मंगलवार, 12 नवंबर 2013

है मेरा ख्वाब तेरे साथ एक शाम गुज़रे
 
यूँ तो कट ही रही है ज़िन्दगी
लेकिन है ख़ाली ख़ाली सी
 उदास सुबहें हैं मेरी ओ सुस्त शामें हैं
नहीं है फिक्र कोई और न कोई
 आरजू ही
 नहीं है आस भी कोई की रंग उतरेंगे
खिलेंगे फूल कलि चट्केगी , आयेगी बहार
हवा हँसेगी चमन महकेंगे
 मगर अब चाहता हूँ सुबहें गीत गा ही उठें
झूम उठे ये समंदर ओ फूल भी महकें
उठा के हाथ ये कहता हूँ खुदा से की कर क़ुबूल दुआ
मेरे होतीं से अब तेरे लबों का जम गुज़रे

है मेरा ख्वाब तेरे साथ एक शाम गुज़रे

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