर दी—
“हुज़ूर! अंग्रेज़ों किले में दाखिल हो रहे हैं।सीढ़ियाँ लगाई जा रही हैं। कब्जे की कोशिश शुरू हो चुकी है!”
ज़फ़र लकड़ी की छड़ी थामे धीरे-धीरे उठे। आँखों में डर नहीं था, थकान भी नहीं थी— बस एक ऐसी वीरानगी थी जो उन लोगों में उतरती है जो जान चुके हों कि उनकी दास्तान अब उनके हाथ में नहीं रही।
उन्होंने खिड़की से झाँका। धुंधलके में लाल कोट पहने अंग्रेज़ी सिपाहियों की पंक्तियाँ काले धुएँ में लाल चमकती चमक की तरह दिख रही थीं।
“मुबारक…”
ज़फ़र ने धीमे स्वर में कहा,
“ये फ़ौज जब पहले आई थी तो हुक्म चलाती थी—अब ये आने वाली फ़ौज ख़त्म करने आई है।”
---
उधर, किले के अंदर सिपाहियों की हालत खराब थी।
कुछ तोपों की मार से घबराकर दीवारों से दूर भाग रहे थे।
कुछ छतों पर चढ़कर अंग्रेज़ों पर गोली चलाना चाहते, मगर बाल-बाल बचते हुए खुद ही गिर पड़ते। कुछ लाठी पकड़े झगड़ रहे थे
—“तू क्यों पीछे हट रहा है?”“तू आगे क्यों नहीं बढ़ रहा?”
एक जवान तो घबराहट में इतना कांप रहा था कि बंदूक का घोड़ा दबाते ही उसकी गोली किले के अपने ही खंबे पर जा लगी। कई लोग छिपकर बार-बार आसमान देखते— मानो किसी फ़रिश्ते का इंतज़ार हो। पर आसमान आज बिल्कुल खाली था।फ़रिश्ते भी शायद डरकर कहीं भाग गए थे।
---
अचानक किले के उत्तरी हिस्से में एक भारी धमाका हुआ। धूल का बादल उठा— और जब बैठा तो सिपाहियों ने देखा कि एक बड़ी दरार धीरे-धीरे दरवाज़े की शक्ल ले रही है। जिससे अंग्रेज़ अंदर घुस सकते थे।
कुछ सिपाही डरते-डरते आगे बढ़े। पर इतने ही में अंग्रेज़ी फौज का पहला दस्ता सीढ़ियाँ टिकाकर दीवार पर चढ़ना शुरू कर चुका था।
गोरों की ठंडी, बेरहम चीखें आसमान चीर रही थीं—
“Forward!
Take the walls!”
उनकी आवाज़ों में
ना जोश था, ना जुनून—सिर्फ़ मशीन जैसी ठंडी नृशंसता।
---
मुबारक अपनी तलवार लहराते हुए दीवार की तरफ़ दौड़ा। उसके पीछे दर्जनों सिपाही। पर क़िले का आधा हिस्सा अब भी अफरातफरी में डूबा हुआ था— कुछ किसी को ग़द्दार समझकर पीट रहे थे,कुछ अपनी जान बचाने किसी तहख़ाने की तलाश में थे।
यह देखकर मुबारक चिल्लाया—“लानत है तुम पर! लड़ तो लो!वरना तुम नहीं तुम्हारी नस्लें भी ग़ुलाम रहेंगी!”
पर खौफ़ इंसान का ईमान खा लेता है— और यह किला इसी खौफ़ से भरा हुआ था।
---
ज़फर धीरे-धीरे अपने कमरे से बाहर आए। दूर से मुबारक की तलवार चमकती दिख रही थी।कुछ जवान अंग्रेज़ी सिपाहियों से भिड़े थे—जान की बाज़ी लगाकर। ज़फ़र ने किले की टूटी हुई दीवार को देखा।फिर आसमान की तरफ़ देखा। फिर बोले—
हाय, दिल्ली…
तूने हमको बादशाह कहा था,
मगर हम तेरे लिए कुछ भी न कर सके।”
उनकी आवाज़ कांप नहीं रही थी—वह बस थककर बिखर रही थी।
--
इसी बीच अंग्रेज़ी धावा पूरी तरह शुरू हो चुका था।
लाल कोट पहने गोरों के दस्ते सीढ़ियों से दीवार पर चढ़ते हुए ऐसे दिखते थे जैसे लाल चींटियाँ किसी टूटते पेड़ पर कब्ज़ा कर रही हों।
सिपाहियों की चीखें, अंग्रेज़ी गोलियों की तड़तड़ाहट, बारूद की गंध—सब मिलकर किले को जंग का मैदान नहीं, क़ब्रगाह बना रहे थे।
मुबारक ज़ोर से चिल्लाया—
“हुज़ूर, अब अंदर चलिए! दीवारें गिर रही हैं!”
ज़फ़र ने उदास मुस्कान के साथ कहा—
“मुबारक… जो गिरना था वो तो हम कबके गिरा चुके हैं।”
फिर उन्होंने किले पर अंतिम नज़र डाली— इतनी लंबी जैसे कोई अपनी उम्र भर की हसरतों को आँखों में समेट रहा हो। उस क्षण ज़फ़र का यक़ीन पत्ते की तरह टूटकर गिर पड़ा— और वह किले की गिरती दीवारों जितना कमज़ोर दिखने लगे।
---
उस सुबह धूप नहीं उगी— बस धुआं उठा। और अंग्रेज़ी सेनाएँ धीरे-धीरे खुले हुए दरारों से किले में दाख़िल होने लगीं।
दिल्ली अब बचने वाली नहीं थी। ज़फ़र अब शहंशाह नहीं—एक अनचाहा मोहरा बन चुके थे। और इस जंग का अंजाम अब किसी तलवार से नहीं, किस्मत से लिखा जाना था।
दिल्ली टूट रही थी। लाल क़िले की दीवारें धुएँ से काली, गालियों में गोलियों की आवाज़ें, और हर आदमी की आँखों में “सब ख़त्म हो गया” जैसा ख़ौफ़।
बाग़ियों के चेहरे पर मायूसी थी और ज़फ़र के चेहरे पर वही पुरानी बेबस शान्ति।
किसी सिपाही ने कहा—
“हुज़ूर, अब क़िले में रुकना ठीक नहीं … कहीं और चलिए शायद वहाँ कुछ वक़्त मिल जाए।”
ज़फ़र ने थका हुआ जवाब दिया—
बादशाह अगर अपनी ही सरज़मीन पर पनाह ढूँढे, तो समझ लो ज़माना बदल चुका है।”
फिर भी वह चला…लाठी टेकता हुआ, काँपते क़दमों से।
---
शहंशाह हुमायूं का मक़बरा अपने पुराने वैभव में खड़ा था—
लाल पत्थर, ऊँची मेहराबें, और आसमान की ओर उठता हुआ गुम्बद। पर आज वह मक़बरा मुगलों की शान नहीं,एक बूढ़े शहंशाह की पनाहगाह था ।
ज़फ़र ने अंदर प्रवेश किया।
ठंडी ज़मीन पर बैठते हुए बोला—
“देखो, कैसे वक्त इंसान को वहीं ले आता है जहाँ उसके बुजुर्ग दफन हैं… शायद मैं भी इसी ख़ामोशी में खो जाऊँ।”
सिपाही चुप थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह विद्रोह था या बस एक अधूरा सपना जो टूट चुका था।
---
उधर अंग्रेज़ी सेना तोपों और बंदूकों के साथ दिल्ली में आगे बढ़ रही थी। चाँदनी चौक, कश्मीर गेट, दरियागंज—हर जगह सन्नाटा और लाशें।
लाल क़िला गिर चुका था। बाग़ी छितर चुके थे।अंग्रेज़ सिपाहियों के जूतों तले दिल्ली की मिट्टी चरमरा रही थी।
एक अंग्रेज़ अफ़सर ने कहा—
“Now the city belongs to the Company.”
और दिल्ली…जो कभी मुग़ल सल्तनत की धड़कन थी,आज एक उजड़ा हुआ शहर बन चुकी थी।
अध्याय 13
जफर की गिरफ्तारी
दिल्ली पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा धीरे-धीरे नहीं,बल्कि अचानक,ऐसे टूटा था जैसे सदियों की इज़्ज़त तलवार की एक धार से दो भाग हो गई हो।
किले से तोपों की गड़गड़ाहट रुक चुकी थी, लेकिन हवा में बारूद, खून और रोते हुए शहर की गंध अब भी तैर रही थी।
उस दोपहर हुमायूँ का मक़बरा ऐसा लगता था जैसे दिल्ली का मय्यतख़ाना बन गया हो।बादशाह ज़फ़र एक पुराने, फटे हुए गद्दे पर बैठे थे—उम्र के साथ उनकी आँखों का नूर गया नहीं था,लेकिन उम्मीद का चराग़ तेज़ आँधियों में झिलमिलाते दिये जैसा था।
उनके आसपास कुछ वफ़ादार नौकर, और तीन शहज़ादे बैठे थे—मिर्ज़ा मुग़ल
मिर्ज़ा खिज़्र,
और मिर्ज़ा अबू बकर।
शहज़ादे अब भी उम्मीद लगाए हुए थे कि अंग्रेज़ उन्हें सिर्फ़ कैदी बनाएँगे, जैसे अंग्रेज़ों की नीयत में अभी भी थोड़ा-बहुत इंसानियत बची हो। लेकिन बाहर खड़े सिपाहियों की आँखें इतनी ठंडी थीं जैसे उनकी रूहों में कोई मौसम ही न बचा हो।
---
दूर से घोड़ों की टापें सुनाई दीं। धूल उड़ती थी, और उस धूल में दिल्ली की टूटी हुई किस्मत तैरती थी।
कप्तान विलियम हडसन काले घोड़े पर सवार आया—चेहरे पर वही क्रूर मुस्कान जो बड़े से बड़ा कसाई भी नहीं रखता।
उसके साथ कुछ अंग्रेज़ सिपाही,और कुछ सिख थे—
मक़बरे के बाहर खड़े एक बूढ़े फ़क़ीर ने बस इतना कहा—
“दिल्ली के दिन पूरे हो गए।”
---
हडसन अंदर गया।
उसने ज़फ़र को देखा—एक बूढ़ा, सफ़ेद दाढ़ी वाला आदमी,टूटी हुई आँखें और काँपती उंगलियों वाला।और फिर मज़ाक उड़ाने जैसा मुस्कुराया—
“So this is the Emperor of India?
“Bahadur Shah…
Your sons must surrender.
You must surrender.”
ज़फ़र की आवाज़ पहले जैसी ठोस नहीं रही थी।वह धीमे, लेकिन साफ़ बोले—
“जनाब, मेरे बच्चे मुजरिम नहीं। जो कुछ भी हुआ, वो भीड़ ने, सिपाहियों ने किया। ये लड़के…… बेगुनाह हैं।”
हडसन ने तिरस्कार से कहा—
“The Company will decide who is guilty.”
कोई इंसानी अहसास उसकी आँखों में नहीं था।
अंग्रेज़ों के दो सिपाही आगे बढ़े—शहज़ादों को पकड़ने के लिए।
मिर्ज़ा मुग़ल सीधे खड़े हुए।
उन्होंने अंग्रेज़ी में कहा—
“You may arrest me. But remember, I am still the son of the Emperor of Hindustan.”
सिपाही ने मुस्कुराकर कहा—
“Not for long.”
उनके हाथ बाँध दिए गए। रस्सी इतनी कसकर कसी गई कि मिर्ज़ा खिज़्र की कलाई से खून निकलने लगा।
मिर्ज़ा अबू बकर घबराए हुए थे। उन्होंने अपने पिता की तरफ़ आख़िरी बार देखा—जैसे पूछ रहे हों:
“अब्बा, क्या ये सच में हमें ले जा रहे हैं?”
जफर ने हडसन की तरफ कातर निगाहों से देखा और काँपती आवाज़ में बोले—
“जनाब हडसन…शहजादे बच्चे हैं…लड़ाई में इनका क्या कसूर?”
हडसन मुस्कुराया—
वही बर्फ़ जैसी मुस्कान जो सिर्फ़ अंग्रेज़ी हुकूमत में पैदा हो सकती थी। उसने कहा—
“हम इन्हें सिर्फ़ questioning के लिए ले जा रहे हैं।
ज़फ़र का दिल इसी झूठ से टूट गया।
इसके बाद तीनों शहजादों को एक बैलगाड़ी में बैठाया गया। गाड़ी के दोनों तरफ़ बंदूकें तानकर अंग्रेज़ी सिपाही खड़े थे
ज़फ़र सिर्फ़ इतना बोल सके—
“ख़ुदा तुम्हारा हाफ़िज़ हो, बेटा।”
कप्तान हडसन ने आगे बढ़कर अपने दस्ते को संकेत दिया।
“Bahadur Shah…You are hereby arrested
in the name of the British Crown.”
यह शब्द ज़फ़र के सिर पर किसी हथौड़े की तरह नहीं गिरे।वह जानता था कि यह पल आएगा—और यह भी कि इतिहास का यह आख़िरी मोड़ उसकी किस्मत में पहले से लिखा हुआ था।उसने अपनी चादर ठीक की,लाठी उठाई, और शांत आवाज़ में कहा—
“चलो … कहाँ चलना है?”
अंग्रेज़ अधिकारी कुछ पल को ठिठक गया। उसने शायद सोचा होगा कि बूढ़ा शहंशाह चिल्लाएगा, रोएगा, या विरोध करेगा। पर ज़फ़र की तरफ़ से सिर्फ़ एक मर्यादित थकान थी।
अंग्रेज़ों ने ज़फ़र के हाथों में लोहे की हल्की बेड़ियाँ डालीं। बेड़ियों की ठंडी छुअन ने उनकी उम्र, उनके साम्राज्य, और उनके दिल—सबको एक साथ बाँध लिया।
जब ज़फ़र बाहर निकले, दिल्ली की हवा उनकी ओर ऐसे देख रही थी जैसे एक माँ अपने बूढ़े, टूटे हुए बेटे को देखती है।
उन्होंने आसमान की ओर देखा—जैसे कह रहे हों
“ख़ुदा, तूने जो लिखा…वह मैं निभा रहा हूँ।”
अंग्रेज़ सेना ने उन्हें घेर लिया, और हुमायूँ का मक़बरा उनके पीछे छूट गया—हमेशा के लिए।
___
उधर तीनों शहज़ादों को बैलगाड़ी में ठूँस दिया गया था ।गाड़ी ऐसे चल रही थी जैसे किसी जानवर को क़साई ख़ाने ले जाया जा रहा हो।रास्ते में दिल्ली की औरतें छतों से झाँकती थीं—किसी के होठों में शहजादों के लिए दुआ थी , किसी के होंठों पर अंग्रेजों के लिए बद-दुआ।
एक बुज़ुर्ग औरत बोली—
“अल्लाह तुम्हें जन्नत दे बेटा…तुम बेगुनाह हो।”
गाड़ी आगे बढ़ती रही—और हवा में दिल्ली का मातम फैलता रहा।
क़ाबुली गेट के पास पहुँचते ही गाड़ी एकदम रुक गई।
वहाँ पहले से हडसन खड़ा था—राइफल ताने हुए सिपाहियों के साथ।
हडसन ने गाड़ी की तरफ़ इशारा किया—
“Bring them down.”
शहज़ादों को नीचे उतारा गया। उनके कपड़े उतरवाए गए ताकि दिल्ली के लोग देखें कि मुग़ल बादशाहत किस हालत में पहुँच चुकी है।
तीनों शहजादे खड़े हुए थे । हडसन ने नफरत से उन्हें देखा और बहुत तेज आवाज में हुक्म दिया ।
“shoot them.”
तीन अंग्रेज़ सिपाही आगे आए। उनकी बंदूकों के मुँह शहज़ादों के सीने पर टिके।
उस एक मिनट में—दूर कहीं शाम की नमाज़ की आवाज़ गूँज उठी।किसी चिड़िया ने झटके से अपने पंख फड़फड़ाए। और तीनों राजकुमारों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।
मिर्ज़ा अबू बकर ने धीरे से आसमान को देखते हुए कहा —
“अब्बा जान का ख़याल रखना…
Fire
धाड़!
धाड़!
धाड़!
तीन गोलियाँ चलीं। तीन जिस्म एक साथ मिट्टी पर गिर पड़े। उनके सीने फट गए, खून फव्वारों की तरह बहा— क़ाबुली गेट की मिट्टी लाल हो गई।
अध्याय 14 दिल्ली का कत्ल ए आम
अंग्रेज़ी फौज ने आदेश जारी किया—
“No Mercy to Rebels.
Shoot every sepoy.
Hang every suspect.”
(किसी भी बाग़ी पर रहम नहीं।
मिलते ही गोली मारो।
संदेह हो—तो फाँसी दो।)
यह सिर्फ़ आदेश नहीं था—यह क़त्ले-आम को वैध करने का लाइसेंस था।
अँग्रेज़ों के लिए बाग़ी सिपाहियों का मतलब था—हर वह आदमी जिसके चेहरे पर डर नहीं, या जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी की आँखों में एक बार भी आँखें मिलाई हों।
पहला निशाना कश्मीरी गेट से भागे हुए सिपाही थे। जिन्होंने विद्रोह में तलवारें उठाईं थीं,जिन्होंने “दीन” और “धरती” के नाम पर कसम खाई थी—उन्हें पकड़कर सड़क पर ही गोली मार दी गई। सिपाहियों की लाशें इकट्ठी-इकट्ठी ढेर की तरह लगने लगीं।
अंग्रेज़ सैनिक कहते थे—“Dead rebels smell the same—
Hindu or Mussalman.
चाँदनी चौक वह जगह थी जहाँ बाग़ियों ने पहली बार अंग्रेज़ अफ़सरों को मारा था। सो अंग्रेज़ों ने यहीं बदला लिया।उन्होंने हर दुकान के पीछे हर घर की छत पर हर कोठरी में छिपे सिपाही खोजे।
कई लोग बिल्कुल बेगुनाह थे—पर शक की एक लकीर का मतलब था तुरंत मौत। जामा मस्जिद में ढेरों बाग़ी छुपे थे अंग्रेज़ों ने मस्जिद पर तोपें तान दीं। अंदर से आवाज़ आई—
हम अल्लाह के घर में हैं,
हम पर रहम करो।
लेकिन तोपों में रहम नहीं होता। तोप दागी गई—और मस्जिद की दीवारें लोगों की चीख़ों के साथ ढह गईं।ज्यादा बाग़ी मलबे में दबकर मरे या अंग्रेज़ों की गोलियों से—यह कोई नहीं गिन सका।
शहर चीख रहा था—खून, बारूद और चीख़ों की बदबू हर गली में घुल गई थी। जैसे किसी ने 17 लाख लोगों के इस शहर को एक ही रात में मय्यत-ख़ाने में बदल दिया हो।
सड़कें सुनसान नहीं थीं—सड़कें लाशों से भरी थीं। किसी के पास रोने का वक़्त नहीं था। रोने वाली आवाज़ें भी कारतूसों से भरी बंदूकों के नीचे कुचल दी गई थीं।
जनरल विलियम जॉन निकोलसन ने आदेश दिया—
“Delhi must be taught a lesson
और अंग्रेज़ों ने ऐसा सबक सिखाया कि इतिहास आज तक उस सिहरन को नहीं भूल पाया।
सैनिक हर गली में फैल गए—कंधों पर बंदूकें, कमर पर तलवारें और दिलों में बदले की आग।
जिस आदमी के हाथों में हथियार मिले उसे बागी कह कर मार दिया गया।
जिसके पास हथियार नहीं मिले—उसे बाग़ी समझकर मार दिया गया।
किले के आसपास जो भी नौकर, बावर्ची, मुंशी, या बेगमात के खिदमतगार मिले—उन्हें बाहर लाकर कतार में खड़ा किया गया।
एक अफ़सर की दिल दहलाने वाली आवाज गूंजी —
फायर
और देखते-देखते किले की दीवारें खून से लाल होती गईं।
तमाम सिपाही ज़िंदा पकड़े गए। उन्हें किले के बाहर खंभों से बाँधकर सरेआम फाँसी दी गई।
एक अंग्रेज़ अफ़सर ने लिखा—
“The ropes were not enough for the number of rebels.”
(फाँसी की रस्सियाँ बाग़ियों की संख्या से कम पड़ रही थीं।)
अंग्रेजों ने घरों के दरवाज़े तोड़े।
किसी बुज़ुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा—“साहब, मैं तो मज़ार पर बैठने वाला आदमी हूँ, मेरा क्या गुनाह?”
सिपाही ने जवाब नहीं दिया—
बस गोली दाग दी।
स्त्रियाँ चिल्लाई—बच्चे रोए—पर कोई नहीं सुन रहा था।
गली की गली लाशों से पट गई। कुत्ते डर गए, बिल्लियाँ भाग गईं—क्योंकि इंसानी खून की गंध बहुत भारी होती है।
अंग्रेज़ अफसर ने ऐलान किया
“Delhi will be evacuated.”
अब दिल्ली को सिर्फ़ लाशों और सैनिकों का शहर बनना था।
लोगों को घरों से बाहर निकालकर किले की तरफ़ धकेला गया।
और वहां से—निकाल दिया गया बाहर। शहर की दीवारों से बाहर।
औरतें पोटलियाँ उठाए,बूढ़े काँपते हुए कदमों से, बच्चे भूख से रोते हुए—सबको दिल्ली छोड़नी पड़ी।कई तो रास्ते में ही गिरकर मर गए।
और सच यही भी था कि इस क़त्ले-आम की आड़ में लूट का ऐसा खेल हुआ जैसा इतिहास में कम देखा गया था ।
जामा मस्जिद में पनाह लेने वालों को घसीट-घसीटकर बाहर निकाला गया। कई को वहीं मार दिया गया।खूबसूरत मुगलिया हवेलियों के दरवाज़े तोड़ दिए गए—दीवारों पर लगी नक्काशी तोड़कर जलावन बना दी गई।
उस समय का एक अंग्रेज़ अफ़सर अपनी डायरी में लिखा —
“We killed everything that had life in Delhi.”
और यह वाक्य —दिल्ली के असली हाल का बयान था।
अंग्रेज़ों ने फख़्र से कहा—बग़ावत खत्म हो गई। ब्रिटिश हुकूमत का “कानून” उस दिन अंग्रेज़ी बंदूक की नाल से निकला था।
दिल्ली का हर पत्थर
हर गली
हर मकान
हर दीवार
हर खिड़की
उस क़त्ले-आम का गवाह बन गई थी ।
अध्याय 15— ज़फ़र का मुक़दमा
लाल क़िले का दीवान-ए-ख़ास, जहाँ कभी नगीने जड़े हुक़्क़े दमकते थे, जहाँ इलाही खिड़कियों से आती धूप सुरहियों पर सोना बनकर गिरती थी, आज एक बेरहम अदालत का चौबारा बन चुका था।
कालीनों की जगह धूल थी, इत्र की जगह बारूद और खून की बदबू,नाज़ुक मेहराबें तक रोती हुई लगती थीं।इसी वीराने में एक पतली चारपाई पर बैठा था मुग़लिया सल्तनत का आख़िरी सूरज—बहादुर शाह ज़फ़र।
जफर का शरीर काँप रहा था,मगर यह ठंड का काँपना नहीं था—यह इतिहास की मार थी,जिसने एक बूढ़े शायर को हाथों में हथकड़ी पहनाकर अपने सामने खड़ा कर दिया था।
---
तीन अंग्रेज़ अफ़सर, उनके पीछे दरबान, कुछ हिंदुस्तानी मुखबिर—
किसी ने ज़फ़र को देखकर कहा—
“ये बादशाह है? या किसी पुरानी कब्र का ख़ाकसार?”
एक और अफ़सर ने मुस्कुराकर कहा—
“यही बुज़दिल बग़ावत का सरगना है।”
ज़फ़र ने नज़रें उठाकर देखा—पहली बार उनमें दर्द नहीं था, बस एक थका हुआ सा तजुर्बा था, जैसे कह रहा हो—“तुम्हारी समझ से परे हूँ मैं । ”
अदालत का क़ानूनी नाटक शुरू हुआ।
सबसे ऊँची आवाज़ वाला अफ़सर उठा,
काग़ज़ हिलाते हुए बोला—
“बहादुर शाह ज़फ़र पर इल्ज़ाम है
1. कंपनी बहादुर के ख़िलाफ़ जंग शुरू करने का।
2. दिल्ली के बागियों को पनाह देने का।
3. अंग्रेज़ ईसाइयों के कत्ल में शामिल होने का।
4. दिल्ली को बागियों के हवाले कर देने का।
5. और—सबसे बड़ा इल्ज़ाम—
मुग़लिया तख़्त के नाम पर हिंदुस्तान की बग़ावत को हौसला देने का।”
कमरे में मौन फैल गया। ज़फ़र ने धीमे से सिर्फ़ इतना कहा—
“मैं तो अपने कमरे से बाहर भी न निकल सका। मुझमें ताक़त नहीं, हाथ काँपते हैं…मैं क्या जंग कराऊँगा?”
अंग्रेज़ अफ़सर हँसा—
“तुम्हें जंग नहीं करानी थी, तुम्हारे नाम ने कराई।”
---
गवाह लाए गए—हर चेहरे पर डर या लालच का साया था
एक ख़ानसामा बोला—
“हुज़ूर, मैंने शहंशाह को बागियों से बात करते सुना था।”
ज़फ़र ने कांपती आवाज़ में पूछा—
“कब?”
ख़ानसामा हकला गया।
अफ़सर ने उसकी ओर देखा—
वह बोल पड़ा—“उसी दिन… जब दिल्ली में शोर हुआ था ।”
ज़फ़र की आँखों में एक बुझा हुआ दुख था ।
एक सिपाही आया, उसने हाथ जोड़ लिए—
“हुज़ूर, मैंने हुक्मनामे पर मुहर तो लगाई थी,
पर बादशाह सलामत को इसकी जानकारी न थी ”
अंग्रेज़ अफ़सर ने चिल्लाकर कहा—
“ओवररूल्ड!”
और उसे बाहर निकाल दिया गया।
---
एक दस्तावेज़ खोला गया, जिसके किनारों पर खून के निशान जैसे उभरते दिख रहे थे।
अफ़सर बोला—
“आपके बेटे —मिरज़ा अबू बकर,मिरज़ा मुईनुद्दीन, मिरज़ा खिज़्र सुल्तान—तीनों को हमने बाग़ी साबित किया है।”
ज़फ़र के गले में काँटा फँस गया।
अफ़सर ने मुस्कुराकर कहा—
“और उनकी लाशें हमने ख़ुद आपको दिखवाई हैं ।कंपनी बहादुर की तरफ़ से आपके लिए तोहफ़े में लाए थे।”
कमरा ठंडा हो गया। इतना ठंडा कि ज़फ़र के हाथ सुन्न पड़ गए।
ज़फ़र के गाल पर आँसू बह निकला। पहली बार अदालत ने एक बादशाह को रोते देखा।
वह बोला—
“मेरे बच्चों को मार दिया…और आज मुझे गुनहगार कहते हो?”
कोई जवाब न आया।
अदालत ने पूछा—
“क्या कहना है आपको?”
ज़फ़र ने गर्दन उठाई—
अब वह सिर्फ़ एक बूढ़ा नहीं, एक टूटा हुआ पिता था जो इतिहास की आँखों में आँख डाल रहा था
“मैंने किसी को जंग का हुक्म नहीं दिया।मेरी मुहर, मेरी इजाज़त—सब मेरे बस से बाहर था।जिस बादशाह की उम्र अस्सी के पार हो,जो अपने जूते तक पहनने में किसी न किसी का सहारा चाहता हो,वह किसी सल्तनत की बग़ावत कैसे उठाएगा?
हाँ—मेरा नाम था।लोगों ने अपने दिलों में उसे जगा लिया।मैं उनका क्या कर सकता था?”
कमरा कुछ क्षणों को निश्चल हो गया
जज ने काग़ज़ों पर हस्ताक्षर किए—
कलम सूखी थी, मगर फैसले में खून की गंध थी।
बहादुर शाह ज़फ़र तख़्त से महरूम।
तमाम खिताब, जागीरें जब्त।
दिल्ली से हमेशा के लिए बेदख़ल।
उम्रकैद की सज़ा।
और स्थान—
रंगून, बर्मा
यह सिर्फ़ एक बूढ़े आदमी को सज़ा नहीं थी।यह मुग़ल सल्तनत के ताबूत पर आख़िरी कील थी।
जब अदालत खाली होने लगी, ज़फ़र ने दीवार से टिककर कहा—
मैंने इस बहार-ए-फ़ानी में जितना देखा, बस एक बात समझी—किस्मत जब पीछे पड़ जाए तो बादशाह भी कोड़ी का नहीं रहता।
अध्याय 16— जफ़र का निर्वासन : “दिल्ली से रंगून तक का तवील सफ़र”
हवा में धूल थी, धुंध थी या इतिहास का बिखरता हुआ कोई परचम—कहना मुश्किल था। लाल क़िले की फटी हुई दीवारें उस दिन किसी बूढ़ी रानी की कलाई की नसों की तरह उभर आई थीं—कमज़ोर, सूखी, काँपती हुई। उन्हीं दीवारों के पीछे, एक छोटे से कमरे में, बहादुर शाह ज़फ़र बैठे थे —सफ़ेद दाढ़ी पर हल्का सा पीलापन, और आँखों में बुझी हुई चिंगारियों का दर्द ।
अंग्रेज़ अफ़सर ने दरवाज़े को हल्के से ठोका।
“बहादुर शाह… अब चलने का वक़्त हो गया है।”
जफ़र ने सिर उठाया। आवाज़ किसी पठार से आती हवा की तरह धीमी थी—
“किधर?”
अफसर ने सपाट स्वर में कहा—
“दिल्ली से बाहर। हमेशा के लिए।”
कमरे में सन्नाटा ऐसा फैल गया जैसे सदियों से जमी कोई बर्फ़ एक ही पल में पिघलकर फिर जम गई हो। जफ़र की आँखों में हल्की सी नमी उभरी, पर वह आँसू नहीं थे। वह दिल्ली थी—तहज़ीब की दिल्ली, ग़ज़लों की दिल्ली, दारबारों और दीयों की दिल्ली—जो उस बूढ़े दिल में अटकी रह गई थी ।
लाल क़िले के दरवाज़े से जब जफ़र को बाहर लाया गया तो पटियाले, अलवर, भरतपुर, और कई दूसरी रियासतों के वफ़ादार रहे सिपाही तमाशबीनों की भीड़ में खो चुके थे। अंग्रेज़ों ने उनके चेहरों की शक्लें बदल दी थीं—किसी में डर था, किसी में शर्म, और किसी में ऐसा सन्नाटा जैसे किसी ने उनकी नसों से ख़ून निकालकर खामोशी भर दी हो।
“मुझे कहां ले जाया जा रहा है?”
ज़फ़र ने पूछा।
“रंगून… बर्मा।”
एक सैनिक ने कठोर आवाज़ में कहा।
यह शब्द किसी तलवार की तरह हवा में घूमता हुआ ज़फ़र की तरफ़ आया—
रंगून!
ज़फ़र के लिए न कोई हाथी, न पालकी, न कोई शाही जुलूस।
उन्हें एक सस्ती, किरकिराती बैलगाड़ी में ठूँस दिया गया—जिसकी खड़खड़ाहट उनके टूटे हुए मन के साथ मिलकर किसी बूढ़ी हड्डी की तरह चटक रही थी। उनके हाथ काँप रहे थे, पैरों में सूजन थी, और आँखों के कोनों में सिर्फ़ आँसू नहीं, एक पूरी उम्र का धुआँ था।
ज़फ़र को बैलगाड़ी के कोने में बिठाकर अंग्रेज़ अफ़सर ने कहा—
“बादशाह, यह आपका आख़िरी सफ़र है दिल्ली में।”
जफर की नज़र दिल्ली की गलियों पर आख़िरी बार पड़ी। चाँदनी चौक की सड़क—जहाँ कभी इत्र की महक उड़ती थी—अब राख और खून की बदबू से भरी थी।जामा मस्जिद के सीढ़ियों पर बैठे फटेहाल लोग उन अंग्रेज़ी सिपाहियों को टकटकी लगाकर देख रहे थे जो विजय की मुद्रा में बंदूकें लटकाए चल रहे थे।
एक बुज़ुर्ग औरत अपने बच्चे को जफ़र की तरफ़ इशारा करके कह रही थी—
“देख बेटा, यह वो बादशाह है जिसने खुद तो कुछ न किया, पर हम सबको बर्बाद करवा गया।”
जफ़र ने यह सुना। काँपती साँस रुकी पर उन्होंने कोई शिकवा न किया। उन्होंने अपने आप से कहा—
“क़िस्मत… तूने भी बड़ा बे-रहम तमाशा दिखाया।” यह आवाज किसी ने नहीं सुनी क्योंकि अंग्रेज़ी बूटों की आवाज़ बहुत ऊँची थी।
यमुना नदी के किनारे एक काफ़िला तैयार था। नावें थीं, घोड़े थे, और अंग्रेज़ी बंदूकों का सख़्त पहरा।
जफ़र को सबसे बीच वाली नाव में बैठाया गया।
नाव धीरे-धीरे बहने लगी।
जफ़र के लिए यह बहाव सिर्फ पानी का नहीं था—यह बहाव दिल्ली को उनसे खींचकर दूर ले जा रहा था ।
काफ़िला कई दिनों तक चलता रहा।
हर पड़ाव पर अंग्रेज़ अफ़सर जफ़र को ऐसे देखते जैसे कोई कीड़ा पकड़कर लाया गया हो।
उन्हें अलग-अलग अंग्रेज़ी शिविरों में ले जाया गया— इलाहाबाद, बनारस, पटना…
हर जगह उन्हीं के नाम पर हजारों हिंदुस्तानी फाँसी के पेड़ों पर झूल रहे थे। कहीं-कहीं वे चोरों की तरह पेश किए गए, कहीं ज़ंजीरों में बाँधा गया।
अंग्रेज़ सिपाही मज़ाक में कहते—
“अरे देखो, ये वही बादशाह है जो हमसे लड़ना चाहता था।”
ज़फ़र चुप थे चोट बहुत गहरी थी।
कलकत्ता पहुँचते-पहुँचते ज़फ़र का शरीर लगभग आधा रह गया था।80 साल से ऊपर की उम्र अब हर कदम पर अपना करज़ा माँग रही थी।
एक अफ़सर ने हँसकर कहा—
“देखो… इंडिया का बादशाह! क्या यही था वह शहंशाह जिसके नाम से सलाम बजते थे?”
दूसरा बोला—
“अब ये बुढ्ढा रंगून में मरेगा… वही ठीक जगह है।”
जफ़र ने उन दोनों की तरफ़ देखा।
आँखों में ग़ुस्सा नहीं था, बस एक गहरा दर्द था—
“जिस ज़मीन का मैं वारिस था, उसी ज़मीन पर अब मैं कै़दी हूँ… वाह री दुनिया।”
कलकत्ता के फ़ोर्ट विलियम पर जब जफ़र पहुँचे तो बारिश शुरू हो चुकी थी। बारिश की बूंदें ज़फ़र के चेहरे पर गिरतीं और ऐसा लगता मानो दिल्ली की धूल उस बूढ़ी पेशानी से धुल रही हो।
जहाज़ तैयार था—काला, भारी, उदास।जफ़र को डेक पर चढ़ाया गया।एक अंग्रेज़ सैनिक ने तंज किया—
“बादशाह, समुद्र की हवा पसंद आएगी आपको?”
जफ़र ने कोई उत्तर नहीं दिया—
समुद्र में हल्की धुंध थी—मानो आसमान भी बूढ़े शहंशाह के साथ रो रहा हो।
सीढ़ियों से नीचे उतरते वक्त उनका एक पाँव फिसला। सिपाहियों ने झटके से पकड़ा—मदद नहीं, बल्कि आदेश जैसी पकड़।
जहाज़ के डेक पर खड़े होकर ज़फ़र ने आख़िरी बार
हिंदुस्तान की मिट्टी को देखा।
“ये वो वतन है जिसके लिए मैं कुछ कर भी न सका…”
लहरों ने जवाब नहीं दिया। लहरें कभी किसी बादशाह के लिए भी नहीं रुकतीं।
जहाज़ धीरे-धीरे हिंदुस्तान से दूर जाने लगा।
पहाड़, पेड़, मंदिर, मस्जिद—सब धुंध में ग़ायब होने लगे।
जफ़र ने आख़िरी बार दिशा-ए-हिंद को देखा और बुदबुदाए—
“न मिटेगी याद दिल्ली की, न बुझेगा दिल का अंधेरा…”
कई दिनों तक नीला पानी, नीला आसमान, और बीच में एक बूढ़ा कैदी।
जहाज़ पर बातचीत कम, निगरानी ज़्यादा थी।
ज़फ़र अक्सर समुद्र की लहरों को देखते हुए धीर-धीरे गुनगुनाता—
“लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में…”
यह वो शेर था जो आने वाले सदियों तक लोग याद रखने वाले थे
रातें ठंडी थीं।
कपड़ों के नाम पर एक पतली शॉल और एक पुराना कुर्ता।कभी-कभार उसकी आँखों में पानी भर आता—समंदर का नमक या दिल का—पहचानना मुश्किल था।
हफ़्तों के सफ़र के बाद जहाज़ रंगून के तट पर रुका।यह शहर दिल्ली जैसा नहीं था—
ना क़िले,
ना महफ़िलें,
ना उर्दू की महक।
बस पेड़ों, दलदलों, और चुप्पी से भरी एक अजनबी जगह।
ज़फ़र को एक छोटे से जेलनुमा मकान तक ले जाया गया—
दीवारों पर सीलन,छत से गिरती बूंदें,और फर्श पर घिसा हुआ एक पतला गद्दा।
“इसी में मेरी बाकी ज़िंदगी कटेगी?”
उन्होंने धीरे से पूछा।
सिपाही ने कंधे उचकाकर कहा—
“Yes.”
अध्याय 17
रंगून की जेल — जहाँ दिन भी रात लगता था
रंगून का वह छोटा-सा, गीली दीवारों वाला कमरा अब बहादुर शाह ज़फ़र की पूरी दुनिया बन चुका था।न कोई तख़्त, न कोई शाही बिस्तर, न कोई महफ़िल—सिर्फ़ फर्श पर पड़ा एक गद्दाऔर छत से झर-झर गिरता पानी।
कभी वे हिंदुस्तान पर राज करते थे , आज उनकी दुनिया चार गज की दीवारों में क़ैद थी।
कमरे के बाहर एक बर्मी सिपाही पहरा देता,जिसे न उर्दू आती थी, न दिल्ली का नाम समझ आता था।
दिल्ली…
ज़फ़र के दिल में एक टीस उठती।इतना बड़ा शहर इतनी आसानी से किसी और का कैसे हो गया?
उम्र तो पहले ही ढल चुकी थी, अब कैद ने जिस्म को भी खोखला कर दिया था। कमर में दर्द, सीने में जलन, सांसों में घुटन—जैसे हर रोज़ मौत एक क़दम और करीब आ रही हो।
रात को खाँसी के दौरे पड़ते—दिवारों से टकराती उसकी खाँसी किसी टूटे हुए तबले की तरह लगती। कोई दवा नहीं, कोई वैद्य नहीं—सिर्फ़ एक बर्मी जेलर जो कभी-कभार चावल का पतला भात दे जाता।
शहंशाह नहीं रहा, पर शायर अब भी ज़िंदा था।
रात में बैठकर वह खिड़की से बाहर झाँकते, जहाँ दूर तक अँधेरा था।कभी वह अपनी टूटी हुई, कांपती आवाज़ में पढ़ते—
“लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में,
किसकी बनी है .....
शेर पूरा करते-करते उनकी सांस रुक-रुक जाती।
कभी वह खुद से बड़बड़ाते—कभी बैठे बैठे अचानक उनकी आँखें नम हो जातीं।
1858 से 1862 तक ज़फ़र मौत के साथ एक लंबी बातचीत करते रहे । पर एक सर्द, बारिश से भरी रात उस बातचीत का आख़िरी दौर शुरू हुआ।
सांस तेज़, बुखार तेज़, और जिस्म काँपता हुआ।आँखों में वही सूनापन जिसे उस बेजान मकान की दीवारें भी महसूस कर रहीं थीं ।
अचानक खाँसी का तेज़ दौरा पड़ा—और उसके बाद एक लंबी, खामोश साँस।
सुबह, जेल के पहरेदार ने कमरे में झाँका। ज़फ़र लेटे थे—शांत, थके हुए, पर चेहरे पर अजीब सुकून था। पास में रखा था एक अधूरी ग़ज़ल का टुकड़ा:
“कितना है बद-नसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए,
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में…”
दिल्ली का वह आख़िरी बादशाह—जिसने न चाहते हुए भी एक बग़ावत का चेहरा बनना पड़ा—इतिहास की तहों में दफ़्न हो गया था ।न रंगून की मिट्टी रोई, न दिल्ली को यह ख़बर मिली कि उसका बूढ़ा बादशाह मर गया। बस हवा के एक झोंके ने उस दिन दिल्ली की ओर रुख़ किया—शायद किसी खोए हुए शेर की आख़िरी सिसकी लेकर।
अध्याय 18_ गुमनाम दफन
रंगून की सुबह उस दिन कुछ अलग थी। आसमान में हल्की-सी धुंध, जैसे किसी ने धुएँ और आँसुओं को मिला दिया हो। पेड़ों पर बैठे कौवे बेवजह काँव-काँव कर रहे थे, और जेल के बरामदे में पसरी हुई नमी में एक अनजाना बोझ था।
बहादुर शाह ज़फ़र की देह अपने उस तंग, सीलन-से भरे कमरे में पड़ी चारपाई पर पड़ी थी —एक ऐसा कमरा जो कभी बादशाहों के लिए घोड़े बाँधने लायक भी नहीं होता, पर इतिहास के इस बूढ़े बादशाह का आख़िरी ठिकाना बन चुका था। उनके चेहरे पर मौत की धूप फैल चुकी थी ।
जेल के पुराने पहरेदार ने बाहर आकर कहा—
“बादशाह मर गए।”
अंग्रेज़ अफ़सर ने झुंझलाहट से कहा—
“बादशाह नहीं, कै़दी मर गया है।”
मौत की खबर फौरन हुकूमत तक पहुँचाई गई। अंग्रेज़ अफ़सरों की एक बैठक बुलाई गई। उन्होंने मानचित्र पर उँगली घुमाई—कहाँ दफन करें? कैसे दफन करें? सबसे अहम सवाल था—दफन कैसे किया जाए कि भविष्य में कोई उसकी मजार न बनाए, कोई उसकी यादगार न खड़ी करे, कोई उसका नाम भी न ले?
एक अफ़सर बोला—
“अगर इस बूढ़े की क़ब्र ज़ाहिर छोड़ दी गई तो हिंदुस्तानी फिर उसे प्रतीक बना लेंगे।
कहीं कोई बग़ावत का नया नारा न उठ जाए।”
दूसरा बोला—
“तो फिर…?”
“गुमनाम क़ब्र। बिना पत्थर, बिना निशान।”
“लाश को ऐसे दफन करो कि कई सौ साल बाद भी कोई जगह पहचान न सके।”
दो सिपाही उनकी लाश बाँधकर ले गए।ना जनाज़ा पढ़ने वालों की भीड़,ना उलेमा,ना उदासी—बस दो सैनिक और दो बूढ़े ख़िदमतगार।
रास्ते में एक बर्मी मजदूर ने पूछा—
“कौन मर गया?”
सैनिक बोला—
“एक बूढ़ा कै़दी।”
इतनी बेनामियत शायद किसी बादशाह की किस्मत में कभी न लिखी गई हो।
कंधों पर ले जाते हुए जब वे क़ब्रगाह पहुँचे, बारिश शुरू हो गई।
मिट्टी की राहें फिसलने लगीं थीं ।
क़ब्र खोदने के लिए सिर्फ़ दो फावड़े थे, और जिन्हें खोदना था वे कई घंटे से थके हुए कै़दी। क़ब्र न ज़्यादा गहरी बनाई गई, न ज़्यादा चौड़ी।बस एक कच्चा गड्ढा—इतना छोटा कि उसमें एक बादशाह को दफनाना इतिहास का मज़ाक लग रहा था।
अंग्रेज़ अफसर ने आदेश दिया—
“फ़ौरन दफनाओ! किसी तरह का रस्म-रिवाज नहीं होना चाहिए।”
एक खिदमतगार ने बोलने की कोशिश की
“कम से कम कुरान की कुछ आयतें तो पढ़ लेने दीजिए ”
अंग्रेज़ अफसर ने स्पष्ट किया —
“No rituals!”
दो फावड़े उठे। मिट्टी गिरनी शुरू हुई। फावड़े में मिट्टी थी, या शायद इतिहास का सबसे बड़ा अपमान।
मिट्टी भरते समय किसी ने एक बार भी "इन्ना लिल्लाह…" नहीं कहा।
एक सैनिक हँसकर बोला—
“किस्सा तमाम हुआ ।”
क़ब्र पर कोई पत्थर नहीं रखा गया। कोई नाम नहीं खुदा।कोई फूल नहीं रखे गए। बस मिट्टी समतल कर दी गई—जैसे वहाँ कभी कोई दफन ही न हुआ हो।
हुक्म था—
“क़ब्र को ऐसे छिपाओ कि कोई न बता सके कि वह कहाँ है।”
दुनिया के सबसे बड़े सल्तनत के वारिस को ऐसी क़ब्र मिली जो सिर्फ़ ज़मीन की एक चपटी सतह थी—एक ऐसी जगह जिसे कोई न पहचान सके ।
इतिहास उस दिन चुप रहा।इतिहास ने सिर झुका लिया। और इतिहास ने मान लिया कि ज़ुल्म की भी एक हद होती है—पर अंग्रेज़ों ने वह हद भी पार कर दी।
और मुगलों का आखिरी बादशाह,जिसके नाम पर कभी क़व्वालियाँ गाई गईं थीं , जिसके नाम पर महफिलें जगमगाती थी,जिसकी शायरी दिलों में दीया जलाती थी…
वह मर गया एक अनजान मौत,
और दफ़न हो गया एक गुमनाम क़ब्र में।