खूब योजनाएं बनाइये ,,,पर ये सारी योजनाएं हवाई साबित होती हैं जब आप का सामना जमीनी सच्चाई से होता है।गाँव केसरकारी स्कूल में बालकों के रुकने के भासण वासन तो ठीक हैं परन्तु उन बालिकाओं को क्या आप रोक सकते हैं जिन्हे अपनी माता के साथ हलवाई की टोली में पूरी बेलने किसी शादी में जाना है जहाँ उसे 100 रूपये दिए जाएंगे। या वे बालक जो अपने पिता के साथ पूरे दिन मछली पकड़ेंगे और उसे बेच कर कुछ पैसे कमाएंगे। व्यर्थ साबित होते जा रहे हैं गाँव की गरीब जनता को ये सारे विद्यालय और शायद यही कारण है की उस जनता ने एक गाँव में इन विद्यालयों की व्यर्थता की घोसणा सर्दी की एक रात में विद्यालय के दरवाजे तोड़ कर उसे जला कर ,,,रात भर ताप कर कर दी। ग्रामीण जनो के लिए शायद इन विद्यालयों का यही हासिल है।
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