कहते हैं कालेज वही जगह है जहाँ आदमी पहली बार अपनी जिंदगी को बाहर से देखता है—
जैसे कोई बालक खिड़की से झाँककर दुनिया का पहला मेला देख ले।
और उस मेले में हमारे बीच एक आदमी था,
जिसकी आँखों में चश्मे के पीछे सदियों की थकान ठहरी थी,
और शरीर ऐसा जैसे हवा चलती रहे और वह धीरे-धीरे हिलता रहे—अफाक आलम भी ऐसे ही थे—साढ़े चार फुट की दुबली-पतली काया, चेहरे पर हमेशा धूल-भरी उदासी, आँखों पर मोटा गोल फ्रेम वाला चश्मा और कंधे पर गांधी कट का कपड़े का थैला, जिसे वे जनेऊ की तरह ऐसे लटकाते जैसे उससे उनकी इज़्ज़त और ईमान दोनों बँधे हों।
अफाक के पास किताबी पढ़ाई के अतिरिक्त दो खूबियां थीं —बेढंगापन और ख़ामोशी।और उन्हें हँसते हुए देखने का मतलब था कि उस दिन कोई चमत्कार घटा है।
अफ़ाक मियाँ ऐसे लड़कों में से थे जो दुनिया में आते हीअपनी जगह गलत चुन लेते हैंजैसे ाफाइल बनाते समय अल्लाह मियां की कलम हिल गई हो। उनके चेहरे की खोखली हड्डियाँमानो भीतर की सारी उम्मीदें सोख चुकी थीं।पर आँखें?
आँखें हमेशा काँपती रहती थीं—जैसे हर पल दुनिया उन्हें पकड़कर पूछेगी—
“क्यों रे? तू यहां क्या कर रहा है ?”
उनकी पूरी दुनिया दो चीज़ों से बनी थी—
नुक्ता और नैतिकता।
किसी शब्द में नुक्ता न लगे तो उन्हें , लगता था जैसे कोई मुसलमान गंगा में डुबकी मारते हुए भजन गाने लगा हो — लाहौल बिल कूवत बिना नुक्ते के शब्द सोच के ही दिल घबराने लगता था उनका
और नैतिकता ऐसी कि दुनिया में जो कुछ भी दिखता उसे देख कर वे लाहौल पढ़ने लगते उनके लिए इस दुनियां को यह के रहने वालों ने एक लानत बना रखा था
हर दिल टूटे हुए आदमी की किस्मत में एक न एक ऐसा दोस्त लिखा ही जाता हैजो उसकी जिंदगी को थप्पड़ मार-मारकर हँसी में बदल देता है।अफ़ाक की जिंदगी में वह शख़्स था — गजेन्दर ठाकुर।
गजेन्दर का कद छह फीट दो इंच,आवाज़ में गूँज ऐसी कि पंचायत का पंच भी चुप हो जाए, और आत्मविश्वास इतना कि वह समोसा खाते-खाते भीकिसी सभा का भाषण दे सकता था।।गजेंद्र की बोली में मिठास कम, मसाला ज्यादा रहता था ।वह आदमी भीतर से जैसे धूप का गोला था—जहाँ जाता, वहाँ रोशनी और बकचोदी फैल जाती।
कहते हैं हर दोस्ती में दो लोग होते हैं—एक जो जोर से हँसता है,और दूसरा जो हँसते हुए भी मन ही मन रोता है।
अफ़ाक मियाँ दुसरे वाले थे —पूरे कॉलेज के इकलौते ऐसे युवक,
जो मज़हबी तौर पर कट्टर मुसलमान,
सिद्धांतिक तौर पर उदास इंसान,और व्यवहारिक तौर पर हास्यास्पद टारगेट बने रहते थे।
उनकी जिंदगी तीन चीज़ों पर टिकी थी—नुक्ता, नियम, और निराशा।
और तीन चीज़ें उनके नियमों को रोज तोड़ती थीं—
गजेन्दर ठाकुर, गजेन्दर ठाकुर, और गजेन्दर ठाकुर।
उस दिन दोपहर को हवा में हल्की-सी बदमाशी थी।
कालेज के गेट पर भीड़ थी,
और ठीक सामने लगा था एक बड़ा-सा रंगीन पोस्टर,
जिस पर लाल मार्का A चमक रहा था—
जैसे किसी ने लाज पर तमाचा मार दिया हो।
पोस्टर में हीरोइन का दुपट्टा उड़ रहा था
और हीरो का हाथ कुछ ज़्यादा ही नीचे की तरफ बढ़ा हुआ था।
गजेंद्र ने पोस्टर देखा नहीं,
पोस्टर ने गजेंद्र को देखा था—
और वह हँस पड़ा।
जैसे ही अफ़ाक मियाँ ने देखा,
उनके भीतर का पूरा इस्लाम, नैतिकता, शरीयत, हदीस, हाफ़िज़ —
सब एक ही साथ कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए।
अफाक की आँखें गोल चश्मे के पीछे फैलती चली गयीं।
भौंहें उठीं।
नथुने फूल गए।
और चेहरा वैसा बन गया जैसे किसी ने
उनके सामने बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई में
हिंदुस्तानी क्लासिकल की जगह
डिस्को लगा दिया हो।
वे असहज होकर बोले—
“देखिए गजेंदर भाई… कितना फालतू फिलिम लगा है। और उनके चेहरे परएक ही स्थाई भाव था असहजता,
असुरक्षा और शर्म का संयुक्त पैकेज।
पोस्टर को देखते हुए उन्होंने दुआ जैसी आह भरी “या खुदा, फट जाय यह धरती… हम समा जाएं उसमें।”
पर धरती और अल्लाह दोनों उनके नाटक समझते थे—
कुछ नहीं हुआ।
गजेन्दर को पोस्टर पर लगी हसीना में ही नहीं,अफ़ाक की आँखों में उठती परेशानी में भीएक किस्म का मनोरंजन दिखता था।
गजेन्दर ने खैनी मसलते हुए कहा—
“चल न, देख आव। डुरांड में इससे भी बढ़िया वाला लगा है।”
अफ़ाक झुँझलाए—
“लाहौल विलाकूवत! कैसी बात कर रहे हैं आप , इतना घिनौना फिलिम!फिलिम तो सिर्फ एक बनाय गए हैं—मुग़ल-ए-आज़म!”उन्होंने ग़ को ऐसे बोला बोला क्या टांक दिया जैसे ग एक फतवा हो और यह ग़ैरत का मुद्दा हो।
गजेन्दर ने ठहाका लगाया —“अरे बकलोल, A पोस्टर से डरता है?
अरे पोस्टर देखने से पाप हो जाता,तो पूरा शहर जहन्नुम में जाता!”
चल देख कर आते हैं
अफाक कूद पड़े—
“लाहौल विला कूवत!
कैसा बात कर रहे हैं गजेंदर भाई?
ई सब फिलिम देखते हुए कोई देख लेगा
तो क्या कहेगा?”
गजेंद्र ने अफाक के कंधे पर हाथ मारा—
“ए अफाक, करबा लड़बकई…
और गंभीर दार्शनिकता में उतरते हुए कहा—
“देख, खाली शेक्सपियर पढ़ने से नहीं होता है।
जीवन में सेक्स नहीं होगा तो पीयर हो जाओगे। समझा? पीयर! यानी पीला ,येलो येलो डर्टी फेलो।और शेक्सपियर ही बोले हैं—
‘कावर्डस डाई मेनी टाइम्स बिफोर देयर डेथ।’
घुट-घुट के मत जिओ।
लोग क्या कहेंगे—
लोगवा तबे न देखेगा तुमको
जब वो खुद भी वहाँ होगा!”
अफाक ने ऐसे देखा
जैसे गजेंद्र ने अभी-अभी
कुरान की किसी आयत को उल्टा सुना दिया हो।
फिर वही हुआ जो हमेशा होता था—
छः फीट का गजेंद्र
साढ़े चार फीट के दुबले-पतले अफाक को
घिसियाता हुआ ले गया।
“पी.के.डी. का लेक्चर छूट जाएगा…”
अफाक ने आखिरी कोशिश की।
“छूटेगा तो छूटे।
एक क्लास गोल करके सिनेमा नहीं देखा
तो जिंदगी अधूरी रह जाएगी।
चल!”
और अफाक ने कलेजे पर पत्थर नहीं—
पूरा
पहाड़ रख लिया।
सिनेमा हॉल में घुसते ही
अंधेरा ऐसा लगा
जैसे किसी ने अफाक की आत्मा पर चादर डाल दी हो।
गजेंद्र ने बगल में बैठे बूढ़े से पूछा—
“फिलिमियाँ कितना देर पहले शुरू हुआ चचा?”
बूढ़ा बोला—
“अभी सीन नहीं निकला है।”
अफाक फुसफुसाए—
“इसको मालूम है कौन सीन?”
गजेंद्र हँसे—
“हियाँ सबके मालूम है कौन सीन।
तुमही बकलोल हो!”
फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ी,
अफ़ाक का चेहरा और सफेद होता गया।
सीन आने से पहले ही उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
आँखों पर चश्मा धुंधला गया।
और अचानक वह उठा—
थैली सीने से चिपकाई—
सीढ़ियाँ लाँघता हुआ बाहर भाग आया।
गजेंद्र पीछे से चिल्लाया—
“ए अफकवा! भाग कहाँ रहा है?”
पर अफ़ाक सुन कहाँ रहा था।
पता नहीं पर्दे पर क्या दिखा,
या उसके भीतर क्या टूटा,
पर अफाक की आँखों में जो दहशत थी
वह किसी बम विस्फोट से कम नहीं थी।
वह तेजी से हाफ रहा था जैसे कोई बड़ा गुनाह हो गया हो और अल्लाह ताला उसे कभी माफ करने वाले नहीं थे । जैसे ता क़यामत पश्चाताप की आग में जलना था और फिर जहन्नुम की आग में ।
दिन गुजरते रहे एक दिन अफ़ाक कॉलेज के पुराने बरगद के नीचे बैठा था। उसके सामने नोट्स खुले थे, नज़रें पन्नों पर टिकी हुई थीं।
तभी सामने वाली पगडंडी पर हल्का-सा हलचल हुआ—पहले बस एक छाया चली, फिर कपड़ों की सरसराहट, और फिर वह आवाज़ जिसे सुनते ही अफ़ाक के मन में अचानक किसी ने घंटियाँ बजा दी हों।
शहनाज़।
नए सत्र की छात्रा, लेकिन जैसे किसी पुराने किस्से की पुनरावृत्ति।
हल्के नीले सूट में लिपटी, बेहद सादा लेकिन अद्भुत संतुलन वाली चाल। आंखों में कुछ ऐसा ठहराव था जो सीधे किसी की रूह तक पहुँच जाए—न तेज़, न धीमा; बस इतना कि आसपास की हवा भी एक पल को ठहर जाए।
उसके आते ही बरगद के नीचे का समूचा परिसर जैसे रंग बदलने लगा।
लड़के एक-दूसरे को कोहनी मारकर फुसफुसाए, लड़कियाँ मुस्कुराते हुए उसकी सजगता को देखती रहीं। लेकिन अफ़ाक… वह उस क्षण किसी भी भीड़ का हिस्सा नहीं था। उसके भीतर जैसे किसी ने पर्दा हटा दिया हो और वह पहली बार किसी चीज़ का असली रूप देख रहा हो।
शहनाज़ ने बरगद के पास खड़े नोटिस बोर्ड की ओर देखा। उसकी उंगलियाँ हल्के से कागज़ को छू रही थीं; जैसे वह किसी निर्जीव वस्तु में भी अर्थ ढूंढ लेती हो। उसके बाल कंधे पर बिखरते थे और धूप उन पर सुनहरी धारियों जैसा रेखांकन करती थी।
अफ़ाक ने पहली बार महसूस किया कि कविता क्या होती है।
वह कोई पंक्ति नहीं थी, वह एक दृश्य था।
और वह दृश्य उसके भीतर उतरकर हलचल मचाने लगा था।
अफ़ाक ने चाहा कि उठकर पूछ ले—
“क्या तलाश रही हैं?”
लेकिन उसके होंठ जैसे शब्दों को अपने भीतर ही कैद किए हुए थे।
एक अजीब-सी बेचैनी उसके सीने में जमा हो रही थी—
न डर, न झिझक, बल्कि एक गहरा-सा विस्मय कि कहीं वह इस शांति को तोड़ न दे।
शहनाज़ ने अचानक मुड़कर बरगद के नीचे बैठे अफ़ाक की ओर देखा।
नज़र बस एक क्षण मिली—
लेकिन वही क्षण उसके भीतर एक साल जितना भारी उतर गया।
अफ़ाक पल भर को स्तब्ध रह गया।
उसकी उंगलियों में पकड़ा पेन धीरे से गिर पड़ा।
पन्नों पर एक तिरछी रेखा खिंच गई जैसे उसने उसके मन की उलझन का नक्शा खींच दिया हो।
वह चल दी—
सड़क की ओर, कक्षा की दिशा में, या शायद उस भविष्य की ओर
जहाँ अफ़ाक चुपचाप अपने दिल की लड़ाई लड़ने वाला था।
उसके जाते ही हवा फिर से हिलने लगी,
लेकिन अफ़ाक जान गया था—
उसकी बेचैनी अब शोर नहीं,
एक स्थायी निवास बनकर उसके भीतर बसने वाली है।
कुछ लोग जीवन में प्रवेश नहीं करते घुसपैठ करते हैं—दिल की बारीक खिड़कियों से। शहनाज़ वही थी।
कॉलेज की कैंटीन हमेशा शोर से भरी रहती थी—चाय की गाढ़ी महक, भुने हुए ब्रेड के टुकड़ों की खुशबू, स्टील के गिलासों की ठक-ठक, और छात्रों की अनगिनत आवाज़ें।
लेकिन उस दिन माहौल में एक अलग-सी गहमागहमी थी। कारण?
शहनाज़।
नया सत्र, नई लड़की, और वह भी इतनी ख़ूबसूरत
कैंटीन में मौजूद हर नज़र उधर बार-बार लौट जाती
अफ़ाक हमेशा की तरह कोने वाली टेबल पर बैठा था—वही जगह जहाँ से वह कॉलेज का आधा संसार देख लेता था लेकिन खुद किसी की नज़र में नहीं आता था।
छट्ठू और प्रेम नारायण उसके दोनों ओर बैठे हुए थे।
छट्ठू की आदत थी कि वह हर माहौल को किसी न किसी मज़ाक की शक्ल दे देता।
सादा मन वाला प्रेम नारायण, जो अपनी सीधी बातों से ही उलझनें पैदा कर देता था।
और तीसरा था उमेश—जो कॉलेज की हर बातचीत का ‘तथ्य विभाग’ था।
तीनों अफ़ाक के दोस्त, और तीनों को अफ़ाक की बेचैनी सूंघने में देर नहीं लगी।
शहनाज के हाथ में कुछ नोट्स थे और चेहरे पर उतनी ही हल्की उलझन—कैंटीन में जगह खाली नहीं दिख रही थी ।
प्रेम नारायण ने अफाक के कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा,
“अफ़ाक, तुम चाहे तो तुम्हारी किस्मत आज जगाई जा सकती है ”
लेकिन अफ़ाक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पर धड़कने इतनी तेज हो गईं थी कि बाहर आसानी से सुनी जा सकती थी ।
उमेश ने भी बहुत गंभीर होकर कहा—
“देख, अगर अभी हमसे बात नहीं की और एक सौदा तय नहीं किया
तो ‘याद रख—इतिहास गवाह है—’ लड़की दोबारा यहाँ नहीं आएगी!”
अफ़ाक का चेहरा लाल हो चुका था ।
तीनों ने टेबल के नीचे पैर टकराते हुए एक अघोषित योजना बनाई।
फिर छट्ठू ने अफ़ाक की ओर झुककर कहा—
“सुन भाई, जितनी देर वो तेरे पास बैठी रहेगी,
उतनी देर हम कैंटीन में खाने-पीने का बिल तेरे अकाउंट पर डालते रहेंगे।”
अफ़ाक चौंका—
“क्या बकवास है? क्यों??”
उमेश मुस्कुराया—
“क्योंकि हम दिल से चाहते हैं कि वो तेरे पास बैठे रहे। ये हमारा समय है जो हम उसे दे रहे हैं तुम्हारे साथ, तो इसकी एक कीमत होगी न
प्रेम नारायण ने बात को अंतिम मुहर देते हुए कहा—
"ये रिश्वत एक भावनात्मक निवेश है।
हम तुम्हारे प्यार को बढ़ावा दे रहे हैं…
और बदले में—सिर्फ समोसा, चाय और एक दो प्लेट मंचूरियन।”
अफ़ाक ने आँखें तरेरीं लेकिन बोल नहीं पाया।
अगर मना करता… तो शहनाज़ शायद कहीं और चली जाती।
अगर हाँ कहता… तो दोस्त कंगाल कर देते।
उसकी खामोशी देखकर छट्ठू ने उठते हुए झट से वेटर को इशारा किया—
“भाई, 3 चाय… 3 सैंडविच… और जो अच्छा हो, सब उधर ले आओ।
बिल भाई अफ़ाक पर डाल देना।”
वेटर मुस्कुराने लगा। शहनाज खड़ी थी । ये 3 भी टेबल से खड़े हो चुके थे और जगह खाली कर दी थी । शहनाज उधर बढ़ चली
शहनाज़ टेबल पर पहुँची और हल्की सी शर्माते हुए कहा—
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?
अफ़ाक हकलाया—
“ह… हाँ, बिल्कुल। बैठिए।”
छट्ठू ने दूर से अफ़ाक को इशारा किया
ऐसा मौका रोज़-रोज़ नहीं मिलता। बात कर
शहनाज़ बैठीथी
नोट्स टेबल पर रखे थे
उसने अफाक से पूछा
“तुम्हें कहानी पढ़नी पसंद है?”
“हाँ… थ…थोड़ी।”
अफ़ाक हकलाया।
“है तो मुझे भी। लेकिन मेरी मम्मी कहती हैं, ‘कहानियां छोड़ो, डॉक्टर बनो।’”वह हँसी,
और अफ़ाक को लगा कि किसी ने उसके पत्थर जैसे दिल पर
एक गर्म हथेली रख दी हो।
उस दिन के बाद शहनाज़ उसकी दोस्त बन गई।
सीधी-सादी, हँसने में तेज, बोलने में और तेज।
वह उसके जीवन में घुल गई—
धीरे, अनजाने, और दुर्घटनावश।
और अफ़ाक भूल गया कि वह अफ़ाक है—
वह सोचने लगा कि शायद वह भी किसी कहानी का
नायक बन सकता है।
दिन बीतने लगे अफाक और शहनाज कई बार साथ दिखते
क्लास में जब शहनाज़ नोट्स मांगती—अफ़ाक को पसीना छूट जाता।वह खुद में सिमट जाता,पर भीतर कहीं बहुत गहरा स्नेह उमड़ता—जिसे वह किसी से बोल नहीं सकता था।
गजेन्दर कहता—
“अफ़ाक, मानो या न मानो…
शहनाज़ तुमसे बेहद मोहब्बत करती है।”
प्रेम नारायण तुरन्त काट देता—
“अगर इससे मोहब्बत करेगी तो हमको यक़ीन हो जाएगा कि,मोहब्बत वाकई आंधी होती है ।”
सब हँसते।
अफ़ाक नहीं।
उसकी मुस्कान हमेशा आधे रास्ते में मर जाती थी।
वह शहनाज़ को पसंद करता था…
शहनाज़ ऐसी लड़की थी जिसकी मुस्कान में किसी पुराने ज़माने का रेडियो बजता था—थोड़ा खड़खड़ाता, थोड़ा प्यारा, थोड़ा धुआँ-धुआँ।
और अफ़ाक?
वह उस रेडियो को हर शाम घर ले जाकर ठीक करने की कोशिश करने वाला व्यक्ति था
अफ़ाक और शहनाज़ की दोस्ती किसी फिल्मी नायक–नायिका वाली चमकीली घटना नहीं थी।
यह धीरे-धीरे ऐसे पनप रही थी —जैसे बरसात के बाद काई चुपचाप पत्थर पर उग आती है।और किसी को पता भी नहीं चलता कि कब वह पुराना पत्थर हरा हो गया।
अफ़ाक के लिए, शहनाज़ समुद्र थी
कभी शांत, कभी लहरों में डूबी,
और कभी इतनी दूर कि नाव भी वहाँ तक न पहुँच सके ।
अफ़ाक ने कभी ज़ोर से नहीं कहा कि वह शहनाज़ से प्रेम करता है।
वह बस उसे जीता था।
साँस की तरह।
धीमे, बेआवाज़, बिना दावा किए।
और शहनाज़?
वह उसे पसंद करती थी—
बस उतना जितना एक इंसान दूसरे को पसंद करता है
जब वह समय बिताने की अच्छी कंपनी हो।
अफ़ाक शहनाज़ को पूरे ब्रह्मांड की तरह देखता था।
वह हर बात में शहनाज़ खोज लेता था—
चाय में उठती भाप में उसकी मुस्कान,
बारिश में गिरती बूंदों में उसका नाम,
कभी-कभी तो रात की खामोशी में उसके बिना कहे वाक्य।
उसका प्रेम एक जंगल था—
घना, उलझा हुआ, और ख़ामोश।
शहनाज़ इस गहराई से अनजान नहीं थी…
पर वह उस जंगल में कभी उतरी ही नहीं।
वह बस किनारे-किनारे चलती रही
जैसे लोग किसी सुंदर बगीचे को दूर से देखकर लौट जाते हैं।
शहनाज़ उसे याद करती थी—
लेकिन सिर्फ़ तब,
जब उसे कोई बात कहनी होती,
जब उसका मूड खराब होता,
या जब कोई कठिनाई आ जाए
वह जानती थी कि अफ़ाक हमेशा सुन लेगा।
हमेशा सह भी लेगा
हमेशा तत्पर भी होगा वह सब करने के लिए जो शहनाज को चाहिए
कई बार वह कहती—
“अच्छा हुआ तुम हो। वरना मैं इतनी बातें किससे करती?”
अफ़ाक मुस्कुराकर कहता—
“हाँ, मैं तो सरकारी सुविधा हूँ—24 घंटे खुला।”
दोनों हँसते,
अफ़ाक को पता था कि शहनाज़ उसे उस तरह नहीं देखती।
उसे शायद यह भी पता था कि वह कभी नहीं देखेगी।
लेकिन प्रेम बौद्धिक निर्णय नहीं है,
वह तो मन की बीमारी है
वह कई रातें जागकर सोचता—
“क्या मैं उसके लिए ज़रूरी हूँ?”
और हर रात जवाब आता
“नहीं। लेकिन तुम फिर भी रहोगे,
क्योंकि यही तुम्हारी नियति है।”
उसने यह दर्दकभी किसी को नहीं बताया।
शहनाज़ अपने सपनों,अपनी पढ़ाई,अपने परिवार,
और अपनी महत्वाकांक्षाओं में व्यस्त थी।
अफ़ाक उसके जीवन का फुटनोट था—
जरूरत पड़ने पर पढ़ लिया,नहीं तो छोड़ दिया।
वह अफ़ाक की भावनाओं को समझती थी,
लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं कर पाती थी।
क्योंकि उसके जीवन में अफ़ाक “मुख्य पात्र” नहीं था।
और अफ़ाक की त्रासदी यही थी—
वह अपने सपनों में शाहनाज का नायक बना हुआ था
लेकिन शहनाज़ की कहानी में वह केवल एक पैराग्राफ से ज़्यादा नहीं था।
अफ़ाक का प्रेम पहाड़ था। और शहनाज़ क एक हल्की हवा।
पहाड़ उम्मीद करता रहा,और हवा गुज़रती रही।
अफाक अपने मन में उस हर शब्द को सहेज लेता जो शहनाज उससे कहती,लेकिन शहनाज उन पलों को ऐसे छोड़ देती जैसे हवा में उड़ते हुए कागज़ के टुकड़े।
वह अफाक से बातें करती थी, हँसती थी, कहानियाँ सुनाती थी—
लेकिन अफाक के लिए नहीं।
बस इसलिए कि दुनिया में कुछ लोग बोलने के लिए किसी भी कान की तलाश में रहते हैं।
अफाक वही कान था।
इस तरह के प्रेम की सबसे खतरनाक बात यह है कि
जिसे तुम प्रेम कहते हो,
वह दूसरे के लिए सिर्फ “अच्छी दोस्ती” होती है।
शहनाज़ अफ़ाक को अपना “अच्छा दोस्त” समझती थी—
इतना अच्छा कि कभी-कभी उसके परिवार के झगड़ों की बातें भी उससे कर लेती थी,
अपनी हँसी, अपनी शिकायतें, अपने मन की उलझनें सब कह देती थी।
अफ़ाक उसे सुनता रहता ।कुछ लड़कियाँ अनजाने में वक़्त काटती हैं,
और कुछ लड़के अनजाने में दिल गँवा बैठते हैं।
अफ़ाक इन्हीं लड़कों में से एक था।
शहनाज़ क्लास में बैठकर अफ़ाक से पेन माँगती।
वह उसके नाम का “A” बड़े सुंदर तरीके से अपनी कॉपी में लिखती।
अफ़ाक सोचता—
“ये प्यार का संकेत है।”
एक दिन शहनाज कॉलेज के गेट पर खड़ी थी
अफ़ाक पास गया।
उसने देखा कि वह किसी के साथ बात कर रही है हँस रही है—
एक खास तरह की हँसी।
वह हँसी जो वह कभी अफ़ाक के साथ नहीं हँसती थी।
वह शायद उसे कॉलेज छोड़ने आया था । अफाक कुछ दूर रुक कर उन्हें देखता रहा । थोड़ी देर बाद शहनाज ने उसे मुस्कुराते हुए विदा कर दिया और कॉलेज के अंदर आ गई ।
अफाक को देख कर वह मुस्कुराई थी पर अफाक ने महसूस किया यह मुस्कुराहट वैसी नहीं थी जैसी उसने अभी कुछ देर पहले देखी थी ।
कौन था
अफ़ाक ने पूछा।
“अरे एक दोस्त है, मेडिकल की तैयारी करता है… बहुत ब्रिलियंट है।”
उस दिन पहली बार अफ़ाक को महसूस हुआ कि
दुनिया में “ब्रिलियंट” होना “अच्छा इंसान” होने से ज्यादा मायने रखता है।
और वह ना तो ब्रिलियंट था,
ना ही बहुत खास।
वो तो बस ऐसा ही था से खुरदुरा सा अजीब
अब वो इंटेलीजेंट अक्सर शहनाज को छोड़ने आने लगा था वे काफी देर तक गैलरी में बैठ कर बातें करते रहते । शहनाज ने अफाक को उस से मिलवाया था
डॉ़ आसिफ़।
अफाक को उस दिन समझ आया था कि शहनाज जो खूबसूरत सा A बनती थी वह अफाक के लिए नहीं था आसिफ के लिए था ।
वह उसके लिए “इंस्पिरेशन” था।
अफ़ाक के लिए वह “प्रतिस्पर्धा” भी नहीं था—क्योंकि वह जानता था कि वह उस लड़के के बराबर खड़ा होने लायक भी नहीं।
एक दिन शहनाज़ ने धीरे से कहा—
“अफ़ाक… मैं चाहती हूँ कि मैं किसी डॉक्टर से शादी करूँ।
है न अच्छा आइडिया?”
उसने हँसने की कोशिश की।
“बहुत… अच्छा।”
लेकिन उसकी आवाज़ में कहीं भी “अच्छा” जैसा कुछ नहीं था।
उसी रात घर लौटकर तकिए में मुंह दे कर रोया था
“क्यूँ दिल ऐसे लोगों पे आता है जिनके पास तुम्हारे लिए दिल ही नहीं होता?”
शहनाज़ और डॉक्टर आसिफ की सगाई की ख़बर आई।
शहनाज़ ने खुद उसे बताया था
“अफ़ाक, तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो इसलिए तुमको सबसे पहले बता रही हूँ।
तुम खुश हो न?”
अफ़ाक ने कहा—
“हाँ… बहुत।”
लेकिन दोनों बार शब्द झूठ थे—
कहने में भी,
और उसके सुनने में भी।
उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि
ज़िंदगी में कुछ लोग सिर्फ संपर्क होते हैं
और कुछ आदत बन जाते हैं।
शहनाज़ उसके लिए आदत थी
एक ऐसी आदत जो छूटती नहीं
और जिस पर कोई अधिकार भी नहीं।
उस दिन
अफ़ाक का प्रेम मर गया था—
चुपचाप,
बिना शवयात्रा,बिना शोक-सभा,
बिना किसी सांत्वना के।
वह दिखा रहा था कि उसे फर्क नहीं पड़ता,
लेकिन उसी रात उसने सड़क पर निकलकर खुद से पूछा—
“क्या मैं बेवकूफ हूँ? जो मेरा नहीं है, उसे अपना मान बैठता हूँ?”
कुछ दिनों बाद उसके हाथ में शहनाज़ की शादी का कार्ड था—सफेद, चमकदार, सुरुचिपूर्ण, बिल्कुल शहनाज की तरह।
ऊपर गुलाबी उर्दू में लिखा था—
शहनाज़ और डॉ. आरिफ़
बस इतना।
अफ़ाक का नाम कहीं नहीं था—ना मेहमानों की सूची में, ना दावतनामे में, और शायद… जिंदगी की किसी भी सूची में।
वह कार्ड को देखते-देखते अचानक हँस पड़ा।लेकिन यह हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी वह हँसी थी भी नहीं—वह सिर्फ आँसुओं का मुखौटा थी ।उसने महसूस किया उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे ।
उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि प्रेम किसी का नहीं होता—
बस एक तरफा बोझ होता है, जो उठाने वाले की कमर तोड़ देता है।
उस रात, दिल के मलबे में बैठा अफ़ाक खुद से लड़ रहा था—
वह इतना महान नहीं था कि आसानी से भूल जाए,
और इतना क्रूर भी नहीं था कि शहनाज़ से नफ़रत कर सके।
वह शहनाज की शादी में गया था वह लाल दुपट्टे में, हल्के मुस्कान के साथ, डॉक्टर के पास बैठी हुई—उसकी मुस्कान में वह स्थिरता थी जो अफ़ाक में कभी थी ही नहीं।
अफ़ाक को नहीं पता चला कि उसकी आँखें कब गीली हो गईं।
एक लंबा समय था जब वह खुद से कहता रहा था
“हम दोस्त हैं… लेकिन शायद उससे थोड़ा ज़्यादा भी।”
लेकिन आज उस भ्रम ने अपने कपड़े बदल लिए थे और आइने के सामने खड़ा हो गया था—नंगा, झूठा, क्रूर।
उसे रोना नहीं आ रहा था।बस एक खालीपन महसूस हो रहा था, जैसे वह कोई बर्तन हो जिसे किसी ने अंदर से खुरच कर साफ़ कर दिया हो—और अब वह सिर्फ बज रहा था।
“क्या मैं सच में उसके लिए इतना ही गैर–जरूरी था?”
यादें उसके दिमाग में लैंप की तेज़ रोशनी की तरह झिलमिला उठीं—
कैंटीन के वो दोपहरें…
रामज़ान के समोसे…
शहनाज़ की वह आधी मुस्कान जो अफ़ाक को हमेशा पूरा कर देती थी।
लेकिन यही तो सच्चाई थी—
अफ़ाक पूरा था ही कहाँ और शहनाज मुस्कुरा रही थी डॉ आरिफ के लिए
उस रात अफ़ाक खुद से हजार झूठ बोलता रहा।
कभी गुस्से में, कभी दर्द में, कभी पूरी तरह टूटकर—
“एक दिन मैं इतना बड़ा आदमी बनूँगा कि शहनाज़ को एहसास होगा…
कि उसने कुछ खो दिया।”
यह वह वाक्य था जो दुनिया के लाखों एकतरफ़ा प्रेमियों ने अपने दर्द की दीवार पर कोयले से लिखा है।
मगर अफ़ाक इसे सच मानना चाहता था।
क्योंकि सच मान लेने से दिल का दर्द थोड़ी देर के लिए मुल्तवी हो जाता है।
वह कभी डॉक्टर बनने का सपना देखता, कभी IAS, कभी प्रोफ़ेसर… वह बस ऐसा कोई बनना चाहता था जिसे देखकर शहनाज़ की आँखें पलटें और भर आएँ।
लेकिन तभी एक और आवाज़ उठती—
“तो क्या मेरी कीमत सिर्फ उसकी नज़रों से तय होगी?”
अफाक उस शाम बहुत देर तक कमरे के कोने में बैठा रहा। बाहर वही पुराना शहर था—दुकानों के नीले-पीले बल्ब, मोड़ पर खड़े धूल भरे रिक्शे, पान की दुकानों के सामने जमघट और वे चेहरे जिनमें वह अपना भविष्य ढूँढता-ढूँढता थक चुका था। लेकिन आज कुछ अलग था। शहर उसे पहली बार ऐसा लगा जैसे कोई पुराना जख्म, जिसमें से बदबू उठ रही हो,
शहनाज़ की शादी हो चुकी थी।
और वह भी एक डॉक्टर से—सलीकेदार, स्थिर, साफ़-सुथरी ज़िंदगी वाले व्यक्ति से और वह जैसेदुनिया को उसकी कोई जरूरत नहीं थी वह बिल्कुल अनवांटेड था दो छोरों के बीच उसका मन टूटता और जुड़ता रहता—गुस्सा और अजीब-सा आत्मतिरस्कार।
एक तरफ एक ऐसा आदमी, जिसकी जेब में भरोसा था और आँखों में सुरक्षा।अफाक की आँखों में बस सपने थे — आधे टूटे, आधे धुंधले, और आधे हँसी उड़ाने लायक।
शहनाज़ की तस्वीर उसकी आँखों से हट नहीं रही थी,
बिस्तर पर लेटे अफ़ाक ने करवट बदली, कंबल अपने सीने से कसकर चिपकाया और छत को घूरने लगा।
उसे नींद नहीं आई थी—
लेकिन अजीब बात ये थी कि वह सोया भी नहीं था और पूरी तरह जागा भी नहीं।
उसके भीतर एक उथली-सी परत में शोर था—
“कुछ नहीं कर पाया…”
शहनाज चली गई”
“एक बार पलट कर भी नहीं देखा…”
“मैं किसके लिए जी रहा हूँ?”
बाहर से देखो तो वह शांत था—जैसे कुछ सोचा ही न हो।
लेकिन अंदर—अंदर अफ़ाक अपनी ही चुप्पी में फँस चुका था।
वह उठ कर बैठ गया फर्श इतना ठंडा था कि पैर सुन्न हो गए, लेकिन चेहरा निर्विकार। उसने डायरी खोली।
कलम हाथ में ली।
और हर दिन की तरह अपने मन की आग बाहर उड़ेलने का सोचा।
लेकिन आज डायरी ने खुद उससे सवाल पूछ लिया—
“लिखकर क्या बदलेगा?”
कलम उसके हाथ से छूट गई।
कमरा खाली था… लेकिन खालीपन में एक अजीब-सी सघनता थी।
अफ़ाक ने अपने बैग से वो स्ट्रिप निकाली—
जिसे वह हमेशा “कभी नहीं खाऊँगा” कहकर रखता आया था।
लाइट बंद कर दी।
डेस्क वाली टेबल लैंप जला छोड़ी—बस हल्की रोशनी।
कमरे में हवा चल रही थी लेकिन वह स्थिर बैठा हुआ था, जैसे किसी निर्णय की मिट्टी से ढला हुआ पुतला।
उसने खिड़की से बाहर देखा—और पहली बार उसने खुद से यह सीधा सवाल पूछा—
“क्या मैं किसी के लिए ज़रूरी हूँ?”
सवाल इतना भारी था
कि उस रात उसका जवाब देने वाला कोई नहीं था।
उसने स्ट्रिप खोली।
एक गोली निकाली।
पानी का गिलास भरा।
और बिना एक्सप्रेशन के खा ली।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
फिर चौथी।
—जैसे वह कुछ कर ही नहीं रहा, बस समय काट रहा है।
न कोई रोना, न चीखना, न नाटक।
बस एक नीरस, शांत, भयावह स्वीकार
डायरी उसने दोबारा खोली।
लिखा—
मैं अब थक चुका हूँ। शायद जीवन से नहीं—अपने ही भीतर की उस आवाज़ से, जो हमेशा कहती रही कि “शायद शहनाज़ लौट आएगी।”
कैसा अजीब आदमी हूँ मैं—मैं जानता था कि वह मेरी नहीं थी, कभी थी ही नहीं।
उसकी हँसी में मैं बेतुके अर्थ खोजता रहा,
उसकी नज़र के हर मोड़ में कोई इशारा ढूँढता रहा,
और जब वह चली गई…
और मैं खाली डिब्बे जैसा बजता रह गया।
मैंने कितना झूठ बोला खुद से—
कि मैं उसे भूल जाऊँगा,
कि मैं पढ़ लिख कर कुछ बन जाऊँगा,
कि कामयाबी मुझे उसकी याद से मुक्त कर देगी…
पर सच तो यह है कि कामयाबी सिर्फ़ उन लोगों को मुक्त करती है, जिनके भीतर जड़ें नहीं होतीं।
और मेरी जड़ें…मैं जितना उखाड़ना चाहता, उतना ही गहरी होती जातीं। शहनाज मेरे अंतर में है किस से मुक्त होऊंगा ।
मैं शहनाज़ से एकतरफा प्रेम करता था
वह मेरे जीवन का वह दरवाज़ा थी जिसे खोलने की चाबी मुझे कभी मिली ही नहीं,
लेकिन मैं उस दरवाज़े के सामने बैठा रहा—कितने ही दिनों तक भ्रमों के बीच।
वह चली गई।
मुझे एक अंतिम “ख़याल रखना” देकर।
कितना हल्का शब्द है—“ख़याल रखना।”
पर उस दिन से मैं अपने ख़याल ही नहीं रख पाया।
मैं जानता हूँ—
उसने कभी मुझसे कुछ वादा नहीं किया था,
कभी इशारा नहीं दिया,
कभी उम्मीद नहीं जगाई…
शायद समस्या वही थी—
उसने कुछ भी नहीं कहा,
और मैं सब कुछ समझ बैठा।
मेरे भीतर यह स्वीकारने की ताक़त नहीं है कि वह किसी और की हो सकती है।
एक डॉक्टर, एक सुरक्षित ज़िंदगी, एक व्यवस्थित संसार—
और मैं?
मैं तो एक बिखरा हुआ पन्ना हूँ,
जिस पर किसी की उँगलियों के निशान भी नहीं टिकते।
मैं उससे शिकायत नहीं करता।
वह मुझे कभी समझ नहीं पाई—
और मैं उसे कभी समझा नहीं पाया।
यही हमारी कहानी थी,
और यही हमारी गलती।
अगर क़यामत जैसी कोई चीज़ है,
कोई और दुनिया है,
कोई दूसरा जन्म है…
तो मैं उसका वहीं इंतज़ार करूँगा।
जहाँ ना हलचल होगी,
ना अकेलापन,
ना मेरे भीतर का यह हंगामा।
अगर क़यामत में हम मिलें,
तो मैं उससे बस इतना कहूँगा—
"मैंने तुमसे कभी कुछ माँगा नहीं,
पर तुम्हें भूलने का हक़ शायद मुझे भी नहीं था।"
और आज…
मैं सिर्फ़ इतना मान रहा हूँ
कि मेरा दुख किसी के लिए बोझ न बने,
किसी पर इल्ज़ाम न रहे।
यह मेरी लड़ाई थी—और मैं हार गया।
बस इतना ही।...
उसने कलम वहीं रखी।
डायरी बंद की।
लाइट बंद कर दी।
लेट गया।
और फिर कमरा…
उसकी सांसों से पहले शांत हो गया।
अगली सुबह दरवाज़ा तोड़ा गया।
लेकिन
अफ़ाक नहीं खुला।

