सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

कॉलेज के दिन भी खूब चमकदार  थे बेफिक्रे और रूमानी।  तब अपनी हैसियत बहोत बड़ी थी ये दुनिया मुट्ठियों में कसमसाती थी और हमें लगता था हम दुनिया को अपनी तरह चलने की क़ाबलियत रखते हैं।  हमें लगता था हम जैसे चाहे वैसे बदल सकते हैं समय की गति। ऊर्जा का एक समुद्र था हमारे अंदर। और अब हा हा हा हा हा हा .........................  

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