“शिकायतनगर
रात का पहर था। विक्रम ने फिर बेताल को पकड़ा।
बेताल बोला —“आज जो कथा है, वह उस नगर की हैजहाँ हर कोई बदलाव चाहता था…बस अपने को छोड़कर।”
शिकायतनगर में अजीब रिवाज था —हर व्यक्ति अपना दिन ऐसे शुरू करता:
चाय पीते ही शिकायत
नाश्ते में शिकायत
रात को टीवी पर शिकायत
और सोने से पहले “देश बर्बाद हो गया” वाली शिकायत
नगर के लोग छोटे-छोटे WhatsApp ग्रुपों में
देश की दिशा तय किया करते थे।
एक ग्रुप का नाम था —“हम सुधरेंगे नहीं”
और दूसरे का —“नेता खराब – हम पैदाइशी महान”
एक युवक था यत्नवीर।
वह बोला —“चलो सड़क साफ करें, पौधे लगाएँ, पढ़ाएँ।”
लोग बोले —“हमें नहीं चाहिए प्रवचन!तुम करो, हम लाइक देंगे
जब यत्नवीर काम करता,लोग वीडियो बनाकर कहते —
“यही असली देशभक्त है!”फिर घर जाकर सो जाते।
नगर की एक महिला बोली —“सिस्टम खराब है!”
यत्नवीर बोला —“मैडम, वोट देने जाएँगे?”
वे बोलीं —“ओह… वो तो उसी दिन शादी में जाना है।”
एक दुकानदार बोला —“अरे सब नेता चोर हैं!”
यत्नवीर बोला —“बिल बनाओ?”
दुकानदार फुसफुसाया —“भाई, टैक्स क्यों बढ़वाना?”
चलते चलते बेताल ने एक प्रश्न किया
“राजन, बताओ —दोष किसका है?
सिस्टम का? नेताओं का? समय का? या उस जनता का
जो बदलाव तो चाहती है,पर मेहनत नहीं करना चाहती?”
विक्रम बोला —
“दोष वहीँ है जहाँ जिम्मेदारी नहीं।
जिस समाज मेंलोग अधिकारों को हक और
कर्तव्यों को बोझ समझें, वहाँ सुधार नहीं, केवल बहस होती है।
जिस देश में नागरिक दिन भर ये कहते रहें ‘कोई कुछ करे’
वह देश इतिहास में कभी कुछ नहीं करता।
बेताल ठहाका मारकर बोला —
“राजन! तुम फिर बोल बैठे!आज के युग में बोलना सबसे खतरनाक अपराध है!”
और फिर हवा में विलीन हो गया।

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