नाटक खत्म हो चुका था । लोगों ने खड़े हो कर तालियां बजाई थिनर अब
छोटे-छोटे ग्रुप में नाटक पर चर्चा करते हुए बाहर जा रहे थे।राजेश मंच के कोने में खड़ा था ।उसी वक्त पीछे से एक हल्की, रेशमी-सी आवाज़ आई—
“आज अच्छा परफ़ॉर्म किया आपने।”
राजेश ने मुड़कर देखा—
इरम वहाँ खड़ी थी।
उसके बाल ढलती रोशनी में ऐसे चमक रहे थे
जैसे किसी ने हवा में काले रेशम का टुकड़ा छोड़ दिया होराजेश हल्का-सा झेंपा,
“जी बस… कोशिश कर रहा हूँ।”
इरम हँस पड़ी।
उसकी हँसी में कोई चमक थी—
मोहक… तेज… और थोड़ी रहस्यमयी।
“कोशिश?”
वह करीब आकर बोली,
“अभिनय वो कोशिश नहीं है जो मंच पर होती है।
वो तो यहाँ—”
उसने राजेश के सीने पर हल्की उँगली रखकर कहा,
“—और यहाँ होती है।”
फिर उसकी उँगली माथे की ओर गई।
राजेश के गालों में गर्मी-सी फैल गई।
उसे अचानक याद आया वह सिर्फ एक स्कूल टीचर है।
और उसके सामने खड़ी यह लड़की—
कोई साधारण लड़की नहीं।
उसकी चाल, उसकी आँखें, उसका बोलना…
सबमें एक करिश्मा था।
इरम ने पूछा,
“चाय पियोगे? बाहर वाली दुकान पर अच्छी मिलती है।
और वैसे भी…वर्कशॉप के बाद दिमाग को थोड़ा खुलना चाहिए।”
राजेश ने पहली बार बिना झिझक ‘हाँ’
कहा—
जैसे उसके भीतर कोई दरवाज़ा खुला हो।
चाय वाले ने कुल्हड़ों में चाय डाली।
इरम ने एक कुल्हड़ उठाया और बोली,
वैसे थिएटर के अलावा क्या करते हैं आप
जी एक स्कूल में टीचर हूं
अच्छा ,वैसे स्कूल टीचर होकर थियेटर क्यों कर रहे हो?”
उसने पूछा
राजेश मुस्कुराया,
“शायद मैं जहां हूं वह दुनिया मुझे अधूरी लगती है।
थियेटर में…मेरी बाकी दुनिया पूरी हो जाती है।”
इरम ने चाय का घूँट लिया,
उसकी आँखें थोड़ी नरम हो गईं।
तुम अलग हो,उसने कहा।
“यहाँ ज्यादातर लोग फेम के लिए आते हैं।
और तुम किसी और वजह से आए हो…
राजेश ने पूछा,
“और आप
आप यहाँ क्या कर रही हैं ?”
इरम ने अपने बालों को कान के पीछे किया।
उस हरकत में ही एक आकर्षण था—
नरमी भी, और आत्मविश्वास भी।
“मैं चैनल के लिए स्टोरी करती हूँ…इस प्ले को कवर करने आई थी ,वैसे मुझे थिएटर अच्छा लगता है । इंसानी जिंदगी की कितनी कहानियां एक स्टेज पर और कहानियाँ मुझे बहुत पसंद हैं।”
राजेश को पहली बार लगा कि वह उसे ध्यान से देख रही है—
जैसे उसकी परतों को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
चाय की भाप दोनों के बीच उठ रही थी ।
इरम ने अचानक पूछा—
“तुम्हारी ज़िंदगी में कोई है?
मतलब… कोई खास?”
राजेश हड़बड़ा गया।
“न…नहीं ऐसा कुछ नहीं है।”
इरम ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अच्छा है।
कभी-कभी अकेलापन भी ज़रूरी होता है।
आदमी खुद को तब साफ़-साफ़ देख पाता है।”
राजेश ने पूछा,
“और तुम्हारे जीवन में?”
इरम ने चाय पर नजरें टिकाईं फिर मुस्कुराते हुए कहा
“मेरी ज़िंदगी में मेरे सपने हैं…
और सपने किसी रिश्ते को ज्यादा देर नहीं झेलते।”
उसे मसरूर की याद आई । जो नहीं चाहता था कि इरम एक टीवी जर्नलिस्ट रहे । रोज रोज होने वाले झगड़े मार पीतौर तलक सब कुछ उसकी आंखों में कौंध गया । उसने खुद को एक पल में स्थिर किया और
हँसते हुए बोली,
“बाकी, दुनिया से दोस्ती कर लेती हूँ।
तुमसे भी कर ली।”
राजेश मुस्कुरा दिया—
उसने हाथ बढ़ाया,
“ दोस्त?”
इरम ने उसका हाथ थाम लिया—
उसकी उँगलियाँ गर्म थीं, मुलायम थीं।
और उस स्पर्श में एक ऐसी आत्मीयता थी
जिसने राजेश के भीतर कोई बंद कमरा खोल दिया।
“हाँ… दोस्त,”
वह बोली।
“लेकिन यह मत सोचना कि मैं साधारण दोस्ती करती हूँ।
मुझसे दोस्ती का मतलब है—
तुम्हें मेरी दुनिया में कदम रखना होगा।”
राजेश ने धीरे से कहा,
“अगर तुम्हारी दुनिया में जगह मिली…
तो मैं आऊँगा।”
इरम ने उसकी आँखों में कुछ देर तक देखा—
कुछ ऐसा जो राजेश नहीं समझ पाया।
फिर वह बोली,
“तुम्हें जगह मिलेगी…
लेकिन क्या तुम उसे संभाल पाओगे—
यह मुझे नहीं पता।”
राजेश उसे देख रहा था । अगले दिन मिलने का वादा करके वे विदा हो गए ।अलग रास्तों पर चलते हुए भीकुछ अदृश्य-सा धागा उन्हें जोड़ चुका था।
दोस्ती शुरू हो चुकी थी—ऐसी दोस्ती जिसका भविष्य उन्हें अभी नहीं पता था।
राजेश और इरम उन दिनों अक्सर गोमती बैराज के पास बैठ जाया करते थे—जहाँ नदी बहते-बहते शहर की शोरगुल को चुप कर देती थी,और हवा में शाम की वही हल्की ठंडक होती थी जो दो अनकही भावनाओं को पास लाने में मदद करती है।
उस शाम आसमान हल्का गुलाबी था।इरम अपने हाथ में कॉफी लिए राजेश को देख रही थी—एक शांत, ईमानदार चेहरे वाला लड़का जो महत्वाकांक्षा से ज़्यादा संकोच में जी रहा था।
“राजेश…”उसने धीरे से कहा,“तुम्हें पता है तुममें कितनी क्षमता है?”
राजेश ने हल्की-सी मुस्कान दी।
हां बच्चे पढ़ा लेता हूँ, थियेटर कर लेता हूँ…और तुम्हारा दोस्त बन चुका हूं
इरम ने बात काट दी।“तुम खुद को कम आंकते हो।
टीचर अच्छा होना बुरा नहीं है,लेकिन तुम उस भीड़ में क्यों रहना चाहते हो जहाँ तुम्हें कोई पहचान ही नहीं मिलनी?”
राजेश ने उसकी आँखों में देखा।
उन आँखों में एक ऐसी आग थी जो दुनिया से कुछ छीन लेना जानती है।
“तो?” उसने पूछा,
इरम ने कॉफी का घूँट लिया
और जैसे अपने भीतर किसी निर्णय को पक्का किया।
तुम पीएचडी करो।”
उसने कहा।
राजेश चौंक गया। पीएचडी? किस पर?”
इरम ने ज़रा झुककर,अपनी आवाज़ दबाकर कहा—देवेंद्र ठाकुर पर।”
राजेश ने स्तब्ध होकर उसकी तरफ देखा।
एक पल को लगा उसने गलत सुना।
वो मंत्री ,पर मंत्री पर क्या phd करूं मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हू
इरम मुस्कुराई—
उसकी मुस्कान में महत्वाकांक्षा चमक रही थी।
देवेंद्र ठाकुर पहले हिंदी भाषा और साहित्य के लेखक थे।
उनकी किताबें हैं, उनके नाटक, उनके कॉलम…
यह सब शोध के लिए बेहतरीन सामग्री है।
और सबसे बड़ी बात—”
वह ठहरकर बोली,
अगर तुम्हारा काम उन्हें पसंद आया…
तो तुम्हारी ज़िंदगी बदल जाएगी।”उनके अंदर एक टीस है कि लोग उन्हें अच्छा लेखक नहीं मानते
लेकिन राजेश ने बात काटनी चाही
इरम ने उसके हाथ पर हाथ रख दिया—
धीरे से, जैसे उसे आश्वासन दे रही हो।
“राजेश…ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे दरवाज़े खुलते हैंजो जिंदगी बदल देते हैं ।
वह रुककर बोली,
“देवेंद्र ठाकुर की नज़र में तुम आओगे…
तुम्हें मेंटर मिल जाएगा…
और इस शहर की दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखने में देर नहीं लगेगी।”
राजेश ने एक लंबी साँस भरी।
वह इरम के तर्कों को नकार नहीं पा रहा था।
“लेकिन इरम… राजेश बोला
इरम का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
“कभी भीड़ में खड़े रहने से कोई पहचान नहीं बनती।
तुम लेखक हो, शोधकर्ता हो, अभिनेता हो…
तुम छोटे दायरे में बंधकर क्यों जीना चाहते हो?”
वह उसे गहराई से देखते हुए बोली—
“अगर तुम मेरे होते…
तो मैं चाहती कि तुम इस शहर में चमको।भीड़ में खोओ नहीं।”
उसकी आवाज़ में एक सूक्ष्म-सी ownership थी—
एक ऐसा अधिकार जो प्रेम और महत्वाकांक्षा दोनों से आता है।
राजेश के भीतर कुछ पिघल गया।उसने पहली बार महसूस किया कि कोई उसे उसकी संभावनाओं के आईने में देख रहा है।
“ठीक है…”उसने धीमी आवाज़ में कहा। मैं सोचूँगा।”
इरम मुस्कुराई—
“सोचो मत। शुरू करो।मैं तुम्हें देवेंद्र ठाकुर से मिलवाऊँगी।”
वो दो दिन बाद आई और बिना किसी भूमिका के उसने कहा कि आज शाम को मिलना है मैने बात कर ली है
इतनी जल्दी?”
“मौक़े… देर करने से हाथ से फिसल जाते हैं, राजेश।”
लखनऊ सचिवालय की उस पुरानी इमारत में जब राजेश और इरम दाख़िल हुए,तो उसे पहली बार समझ आया कि सत्ता की इमारतें सिर्फ ईंटों से नहीं बनतीं—चुप्पियों से बनती हैं,फासलों सेबनती हैंऔर उन निगाहों से बनती हैं जो हर आते-जाते इंसान का वज़न तोल लेती हैं।
गलियारा लंबा था।दीवारों पर लगी तस्वीरें—पुराने मुख्यमंत्री, शहीद, नेता—सब मानो एक ही बात कह रहे हों:
“यहाँ कहने से ज़्यादा, न कहने का फ़न काम आता है।”
इरम चलते-चलते फुसफुसाई,
“डरो मत… बस सलीक़े से बोलना।यह आदमी बोलने से ज़्यादा देखने में यक़ीन रखता है।”
राजेश ने हल्का-सा सिर हिलाया।दिल की धड़कन ज़रा तेज़ हो गई।
इरम ने पहली बार उसका हाथ पकड़ा—
बहुत हल्के, मगर बहुत यक़ीनी तरीक़े से।
उस पकड़ में नर्मी नहीं,तैयारी थी।
एक कमरे के दरवाजे पर पहुंचते ही चपरासी ने इरम को नमस्ते किया और दरवाज़ा खोल दिया
अंदर एक बड़ी सी कुर्सी पर देवेंद्र ठाकुर बैठा था।
गहरी आँखें,तेज़ नाक,
और चेहरे पर मुस्कान जो पूरी मुस्कान नहीं थी—
बस उसके इशारे भर।
इरम ने धीमे से कहा,
“सर… ये राजेश हैं।
नाटकों और सामाजिक चिंतन पर रिसर्च कर रहे हैं।
आपके काम पर…”
देवेंद्र ने सिर उठाया।
एक नज़र—
सिर्फ एक।
और राजेश को लगा जैसे कोई अंदर तक झाँक रहा हो।
“अच्छा…”
देवेंद्र बोला,
आवाज़ धीमी, मगर गूंजदार।
“तुम मेरे नाटकों पर रिसर्च करना चाहते हो?”
राजेश ने संभलकर कहा,
“जी… आपका आरंभिक लेखन मुझे बेहद… दिलचस्प लगा।”
देवेंद्र मुस्कुराया।
“दिलचस्प?”
उसने शब्द लौटाया—
जैसे उसकी परीक्षा ले रहा हो।
इरम ने कहा,
“राजेश को आपकी भाषा, आपकी राजनीतिक यात्रा…
और आपकी फिलॉसॉफी बहुत आकर्षित करती है।”
देवेंद्र ने हल्के से पूछा,
“तुम्हें भी?”
इरम मुस्कुराई—
“मैं तो आपकी किताबों पर स्टोरी कर चुकी हूँ, सर।”
देवेंद्र ने दोनों को कुछ पलों तक देखा—
इतनी देर तक कि कमरे की हवा भारी होने लगी।
फिर वह उठा।
धीरे-धीरे कदम रखते हुए
राजेश के बेहद क़रीब आया।
“शोध… सिर्फ किताबों का काम नहीं होता,”
“शोध नफ्स को पढ़ना होता है, इंसान के भीतर के अंधेरे को,
और कभी-कभी अपने अंधेरे को भी।”
राजेश ने सिर झुकाया।
देवेंद्र एक हाथ पीछे बाँधकर बोला—
“इरम ने तुम्हारे बारे में बहुत बताया है।”
राजेश ने चौंककर इरम की ओर देखा।
इरम ने हल्की मुस्कान दी ।
देवेंद्र ने कहा,
“अच्छा है… कोई तो है जो इस लड़के में काबिलियत देख रहा है।”
उसके लहजे में
तारीफ़ कम और तंज़ ज़्यादा था।
बैठते-बैठते देवेंद्र बोला,
“अगर तुम्हें सच में काम करना है,
तो मेरे पुराने ड्राफ़्ट, किताबें ,नोट्स…
सब तुम्हें उपलब्ध करा दिए जाएँगे।”
राजेश चौंका।
“स… सच में?”
देवेंद्र ने अपनी मुस्कान चौड़ी की,
“क्यों नहीं?
इरम ने कहा है कि तुम मेहनती हो।”
राजेश ने सिर झुकाया।
इरम अब भी चुप थी—
जैसे वह जानती हो खेल किस दिशा में जा रहा है।
देवेंद्र ने चाय का कप उठाते हुए कहा,
“वो क्या कहते हैं नाटक वाले?
कि असली किरदार वही होता है
जिसका सच कभी सामने न आए।”
राजेश ने हौले से कहा,
“जी… जहाँ अभिनय और हक़ीक़त एक-दूसरे के भीतर छिप जाएँ।”
देवेंद्र नज़रें गड़ाकर बोला,
जिंदगी भी एक बड़ा नाटक है।और हम सब…
अपनी-अपनी औक़ात के हिसाब से किरदार निभा रहे हैं।”
कमरे में एक ठंडी हवा सी दौड़ गई।
राजेश ने महसूस किया कि इस आदमी से डर तो नहीं,
लेकिन एक अनकहा दबाव है जैसे कोई बहुत दूर से उसके भविष्य की डोर पकड़ रहा हो।
इरम बोली“हम चलते हैं, सर।”
देवेंद्र ने इशारा किया—
“जाओ।
और राजेश…”
राजेश मुड़ा।
“इरम क़ाबिल लड़की है।
ध्यान रखना…
क़ाबिल लोग कभी किसी के इंतज़ार में ज़्यादा देर नहीं रुकते।”
शब्द साधारण थे,
मगर मानी… बहुत भारी।
---
कमरे से बाहरनिकलते ही राजेश को लगा हवा अचानक हल्की हो गई है।
इरम ने उससे पूछा,
“कैसे लगे?”
राजेश कुछ क्षण ख़ामोश रहा।
फिर धीमे से बोला—
“जैसे किसी ने मुझे पूरी तरह पढ़ लिया हो…
और मैं उसके सामने बिल्कुल
खुला रह गया हूँ।”
इरम मुस्कुराई,
“यही तो उसका हुनर है।”
कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा,
और राजेश…
यही हुनर आगे चलकर
तुम्हारी ज़िंदगी भी बदलेगा।”
राजेश देवेंद्र ठाकुर के साहित्य पर शोध करने लगा था । ठाकुर उसे बार बार बुलाता कभी काम की प्रगति पूछता कभी नोट्स देखता कभी कहता लिखो तुम्हारा लिखा हुआ शोध तुम्हे बहुत आगे तक ले जाएगा ।
वैलेंटाइन डे की रात अरमान ठाकुर का बंगला रोशनियों से जगमगा रहा था। लाल गुलाबों की लड़ियाँ, गज़लों की धीमी महफ़िल, और सत्ता व मीडिया की मिली-जुली महक—यह सब कुछ राजेश को एक अजनबी दुनिया जैसा लग रहा था।
इरम उस रात कुछ अलग ही चमक रही थी—काले सिल्क के कुरते में, कानों में हल्के झुमके, और होंठों पर वह मुस्कराहट जो आदमी को पहले हैरान करती है, फिर बेबस।
“राजेश, आज किसी चीज़ की फ़िक्र मत करना,” उसने काँधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“यहाँ कोई किसी का हिसाब नहीं पूछता… बस जीना पड़ता है—थोड़ा बेपरवाह होकर।”
राजेश हल्की झिझक से मुस्कुराया।
पार्टी बढ़ती गई। देवेंद्र ठाकुर शराब के गिलास के साथ अपने समर्थकों, कविताओं और राजनीतिक रणनीतियों का मेल बिठाता घूम रहा था।
इरम कई बार उसके पास गई—कुछ फुसफुसाया, कुछ हँसी—और फिर लौटकर राजेश को आँखों से इशारा करती रही, जैसे कह रही हो देखो, दुनिया यूँ चलती है… सीखो।
धीरे-धीरे रात ढलती गई।
लगभग 2 बजे, हवा में गुलाबों की जगह शराब और महफ़िल की थकान घुल चुकी थी।
इरम पूरी तरह नशे में थी।
वह लड़खड़ाते कदमों से राजेश के पास आई,
“चलो… बहोत हो गया।
राजेश तुरंत उठ खड़ा हुआ।
बाहर निकलते ही बंगले की रोशनियों के पीछे लखनऊ की सड़कें वीरान और ठंडी पड़ी थीं। उसने ड्राइवर और गाड़ी को जाने को पहले ही कह दिया था ।वे दोनों अब हजरतगंज की सड़क पर थे ।हवा में फ़रवरी की ठिठुरन थी, और इरम की आवाज़ में नशे की घुली हुई अज़ादी।
रिक्शा—रिक्शा!”
वह तेज़ आवाज़ में चिल्लाई।
क़रीब खड़े एक बूढ़े रिक्शे वाले ने घबराकर पीछे मुड़कर देखा।
इरम ने हँसते हुए कहा,
“हमको घूमाओ… पूरी हजरतगंज … आज की रात को यादगार बनाना है।”
राजेश ने उसका हाथ पकड़कर धीमे से कहा,
“इरम, शांत हो जाओ… 2 बज रहे हैं चलो, पहले तुम्हें घर पहुँचाते हैं।”
ईरम ने उसकी उँगली पकड़ते हुए, आँखें मींचकर जोर से कहा,
“डरो मत राजेश… डरने से ज़िंदगी नहीं बदलती।”
रिक्शा चल पड़ा।
हजरतगंज की पीली स्ट्रीट लाइट्स एक-एक करके गुज़रती जा रही थीं।
इरम कभी हँसती, कभी हवा में हाथ फैलाकर कोई उर्दू शेर बोलती—
“ज़िंदगी क्या है…हवा का एक झोंका
कभी आग का, कभी ख़्वाब का…”
राजेश का दिल धक-धक कर रहा था।
अगर पुलिस मिल गई… अगर कोई गुंडा…
इरम को संभालते हुए उसका हाथ काँप रहा था।
आधे घंटे बाद वह किसी तरह उसे उसके घर तक ले आया।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इरम कई बार उस पर झुकती रही।
कमरे तक पहुँचते-पहुँचते नशा और गहरा गया था
कमरा अँधेरे में डूबा था—सिर्फ खिड़की के पर्दे से आती स्ट्रीट लाइट की हल्की सफेद रेखा फर्श पर बिछी हुई थी।
इरम दरवाज़े के भीतर आते ही सोफ़े पर गिर गई, उसके बाल कंधों से फिसलकर गर्दन पर आ टिके थे।
और तभी—
इरम ने उसका हाथ पकड़ लिया।
क़रीब खींचकर उसकी आँखों में देखा।
आँखें आधी नशे में, आधी किसी अनकहे खालीपन में डूबी हुईं।
"राजेश…"
उसने धीरे से उसे पुकारा।
आवाज़ नशा और थकान से काँप रही थी, पर उसमें एक अजीब सा सुकून था—जैसे किसी भरोसे की इबारत।
राजेश झिझकते हुए उसके पास आया।
इरम ने उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया—हथेलियाँ गर्म, काँपती हुईं।
बाहर बहुत सर्दी है…इरम फुसफुसाई,और भीतर बहुत ख़ालीपन।
कभी-कभी इंसान को किसी की मौजूदगी चाहिए होती है… बस मौजूदगी…"
राजेश ने कुछ कहना चाहा, पर इरम की उँगलियाँ उसके हाथ पर और कस गईं।
जैसे कमरा स्थिर हो गया हो—
बाहर की सड़क, पेड़, हवा… सब चुप।
सिर्फ उनकी साँसों का हल्का कंपन।
इरम ने सिर उठाया, उसकी आँखें अँधेरे में और गहरी लग रही थीं—
जैसे उनमें पूरी रात ठहरी हो।
राजेश, तुम बहुत सादे हो।
बिलकुल कच्ची मिट्टी की तरह…
और शायद यही मुझे तुम्हारी तरफ खींचता है।”
उसने धीरे से उसके कंधे पर सिर रख दिया
राजेश के भीतर कुछ पिघलने लगा था
जैसे पहली बार किसी ने उसे इस तरह छुआ हो… बेबाक
खिड़की से आती हल्की हवा इरम के बालों को छूती, और वे बार-बार राजेश के चेहरे से लग जाते।
उसी पल इरम ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
बहुत धीमे, बहुत नर्म।
“राजेश… आज रात कोई नक़ाब मत पहनना।
ना तुम… ना मैं…”
उसके शब्दों में एक अजीब सादगी थी, कोई आग्रह नहीं—बस एक रूहानी सा निमंत्रण।
वह करीब आई—इतनी कि उसकी सांसों में इरम की शराब और इत्र एक साथ घुल गए।
राजेश का दिल जोर से धड़क रहा था
राजेश…आज कुछ मत सोचना… बस… होने दो।”
उसने खुद को रोकने की कोशिश की—पर इरम ने उसके झिझकते हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।
उस रात—
।इरम जैसे किसी पुराने बोझ से मुक्त हो रही थी,
और राजेश पहली बार ज़िंदगी की किसी अनजानी नदी में बह रहा था
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कई दिन बीत गए शोध ,काफी ,गोमती का किनारा और शहर की हवा सब एक जैसे बने हुए थे
एक दोपहर में इरम को मंत्रालय से कॉल आया—
“मंत्री जी आपसे मिलना चाहते हैं। आज। अभी।”
इरम एक पल को रुकी।
दिल में एक हल्का सा कंपन उठा,
पर उसने खुद को सीधा रखा
और कार मंत्रालय की ओर मोड़ दी।
गलियारे लखनऊ की ठंडी हवा जैसे अपने अंदर खींचे खड़े थे।
कमरा वही—
भारी परदे, बड़ी कुर्सी,
और उस कुर्सी पर बैठा देवेंद्र ठाकुर—
एक शातिर मुस्कान,एक शिकारी नज़र,
और भीतर छुपा हुआ अँधेरा जो वह कभी छुपाता नहीं था,
बस, नियंत्रित रखता था।
इरम अंदर आई।
देवेंद्र ठाकुर ने उसकी तरफ देखा,अपने चश्मे के पीछे से लंबी नज़र डालते हुए बोला
अरे, इरम…
आजकल तुम बड़ी रौशन लग रही हो।
कहीं नयी रोशनी मिल गई है क्या?”
इरम का दिल एक पल को थमा।
क्या उसे पता है?
वह संयत होकर बोली—
“सर, मैं आपकी रिसर्च स्टोरी के सिलसिले में आई हूँ…”
देवेंद्र हल्के से हँसा।
“स्टोरी?”
वह कुर्सी से उठकर करीब आया और बोला—
“कभी-कभी असली कहानी फाइलों से नहीं…
लोगों के चेहरों से समझ आती है।”
इरम जड़ खड़ी रह गई।
ठाकुर ने आगे कहा—
“तुम होशियार हो, खूबसूरत हो…
और सबसे बड़ी बात—
समझदार हो
तुम्हें पता है कि इस दुनिया में किससे क्या लेना है।”
“और हाँ…
कुछ लोग ऐसे होते हैं
जो बस तुम्हें पीछे खींचते हैं।
मैं नाम नहीं पूछूँगा…
तुम्हें पता है मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”
इरम की सांस अटक गई।उसने कुछ नहीं कहा।
देवेंद्र ठाकुर मुस्कुराया—
एक लंबी, ठंडी मुस्कान।
“वैसे…
तुम्हारा दोस्त राजेश…
अच्छा लड़का है।
बहुत अच्छा। लेकिन दुनिया अच्छे लोगों से नहीं चलती, इरम।”
वह खिड़की की ओर मुड़ा और बोला—
“अगर तुम्हें ऊपर जाना है…
तो तुम्हें नीचे पड़े बोझ उतारने ही होंगे।”
इरम ने आँखें झुका लीं—
“तुम बहुत आगे आ गई हो…
बहुत कम वक़्त में।”
“और जानती हो…
तुम जहाँ भी हो,
जिस भी ऊँचाई पर खड़ी हो—
उसमें मेरा कितना हिस्सा है?”
उसकी आँखों में वो शिकारी सुकून था जो सिर्फ ताक़त के नशे में डूबे लोगों की आँखों में होता है।
इरम ने होंठ भींचे।
“सर, मैंने मेहनत—”
देवेंद्र ने तीखी मुस्कान से उसकी बात रोक दी।
“मेहनत?हाँ, की होगी।पर मेहनत अकेले किसी को यहाँ तक नहीं लाती।”
“आज तुम जो इरम हो…जो नाम है, जो पहुँच है…वो मेरी वजह से है।”
हर शब्द वज़नदार था
इरम ने गहरी सांस ली—
“मैं आपकी इज़्ज़त करती हूँ, सर।”
वह मुस्कुराया,
उस मुस्कान में इज़्ज़त का जवाब नहीं,
एक मालिकाना भाव था।
और बहुत धीमी आवाज़ में बोला—
“मुझे तुमसे चाहिए ही क्या, इरम?”
“बस…थोड़ी सी गर्मी।”
वह धीरे-धीरे बोला—
“जिस्म की, साथ की… और वक़्त की।यह कोई बड़ा सौदा तो नहींथा जो तुमने मेरे साथ किया था ”
इरम ने नज़र झुका ली।
और ये गर्मी… सिर्फ मेरी होनी चाहिए।
बस, इसी में सबकी भलाई है—तुम्हारी भी…
और उस लड़के की भी…
जिसका नाम तुम्हारे चेहरे पर लिखा फिरता है।”
इरम की सांस ठहर गई।
दे इंद्र ठाकुर ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा—
“इरम…
सफलता एक खेल है।
और इस खेल में जो चलना सीख जाता है,वो दुनिया को पीछे छोड़ देता है।”
वह हँसा—
“बस…फैसला तुम पर है।
उड़ना है… या किसी की उँगली पकड़कर चलना?”
कमरा भारी हो गया था
वह ठंडी आवाज़ में बोली—
“मैं समझ गई, सर।”
देवेंद्र ठाकुर ने सिर हिलाया—
“अच्छा है।
ज़िंदगी आसान रहेगी।”
इरम निकलने लगी तो पीछे से उसने एक वाक्य फेंका—
हल्का, पर ज़हर से भरा।
“और हाँ…
जिस्म और जज़्बात—
दोनों को काबू में रखना सीखो।
कहीं कोई ग़लत हाथ न लग जाए।
”
इरम बाहर निकल गई।
पर उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।
जैसे किसी ने उसकी रूह पर एक भारी मुहर लगा दी हो।
इरम अपने कमरे की खिड़की पर टिककर बैठी थी। नीचे लखनऊ शहर अपनी रफ्तार में बह रहा था—मेट्रो की हल्की घरघराहट, दुकानों के बंद होते शटर, चाय की भाप में उठती बातें। लेकिन उसके भीतर एक और शहर बस गया था—जिसमें हर गली दो भागों में बँटी थी। एक तरफ़ राजेश था—शांत, भरोसेमंद।
दूसरी तरफ़ देवेंद्र ठाकुर तेज़, और खतरनाक
इरम सोच रही थी कि उस की दुनिया केवल दिल की नहीं थी—वह एक ऐसे पेशे में थी जहाँ लोगों की यादें, और निर्णय कैरियर या तबाही का फ़ासला तय कर देती हैं।
वह खुद से लड़ रही थी—
क्या वह राजेश के साथ रह सकती है?
क्या वह यह सुख झेल सकती है?
और क्या वह उसके साथ रहकर अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकती है?
राजेश उसके जीवन में वह ठंडी जगह बन गया था जहाँ संघर्ष की आग थोड़ी देर के लिए राख हो जाती है।लेकिन महत्वाकांक्षाओं में ठंडी जगहें नहीं होतीं—वहाँ सिर्फ़ दौड़ होती है और पीछे छूट जाने का डर
राजेश की ईमानदार आँखें उसे खींचती थीं।
लेकिन देवेंद्र की बात न मानने के परिणाम का डर उसे पीछे धकेल रहा था और उसके करियर की ऊँचाई उससे मांग कर रही थी कि “निजी जीवन को भूल जाओ
इरम ने अपनी डेस्क पर रखी हर उस फ़ाइल को फिर से छुआ, जो उसके पिछले पाँच वर्षों की नींद, आँसू और संघर्षों का जमा हुआ प्रमाण थी।
उसकी दुनिया में भावनाएँ नहीं चलतीं; सिर्फ़ जगह, पहुँच और प्रभाव चलता है।
इरम जानती थी—
अगर वह राजेश के साथ गहराई में चली गई,
तो राजेश मजबूत होगा या नहीं,
पर वह खुद कमजोर पड़ जाएगी।
और उसकी दुनिया में कमजोरी एक विलासिता थी—जो वह अफोर्ड नहीं कर सकती थी।
वह धीरे से उठी।
आईने में खुद को देखा—
ज़रा-सी थकान, थोड़ी-सी उदासी, और भीतर कहीं जिद की एक पतली-सी लौ।
वह लौ उसका करियर था।
वह लौ उसकी पहचान थी।
उसने गहरी साँस ली।
मोबाइल उठाया।
राजेश का नाम स्क्रीन पर उभर आया—इतना मासूम, इतना शांत, इतना अलग उसकी दुनिया से।
इरम ने एक ल, सधा हुआ संदेश टाइप किया:
“राजेश…
हमारी दुनिया अलग है।
तुम मुझे समझते हो, पर मेरी जगह को नहीं जानते।
मुझे अपने काम पर पूरा ध्यान देना है।
किसी भी रिश्ते से ज़्यादा इस समय मेरा करियर महत्वपूर्ण है।
अब हम अलग रास्तों पर बेहतर रहेंगे।”
उसने निर्णय ले लिया था एक साफ़, कठोर, दृढ़ निर्णय—
वह अपने करियर की ऊँचाई चुनेगी।
भले उसके दिल की कोई घाटी अधूरी रह जाए।
संदेश भेज कर वह थोड़ी देर तक राजेश के नंबर को देखती रही और फिर एक झटके उसे ब्लॉक कर दिया ।
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