शुक्रवार, 28 मई 2021

फ़िल्म


 अफाक मियाँ सैद्धांतिक तौर पर बड़े कट्टर किस्म के मुसलमान थे पर जब भी कोई सिनेमा का पोस्टर A मार्क के साथ लगता तो अफाक भाई उसकी चर्चा गजेंदर से जरूर करते । ऐसी ही किसी फिल्म का रंगीन पोस्टर लगा हुआ था । आफाक से रह न गया एक दम से फट पड़े ।


" देखिए अब कितना फालतू फ़िल्म लगता है  ।फिलिम तो एक ही ठो बना है आज तक मुग़ल ए आज़म । " 

मुगले आजम बोलते हुए नुक्ते को थोड़ा गाढ़ा जरूर कर दिया । शायद नुक्ता लगा कर बोलना वो अपना मजहबी फ़र्ज़ समझते थे ।


उस वक़्त भी उनकी निगाहें पोस्टर पर ही थीं । 

बताइए यह भी कोई फ़िल्म हुई उफ्फ ,उफ्फ । या खुदा फट जाए यह धरती और सम जाऊं में उसमे ।


गजेंदर बाबू खैनी मसलते हुए मुस्कुराए और अफाक से बोले 

" ,देखने चलेगा ? इस से बढियाँ वाला डुराण्ड में लगा है ।


- लाहौल विला कूवत। कैसा बात कर रहे है गजेंदर भाई ।ई सब फिलिम देखते हुए कोई देख लेगा तो क्या कहेगा ?


-- ए अफाक , करबा लड़बकई। खाली शेक्सपियर पढ़ने से नही होता है ।जीवन मे सेक्स नही होगा तो पीयर हो जाओगे। और शेक्सपियर भी कहते हैं "कावर्डस डाई मेनी टाइम्स बिफोर देयर डेथ" घुट घुट के मत जिओ , लोग के चिंता मत करो , लोगवा तबे न देखेगा तुमको जब उ खुद भी वहाँ होगा ।डराओ मत , चल सिनेमा देखे

 


और अफाक भाई घिसिया लिए गए 

साढ़े चार फिट की दुर्बल काया और धंसी हुई आंखों पर गोल चश्मा लगाये आफाक अक्सर 6 फिटे गजेंदर द्वारा घिसिया लिए जाते थे । पर थे दोनो पक्के यार

 

P k d का लेक्चर छूट जाएगा । आफाक ने कहा


चल रे । एको किलास गोल कर के सिनेमा भी नही देखा त जिंदगी अधूरी रह जाएगी । चल 

 आफाक ने कलेंजे पर पत्थर रखा , हिम्मत जुटाई थी और चले गए थे क्लास गोल करके । टिकट ले कर अंदर आये तो फ़िल्म शुरू हो गयी थी ।

गजेन्दर ने बगल में बैठे अधेड़ से पूछा " फिलिमियाँ कितना देर पहले शुरू हुआ चचा ?"


"अभी सीन नही निकला है " जवाब मिला ।


"इसको मालूम है कौन सीन " आफाक ने फुसफुसाते हुए पूछा 


गजेन्दर बाबू मुस्कुराए " हियाँ सब के मालूम है कौन सीन । तुमही बकलोल हो ।


बाद में सुना अफकवा भाग आया था ।पूरी फिल्म उस से देखी नही गयी थी ।


अगला किस्सा अब कल...

गुरुवार, 27 मई 2021

गोली चल गई ठाँय

 महफ़िल जमी हुई थी । पूरे गाँव के ठलुओं का एक ही ठिकाना तेज की नीम ।

काए दद्दा तुमने तो चीन से बासठ की  की लड़ाई लड़ी है ।

दद्दा मुस्कराए , मूछों पे हाथ फेरा , -"हम चीन की सीमा पर थे । शाम का बखत था । हम ने दूरबीन से देखा सामने दुश्मन का तंबू लगा हुआ था ।दुश्मन और हम आमने सामने , बो  हमे देखता हम बिसे   एक दिन हमने तय कर लई की आज इनके कमांडर से दो दो हाथ होई जायँ।"

----फिर ..

"फिर क्या हम अकेले ही चल दिये दुश्मन के तंम्बू की तरफ 

सामने डेढ़ फुटिया चीनी उसने हमें आते देखा तो सकपका गया , कि जे तो इधर ही आ रहा है । बिस्ने अपनी बंदूक हमाए सामने कर के कहा '  थम कौन है'

हमने कहा जाओ अपने 2 फुटिये कमांडर से कह दो हवलदार बेंचे सिंह आएँ हैं

वो बोला नही जाने देंगे

हमने कहा कौन रोकेगा हमे

विसने कहा हमाई बंदूक और विसमे से निकली गोली

हमने कही चला गोली 

गोली चली...  ठांय...

----गोली चला दी 

---हाँ चला दी  ठांय$$$

लेकिन गोली बंदूक की नली से निकर के हमाए पास तक आती इस से पहले हमने नली के मुँह पर अपने हाथ का पंजा लगा दिया ।

---"  फिर "

--फिर क्या गोली नली के मुहाने पर आकर पंजे से टकराई और वापस मुड़ के फिर अंदर वहाँ से फिर नली के मुँह पर और फिर पंजे से टकरा कर फिर अंदर ।गोली की समझ न आये की निकलें कहा से वहीं नली में गन्न गन्न करके फिस्स हो गयी ।

संतरी ने जब जे देखा कि गोली बंदूक बेकार ,तो भाग गया और अपने कमांडर को जा कर बताया ।

कमांडर सुनते ही बोला ओह ये जरूर हवलदार बेंचे सिंह ही होगा उसके अलावा इतना दिलावर कोई नही 

-- दाऊ तुम ने कैसे समझा कि जे कमांडर जे बोल रहा है , तुम चीनी भाषा जानते हो ?

दाऊ कुछ बोले इस से पहले रामपित्ताप बोल पड़े "" जे चीनी का , बेसन ,सूजी औ नोन तेल धना सब जान्त हैं।

वहाँ मेस में ले कलछुला खाना बनाती रहीं , जहां बताय रहीं लड़ाई लड़ीं ..।

हम से सुनो इनके किस्सा ।

हवलदार साब खिसिया गए, और ठलुआ एक नया किस्सा सुनने में लग गए ।


बुधवार, 26 मई 2021

बारात

 बात उन दिनों की है जब बारातें बसों में जाया  करती थीं और बाजे वाले भी बारात के साथ ही जाया करते थे । ऐसी ही एक बारात गाँव से लखनऊ की तरफ जा रही थी । बाराती बसों में सवार हुए । बाजा वाले भी आ गए । बैठें कहाँ सीटें तो बारातियों से ही भर गई । लिहाजा बाजा वालों से कहा गया कि बस की  छत पर बैठो । 

दो एक कुनमुनाए -  छत्त पे इतनी दूर कैसे जाएंगे ठाकुर

ठाकुर बोले - हेलीकॉप्टर पे जाओगे , बजाएँगी कुड़कुड़ियाँ और बैठने है जहाज पे । चढ़ जल्दी छत्त पे ।

बहरहाल बस चली रास्ते पे एक ठेका मिला बस रोकी गयी ।ये हुआ कि   स्टॉक ले लिया जाए ।कुछेक ने गला वहीं तर करने की ख्वाहिश भी जताई -अब इत्ती दूर बारात जाने हैं ऐसे ही सूखे सूखे ।अब लम्बददार के मोड़ा को ब्याव और रंग न जमे ।

तो बस रुकी और लोग अपने जरूरत का सामान लेने लगे  ।

बस की छत से परभुआ बोला -- ठाकुर हमउँ हैं

ठाकुर ने ऊपर नजर घुमाई ,होठ मुस्कुराए और मुख से आवाज निकली - पतो है भोसड़ी के , आय जा नीचे ।

परभुआ एंड टीम खुश हो कर उतरने लगी तो ठाकुर ने फरमाया - ऐसे  नही अपनी कुड़कुड़ियाँ औ पीपिया झुनझुना ले के उतर ।

परभुआ एंड कम्पनी विथ पीपिया झुनझुना और कुड़कुड़ियाँ उतर आए ।

ठाकुर साहब ने हुकुम फरमाया - बजाओ

जम के बाजा बजे ,नाच हुआ और लगभग 1 घंटा बाद बस आगे रवाना हुई ।

लगभग 2 घंटे बाद वाहनों की लंबी लाइन दिखाई दी बस भी उसी कतार में लग गयी । मालूम पड़ा  कोई दुर्घटना हो गयी है जाम लगा है ।रास्ता साफ कराया जा रहा है आधा घंटा लगेगा । लोग बस से नीचे उतर कर टहलने लगे  इतने किसी की नजर फिर से परभुआ और उसके साथियों पर पड़ी और उसके मुंह से निकला - परभुआ 

परभुआ -जी मालिक

मालिक- नीचे उतर बाजा बजा

परभू और मंडली फिर नीचे उतरी और फिर से एक बार समा बांध दिया ।

 बस फिर चली और घंटे डेढ़ के बाद बस के अंदर किसी बाराती ने कहा --बस रोक लो हवाई जहाज बनाये हो आदमी को टट्टी पेशाब भी नही करने दे रहे  ।

लिहाजा बस फिर रुकी और यह तय हुआ कि जब तक लोग मूतें मातें तब तक एक बार डांस होना चाहिए और परभुआ से फिर कहा गया कि नीचे उतर और बीज अपनी कुड़कुड़ियाँ।

न चाहते हुए भी परभुआ और साथियों ने अपनी पोजिशन ली और परभुआ बोला रेडी... वन ....गो$$$

धुतुड़ धुतुड़ धों धों 

धुतुड़ धुतुड़ धों धों 

पीं $$$$

बाजा बजा

ठाकुर साहब गण गाना सुनते सुनते नाचते रहे और मूतते हुए भी उनके चूतड़ मटकते रहे और परभुआ झुंझलाते हुए भी धुन निकालता रहा

 ' लगता है जैसे सारे संसार की शादी है '

बस फिर आगे चली , शाम होने आयी थी और चाय की तलब लग रही थी लिहाज एक खुले से ढाबे के पास बस फिर से रोकी गयी ।बाराती उतरे और ठाकुर साहब ने फिर नजरें बस की छत पर फेरी कि परभुआ बोल पड़ा -- जे सही नही है ठाकुर हम ऐसे नहीं बजाय पाएंगे । हम जनवासे में बाजा बजाने के लिए आये और तुम जे पांचवीं बार रास्ते मे ही बजवा रहे ।

ठाकुर साहब ने परभुआ पे नजरें जमाये हुए ही आवाज लगाई--भुल्ली 

भुल्ली-का है दद्दा

 बस में से लइये तो हमाई बंदूक

भुल्ली दौड़ के दुनाला उठा लाया । ठाकुर साहब ने उसमे कारतूस भरे और परभुआ पर निशाना लगाया - तू बजाय रहो की हम बजावें ।


पीपिया बज रही थी , कुड़कुड़ियाँ ,ताल दे रहीं थी और बारातियों ने झुनझुने अपने हाथ मे ले लिए थे । उत्सव चल रहा था और ठाकुर साहब की बंदूक की नाल परभुआ की ओर थी 

हवाओं में गीत  बह रहा था

"पल्लू लटके 

गोरी को पल्लू लटके

जरा सो ,जरा सो 

जरा सो सीधो है जा बालमा मेरो पल्लू लटके ।


शुक्रवार, 21 मई 2021

प्रभु जी तुम कैसे प्रोफेसर

 

 

प्रभु जी
तुम कैसे प्रोफेसर
तुम हम को समझत शिकार
हम जानत तुम हो गोली
ट्यूसन के हित बोलत हो तुम
हमसे मीठी बोली
फिर हु हम जो पढ़त न तुमसों
अंक करत हैं ठिठोली
हार मानि के कहत हैं हम
प्रभु तुम हमरे परमेश्वर
प्रभु जी तुम कैसे प्रोफेसर

हमरे धन पर डालत डाका
करत हो मुश्किल जीना
हम जानत हैं गुरूजी तुम को
तुम होबड़े कमीना
तुम खुद को हो कहत देव
हम जानत तुम रजनीचर
प्रभु जी तुम कैसे प्रोफेसर

 

 

कुछ भी न हो ज़िंदगी मे फिर भी चाय होती है

 जो वक़्त के साथ बदल जाए वह  राय होती है ,

कुछ भी न हो ज़िंदगी मे फिर भी चाय होती है


चाय उत्सव भी है बेफिक्री भी और सुस्ती उदासी भागने का जरिया भी। दोस्तों के साथ चाय के खनखनाते प्याले उत्सव का आभाष भी हैं और ज़िंदगी की भागदौड़ का अहसास भी ।फीकी चाय भी स्वाद देती है जब बैठा हो कि मेज के उस पार कोई बेहद प्यारा और कभी कभी अकेले बैठ चाय के प्याले से निकलते धुएं में खुद को ढूंढना इतना भी बुरा नही होता ।

 शहर  का मिजाज जानना हो तो नुक्कड़ की चाय की दुकान से अच्छा कुछ भी नही । 

और अगर बिहार और गुजरात में है तो पीने को चाय के अलावा मजेदार और असरदार कुछ भी नही ।

चाय की महिमा अनंत है आप घर मे हों या सफर में  चाय होती है । सुबह की हगन चाय (बेड टी) से लेकर शाम की मगन चाय होती है  । रेल में बढ़िया से लेकर सबसे खराब और  रामप्यारी से लेकर सिया दुलारी चाय होती है ।कश्मीर से कन्याकुमारी कहीं भी जाइए रेल के हर स्टेशन  पर जो आवाज सबसे पहले आती है वह चाय और चायवाले की  होती है । अब तो राजनीति में भी चाय वाले का ही बोलबाला है  ।और उसके सामने कौन कुछ कहने वाला है। 

बहरहाल

इस दुनिया के कुत्तेपन में 

एक हमदर्द निराली है 

जीवन में  सिरदर्द हैं लाखों 

सुकूं चाय की प्याली है ।


#अंतराष्ट्रीयचायदिवस  पर हार्दिक शुभकामनाएं

चाय पियो मस्त जियो


बुधवार, 19 मई 2021

बैताल कथा


बैताल कथा

 

 

बेताल ने विक्रम के कंधे पर लदे लदे पूरा किस्सा सुनाया की विक्रम हुकूमत ने

 राजधानी को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए दूर बुंदेलखंड में खटारा वाहन भेजने का

फैसला किया है और इस फैसले की देवताओं ने साधु साधु कह कर प्रशंसा की है।

बुंदेलों से कहा गया कि वे इन वाहनों का पुष्प वर्षा और दुंदुभि बजा कर स्वागत

करें । परंतु कुछ लोग कहने लगे कि यह तो अन्याय है ऐसा नही किया जाना चाहिए

।बुंदेलों को भी स्वच्छ हवा का हक़ है ।

तो मियाँ विक्रम अब तुम इस प्रश्न काउत्तर दो की कौन सही है ?यदि तुमने जानते हुए उत्तर न दिया तो तुम्हारे सिर के टुकड़े हो जाएंगे ।

विक्रम बोले सुन बेताल दोनों ही अपनी अपनी जगह सही हैं .ऐसा हमेशा से होता रहा

है ।बुंदेलखंड उत्तर प्रदेश के लिए वैसे ही है जैसे विकसित देशों के लिए

अविकसित और विकास शील देश है जिस तरह इनका  कल्याण करने के लिए तमाम दावे

 किये जाते हैं और अपना समस्त कचरा अंकल टॉम उसी या उस जैसे देशों को देता

रहता है उसी तरह बुंदेलखंड के लिए कई पैकेज दिए जाते रहे हैं यह भी नई तरह का

पैकेज है ।योगी अंकल की अफसरशाही  के पास अविकसित बुंदेलखंड के लिए क्या किया

जाए इसे जानने की एक सुदीर्घ परंपरा है और वे यह सब पढ़ लिख कर आते हैं ऐसे ही

कोई अफसर हो जाता है क्या ।और जो यह कह रहे हैं कि यह गलत है वो भी

सैद्धान्तिक रूप से सही हैं  उन्होंने दिनकर को पढ़ा था दिल्ली में रौशनी शेष

भारत मे अंधियारा है पर यह सिर्फ सैद्धान्तिक रूप से ही सही है और सिद्धांत का

अचार भी नही डलता अगर वे व्यवहार में 'बोल दिल्ली तू क्या कहती है?' नही पूछ

पाते हैं तो उन्हें गलत कहने का कोई हक नही वे खटारा बसों में ही घूमे । अगर

यह प्रश्न दमदारी से पूछा गया तो वो लोग सही हो जाएंगे जो यह कह रहे हैं कि यह

गलत कर रही है सरकार और यदि दमदारी से पूछने का हौसला न दिखा पाए तो फिर वो

अफसर बिल्कुल सही होंगे जिन्होंने दिल्ली का कचरा बुंदेलखंड में फेंक दिया है

और राजधानी को प्रदूषण की समस्या से निजात दिलाने के लिए पुरुस्कृत भी होंगे ।

इतना सुनते ही बेताल वापस डाल पर जा कर बैठ गया और कौन सही है यह जानने की

प्रतीक्षा करने लगा ।

शनिवार, 29 अगस्त 2020

शेर अफ़ग़ान का मकबरा बर्धमान

 अकबर के समय एक आदमी ईरान से हिंदुस्तान आया जिसका नाम था मिर्ज़ा गयास बेग । सयाना था , दरबार मे काम मिल गया और उसकी बेटी अक्सर मुग़ल रानियों के साथ उनके बच्चों के साथ खेलने लगी । इस बेटी का नाम मेहरुन्निसा था । वहीं जहांगीर ने उसे देखा । लड़की खूबसूरत थी और होशियार भी और जहांगीर जो उस समय सलीम हुआ करते थे उनमे बड़े बाप की बिगड़ी औलादों वाले सारे अवगुण थे ।

दरबार की अपनी राजनीति होती है और राजनीति, व्यापार ,ठेकेदारी  में फायदा उठाने के लिए अक्सर औरतों का उपयोग होता रहा है । पहले भी चंद्रगुप्त मौर्य के समय मे हुआ था जब पर्वतराज की हत्या हो गयी थी आज कल भी हो ही रह है जैसे एक इंद्राणी मुखर्जी थी जैसे रिया चक्रवर्ती जैसे अन्य भी जिनके कारण संघ के एक प्रचारक  जी का काम तमाम हो गया था ।

बहरहाल हम बात कर रहे थे मेहरुन्निसा और सलीम की तो मेहरुन्निसा सलीम को पसंद आ गयी वैसे उन्हें हर तीसरी लड़की पसंद आ जाया करती थी उनके जनान खाने भरे पड़े थे औरतों से तो मेहरुन्निसा भी पसंद आ गयी । या ऐसा कहें कि घेर के पसंद करवा दी गयी मेहरुन्निसा सलीम को । कौन जाने मिर्ज़ा गयास बेग का ही ख्वाब रहा हो हिंदुस्तान की मुगलिया सल्तनत में अपना प्रभाव बढ़ाने का । बात जो भी रही हो पर जब सलीम ने मेहरुन्निसा से इज़हार ए इश्क़ किया तो उसने साफ कह दिया कि पहले निकाह कीजिये उसके बाद ही हम आपके होंगे । बात जिल्ले इलाही यानी सलीम मियाँ के बाप जलालुद्दीन अकबर तक पहुँची । अकबर इस तरह के हरामीपन और अपने लौंडे की चूतियापने को पूरी तरह समझता था । दरबार मे उन दिनों कई गुट थे, ईरानी ,तुरानी ,अफगानी और हिन्दोस्तानी ,राजपूत ... ढेर सारे ऐसा समझ लीजिए अटल बिहारी की 13 दलों वाली सरकार थी और किसी भी गट के नाराज होने का मतलब था कुर्सी या तख्त का खतरे में आ जाना ।राणा प्रताप चुनौती दे रहे थे और मिर्ज़ा गयास बेग की लौंडिया अगर सलीम से निकाह कर लेती तो दरबार मे ईरानियों का प्रभाव बढ़ना शुरू होता और राजपूत इसे बर्दाश्त नही करते और यदि ऐसे में जिल्ले इलाही की सरकार से समर्थन वापिस ले लेते तो राजपुताना हाथ से निकल जाता जो कि एक बड़ी त्रासदी होती अकेला राणा प्रताप ही धुंआ भरे हुए था मुगलों के बाकी के अलग होते तो फोगिंग मशीन चल जाती । तो मियाँ अकबर ने इस हरामीपन को भांप लिया कि मिर्ज़ा गयास बेग दिल्ली सल्तनत का बलबन बना चाहता है । अकबर ने सलीम साहब की एक न मानी सलीम बाबू खूब रोये चिल्लाए औरऊल ऊल के गिर गिर पड़े पर अकबर ने उनकी एक न सुनते हुए मेहरुन्निसा की शादी शेर अफ़ग़ान से करवा दी और शेर अफ़ग़ान का ट्रांसफर दूर के इलाके बंगाल की जागीर बर्धमान कर दिया गया । अली कुली बर्धमान आ गए और अपनी बीबी के साथ यहाँ रहने लगे पर मेहरुन्निसा का भारत की प्रथम महिला बनने और गयास बेग का उस हैसियत को पाने का ख्वाब जो मनमोहन सिंह की सरकार में सोनिया गांधी का था कहीं ज्यादा शिद्दत से देखा गया था ।तो बकौल शारुख खान जब आप शिद्दत से कुछ चाहे तो कायनात भी आपको व्व देने की साजिश करती है । अलीकुली बीबी के साथ मजे में दिन गुज़र रहे थे एक बेटी भी हो चुकी थी । उधर अकबर मियाँ भी कमजोर हो चुके थे सलीम ताकत पा रहे थे ईरानी गट उनके साथ था लिहाजा एक दिन उन्होंने बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन कोका जो कि रिश्ते में सलीम का भाई भी था से अलीकुली को पकड़ कर लाने का हुक्म फरमाया । अलीकुली ने इस पर ऐतराज जताया और एक छोटा सा युद्ध जिसे युद्ध के स्थान पर झड़प या मुठभेड़ दोनो में हुई और बंगाल के सूबेदार कुतुबुद्दीन और बर्धमान के दुर्गाधिपति शेर अफ़ग़ान दोनो मारे गए ।सलीम को अपनी सल्तनत के एक और प्रतियोगी से निजात मिली और नूरजहाँ को साम्राज्ञी बनने की राह में रोड़े शेर अफ़ग़ान से। मेहरुन्निसा अपनी बेटी के साथ दोबारा से सलीम के जनानखाने पहुंच गई ।मिर्जा गयास बेग एत्मादुद्दौला के ख़ितब से नवाजे गए और कुछ दिनों बाद जहांगीर ने मेहरुन्निसा से बाकायदा निकाह किया और मेहरुन्निसा को नूरजहाँ के नाम से जाना जाने लगा । फिर ये भी सुना जाता है कि जहांगीर ने एक प्याला शराब के लिए पूरा हिंदुस्तान नूरजहाँ के क़दमो में रख दिया । 

खैर मेरे पीछे जो इमारत देख रहे हैं वह नूरजहाँ के उसी बदकिस्मत पहले पति शेर अफ़ग़ान की कब्र पर बना एक छोटा सा मक़बरा है ।

अब नूरजहाँ और मुमताज की कहानी फिर कभी