सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

फिल्म देखी  हैदर।  और इस नतीजे पर पहुँचा कि  कुछ चीजें  सिर्फ रंगमंच पर ही अच्छी लगती हैं. ऐसे समय में जब चारो तरफ क्रिटिक्स  हैदर की प्रशंसा कर   रहे हैं ,,मुझे लगता है स्क्रिप्ट में कुछ कमी रह गयी।  ये स्क्रिप्ट रंगमंच के लिए बेहतरीन थी पर फिल्म वाले फॉर्मेट में फिट नही हो रही।  हैदर को रंगमंच पर देखना एक अद्भुत अनुभव होता पर फिल्म बोझिल हो गयी।  इस स्क्रिप्ट के साथ रंगमंच पर जो   दृश्य रचे  जा सकते थे उन्हें सोच कर ही रोमांच हो उठता है पर कैमरा  उन्हें  समग्रता में पकड़ नहीं पाया। खैर तब्बू और के के मेनन के बेहतरीन अभिनय को देख कर मन प्रसन्न होता  है।  फिल्म कई जगह झोल खाती भी दिखती है और बेवजह के दोहराव ऊब पैदा करते हैं।

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