शनिवार, 1 नवंबर 2025

बेताल कथा

 विक्रम ने बेताल को कंधे पर लादा और चल पड़ा ।बेताल बोला अभी कोई जल्दी नहीं है मैं सुबह तुझे एक जगह ले कर चलूंगा और वही प्रश्न पूछूंगा 

सुबह बेताल विक्रम को लेकर तहसील आया 

नौ बजे का समय।

निकासी विभाग के कमरे में कुर्सी खाली,

पर कुर्सी के ऊपर तौलिया टंगा —

मानो कह रहा हो, “साहब यहीं होते हैं, आपकी उम्मीद की तरह अदृश्य।”


लाइन में खड़े लोग

अपनी फाइलों को ऐसे पकड़ रहे थे

जैसे किसान बरसात में बोरी बचाए रखता है।


एक बूढ़ा चिल्लाया—

“मेरा नाम ठीक कर दो, पाँच महीने से चक्कर काट रहा हूँ!”


क्लर्क ने चाय सिप की और बोला—

“अरे बाबा, सिस्टम डाउन है…

तेरा नाम तो राम है, जल्दी क्या?

भगवान भी धैर्य ही सिखाते हैं।”


एक महिला बोली—

“साहब, राशन कार्ड पर पति का नाम ग़लत लिखा है।”


बाबू मुस्कुराया—

“अच्छा है बहन, नया नाम नया भाग्य।”

फिर धीरे से—

“लेकिन सही भाग्य चाहिए तो चाय-पानी का इंतज़ाम करो…”


भीड़ हंसी नहीं;

वो दुख को हंसी में ढंकने का हुनर सीख चुकी थी।



विक्रम ने पूछा ये कहां ले आए मुझे 

“राजा, यह तहसील है।

यहाँ काम भगवान करता है —

पर फाइल तब चलती है जब नोट चढ़ता है।


यहाँ शिकायतकर्ता चक्कर लगाता है,

गलती सिस्टम की होती है।

यहाँ कागज़ों की भाषा वही समझता है

जो अपने शब्दों का वजन ‘गुप्त शुल्क’ में तोलता है।”


तभी ऊपर से पंखा हिला—

जैसे खुद हवा भी भ्रष्टाचार से कांप रही हो।


एक किसान फुसफुसाया—

“साहब, जमीन का नक़्शा चाहिए।”

कर्मचारी हंसा—

“नक्शा तो देश का भी बदल जाता है भाई,

तेरी जमीन क्या चीज़ है?”



--


राजा ने तलवार थामकर कहा—

 कैसी व्यवस्था है जहां जनता के अधिकार भी फाइलों में दम तोड़ते हैं?

यह किस राज का हाल है?”

यह जनता के राज का हाल  है विक्रम

यहाँ जनता की आवाज़ आवेदन बनकर धूल खाती है,

जहाँ ईमानदार आदमी चक्कर काटता है,

और चालाक सीधे कमरे में चाय लेकर जाता है।

अब बता यह व्यवस्था जनता को मजबूत कर रही है

या धीरे-धीरे उसे थका कर चुप रहना सिखा रही है?”


राजा शांत हो गए।


उन्होंने उत्तर दिया—

“बेताल, व्यवस्था वही होती है जिस पर प्रजा भरोसा करे।

जिस तहसील में फाइल से ज्यादा चाय-पानी चलता है,

वह न्याय का मंदिर नहीं,

निराशा का किला है।


जब नागरिक लाइन में खड़े होकर थक जाता है

और रिश्वत देकर काम कराता है—

तब वह नहीं टूटता,

राष्ट्र टूटता है।”


बेताल हंसा—

राजा, सच कह दिया।

अब संभल जाओ… ये सच बोलने से कई तहसीलें नाराज़ हो जाएँगी!”


और  उड़ गया।

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