सुदर्शन पटनायक जो की एक विश्व प्रसिद्द रेत की कलाकृतियां बनाने वाले कलाकार हैं की कलाकृति के सामने तस्वीर खिचवाते समय मैं ये सोच रहा था की सैफई महोत्सव न होता तो क्या साधारण ग्रामीण जन अपनी आँखों से देख पाते उन व्यक्तित्वों से जिन्हे सिर्फ टेलीविजन या अख़बारों में देख पाते हैं , प्रसिद्द खिलाडियों के मैच ,,,,सिनेमा के परदे के सितारों को । मुझे नहीं लगता की किसी को भी आपत्ति होनी चाहिए ग्रामीण जनता को हक़ है की उन सब चीजों से परिचित होने का जो सिर्फ राजधानियों और बड़े शहरों में ही केंद्रित हो चुके हैं। सैफई महोत्सव न सिर्फ इन सब चीजो को ग्रामीण जनता के समक्ष ला रहा है बल्कि स्थानीय जनता को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध करा रहा है।
मंगलवार, 6 जनवरी 2015
सोमवार, 5 जनवरी 2015
छठवीं में पढ़ती है गायत्री। पढ़ने में अच्छी है ,खोखो भी खेलती है बहुत अच्छा। पिछलीबार जिले कीटीम में गयी थी और कानपुर हुए खेल प्रतियोगिताएं में जीत भी दिलाई थी इसने अपनी टीम को। इधर कुछ दिनों से गुमसुम सी रहती है। गणित के सवाल गलत हो जाते हैं। मैडम डाँटती है ,समझाती हैं फिर गलत , मन नही लगता उसका। अब खेलती भी नहीं। खेल के घंटे में जब लड़कियाँ खो खो खेलती हैं वो चुपचाप बैठी रहती है।
पिता अस्पताल से अब घर आ गया है गायत्री का। दोनों पैर काट दिए गए हैं उसके। पिछले दिनों एक्सीडेंट हो गया था। टेम्पो चलाया करता था। गायत्री की माँ प्यार से भी समझाती थी और झगड़ा भी खूब करती थी उसके पिता से की वो दारू की आदत छोड़ दे। गायत्री भी पिता से अक्सर रूठ जाती जब वो दारू पीकर घर आता था। कहती थी बात नही करेगी बदबू आती है मुह से दारू की।एक दिन दारू के नशे में टेम्पो समेत खड्ड में चला गया गायत्री का पिता,, बुरी तरह ज़ख़्मी हुआ था। उसके दोनों पैर काटने पड़े। अब दिन भर घर में पड़ा रहता है। गायत्री की माँ रो रो कर अपने भाग्य को कोसती रहती है। गायत्री का एक बड़ा भाई है राहुल, दसवीं में पढता था . पढ़ने लिखने में बहुत होसियार हैगायत्री को रोज गणित के सवाल हल करने की नयी तकनीकें बताता था और चुटकियों में सवाल हल हो जाते थे अंग्रेजी में बात करना सिखाता था वो गायत्री को , पर अब आगे की पढ़ाई शायद नही कर पायेगा। घर का खर्चचलाने के लिए सुखविंदर सिंह के ट्रक पर क्लीनर काकाम करने लगा है. कुछ दिनों में ड्राइवर हो जाएगा।
गायत्री अब क्लास में शोर भी नहीं मचाती। पहले कहा करती थी पढ़ लिख कर पुलिस में दरोगा बनेगी और सब को परेड करवाएगी ,तेज चल कह कर खूब हंसती थी। अब नहीं हँसती।
एक दिन जब मैडम ने प्यार से बहुत देर तक गायत्री से उसकेगुम सुम रहने का कारण पूछा तो गायत्री रो पड़ी और सुबकते बोली "मेरी आगे की पढाई कैसे होगी? "
शनिवार, 27 दिसंबर 2014
happy christmas की बाढ़ आ गयी फेसबुक पर। कुछ ऐसा ही होता है जब ईद होती है होली और दिवाली होती है। तो क्या हम इतने सहिष्णु हो गए हैं कि सभी धर्मो के त्यौहार को उतनी ही उमंग से मनाये पर दिनों दिन दंगो की घटनाएँ और सांप्रदायिक घृणा के बढ़ता ग्राफ कुछ और कहता है। हम आज भी वैसे ही हैं जैसे तब थे जब दारा सिंह एक ईसाई पादरी को जिन्दा जला रहा था ,जब एक बड़ा पेड़ गिरा था और धरती हिल रही थी सिख मारे जा रहे थे ,जब मुंबई के धमाके हुए थे, जब गोधरा हुआ था और गुजरात। पर बाज़ार ने हमें हैप्पी क्रिसमस भी बोलवाया ईद मुबारक भी और दिवाली की शुभ कामनाये भी साथ ही उसने ये भी जोड़ दिया की ख़ुशी के मौके पर कुछ मीठा हो जाए , फिर उसने कैडबरी चॉकलेट बताये और ये भी बताता गया साथ कि खोया नकली मिलता है इसलिए मोहल्ले की दुकान से मिठाई मत खरीदना , इन त्योहारों पर वो ये भी बताना नही भूला कि त्योहारों पर तोहफे नही दिए तो त्यौहार अधूरा ही रह जाएगा। कुछ त्योहारों को बाजार ने पुनरपरिभासित किया और कई नए गढ़े भी ,,जैसे वेलेंटाइन्स डे जो कि सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ और पहले ये एक दिन का था फिर पूरा सप्ताह इस के नाम हुआ क्युकी बाजार ने सर्वाधिक सम्भावनाये यही देखी। हमे पता भी न चला कि ये सरे त्यौहार कब हमारे जीवन का हिस्सा बन गए , और हम इनके उपभोक्ता। बेहतर होता कि एक षड़यंत्र ऐसा भी होता कि हम इन सभी त्योहारों को बाजार के मकड़जाल से परे भी मनाना सीख गए होते। तब शायद न चर्च जलाये जा रहे होते और न मंदिर और मस्जिद के लिए आंदोलन हो रहा होता।
बुधवार, 24 दिसंबर 2014
एक तरफ हम बात करते हैं की प्रत्येक बालक अपने आप में अनूठा है दूसरी तरफ सबका सामान्यीकरण कर के एक सिलेबस का निर्माण भी करते हैं और प्रयास कि बालक इस सिलेबस को पढ़े यह उस के लिए उपयोगी है। M L L भी बना लेते हैं की मियां इतना तो इसे आना ही चाहिए। मुझे लगता है यह बालक और उसकी स्वतंत्रता में दखलंदाज़ी है उसके मन मस्तिस्क को जबरिया मोल्ड करने का तरीका है।
शनिवार, 6 दिसंबर 2014
पुतलियों के बहुत सारे गुण होते हैं ,,वे बेमतलब की बहस नहीं करती ,,,,,कला के प्रति उनका कोई अशोभनीय दृष्टिकोण नही होता ,,,,उनका अपना कोई निजी जीवन नही होता जो कार्य में बाधा उत्पन्न करे ,,,,,और वे खुद को बनाने वाले के प्रति बुरी सोच भी नही रखती ,,,,इसीलिए मैं अब पुतलियों को अपनी बात कहने का माध्यम बेहतर माध्यम समझता हूँ ,,,,,,मुझे किसी बेवक़ूफ़ एक्टर की जरूरत नहीं।
सोमवार, 24 नवंबर 2014
उदयपुर के सिटी पैलेस पर खड़ा हुआ मैं सोच रहा था की भारत की आज़ादी का हम राजपूतों पर क्या फर्क पड़ा ,,,जो राजा थे वे बमुश्किल अपनी कुछ संपत्ति ट्रस्ट बना कर बचा पाये और आज अपने महलों को होटलों की शक्ल दे कर फिरंगियों को चाय पिलाते हैं और जो साधारण जन थे उन्हें आरक्षण का दण्ड दे कर उनको उनकी योग्यता से वंचित किया गया ,,,,,इसका ये अर्थ नही था की जनतंत्र आया और सब बराबर हो गए ,,,बल्कि एक नए तरह की सामंतशाही प्रारम्भ हुई जहाँ राजा अपनी योग्यता से नहीं बल्कि धूर्तता से वोटों के द्वारा बनने लगे और अयोग्यता अगर वोट दे सकती थी तो सम्मानित होने लगी।
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