इस छोटे से शहर की सुबहें हमेशा धुंध में लिपटी रहती थीं, जैसे हर चीज़ किसी अनकहे राज़ के आवरण में ढँकी हो। उसी शहर के सरस्वती कन्या विद्यालय में वर्षों से अंग्रेज़ी पढ़ाती आ रही थी समीरा— शांत, सौम्य, अपने भीतर कई परतों में धँसी हुई।
उस दिन पहली बार जब नई शिक्षिका आन्या स्टाफ़ रूम में दाख़िल हुई, तो जैसे कमरे की हवा में हलचल हुई। वह ऊँचे कद की, भूरी आँखों वाली, हल्के आत्मविश्वास और गहरे संकोच का अनोखा मिश्रण थी। उसके मुस्कुराते ही जैसे कमरे की धूप कुछ और खिल उठी
आन्या ने दुपट्टे को ठीक करते हुए धीमे से कहा,
“मैं… आन्या। हिंदी पढ़ाऊँगी।
स्कल के रोज़मर्रा के काम में दोनों अक्सर साथ रहने लगीं—परीक्षा की कॉपियाँ जाँचना, आयोजनों की तैयारी, और बीच-बीच में चाय के कपों पर बहती बातचीतें।
छोटे शहर में अकसर लोग बाहरी व्यक्तियों पर जल्दी भरोसा नहीं करते, लेकिन आन्या की सरलता ने सबका मन जीत लिया। और वहीं समीरा के भीतर कुछ धीरे से बदलने लगा था।
एक दिन बारिश अचानक टूट पड़ी। विद्यालय जल्दी छुट गया।आन्या अपनी स्कूटी पर असहाय खड़ी थी—बरसात तेज़, रास्ते अपरिचित।समीरा ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा,
“तुम्हारा घर तो बहुत दूर है… चाहो तो आज मेरे घर चलो। बारिश थमे तो निकल जाना।”आन्या ने क्षणभर संकोच किया, फिर सिर हिलाया, हाँ… ठीक रहेगा।”
बारिश हल्की हुई तो आन्या समीरा के साथ उसके घर आ गई । समीरा अकेले ही रहती थी । घर शांत, व्यवस्थित और गर्मजोशी से भरा था—दीवारों पर किताबों की महक, हल्की रौशनी और अकेलेपन का सौम्य स्थायित्व।आन्या ने अंदर आते ही जूते उतारे और हँसकर बोली,
“आपका घर… घर जैसा लगता है। पता नहीं क्यों, मेरे लिए यह एहसास बहुत कम जगहों पर मिला है।”
समीरा ने उत्तर नहीं दिया, बस मुस्कुराई ।
उस दिन उन्होंने जो भरकर बातें की।शाम बीती। बातें गहराती चली गईं—अपनी पिछली ज़िंदगियों की छोटी-बड़ी बातों तक।आन्या खुलकर हँसती थी ।
बातें करते करते आन्या ने धीमी आवाज़ में पूछा, समीरा मैम… क्या आपको कभी लगता है कि हम कहीं फिट नहीं होते? जैसे हम किसी दूसरी दुनिया के लोग हों?”
समीरा ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा—कुछ रुका हुआ, कुछ बहता हुआ, कुछ खोया हुआ।
हाँ… बहुत बार,” वह बोली। और दोनों जोर से हंसी
दिन बीतते गए, पर वह शाम दोनों के भीतर कहीं अटक-सी रह गई थी। स्कूल में मिलने पर अब उनकी मुस्कानें पहले वाली औपचारिकता में नहीं ठहरती थीं—उनके बीच एक अनकहा अपनापन आकार ले रहा था। आन्या अब इस शहर में लगभग एक महीना बिता चुकी थी। उसे स्कूल के पास कोई तरीके का घर किराए पर नहीं मिला था । स्कूल के बाद वह पहले किराए पर देखे गए घरों की ल सूची लिए, एक-एक करके जगहें देखने जाती—कहीं नमी, कहीं तंग कमरे, कहीं अनुचित बातें करता मकानमालिक। छोटे शहरों में अविवाहित महिला के लिए अकेले रहना अक्सर सुविधा से ज़्यादा शंका का विषय बन जाता है।
एक शाम, स्टाफ़ रूम लगभग खाली हो चुका था।
आन्या थककर एक कुर्सी पर बैठी थी.
“आज भी नहीं मिला?” समीरा ने धीमे स्वर में पूछा।
आन्या ने नहीं में सिर हिलाया वह थकी लग रही थी
आन्या… तुम चाहो तो मेरे साथ रह सकती हो।”
आन्या ने चौंककर उसकी ओर देखा—अचरज और राहत की मिली हुई चमक के साथ।
आपके साथ? पर… कैसे? यह आपका घर है, आपकी दुनिया है। मैं उसमें दखल नहीं करना चाहती।”समीरा मुस्कुराई—धीमी, पर पूरी तरह सच्ची।
“तुम दखल नहीं दोगी।
आन्या ने धीरे से कहा “अगर आप सच में कह रही हैं… तो हाँ। मैं… आपके साथ रहना चाहूँगी।”
“तो कल शाम अपना सामान ले आओ,” उसने कहा, “मैं कमरे तैयार कर दूँगी।”
आन्या ने एक पल के लिए समीरा का हाथ छुआ—अनजाने में, लेकिन बेहद स्वाभाविकउस स्पर्श में एक कोमल धन्यवाद था ।
और समीरा ने उस हल्के स्पर्श में कुछ ऐसा महसूस किया जो उसे लंबे समय बाद जीवित महसूस कराता था।
आन्या के समीरा के घर में आ जाने के बाद जीवन जैसे धीरे-धीरे एक नई लय में ढलने लगा।कोई बड़ा बदलाव नहीं था—बस छोटी-छोटी बातें, जो किसी अनकहे गीत की तरह दोनों के भीतर गूँजती रहतीं।
एक शाम, कॉलेज के बाद दोनों छत पर बैठे थे।हवा में ठंड थी।
पेड़ धीरे-धीरे झूम रहे थे।
समीरा आन्या को देखे जा रही थी
आन्या ने धीरे से पूछा—
क्या देख रही हैं
समीरा ने उसे देखते हुए धीमी पर स्थिr आवाज में कहा
अगर मैं तुम्हें बताऊँ कि तुम्हारे साथ रहकर ही मुझे लगता है कि मैं ज़िंदा हूँ…
तो क्या तुम्हें अजीब लगेगा?”
आन्या का दिल एक क्षण के लिए थम गया।
उसने समीरा का हाथ पकड़ा,
बहुत धीरे से—
जैसे किसी मोम की गुड़िया को छू रही हो।
“बिल्कुल नहीं क्योंकि मुझे भी ऐसा ही लगता है
वह पल बहुत शांत था—
और वही शांति प्रेम की सबसे गहरी भाषा होती है।
उनके हाथ एक-दूसरे में ऐसे गुंथे,मानो हमेशा से ऐसा ही होना लिखा हो।
वे दोनों देर तक बातें करती रहीं स्कूल के बच्चों, घर की छोटी-छोटी बातों और अपनी अनकही बेचैनियों की।
फिर एक लंबी ख़ामोशी उतर आई, जो किसी बोझ की नहीं बल्कि किसी गहराई की थी।
आन्या ने धीरे से कहा,
“कभी-कभी लगता है… तुम ही वह जगह हो जहाँ मैं सच में खुद को पा लेती हूँ।”
समीरा ने उसकी ओर देखा—
वह नज़र वैसी नज़र थी जो बोल देती है कि शब्द अब काफ़ी नहीं।
कमरा मानो एकदम हल्का हो गया।
समीरा ने हाथ बढ़ाकर आन्या की उँगलियाँ थाम लीं।
वह स्पर्श धीमा था, पर उसमें एक शांत आत्मविश्वास भी था—
जैसे दोनों कोई पुराना डर पीछे छोड़ रही हों।
आन्या समीरा की तरफ थोड़ा झुकी।
दोनों के माथे एक-दूसरे से टिक गए।
इस पास आने में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी—
जैसे बरसों का विश्वास धीरे-धीरे अपनी परतें खोल रहा हो।
क्या तुमहे अपने ऊपर यक़ीन है ?
समीरा ने फुसफुसाया।
आन्या ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारे साथ… मैं पहली बार किसी चीज़ के बारे में यक़ीन से हूँ।”
फिर दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में ले लिया।
उस आलिंगन में भय था, विश्वास भी था—
और वह सन्नाटा जो दो लोगों के बीच तब उतरता है जब वे अपने भीतर की दीवारें हटा देते हैं।
उनकी साँसें एक-दूसरे से मिलीं।
कमरे की रोशनी उनके चेहरों पर किसी शांत जल की तरह फैल गई।
बाहर कहीं रात और गहरी हो रही थी—
पर उनके भीतर एक कोमल गर्माहट जन्म ले रही थी।
धीरे-धीरे उनके बीच की दूरी मिटने लगी—
मानो दो अलग दुनियाएँ एक ही धड़कन की लय में बंध रही हों।
और फिर उस रात,
बिना किसी शब्द के,बिना किसी घोषणा के,
उन्होंने एक-दूसरे को पूरे मन से स्वीकार लिया।
कमरा देर तक उस शांत, नर्म निकटता से भरा रहा—
जिसमें किसी शोर की, किसी प्रमाण की, किसी परिभाषा की जरूरत नहीं होती।सिर्फ दो लोग होते हैं और प्रेम का सबसे सच्चा क्षण।
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प्रदीप उन गिने-चुने लोगों में था जो समीरा से वर्षों से बिना कहे समझदारी के रिश्ते में बँधे थे।वह भी उसी स्कूल में शिक्षक था—मस्तमौला, खुशदिल और अपनी हंसी में एक अजीब-सी आत्मीयता लिए हुए।समीरा और प्रदीप के बीच कोई प्रेम नहीं था, पर एक सहज अपनापन था… एक ऐसा बंधन जिसमें भावनाएँ कम और मित्रता की जड़ें अधिक थीं।फिर भी, स्कूल के सभी लोगों को हमेशा लगता कि प्रदीप की मुस्कान समीरा के लिए कुछ और नरम होती है।
आन्या के घर में रहने के बाद स्कूल में चर्चाएँ बढ़ने लगींथीं ।
समीरा इससे विचलित नहीं होती, पर प्रदीप—जो हमेशा सबसे बेफ़िक्र रहता था—एक दिन गलियारे में समीरा के साथ चलते हुए अचानक बोला,
तो… नई मैडम अब तुम्हारे घर भी रहती हैं?
वाह समीरा, तुमने तो मुझे बताया भी नहीं! तुम्हें पता है, मैं तो सोच रहा था कि वह जगह मेरे लिए बची होगी…”
वह मज़ाक कर रहा था, पर आँखों में एक हल्की चोट छुपी थी।
समीरा हल्का हँसते हुए बोली,
“तुम बेवकूफ हो, प्रदीप। वह अकेली थी, शहर नया था… इसलिए कहा। बस।”
प्रदीप ने उसके चेहरे की ओर ऐसे देखा जैसे कुछ पढ़ रहा हो—कुछ ऐसा जो उसे दिख नहीं रहा, पर महसूस हो रहा था।
“समीरा,” उसने धीमे से कहा,
“तुमने तो मेरी जगह कोई और रख लिया। अब मैं कहाँ जाऊँ?”
उसकी आवाज़ में आधी हँसी थी, आधा सच।
मगर इस बार हँसी उसकी आँखों तक नहीं पहुँची।
समीरा एक क्षण के लिए रुकी।
वह जानती थी कि प्रदीप के मन में एक सरल, मासूम-सी चाह हमेशा रही है—जो कभी शब्द नहीं बनी।
लेकिन आज उन शब्दों ने पहली बार हवा में जगह माँगी।
वह हल्के से मुस्कुराई।
“कौन सी जगह, प्रदीप? हम सब एक-दूसरे की ज़िंदगी में अलग-अलग जगहों पर होते हैं…
चाहो तो तुम भी हमारे साथ रह सकते हो।”
मैं…?”
वह हँस पड़ा—थोड़ा हैरानी में, थोड़ा बचकाने विस्मय में।
मैं तुम्हारे घर रहूँ? और वो नई मैडम भी?
ये तो… यह तो एकता कपूर के टीवी सीरियल के जैसा सेटअप हो जाएगा!”।
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