मंगलवार, 25 नवंबर 2025

 इस छोटे से शहर की सुबहें हमेशा धुंध में लिपटी रहती थीं, जैसे हर चीज़ किसी अनकहे राज़ के आवरण में ढँकी हो। उसी शहर के सरस्वती कन्या विद्यालय में वर्षों से अंग्रेज़ी पढ़ाती आ रही थी समीरा— शांत, सौम्य, अपने भीतर कई परतों में धँसी हुई।

उस दिन पहली बार जब नई शिक्षिका आन्या स्टाफ़ रूम में दाख़िल हुई, तो जैसे कमरे की हवा में हलचल हुई। वह ऊँचे कद की, भूरी आँखों वाली, हल्के आत्मविश्वास और गहरे संकोच का अनोखा मिश्रण थी। उसके मुस्कुराते ही जैसे कमरे की धूप कुछ और खिल उठी

आन्या ने दुपट्टे को ठीक करते हुए धीमे से कहा,

“मैं… आन्या। हिंदी पढ़ाऊँगी। 

स्कल के रोज़मर्रा के काम में दोनों अक्सर साथ रहने लगीं—परीक्षा की कॉपियाँ जाँचना, आयोजनों की तैयारी, और बीच-बीच में चाय के कपों पर बहती बातचीतें।

छोटे शहर में अकसर लोग बाहरी व्यक्तियों पर जल्दी भरोसा नहीं करते, लेकिन आन्या की सरलता ने सबका मन जीत लिया। और वहीं समीरा के भीतर कुछ धीरे से बदलने लगा था।

एक दिन बारिश अचानक टूट पड़ी। विद्यालय जल्दी छुट गया।आन्या अपनी स्कूटी पर असहाय खड़ी थी—बरसात तेज़, रास्ते अपरिचित।समीरा ने खिड़की से बाहर झाँकते हुए कहा,

“तुम्हारा घर तो बहुत दूर है… चाहो तो आज मेरे घर चलो। बारिश थमे तो निकल जाना।”आन्या ने क्षणभर संकोच किया, फिर सिर हिलाया, हाँ… ठीक रहेगा।”


बारिश हल्की हुई तो आन्या समीरा के साथ उसके घर आ गई । समीरा अकेले ही रहती थी   । घर शांत, व्यवस्थित और गर्मजोशी से भरा था—दीवारों पर किताबों की महक, हल्की रौशनी और अकेलेपन का सौम्य स्थायित्व।आन्या ने अंदर आते ही जूते उतारे और हँसकर बोली,

“आपका घर… घर जैसा लगता है। पता नहीं क्यों, मेरे लिए यह एहसास बहुत कम जगहों पर मिला है।”

समीरा ने उत्तर नहीं दिया, बस मुस्कुराई ।

उस दिन उन्होंने जो भरकर बातें की।शाम बीती। बातें गहराती चली गईं—अपनी पिछली ज़िंदगियों की छोटी-बड़ी बातों तक।आन्या खुलकर हँसती थी ।

बातें करते करते आन्या ने धीमी आवाज़ में पूछा, समीरा मैम… क्या आपको कभी लगता है कि हम कहीं फिट नहीं होते? जैसे हम किसी दूसरी दुनिया के  लोग हों?”

समीरा ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा—कुछ रुका हुआ, कुछ बहता हुआ, कुछ खोया हुआ।

हाँ… बहुत बार,” वह बोली। और दोनों जोर से हंसी 

दिन बीतते गए, पर वह शाम दोनों के भीतर कहीं अटक-सी रह गई थी। स्कूल में मिलने पर अब उनकी मुस्कानें पहले वाली औपचारिकता में नहीं ठहरती थीं—उनके बीच एक अनकहा अपनापन आकार ले रहा था। आन्या अब इस शहर  में लगभग एक महीना बिता चुकी थी। उसे स्कूल के पास कोई तरीके का घर किराए पर नहीं मिला था । स्कूल के बाद वह पहले किराए पर देखे गए घरों की ल सूची लिए, एक-एक करके जगहें देखने जाती—कहीं नमी, कहीं तंग कमरे, कहीं अनुचित बातें करता मकानमालिक। छोटे शहरों में अविवाहित महिला के लिए अकेले रहना अक्सर सुविधा से ज़्यादा शंका का विषय बन जाता है।

एक शाम, स्टाफ़ रूम लगभग खाली हो चुका था।

आन्या थककर एक कुर्सी पर बैठी थी.

“आज भी नहीं मिला?” समीरा ने धीमे स्वर में पूछा।

आन्या ने   नहीं में सिर हिलाया वह थकी लग रही थी

आन्या… तुम चाहो तो मेरे साथ रह सकती हो।”

आन्या ने चौंककर उसकी ओर देखा—अचरज और राहत की मिली हुई चमक के साथ।

आपके साथ? पर… कैसे? यह आपका घर है, आपकी दुनिया है। मैं उसमें दखल नहीं करना चाहती।”समीरा मुस्कुराई—धीमी, पर पूरी तरह सच्ची।

“तुम दखल नहीं दोगी।

आन्या ने धीरे से कहा “अगर आप सच में कह रही हैं… तो हाँ। मैं… आपके साथ रहना चाहूँगी।”

“तो कल शाम अपना सामान ले आओ,” उसने कहा, “मैं कमरे तैयार कर दूँगी।”

आन्या ने एक पल के लिए समीरा का हाथ छुआ—अनजाने में, लेकिन बेहद स्वाभाविकउस स्पर्श में  एक कोमल धन्यवाद था ।

और समीरा ने उस हल्के स्पर्श में कुछ ऐसा महसूस किया जो उसे लंबे समय बाद जीवित महसूस कराता था।

आन्या के समीरा के घर में आ जाने के बाद जीवन जैसे धीरे-धीरे एक नई लय में ढलने लगा।कोई बड़ा बदलाव नहीं था—बस छोटी-छोटी बातें, जो किसी अनकहे गीत की तरह दोनों के भीतर गूँजती रहतीं।

एक शाम, कॉलेज के बाद दोनों छत पर बैठे थे।हवा  में ठंड थी।
पेड़ धीरे-धीरे झूम रहे थे।
समीरा आन्या को देखे जा रही थी
आन्या ने धीरे से पूछा—
क्या देख रही हैं


समीरा ने उसे देखते हुए धीमी पर स्थिr आवाज में कहा 
अगर मैं तुम्हें बताऊँ कि तुम्हारे साथ रहकर ही मुझे लगता है कि मैं ज़िंदा हूँ…
तो क्या तुम्हें अजीब लगेगा?”

आन्या का दिल एक क्षण के लिए थम गया।
उसने समीरा का हाथ पकड़ा,
बहुत धीरे से—
जैसे किसी मोम की गुड़िया को छू रही हो।

“बिल्कुल नहीं  क्योंकि मुझे भी ऐसा ही लगता है 
वह पल बहुत शांत था—
और वही शांति प्रेम की सबसे गहरी भाषा होती है।
उनके हाथ एक-दूसरे में ऐसे गुंथे,मानो हमेशा से ऐसा ही होना लिखा हो।
वे दोनों देर तक बातें करती रहीं स्कूल के बच्चों, घर की छोटी-छोटी बातों और अपनी अनकही बेचैनियों की।
फिर एक लंबी ख़ामोशी उतर आई, जो किसी बोझ की नहीं बल्कि किसी गहराई की थी।
आन्या ने धीरे से कहा,
“कभी-कभी लगता है… तुम ही वह जगह हो जहाँ मैं सच में खुद को पा लेती हूँ।”
समीरा ने उसकी ओर देखा—
वह नज़र वैसी नज़र थी जो बोल देती है कि शब्द अब काफ़ी नहीं।
कमरा मानो एकदम हल्का हो गया।
समीरा ने हाथ बढ़ाकर आन्या की उँगलियाँ थाम लीं।
वह स्पर्श धीमा था, पर उसमें एक शांत आत्मविश्वास भी था—
जैसे दोनों कोई पुराना डर पीछे छोड़ रही हों।
आन्या समीरा की तरफ थोड़ा झुकी।
दोनों के माथे एक-दूसरे से टिक गए।
इस पास आने में कोई जल्दबाज़ी नहीं थी—
जैसे बरसों का विश्वास धीरे-धीरे अपनी परतें खोल रहा हो।
क्या तुमहे अपने ऊपर यक़ीन है ?
समीरा ने फुसफुसाया।
आन्या ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हारे साथ… मैं पहली बार किसी चीज़ के बारे में यक़ीन से हूँ।”
फिर दोनों ने एक-दूसरे को बाँहों में ले लिया।
उस आलिंगन में भय था, विश्वास भी था—
और वह सन्नाटा जो दो लोगों के बीच तब उतरता है जब वे अपने भीतर की दीवारें हटा देते हैं।
उनकी साँसें एक-दूसरे से मिलीं।
कमरे की रोशनी उनके चेहरों पर किसी शांत जल की तरह फैल गई।
बाहर कहीं रात और गहरी हो रही थी—
पर उनके भीतर एक कोमल गर्माहट जन्म ले रही थी।
धीरे-धीरे उनके बीच की दूरी मिटने लगी—
मानो दो अलग दुनियाएँ एक ही धड़कन की लय में बंध रही हों।
और फिर उस रात,
बिना किसी शब्द के,बिना किसी घोषणा के,
उन्होंने एक-दूसरे को पूरे मन से स्वीकार लिया।

कमरा देर तक उस शांत, नर्म निकटता से भरा रहा—
जिसमें किसी शोर की, किसी प्रमाण की, किसी परिभाषा की जरूरत नहीं होती।सिर्फ दो लोग होते हैं और प्रेम का सबसे सच्चा क्षण।



*************

प्रदीप उन गिने-चुने लोगों में था जो समीरा से वर्षों से बिना कहे समझदारी के रिश्ते में बँधे थे।वह भी उसी स्कूल में शिक्षक था—मस्तमौला, खुशदिल और अपनी हंसी में एक अजीब-सी आत्मीयता लिए हुए।समीरा और प्रदीप के बीच कोई प्रेम नहीं था, पर एक सहज अपनापन था… एक ऐसा बंधन जिसमें भावनाएँ कम और मित्रता की जड़ें अधिक थीं।फिर भी, स्कूल के सभी लोगों को हमेशा लगता कि प्रदीप की मुस्कान समीरा के लिए कुछ और नरम होती है।


आन्या के घर में रहने के बाद स्कूल में चर्चाएँ बढ़ने लगींथीं ।
समीरा इससे विचलित नहीं होती, पर प्रदीप—जो हमेशा सबसे बेफ़िक्र रहता था—एक दिन गलियारे में समीरा के साथ चलते हुए अचानक बोला,
तो… नई मैडम अब तुम्हारे घर भी रहती हैं?
वाह समीरा, तुमने तो मुझे बताया भी नहीं! तुम्हें पता है, मैं तो सोच रहा था कि वह जगह मेरे  लिए बची होगी…”
वह मज़ाक कर रहा था, पर आँखों में एक हल्की चोट छुपी थी।
समीरा हल्का हँसते हुए बोली,
“तुम बेवकूफ हो, प्रदीप। वह अकेली थी, शहर नया था… इसलिए कहा। बस।”

प्रदीप ने उसके चेहरे की ओर ऐसे देखा जैसे कुछ पढ़ रहा हो—कुछ ऐसा जो उसे दिख नहीं रहा, पर महसूस हो रहा था।
“समीरा,” उसने धीमे से कहा,
“तुमने तो मेरी जगह कोई और रख लिया। अब मैं कहाँ जाऊँ?”
उसकी आवाज़ में आधी हँसी थी, आधा सच।
मगर इस बार हँसी उसकी आँखों तक नहीं पहुँची।
समीरा एक क्षण के लिए रुकी।
वह जानती थी कि प्रदीप के मन में एक सरल, मासूम-सी चाह हमेशा रही है—जो कभी शब्द नहीं बनी।
लेकिन आज उन शब्दों ने पहली बार हवा में जगह माँगी।
वह हल्के से मुस्कुराई।
“कौन सी जगह, प्रदीप? हम सब एक-दूसरे की ज़िंदगी में अलग-अलग जगहों पर होते हैं…
चाहो तो तुम भी हमारे साथ रह सकते हो।”
मैं…?”
वह हँस पड़ा—थोड़ा हैरानी में, थोड़ा बचकाने विस्मय में।
मैं तुम्हारे घर रहूँ? और वो नई मैडम भी?
ये तो… यह तो एकता कपूर के टीवी सीरियल के जैसा सेटअप हो जाएगा!”।

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रविवार, 23 नवंबर 2025

नाटक खत्म हो चुका था । लोगों ने खड़े हो कर तालियां बजाई थिनर अब

छोटे-छोटे ग्रुप में नाटक  पर चर्चा करते हुए बाहर जा रहे थे।राजेश  मंच के कोने में खड़ा था ।उसी वक्त पीछे से एक हल्की, रेशमी-सी आवाज़ आई—

“आज अच्छा परफ़ॉर्म किया आपने।”

राजेश ने मुड़कर देखा—

इरम वहाँ खड़ी थी।

उसके बाल ढलती रोशनी में ऐसे चमक रहे थे

जैसे किसी ने हवा में काले रेशम का टुकड़ा छोड़ दिया होराजेश हल्का-सा झेंपा,

“जी बस… कोशिश कर रहा हूँ।”

इरम हँस पड़ी।

उसकी हँसी में कोई चमक थी—

मोहक… तेज… और थोड़ी रहस्यमयी।


“कोशिश?”

वह करीब आकर बोली,

“अभिनय वो कोशिश नहीं है जो मंच पर होती है।

वो तो यहाँ—”

उसने राजेश के सीने पर हल्की उँगली रखकर कहा,

“—और यहाँ होती है।”

फिर उसकी उँगली माथे की ओर गई।


राजेश के गालों में गर्मी-सी फैल गई।

उसे अचानक याद आया वह सिर्फ एक स्कूल टीचर है।

और उसके सामने खड़ी यह लड़की—

कोई साधारण लड़की नहीं।

उसकी चाल, उसकी आँखें, उसका बोलना…

सबमें एक करिश्मा था।

इरम ने पूछा,

“चाय पियोगे? बाहर वाली दुकान पर अच्छी मिलती है।

और वैसे भी…वर्कशॉप के बाद दिमाग को थोड़ा खुलना चाहिए।”

राजेश ने पहली बार बिना झिझक ‘हाँ’

 कहा—

जैसे उसके भीतर कोई दरवाज़ा खुला हो।



चाय वाले ने कुल्हड़ों में चाय डाली।

इरम ने एक कुल्हड़ उठाया और बोली,

वैसे थिएटर के अलावा क्या करते हैं आप 

जी एक स्कूल में टीचर हूं

अच्छा ,वैसे स्कूल टीचर होकर थियेटर क्यों कर रहे हो?”

उसने पूछा 


राजेश मुस्कुराया,

“शायद मैं जहां हूं वह दुनिया मुझे अधूरी लगती है।

थियेटर में…मेरी बाकी दुनिया पूरी हो जाती है।”

इरम ने चाय का घूँट लिया,

उसकी आँखें थोड़ी नरम हो गईं।

तुम अलग हो,उसने कहा।

“यहाँ ज्यादातर लोग फेम के लिए आते हैं।

और तुम किसी और वजह से आए हो…


राजेश ने पूछा,

“और आप

आप  यहाँ क्या कर रही हैं ?”


इरम ने अपने बालों को कान के पीछे किया।

उस हरकत में ही एक आकर्षण था—

नरमी भी, और आत्मविश्वास भी।


“मैं चैनल के लिए  स्टोरी करती हूँ…इस प्ले को कवर करने आई थी ,वैसे मुझे थिएटर अच्छा लगता है । इंसानी जिंदगी की कितनी कहानियां एक स्टेज पर और  कहानियाँ मुझे बहुत पसंद हैं।”

राजेश को पहली बार लगा कि वह उसे ध्यान से देख रही है—

जैसे उसकी परतों को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।

चाय की भाप दोनों के बीच उठ रही थी ।

इरम ने अचानक पूछा—

“तुम्हारी ज़िंदगी में कोई है?

मतलब… कोई खास?”


राजेश हड़बड़ा गया।

“न…नहीं ऐसा कुछ नहीं है।”


इरम ने मुस्कुराते हुए कहा,

“अच्छा है।

कभी-कभी अकेलापन भी ज़रूरी होता है।

आदमी खुद को तब साफ़-साफ़ देख पाता है।”


राजेश ने पूछा,

“और तुम्हारे जीवन में?”


इरम ने चाय पर नजरें टिकाईं फिर मुस्कुराते हुए कहा 

“मेरी ज़िंदगी में मेरे सपने हैं…

और सपने किसी रिश्ते को ज्यादा देर नहीं झेलते।”

उसे मसरूर की याद आई । जो नहीं चाहता था कि इरम एक टीवी जर्नलिस्ट रहे । रोज रोज होने वाले झगड़े मार पीतौर तलक सब कुछ उसकी आंखों में कौंध गया । उसने खुद को एक पल में स्थिर किया और 

हँसते हुए बोली,

“बाकी, दुनिया से दोस्ती कर लेती हूँ।

तुमसे भी कर ली।”

राजेश मुस्कुरा दिया—

उसने हाथ बढ़ाया,

“ दोस्त?”

इरम ने उसका हाथ थाम लिया—

उसकी उँगलियाँ गर्म थीं, मुलायम थीं।

और उस स्पर्श में एक ऐसी आत्मीयता थी

जिसने राजेश के भीतर कोई बंद कमरा खोल दिया।

“हाँ… दोस्त,”

वह बोली।

“लेकिन यह मत सोचना कि मैं साधारण दोस्ती करती हूँ।

मुझसे दोस्ती का मतलब है—

तुम्हें मेरी दुनिया में कदम रखना होगा।”

राजेश ने धीरे से कहा,

“अगर तुम्हारी दुनिया में जगह मिली…

तो मैं आऊँगा।”

इरम ने उसकी आँखों में कुछ देर तक देखा—

कुछ ऐसा जो राजेश नहीं समझ पाया।

फिर वह बोली,

“तुम्हें जगह मिलेगी…

लेकिन क्या तुम उसे संभाल पाओगे—

यह मुझे नहीं पता।”

राजेश उसे देख रहा था । अगले दिन मिलने का वादा करके वे विदा हो गए ।अलग रास्तों पर चलते हुए भीकुछ अदृश्य-सा धागा उन्हें जोड़ चुका था।

दोस्ती शुरू हो चुकी थी—ऐसी दोस्ती जिसका भविष्य उन्हें अभी नहीं पता था।


राजेश और इरम उन दिनों अक्सर गोमती बैराज के पास बैठ जाया करते थे—जहाँ नदी बहते-बहते शहर की शोरगुल को चुप कर देती थी,और हवा में शाम की वही हल्की ठंडक होती थी जो दो अनकही भावनाओं को पास लाने में मदद करती है।

उस शाम आसमान हल्का गुलाबी था।इरम अपने हाथ में कॉफी लिए राजेश को देख रही थी—एक शांत, ईमानदार चेहरे वाला लड़का जो महत्वाकांक्षा से ज़्यादा संकोच में जी रहा था।

“राजेश…”उसने धीरे से कहा,“तुम्हें पता है तुममें कितनी क्षमता है?”

राजेश ने हल्की-सी मुस्कान दी।

हां बच्चे  पढ़ा लेता हूँ, थियेटर कर लेता हूँ…और तुम्हारा दोस्त बन चुका हूं 

इरम ने बात काट दी।“तुम खुद को कम आंकते हो।

टीचर अच्छा होना बुरा नहीं है,लेकिन तुम उस भीड़ में क्यों रहना चाहते हो जहाँ तुम्हें कोई पहचान ही नहीं मिलनी?”

राजेश ने उसकी आँखों में देखा।

उन आँखों में एक ऐसी आग थी जो दुनिया से कुछ छीन लेना जानती है।

“तो?” उसने पूछा,

इरम ने कॉफी का घूँट लिया

और जैसे अपने भीतर किसी निर्णय को पक्का किया।

तुम पीएचडी करो।”

उसने कहा।

राजेश चौंक गया। पीएचडी? किस पर?”

इरम ने ज़रा झुककर,अपनी आवाज़ दबाकर कहा—देवेंद्र ठाकुर पर।”

राजेश ने स्तब्ध होकर उसकी तरफ देखा।

एक पल को लगा उसने गलत सुना।

वो मंत्री ,पर मंत्री पर क्या phd करूं मैं साहित्य का विद्यार्थी रहा हू

इरम मुस्कुराई—

उसकी मुस्कान में महत्वाकांक्षा चमक रही थी।

देवेंद्र ठाकुर  पहले  हिंदी भाषा और साहित्य के लेखक थे।

उनकी किताबें हैं, उनके नाटक, उनके कॉलम…

यह सब शोध के लिए बेहतरीन सामग्री है।

और सबसे बड़ी बात—”

वह ठहरकर बोली,

अगर तुम्हारा काम उन्हें पसंद आया…

तो तुम्हारी ज़िंदगी बदल जाएगी।”उनके अंदर एक टीस है कि लोग उन्हें अच्छा लेखक नहीं मानते 

लेकिन राजेश ने बात काटनी चाही

इरम ने उसके  हाथ पर हाथ रख दिया—

धीरे से, जैसे उसे आश्वासन दे रही हो।

“राजेश…ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे दरवाज़े खुलते हैंजो जिंदगी बदल देते हैं । 

वह रुककर बोली,

“देवेंद्र  ठाकुर की नज़र में तुम आओगे…

तुम्हें मेंटर मिल जाएगा…

और इस शहर की दीवारों पर तुम्हारा नाम लिखने में देर नहीं लगेगी।”

राजेश ने एक लंबी साँस भरी।

वह इरम के तर्कों को नकार नहीं पा रहा था।


“लेकिन इरम… राजेश बोला 

इरम का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“कभी भीड़ में खड़े रहने से कोई पहचान नहीं बनती।

तुम लेखक हो, शोधकर्ता हो, अभिनेता हो…

तुम छोटे दायरे में बंधकर क्यों जीना चाहते हो?”


वह उसे गहराई से देखते हुए बोली—

“अगर तुम मेरे होते…

तो मैं चाहती कि तुम इस शहर में चमको।भीड़ में खोओ नहीं।”


उसकी आवाज़ में एक सूक्ष्म-सी ownership थी—

एक ऐसा अधिकार जो प्रेम और महत्वाकांक्षा दोनों से आता है।


राजेश के भीतर कुछ पिघल गया।उसने पहली बार महसूस किया कि कोई उसे उसकी संभावनाओं के आईने में देख रहा है।


“ठीक है…”उसने धीमी आवाज़ में कहा। मैं सोचूँगा।”

इरम मुस्कुराई—

“सोचो मत। शुरू करो।मैं तुम्हें देवेंद्र  ठाकुर से मिलवाऊँगी।”

 वो दो दिन बाद आई और बिना किसी भूमिका के उसने कहा कि आज शाम को मिलना है मैने बात कर ली है

 इतनी जल्दी?”


“मौक़े… देर करने से हाथ से फिसल जाते हैं, राजेश।”


लखनऊ सचिवालय की उस पुरानी इमारत में जब राजेश और इरम दाख़िल हुए,तो उसे पहली बार समझ आया कि सत्ता की इमारतें सिर्फ ईंटों से नहीं बनतीं—चुप्पियों से बनती हैं,फासलों सेबनती हैंऔर उन निगाहों से बनती हैं  जो हर आते-जाते इंसान का वज़न तोल लेती हैं।

गलियारा लंबा था।दीवारों पर लगी तस्वीरें—पुराने मुख्यमंत्री, शहीद, नेता—सब मानो एक ही बात कह रहे हों:

“यहाँ कहने से ज़्यादा, न कहने का फ़न काम आता है।”

इरम चलते-चलते फुसफुसाई,

“डरो मत… बस सलीक़े से बोलना।यह आदमी बोलने से ज़्यादा देखने में यक़ीन रखता है।”

राजेश ने हल्का-सा सिर हिलाया।दिल की धड़कन ज़रा तेज़ हो गई।

इरम ने पहली बार उसका हाथ पकड़ा—

बहुत हल्के, मगर बहुत यक़ीनी तरीक़े से।

उस पकड़ में नर्मी नहीं,तैयारी थी।

एक कमरे के दरवाजे पर पहुंचते ही चपरासी  ने इरम को नमस्ते किया और  दरवाज़ा खोल दिया 

अंदर  एक बड़ी सी  कुर्सी पर   देवेंद्र ठाकुर बैठा था।

गहरी आँखें,तेज़ नाक,

और चेहरे पर मुस्कान जो पूरी मुस्कान नहीं थी—

बस उसके इशारे भर।


इरम ने धीमे से कहा,

“सर… ये राजेश हैं।

नाटकों और सामाजिक चिंतन पर रिसर्च कर रहे हैं।

आपके काम पर…”

देवेंद्र ने सिर उठाया।

एक नज़र—

सिर्फ एक।

और राजेश को लगा जैसे कोई अंदर तक झाँक रहा हो।


“अच्छा…”

देवेंद्र बोला,

आवाज़ धीमी, मगर गूंजदार।

“तुम मेरे नाटकों पर रिसर्च करना चाहते हो?”


राजेश ने संभलकर कहा,

“जी… आपका आरंभिक लेखन मुझे बेहद… दिलचस्प लगा।”

देवेंद्र मुस्कुराया।

“दिलचस्प?”

उसने शब्द लौटाया—

जैसे उसकी परीक्षा ले रहा हो।


इरम ने कहा,

“राजेश को आपकी भाषा, आपकी राजनीतिक यात्रा…

और आपकी फिलॉसॉफी बहुत आकर्षित करती है।”

देवेंद्र  ने हल्के से पूछा,

“तुम्हें भी?”


इरम मुस्कुराई—

“मैं तो आपकी किताबों पर स्टोरी कर चुकी हूँ, सर।”


देवेंद्र  ने दोनों को कुछ पलों तक देखा—

इतनी देर तक कि कमरे की हवा भारी होने लगी।


फिर वह उठा।

धीरे-धीरे कदम रखते हुए

राजेश के बेहद क़रीब आया।


“शोध… सिर्फ किताबों का काम नहीं होता,”

“शोध नफ्स को पढ़ना होता है, इंसान के भीतर के अंधेरे को,

और कभी-कभी अपने अंधेरे को भी।”

राजेश ने सिर झुकाया।

देवेंद्र एक हाथ पीछे बाँधकर बोला—

“इरम ने तुम्हारे बारे में बहुत बताया है।”


राजेश ने चौंककर इरम की ओर देखा।

इरम ने हल्की मुस्कान दी ।

देवेंद्र ने कहा,

“अच्छा है… कोई तो है जो इस लड़के में काबिलियत देख रहा है।”

उसके लहजे में

तारीफ़ कम और तंज़ ज़्यादा था।


बैठते-बैठते देवेंद्र बोला,

“अगर तुम्हें सच में काम करना है,

तो मेरे पुराने ड्राफ़्ट, किताबें ,नोट्स…

सब तुम्हें उपलब्ध करा दिए जाएँगे।”


राजेश चौंका।

“स… सच में?”


देवेंद्र  ने अपनी मुस्कान चौड़ी की,

“क्यों नहीं?

इरम ने कहा है कि तुम मेहनती हो।”


राजेश ने सिर झुकाया।

इरम अब भी चुप थी—

जैसे वह जानती हो खेल किस दिशा में जा रहा है।

देवेंद्र  ने चाय का कप उठाते हुए कहा,

“वो क्या कहते हैं नाटक वाले?

कि असली किरदार वही होता है

जिसका सच कभी सामने न आए।”

राजेश ने हौले से कहा,

“जी… जहाँ अभिनय और हक़ीक़त एक-दूसरे के भीतर छिप जाएँ।”

देवेंद्र नज़रें गड़ाकर बोला,

जिंदगी भी  एक बड़ा नाटक है।और हम सब…

अपनी-अपनी औक़ात के हिसाब से किरदार निभा रहे हैं।”

कमरे में एक ठंडी हवा सी दौड़ गई।

राजेश ने महसूस किया कि इस आदमी से डर तो नहीं,

लेकिन एक अनकहा दबाव है जैसे कोई बहुत दूर से उसके भविष्य की डोर पकड़ रहा हो।

इरम बोली“हम चलते हैं, सर।”


देवेंद्र ने इशारा किया—

“जाओ।

और राजेश…”


राजेश मुड़ा।

“इरम क़ाबिल लड़की है।

ध्यान रखना…

क़ाबिल लोग कभी किसी के इंतज़ार में ज़्यादा देर नहीं रुकते।”


शब्द साधारण थे,

मगर मानी… बहुत भारी।



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कमरे से बाहरनिकलते ही राजेश को लगा हवा अचानक हल्की हो गई है।

इरम ने उससे पूछा,

“कैसे लगे?”


राजेश कुछ क्षण ख़ामोश रहा।

फिर धीमे से बोला—

“जैसे किसी ने मुझे पूरी तरह पढ़ लिया हो…

और मैं उसके सामने बिल्कुल

 खुला रह गया हूँ।”


इरम मुस्कुराई,

“यही तो उसका हुनर है।”

कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा,

और राजेश…

यही हुनर आगे चलकर

तुम्हारी ज़िंदगी भी बदलेगा।”

राजेश देवेंद्र ठाकुर के साहित्य पर शोध करने लगा था ।  ठाकुर उसे बार बार बुलाता कभी काम की प्रगति पूछता कभी नोट्स देखता कभी कहता लिखो तुम्हारा लिखा हुआ शोध तुम्हे बहुत आगे तक ले जाएगा । 

वैलेंटाइन डे की रात अरमान ठाकुर का बंगला रोशनियों से जगमगा रहा था। लाल गुलाबों की लड़ियाँ, गज़लों की धीमी महफ़िल, और सत्ता व मीडिया की मिली-जुली महक—यह सब कुछ राजेश को एक अजनबी दुनिया जैसा लग रहा था।

इरम उस रात कुछ अलग ही चमक रही थी—काले सिल्क के कुरते में, कानों में हल्के झुमके, और होंठों पर वह मुस्कराहट जो आदमी को पहले हैरान करती है, फिर बेबस।


“राजेश, आज किसी चीज़ की फ़िक्र मत करना,” उसने काँधे पर हाथ रखते हुए कहा।

“यहाँ कोई किसी का हिसाब नहीं पूछता… बस जीना पड़ता है—थोड़ा बेपरवाह होकर।”

राजेश हल्की झिझक से मुस्कुराया।


पार्टी बढ़ती गई। देवेंद्र ठाकुर शराब के गिलास के साथ अपने समर्थकों, कविताओं और राजनीतिक रणनीतियों का मेल बिठाता घूम रहा था।

इरम कई बार उसके पास गई—कुछ फुसफुसाया, कुछ हँसी—और फिर लौटकर राजेश को आँखों से इशारा करती रही, जैसे कह रही हो देखो, दुनिया यूँ चलती है… सीखो।

धीरे-धीरे रात ढलती गई।

लगभग 2 बजे, हवा में गुलाबों की जगह शराब और महफ़िल की थकान घुल चुकी थी।

इरम पूरी तरह नशे में थी।

वह लड़खड़ाते कदमों से राजेश के पास आई,

“चलो… बहोत हो गया। 

राजेश तुरंत उठ खड़ा हुआ।

बाहर निकलते ही बंगले की रोशनियों के पीछे लखनऊ की सड़कें वीरान और ठंडी पड़ी थीं। उसने ड्राइवर और गाड़ी को जाने को पहले ही कह दिया था ।वे दोनों अब हजरतगंज की सड़क पर थे ।हवा में फ़रवरी की ठिठुरन थी, और इरम की आवाज़ में नशे की घुली हुई अज़ादी।

रिक्शा—रिक्शा!”

वह तेज़ आवाज़ में चिल्लाई।

क़रीब खड़े एक बूढ़े रिक्शे वाले ने घबराकर पीछे मुड़कर देखा।

इरम ने हँसते हुए कहा,

“हमको घूमाओ… पूरी हजरतगंज … आज की रात को यादगार बनाना है।”

राजेश ने उसका हाथ पकड़कर धीमे से कहा,

“इरम, शांत हो जाओ…   2 बज रहे हैं  चलो, पहले तुम्हें घर पहुँचाते हैं।”

ईरम ने उसकी उँगली पकड़ते हुए, आँखें मींचकर जोर से कहा,

“डरो मत राजेश… डरने से ज़िंदगी नहीं बदलती।”


रिक्शा चल पड़ा।

हजरतगंज की पीली स्ट्रीट लाइट्स एक-एक करके गुज़रती जा रही थीं।

इरम कभी हँसती, कभी हवा में हाथ फैलाकर कोई उर्दू शेर बोलती—

“ज़िंदगी क्या है…हवा का एक झोंका

कभी आग का, कभी ख़्वाब का…”

राजेश का दिल धक-धक कर रहा था।

अगर पुलिस मिल गई… अगर कोई गुंडा…

इरम को संभालते हुए उसका हाथ काँप रहा था।


आधे घंटे बाद वह किसी तरह उसे उसके घर तक ले आया।

सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इरम कई बार उस पर झुकती रही।

कमरे तक पहुँचते-पहुँचते नशा और गहरा गया था 

कमरा अँधेरे में डूबा था—सिर्फ खिड़की के पर्दे से आती स्ट्रीट लाइट की हल्की सफेद रेखा फर्श पर बिछी हुई थी।

इरम दरवाज़े के भीतर आते ही  सोफ़े पर गिर गई, उसके बाल कंधों से फिसलकर गर्दन पर आ टिके थे।

और तभी—

इरम ने उसका हाथ पकड़ लिया।

क़रीब खींचकर उसकी आँखों में देखा।

आँखें आधी नशे में, आधी किसी अनकहे खालीपन में डूबी हुईं।

"राजेश…"

उसने धीरे से उसे पुकारा।

आवाज़ नशा और थकान से काँप रही थी, पर उसमें एक अजीब सा सुकून था—जैसे किसी भरोसे की इबारत।

राजेश झिझकते हुए उसके पास आया।

इरम ने उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में थाम लिया—हथेलियाँ गर्म, काँपती हुईं।

बाहर बहुत सर्दी है…इरम फुसफुसाई,और भीतर बहुत ख़ालीपन।

कभी-कभी इंसान को किसी की मौजूदगी चाहिए होती है… बस मौजूदगी…"

राजेश ने कुछ कहना चाहा, पर इरम की उँगलियाँ उसके हाथ पर और कस गईं।

जैसे कमरा स्थिर हो गया हो—

बाहर की सड़क, पेड़, हवा… सब चुप।

सिर्फ उनकी साँसों का हल्का कंपन।

इरम ने सिर उठाया, उसकी आँखें अँधेरे में और गहरी लग रही थीं—

जैसे उनमें पूरी रात ठहरी हो।

राजेश, तुम बहुत सादे हो।

बिलकुल कच्ची मिट्टी की तरह…

और शायद यही मुझे तुम्हारी तरफ खींचता है।”

उसने धीरे से उसके कंधे पर सिर रख दिया

राजेश के भीतर कुछ पिघलने लगा था 

जैसे पहली बार किसी ने उसे इस तरह छुआ हो… बेबाक

खिड़की से आती हल्की हवा इरम के बालों को छूती, और वे बार-बार राजेश के चेहरे से लग जाते।

उसी पल इरम ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।

बहुत धीमे, बहुत नर्म।

“राजेश… आज रात कोई नक़ाब मत पहनना।

ना तुम… ना मैं…”


उसके शब्दों में एक अजीब सादगी थी, कोई आग्रह नहीं—बस एक रूहानी सा निमंत्रण।

वह करीब आई—इतनी कि उसकी सांसों में इरम की शराब और इत्र एक साथ घुल गए।

राजेश का दिल जोर से धड़क रहा था 

राजेश…आज कुछ मत सोचना… बस… होने दो।”


उसने खुद को रोकने की कोशिश की—पर इरम ने उसके झिझकते हाथों को अपने दोनों हाथों में थाम लिया।


उस रात—

।इरम जैसे किसी पुराने बोझ से मुक्त हो रही थी,

और राजेश पहली बार ज़िंदगी की किसी अनजानी नदी में बह रहा था

#######

कई दिन बीत गए शोध ,काफी  ,गोमती का किनारा और  शहर की हवा सब एक जैसे बने हुए थे 

एक दोपहर में इरम को मंत्रालय से कॉल आया—

“मंत्री जी आपसे मिलना चाहते हैं। आज। अभी।”


इरम एक पल को रुकी।

दिल में एक हल्का सा कंपन उठा,

पर उसने खुद को सीधा रखा

और कार मंत्रालय की ओर मोड़ दी।


गलियारे लखनऊ की ठंडी हवा जैसे अपने अंदर खींचे खड़े थे।

कमरा वही—

भारी परदे, बड़ी कुर्सी,

और उस कुर्सी पर बैठा देवेंद्र ठाकुर—


एक शातिर मुस्कान,एक शिकारी नज़र,

और भीतर छुपा हुआ अँधेरा जो वह कभी छुपाता नहीं था,

बस, नियंत्रित रखता था।


इरम अंदर आई।

देवेंद्र ठाकुर ने उसकी तरफ देखा,अपने चश्मे के पीछे से लंबी नज़र डालते हुए बोला

अरे, इरम…

आजकल तुम बड़ी रौशन लग रही हो।

कहीं नयी रोशनी मिल गई है क्या?”


इरम का दिल एक पल को थमा।

क्या उसे पता है?

वह संयत होकर बोली—

“सर, मैं आपकी रिसर्च स्टोरी के सिलसिले में आई हूँ…”

देवेंद्र हल्के से हँसा।

“स्टोरी?”

वह कुर्सी से उठकर करीब आया और बोला—

“कभी-कभी असली कहानी फाइलों से नहीं…

लोगों के चेहरों से समझ आती है।”

इरम जड़ खड़ी रह गई।

ठाकुर ने  आगे कहा—

“तुम होशियार हो, खूबसूरत हो…

और सबसे बड़ी बात—

समझदार हो 

तुम्हें पता है कि इस दुनिया में किससे क्या लेना है।”

“और हाँ…

कुछ लोग ऐसे होते हैं

जो बस तुम्हें पीछे खींचते हैं।

मैं नाम नहीं पूछूँगा…

तुम्हें पता है मैं किसकी बात कर रहा हूँ।”

इरम की सांस अटक गई।उसने कुछ नहीं कहा।


देवेंद्र ठाकुर मुस्कुराया—

एक लंबी, ठंडी मुस्कान।

“वैसे…

तुम्हारा दोस्त राजेश…

अच्छा लड़का है।

बहुत अच्छा। लेकिन दुनिया अच्छे लोगों से नहीं चलती, इरम।”

वह खिड़की की ओर मुड़ा और बोला—

“अगर तुम्हें ऊपर जाना है…

तो तुम्हें नीचे पड़े बोझ उतारने ही होंगे।”


इरम ने आँखें झुका लीं—

“तुम बहुत आगे आ गई हो…

बहुत कम वक़्त में।”

“और जानती हो…

तुम जहाँ भी हो,

जिस भी ऊँचाई पर खड़ी हो—

उसमें मेरा कितना हिस्सा है?”

उसकी आँखों में वो शिकारी सुकून था जो सिर्फ ताक़त के नशे में डूबे लोगों की आँखों में होता है।


इरम ने होंठ भींचे।

“सर, मैंने मेहनत—”

देवेंद्र ने तीखी मुस्कान से उसकी बात रोक दी।

“मेहनत?हाँ, की होगी।पर मेहनत अकेले किसी को यहाँ तक नहीं लाती।”

“आज तुम जो इरम हो…जो नाम है, जो पहुँच है…वो मेरी वजह से है।”


हर शब्द वज़नदार था 


इरम ने गहरी सांस ली—

“मैं आपकी इज़्ज़त करती हूँ, सर।”


वह मुस्कुराया,

उस मुस्कान में इज़्ज़त का जवाब नहीं,

एक मालिकाना भाव था।

और बहुत धीमी आवाज़ में बोला—

“मुझे तुमसे चाहिए ही क्या, इरम?”

“बस…थोड़ी सी गर्मी।”

वह धीरे-धीरे बोला—

“जिस्म की, साथ की… और वक़्त की।यह कोई बड़ा सौदा तो नहींथा  जो तुमने मेरे साथ किया था ”


इरम ने नज़र झुका ली।

और ये गर्मी… सिर्फ मेरी होनी चाहिए।

बस, इसी में सबकी भलाई है—तुम्हारी भी…

और उस लड़के की भी…

जिसका नाम तुम्हारे चेहरे पर लिखा फिरता है।”


इरम की सांस ठहर गई।

दे इंद्र ठाकुर  ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा—


“इरम…

सफलता  एक खेल है।

और इस खेल में जो चलना सीख जाता है,वो दुनिया को पीछे छोड़ देता है।”


वह हँसा—

“बस…फैसला तुम पर है।

उड़ना है… या किसी की उँगली पकड़कर चलना?”

कमरा भारी हो गया था 

वह ठंडी आवाज़ में बोली—

“मैं समझ गई, सर।”


देवेंद्र ठाकुर ने सिर हिलाया—

“अच्छा है।

ज़िंदगी आसान रहेगी।”


इरम निकलने लगी तो पीछे से उसने एक वाक्य फेंका—

हल्का, पर ज़हर से भरा।


“और हाँ…

जिस्म और जज़्बात—

दोनों को काबू में रखना सीखो।

कहीं कोई ग़लत हाथ न लग जाए।


इरम बाहर निकल गई।

पर उसके कदम लड़खड़ा रहे थे।

जैसे किसी ने उसकी रूह पर एक भारी मुहर लगा दी हो।

इरम अपने कमरे की खिड़की पर टिककर बैठी थी। नीचे लखनऊ शहर अपनी रफ्तार में बह रहा था—मेट्रो की हल्की घरघराहट, दुकानों के बंद होते शटर, चाय की भाप में उठती बातें। लेकिन उसके भीतर एक और शहर बस गया था—जिसमें हर गली दो भागों में बँटी थी। एक तरफ़ राजेश था—शांत, भरोसेमंद।

दूसरी तरफ़  देवेंद्र ठाकुर तेज़, और खतरनाक

 इरम सोच रही थी कि उस की दुनिया केवल दिल की नहीं थी—वह एक ऐसे पेशे में थी जहाँ लोगों की यादें, और निर्णय  कैरियर या तबाही का फ़ासला तय कर देती हैं।

वह खुद से लड़ रही थी—

क्या वह राजेश के साथ रह सकती है?

क्या वह यह सुख झेल सकती है?

और क्या वह उसके साथ रहकर अपने भविष्य को सुरक्षित रख सकती है?

राजेश उसके जीवन में वह ठंडी जगह बन गया था जहाँ संघर्ष की आग थोड़ी देर के लिए राख हो जाती है।लेकिन महत्वाकांक्षाओं में ठंडी जगहें नहीं होतीं—वहाँ सिर्फ़ दौड़ होती है और पीछे छूट जाने का डर

राजेश की ईमानदार आँखें उसे खींचती थीं।

लेकिन देवेंद्र की बात न मानने के परिणाम का डर उसे पीछे धकेल रहा था और उसके करियर की ऊँचाई उससे मांग कर रही थी  कि “निजी जीवन को भूल जाओ

इरम ने अपनी डेस्क पर रखी हर उस फ़ाइल को फिर से छुआ, जो उसके पिछले पाँच वर्षों की नींद, आँसू और संघर्षों का जमा हुआ प्रमाण थी।

उसकी दुनिया में भावनाएँ नहीं चलतीं; सिर्फ़ जगह, पहुँच और प्रभाव चलता है।


इरम जानती थी—

अगर वह राजेश के साथ गहराई में चली गई,

तो राजेश मजबूत होगा या नहीं,

पर वह खुद कमजोर पड़ जाएगी।

और उसकी दुनिया में कमजोरी एक विलासिता थी—जो वह अफोर्ड नहीं कर सकती थी।


वह धीरे से उठी।

आईने में खुद को देखा—

ज़रा-सी थकान, थोड़ी-सी उदासी, और भीतर कहीं जिद की एक पतली-सी लौ।


वह लौ उसका करियर था।


वह लौ उसकी पहचान थी।

उसने गहरी साँस ली।

मोबाइल उठाया।

राजेश का नाम स्क्रीन पर उभर आया—इतना मासूम, इतना शांत, इतना अलग उसकी दुनिया से।

इरम ने एक ल, सधा हुआ संदेश टाइप किया:


“राजेश…

हमारी दुनिया अलग है।

तुम मुझे समझते हो, पर मेरी जगह को नहीं जानते।

मुझे अपने काम पर पूरा ध्यान देना है।

किसी भी रिश्ते से ज़्यादा इस समय मेरा करियर महत्वपूर्ण है।

अब हम अलग रास्तों पर बेहतर रहेंगे।”

उसने निर्णय ले लिया था  एक साफ़, कठोर, दृढ़ निर्णय—

वह अपने करियर की ऊँचाई चुनेगी।

भले उसके दिल की कोई घाटी अधूरी रह जाए।

 संदेश भेज कर वह थोड़ी देर तक राजेश के नंबर को देखती रही और फिर एक झटके उसे ब्लॉक कर दिया ।







शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

 

कहते हैं कालेज वही जगह है जहाँ आदमी पहली बार अपनी जिंदगी को बाहर से देखता है—

जैसे कोई बालक खिड़की से झाँककर दुनिया का पहला मेला देख ले।

और उस मेले में हमारे बीच एक आदमी था,

जिसकी आँखों में चश्मे के पीछे सदियों की थकान ठहरी थी,

और शरीर ऐसा जैसे हवा चलती रहे और वह धीरे-धीरे हिलता रहे—अफाक आलम भी ऐसे ही थे—साढ़े चार फुट की दुबली-पतली काया, चेहरे पर हमेशा धूल-भरी उदासी, आँखों पर मोटा गोल फ्रेम वाला चश्मा और कंधे पर गांधी कट का कपड़े का थैला, जिसे वे जनेऊ की तरह  ऐसे लटकाते जैसे उससे उनकी इज़्ज़त और ईमान दोनों बँधे हों।


अफाक के पास  किताबी पढ़ाई के अतिरिक्त दो खूबियां थीं —बेढंगापन और ख़ामोशी।और उन्हें हँसते हुए देखने का मतलब था कि उस दिन कोई चमत्कार घटा है।

अफ़ाक मियाँ ऐसे लड़कों में से थे जो दुनिया में आते हीअपनी जगह गलत चुन लेते हैंजैसे ाफाइल बनाते समय अल्लाह मियां की कलम हिल गई हो। उनके चेहरे की खोखली हड्डियाँमानो भीतर की सारी उम्मीदें सोख चुकी थीं।पर आँखें? 

आँखें हमेशा काँपती रहती थीं—जैसे हर पल दुनिया उन्हें पकड़कर पूछेगी—

“क्यों रे? तू यहां क्या कर रहा है ?”

उनकी पूरी दुनिया दो चीज़ों से बनी थी—

नुक्ता और नैतिकता।

किसी शब्द में नुक्ता न लगे तो उन्हें , लगता था जैसे कोई मुसलमान गंगा में डुबकी मारते हुए भजन गाने लगा हो — लाहौल बिल कूवत बिना नुक्ते के शब्द सोच के ही दिल घबराने लगता था उनका 

और नैतिकता ऐसी कि दुनिया में जो कुछ भी दिखता उसे देख कर वे लाहौल पढ़ने लगते उनके लिए इस दुनियां को यह के रहने वालों ने एक लानत बना रखा था 

हर दिल टूटे हुए आदमी की किस्मत में एक न एक ऐसा दोस्त लिखा ही जाता हैजो उसकी जिंदगी को थप्पड़ मार-मारकर हँसी में बदल देता है।अफ़ाक की जिंदगी में वह शख़्स था — गजेन्दर ठाकुर।

गजेन्दर का कद छह फीट दो इंच,आवाज़ में गूँज ऐसी कि पंचायत का पंच भी चुप हो जाए, और आत्मविश्वास इतना कि वह समोसा खाते-खाते भीकिसी सभा का भाषण दे सकता था।।गजेंद्र की बोली में मिठास कम, मसाला ज्यादा रहता था ।वह आदमी भीतर से जैसे धूप का गोला था—जहाँ जाता, वहाँ रोशनी और बकचोदी फैल जाती।

कहते हैं हर दोस्ती में दो लोग होते हैं—एक जो जोर से हँसता है,और दूसरा जो हँसते हुए भी मन ही मन रोता है।

अफ़ाक मियाँ दुसरे वाले थे —पूरे कॉलेज के इकलौते ऐसे युवक,

जो मज़हबी तौर पर कट्टर मुसलमान,

सिद्धांतिक तौर पर उदास इंसान,और व्यवहारिक तौर पर हास्यास्पद टारगेट बने रहते थे।

उनकी जिंदगी तीन चीज़ों पर टिकी थी—नुक्ता, नियम, और निराशा।

और तीन चीज़ें उनके नियमों को रोज तोड़ती थीं—

गजेन्दर ठाकुर, गजेन्दर ठाकुर, और गजेन्दर ठाकुर।


उस दिन दोपहर को हवा में हल्की-सी बदमाशी थी।

कालेज के गेट पर भीड़ थी,

और ठीक सामने लगा था एक बड़ा-सा रंगीन पोस्टर,

जिस पर लाल मार्का A चमक रहा था—

जैसे किसी ने लाज पर तमाचा मार दिया हो।


पोस्टर में हीरोइन का दुपट्टा उड़ रहा था

और हीरो का हाथ कुछ ज़्यादा ही नीचे की तरफ बढ़ा हुआ था।

गजेंद्र ने पोस्टर देखा नहीं,

पोस्टर ने गजेंद्र को देखा था—

और वह हँस पड़ा।

जैसे ही अफ़ाक मियाँ ने देखा,

उनके भीतर का पूरा इस्लाम, नैतिकता, शरीयत, हदीस, हाफ़िज़ —

सब एक ही साथ कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए।

अफाक की आँखें गोल चश्मे के पीछे फैलती चली गयीं।

भौंहें उठीं।

नथुने फूल गए।

और चेहरा वैसा बन गया जैसे किसी ने

उनके सामने बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई में

हिंदुस्तानी क्लासिकल की जगह

डिस्को लगा दिया हो।

वे असहज होकर बोले—

“देखिए गजेंदर भाई… कितना फालतू फिलिम लगा है। और उनके चेहरे परएक ही स्थाई भाव था असहजता, 

असुरक्षा और शर्म का संयुक्त पैकेज।

पोस्टर को देखते हुए उन्होंने दुआ जैसी आह भरी “या खुदा, फट जाय यह धरती… हम समा जाएं उसमें।”

पर धरती और अल्लाह दोनों उनके नाटक समझते थे—

कुछ नहीं हुआ। 

गजेन्दर को  पोस्टर पर लगी हसीना में ही नहीं,अफ़ाक की आँखों में उठती परेशानी में भीएक किस्म का मनोरंजन दिखता था।

गजेन्दर ने खैनी मसलते हुए कहा—

“चल न, देख आव। डुरांड में इससे भी बढ़िया वाला लगा है।”

अफ़ाक झुँझलाए—

“लाहौल विलाकूवत! कैसी  बात कर रहे हैं आप , इतना घिनौना फिलिम!फिलिम तो सिर्फ एक बनाय गए हैं—मुग़ल-ए-आज़म!”उन्होंने ग़ को ऐसे बोला बोला क्या टांक दिया जैसे ग एक फतवा हो और  यह ग़ैरत का मुद्दा हो।

गजेन्दर ने ठहाका लगाया —“अरे बकलोल, A पोस्टर से डरता है?

अरे पोस्टर देखने से पाप हो जाता,तो पूरा शहर जहन्नुम में जाता!”

चल देख कर आते हैं

अफाक कूद पड़े—

“लाहौल विला कूवत!

कैसा बात कर रहे हैं गजेंदर भाई?

ई सब फिलिम देखते हुए कोई देख लेगा

तो क्या कहेगा?”

गजेंद्र ने अफाक के कंधे पर हाथ मारा—

“ए अफाक, करबा लड़बकई…

और  गंभीर दार्शनिकता में उतरते हुए कहा—


“देख, खाली शेक्सपियर पढ़ने से नहीं होता है।

जीवन में सेक्स नहीं होगा तो पीयर हो जाओगे। समझा? पीयर! यानी पीला ,येलो येलो डर्टी फेलो।और शेक्सपियर ही बोले हैं—

‘कावर्डस डाई मेनी टाइम्स बिफोर देयर डेथ।’

घुट-घुट के मत जिओ।

लोग क्या कहेंगे—

लोगवा तबे न देखेगा तुमको

जब वो खुद भी वहाँ होगा!”


अफाक ने ऐसे देखा

जैसे गजेंद्र ने अभी-अभी

कुरान की किसी आयत को उल्टा सुना दिया हो।

फिर वही हुआ जो हमेशा होता था—

छः फीट का गजेंद्र

साढ़े चार फीट के दुबले-पतले अफाक को

घिसियाता हुआ ले गया।


“पी.के.डी. का लेक्चर छूट जाएगा…”

अफाक ने आखिरी कोशिश की।


“छूटेगा तो छूटे।

एक क्लास गोल करके सिनेमा नहीं देखा

तो जिंदगी अधूरी रह जाएगी।

चल!”


और अफाक ने कलेजे पर पत्थर नहीं—

पूरा 

पहाड़ रख लिया।


सिनेमा हॉल में घुसते ही

अंधेरा ऐसा लगा

जैसे किसी ने अफाक की आत्मा पर चादर डाल दी हो।

गजेंद्र ने बगल में बैठे बूढ़े से पूछा—


“फिलिमियाँ कितना देर पहले शुरू हुआ चचा?”


बूढ़ा बोला—

“अभी सीन नहीं निकला है।”


अफाक फुसफुसाए—

“इसको मालूम है कौन सीन?”


गजेंद्र हँसे—

“हियाँ सबके मालूम है कौन सीन।

तुमही बकलोल हो!”


फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ी,

अफ़ाक का चेहरा और सफेद होता गया।

सीन आने से पहले ही उसका दिल जोर से धड़कने लगा।

आँखों पर चश्मा धुंधला गया।


और अचानक वह उठा—

थैली सीने से चिपकाई—

सीढ़ियाँ लाँघता हुआ बाहर भाग आया।


गजेंद्र पीछे से चिल्लाया—


“ए अफकवा! भाग कहाँ रहा है?”


पर अफ़ाक सुन कहाँ रहा था।


पता नहीं पर्दे पर क्या दिखा,

या उसके भीतर क्या टूटा,

पर अफाक की आँखों में जो दहशत थी

वह किसी बम विस्फोट से कम नहीं थी।

वह तेजी से हाफ रहा था जैसे कोई बड़ा गुनाह हो गया हो और अल्लाह ताला उसे कभी माफ करने वाले नहीं थे । जैसे ता क़यामत पश्चाताप की आग में जलना था और फिर जहन्नुम की आग में ।


दिन गुजरते रहे एक दिन अफ़ाक कॉलेज के पुराने बरगद के नीचे बैठा था। उसके सामने नोट्स खुले थे, नज़रें पन्नों पर टिकी हुई  थीं। 

तभी सामने वाली पगडंडी पर हल्का-सा हलचल हुआ—पहले बस एक छाया चली, फिर कपड़ों की सरसराहट, और फिर वह आवाज़ जिसे सुनते ही अफ़ाक के मन में अचानक किसी ने घंटियाँ बजा दी हों।


शहनाज़।

नए सत्र की छात्रा, लेकिन जैसे किसी पुराने किस्से की पुनरावृत्ति।

हल्के नीले सूट में लिपटी, बेहद सादा लेकिन अद्भुत संतुलन वाली चाल। आंखों में कुछ ऐसा ठहराव था जो सीधे किसी की रूह तक पहुँच जाए—न तेज़, न धीमा; बस इतना कि आसपास की हवा भी एक पल को ठहर जाए।


उसके आते ही बरगद के नीचे का समूचा परिसर जैसे रंग बदलने लगा।

लड़के एक-दूसरे को कोहनी मारकर फुसफुसाए, लड़कियाँ मुस्कुराते हुए उसकी सजगता को देखती रहीं। लेकिन अफ़ाक… वह उस क्षण किसी भी भीड़ का हिस्सा नहीं था। उसके भीतर जैसे किसी ने पर्दा हटा दिया हो और वह पहली बार किसी चीज़ का असली रूप देख रहा हो।


शहनाज़ ने बरगद के पास खड़े नोटिस बोर्ड की ओर देखा। उसकी उंगलियाँ हल्के से कागज़ को छू रही थीं; जैसे वह किसी निर्जीव वस्तु में भी अर्थ ढूंढ लेती हो। उसके बाल कंधे पर बिखरते थे और धूप उन पर सुनहरी धारियों जैसा रेखांकन करती थी।


अफ़ाक ने पहली बार महसूस किया कि कविता क्या होती है।

वह कोई पंक्ति नहीं थी, वह एक दृश्य था।

और वह दृश्य उसके भीतर उतरकर हलचल मचाने लगा था।


अफ़ाक ने चाहा कि उठकर पूछ ले—

“क्या तलाश रही हैं?”

लेकिन उसके होंठ जैसे शब्दों को अपने भीतर ही कैद किए हुए थे।

एक अजीब-सी बेचैनी उसके सीने में जमा हो रही थी—

न डर, न झिझक, बल्कि एक गहरा-सा विस्मय कि कहीं वह इस शांति को तोड़ न दे।


शहनाज़ ने अचानक मुड़कर बरगद के नीचे बैठे अफ़ाक की ओर देखा।

नज़र बस एक क्षण मिली—

लेकिन वही क्षण उसके भीतर एक साल जितना भारी उतर गया।


अफ़ाक पल भर को स्तब्ध रह गया।

उसकी उंगलियों में पकड़ा पेन धीरे से गिर पड़ा।

पन्नों पर एक तिरछी रेखा खिंच गई जैसे उसने उसके मन की उलझन का नक्शा खींच दिया हो।

 वह चल दी—

सड़क की ओर, कक्षा की दिशा में, या शायद उस भविष्य की ओर

जहाँ अफ़ाक चुपचाप अपने दिल की लड़ाई लड़ने वाला था।


उसके जाते ही हवा फिर से हिलने लगी,

लेकिन अफ़ाक जान गया था—

उसकी बेचैनी अब शोर नहीं,

एक स्थायी निवास बनकर उसके भीतर बसने वाली है।


कुछ लोग जीवन में प्रवेश नहीं करते घुसपैठ करते हैं—दिल की बारीक खिड़कियों से। शहनाज़ वही थी।



कॉलेज की कैंटीन हमेशा शोर से भरी रहती थी—चाय की गाढ़ी महक, भुने हुए ब्रेड के टुकड़ों की खुशबू, स्टील के गिलासों की ठक-ठक, और छात्रों की अनगिनत आवाज़ें।

लेकिन उस दिन माहौल में एक अलग-सी गहमागहमी थी। कारण?

शहनाज़।

नया सत्र, नई लड़की, और वह भी इतनी  ख़ूबसूरत

 कैंटीन में मौजूद हर नज़र उधर बार-बार लौट जाती

अफ़ाक हमेशा की तरह कोने वाली टेबल पर बैठा था—वही जगह जहाँ से वह कॉलेज का आधा संसार देख लेता था लेकिन खुद किसी की नज़र में नहीं आता था।

छट्ठू और प्रेम नारायण उसके दोनों ओर बैठे हुए थे।


छट्ठू की आदत थी कि वह हर माहौल को किसी न किसी मज़ाक की शक्ल दे देता।

सादा मन वाला प्रेम नारायण, जो अपनी सीधी बातों से ही उलझनें पैदा कर देता था।

और तीसरा था उमेश—जो कॉलेज की हर बातचीत का ‘तथ्य विभाग’ था।


तीनों अफ़ाक के दोस्त, और तीनों को अफ़ाक की बेचैनी सूंघने में देर नहीं लगी।

शहनाज के हाथ में कुछ नोट्स थे और चेहरे पर उतनी ही हल्की उलझन—कैंटीन में जगह खाली नहीं दिख रही थी ।


प्रेम नारायण ने अफाक के  कान में धीरे से फुसफुसाकर कहा,

“अफ़ाक, तुम चाहे तो तुम्हारी किस्मत आज जगाई जा सकती है ”


लेकिन अफ़ाक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पर धड़कने इतनी तेज हो गईं थी कि बाहर आसानी से सुनी जा सकती थी ।

उमेश ने भी बहुत गंभीर होकर कहा—

“देख, अगर अभी हमसे बात नहीं की और एक सौदा तय नहीं किया 

तो ‘याद रख—इतिहास गवाह है—’ लड़की दोबारा यहाँ नहीं आएगी!”

अफ़ाक का चेहरा लाल हो चुका था ।

तीनों ने टेबल के नीचे पैर टकराते हुए एक अघोषित योजना बनाई।

फिर छट्ठू ने अफ़ाक की ओर झुककर कहा—


“सुन भाई, जितनी देर वो तेरे पास बैठी रहेगी,

उतनी देर हम कैंटीन में खाने-पीने का बिल तेरे अकाउंट पर डालते रहेंगे।”


अफ़ाक चौंका—

“क्या बकवास है? क्यों??”


उमेश मुस्कुराया—

“क्योंकि हम दिल से चाहते हैं कि वो तेरे पास बैठे रहे। ये हमारा समय है जो हम उसे दे रहे हैं तुम्हारे साथ,  तो इसकी एक कीमत होगी न

प्रेम नारायण ने बात को अंतिम मुहर देते हुए कहा—

"ये रिश्वत एक  भावनात्मक निवेश है।

हम तुम्हारे प्यार को बढ़ावा दे रहे हैं…

और बदले में—सिर्फ समोसा, चाय और एक  दो प्लेट मंचूरियन।”


अफ़ाक ने आँखें तरेरीं लेकिन बोल नहीं पाया।

अगर मना करता… तो शहनाज़ शायद कहीं और  चली जाती।

अगर हाँ कहता… तो दोस्त कंगाल कर देते।


उसकी खामोशी देखकर छट्ठू ने उठते हुए झट से वेटर को इशारा किया—

“भाई, 3 चाय… 3 सैंडविच… और जो अच्छा हो, सब उधर ले आओ।

बिल भाई अफ़ाक पर डाल देना।”


वेटर मुस्कुराने लगा। शहनाज खड़ी थी । ये 3 भी टेबल से खड़े हो चुके थे और जगह खाली कर दी थी । शहनाज उधर बढ़ चली 

शहनाज़ टेबल पर पहुँची और हल्की सी शर्माते हुए कहा—

“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?

अफ़ाक हकलाया—

“ह… हाँ, बिल्कुल। बैठिए।”



छट्ठू ने दूर से अफ़ाक को इशारा किया 

ऐसा मौका रोज़-रोज़ नहीं मिलता। बात कर


शहनाज़ बैठीथी 

नोट्स टेबल पर रखे थे 

उसने अफाक से पूछा

“तुम्हें कहानी पढ़नी पसंद है?”

“हाँ… थ…थोड़ी।”

अफ़ाक हकलाया।

“है तो मुझे भी। लेकिन मेरी मम्मी कहती हैं, ‘कहानियां छोड़ो, डॉक्टर बनो।’”वह हँसी,

और अफ़ाक को लगा कि किसी ने उसके पत्थर जैसे दिल पर

एक गर्म हथेली रख दी हो।


उस दिन के बाद शहनाज़ उसकी दोस्त बन गई।

सीधी-सादी, हँसने में तेज, बोलने में और तेज।

वह उसके जीवन में घुल गई—

धीरे, अनजाने, और दुर्घटनावश।

और अफ़ाक भूल गया कि वह अफ़ाक है—

वह सोचने लगा कि शायद वह भी किसी कहानी का

 नायक बन सकता है।

दिन बीतने लगे अफाक और शहनाज कई बार साथ दिखते 

क्लास में जब शहनाज़ नोट्स मांगती—अफ़ाक को पसीना छूट जाता।वह खुद में सिमट जाता,पर भीतर कहीं बहुत गहरा स्नेह उमड़ता—जिसे वह किसी से बोल नहीं सकता था।

गजेन्दर कहता—

“अफ़ाक, मानो या न मानो…

शहनाज़ तुमसे बेहद मोहब्बत  करती है।”


प्रेम नारायण तुरन्त काट देता—

“अगर इससे मोहब्बत  करेगी तो हमको यक़ीन हो जाएगा कि,मोहब्बत वाकई आंधी होती है ।”

सब हँसते।

अफ़ाक नहीं।

उसकी मुस्कान हमेशा आधे रास्ते में मर जाती थी।

वह शहनाज़ को पसंद करता था…

शहनाज़  ऐसी लड़की थी जिसकी मुस्कान में किसी पुराने ज़माने का रेडियो बजता था—थोड़ा खड़खड़ाता, थोड़ा प्यारा, थोड़ा धुआँ-धुआँ।

और अफ़ाक?

वह उस रेडियो को हर शाम घर ले जाकर ठीक करने की कोशिश करने वाला व्यक्ति था 


अफ़ाक और शहनाज़ की दोस्ती किसी फिल्मी नायक–नायिका वाली चमकीली घटना नहीं थी।

यह धीरे-धीरे ऐसे पनप रही थी —जैसे बरसात के बाद काई चुपचाप पत्थर पर उग आती है।और किसी को पता भी नहीं चलता कि कब वह पुराना पत्थर हरा हो गया। 

अफ़ाक के लिए, शहनाज़ समुद्र थी

कभी शांत, कभी लहरों में डूबी,

और कभी इतनी दूर कि नाव भी वहाँ तक न पहुँच सके ।

अफ़ाक ने कभी ज़ोर से नहीं कहा कि वह शहनाज़ से प्रेम करता है।

वह बस उसे जीता था।

साँस की तरह।

धीमे, बेआवाज़, बिना दावा किए।


और शहनाज़?

वह उसे पसंद करती थी—

बस उतना जितना एक इंसान दूसरे को पसंद करता है

जब वह समय बिताने की अच्छी कंपनी हो।

अफ़ाक शहनाज़ को पूरे ब्रह्मांड की तरह देखता था।

वह हर बात में शहनाज़ खोज लेता था—


चाय में उठती भाप में उसकी मुस्कान,

बारिश में गिरती बूंदों में उसका नाम,

कभी-कभी तो रात की खामोशी में उसके बिना कहे वाक्य।


उसका प्रेम एक जंगल था—

घना, उलझा हुआ, और ख़ामोश।


शहनाज़ इस गहराई से अनजान नहीं थी…

पर वह उस जंगल में कभी उतरी ही नहीं।

वह बस किनारे-किनारे चलती रही

जैसे लोग किसी सुंदर बगीचे को दूर से देखकर लौट जाते हैं।

शहनाज़ का दिल खराब नहीं था।
वह बस उस कल्पना को नहीं समझती थी
जिसमें अफ़ाक उसे रखता था।

वह कहती—

“तुम बहुत अच्छे हो, अफ़ाक। सच में।
तुम्हारे जैसा दोस्त मुश्किल से मिलता है।”

यह वाक्य अफ़ाक को किसी चाकू की तरह लगता था
जिसका हत्था फूलों से सजाया गया हो।
दर्द भी देता,
और दूसरों को दिखाई भी नहीं देता।

शहनाज़ जब भी “दोस्त” शब्द बोलती,
अफ़ाक मुस्कुरा देता था।
क्योंकि उसके पास और विकल्प नहीं था।

एकतरफ़ा प्रेम की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
आपके पास भावनाएँ बहुत होती हैं,
और हक़ बिल्कुल नहीं।

शहनाज़ उसे याद करती थी—

लेकिन सिर्फ़ तब,

जब उसे कोई बात कहनी होती,

जब उसका मूड खराब होता,

या जब कोई कठिनाई आ जाए


वह जानती थी कि अफ़ाक हमेशा सुन लेगा।

हमेशा सह भी लेगा

हमेशा तत्पर भी होगा वह सब करने के लिए जो शहनाज को चाहिए 

कई बार वह कहती—

“अच्छा हुआ तुम हो। वरना मैं इतनी बातें किससे करती?”


अफ़ाक मुस्कुराकर कहता—

“हाँ, मैं तो सरकारी सुविधा हूँ—24 घंटे खुला।”


दोनों हँसते,

अफ़ाक को पता था कि शहनाज़ उसे उस तरह नहीं देखती।

उसे शायद  यह भी पता था कि वह कभी नहीं देखेगी।

लेकिन प्रेम बौद्धिक निर्णय नहीं है,

वह तो मन की बीमारी है

वह कई रातें जागकर सोचता—

“क्या मैं उसके लिए ज़रूरी हूँ?”

और हर रात जवाब आता

“नहीं। लेकिन तुम फिर भी रहोगे,

क्योंकि यही तुम्हारी नियति है।”

उसने यह दर्दकभी  किसी को नहीं बताया।

शहनाज़ अपने सपनों,अपनी पढ़ाई,अपने परिवार,

और अपनी महत्वाकांक्षाओं में व्यस्त थी।

अफ़ाक उसके जीवन का फुटनोट था—

जरूरत पड़ने पर पढ़ लिया,नहीं तो छोड़ दिया।

वह अफ़ाक की भावनाओं को समझती थी,

लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं कर पाती थी।

क्योंकि उसके जीवन में अफ़ाक “मुख्य पात्र” नहीं था।

और अफ़ाक की त्रासदी यही थी—

वह अपने सपनों में शाहनाज  का  नायक बना हुआ था 

लेकिन शहनाज़ की कहानी में  वह केवल एक पैराग्राफ से  ज़्यादा नहीं था।

अफ़ाक का प्रेम पहाड़ था। और शहनाज़ क एक हल्की हवा।

पहाड़ उम्मीद करता रहा,और हवा गुज़रती रही।

अफाक अपने मन में उस हर शब्द को सहेज लेता जो शहनाज उससे कहती,लेकिन शहनाज उन पलों को ऐसे छोड़ देती जैसे हवा में उड़ते हुए कागज़ के टुकड़े।

वह अफाक से बातें करती थी, हँसती थी, कहानियाँ सुनाती थी—

लेकिन अफाक के लिए नहीं।

बस इसलिए कि दुनिया में कुछ लोग बोलने के लिए किसी भी कान की तलाश में रहते हैं।

अफाक वही कान था।

इस तरह के  प्रेम की सबसे खतरनाक बात यह है कि

जिसे तुम प्रेम कहते हो,

वह दूसरे के लिए सिर्फ “अच्छी दोस्ती” होती है।


शहनाज़ अफ़ाक को अपना “अच्छा दोस्त” समझती थी—

इतना अच्छा कि कभी-कभी उसके परिवार के झगड़ों की बातें भी उससे कर लेती थी,

अपनी हँसी, अपनी शिकायतें, अपने मन की उलझनें सब कह देती थी।

अफ़ाक उसे सुनता रहता ।कुछ लड़कियाँ अनजाने में वक़्त काटती हैं,

और कुछ लड़के अनजाने में दिल गँवा बैठते हैं।

अफ़ाक इन्हीं लड़कों में से एक था।

शहनाज़ क्लास में बैठकर अफ़ाक से पेन माँगती।

वह उसके नाम का “A” बड़े सुंदर तरीके से अपनी कॉपी में लिखती।

अफ़ाक सोचता—

“ये प्यार का संकेत है।”

एक दिन शहनाज कॉलेज के गेट पर खड़ी थी

अफ़ाक पास गया।

उसने देखा कि वह किसी के साथ बात कर रही है  हँस रही है—

एक खास तरह की हँसी।

वह हँसी जो वह कभी अफ़ाक के साथ नहीं हँसती थी।

वह शायद उसे कॉलेज छोड़ने आया था । अफाक कुछ दूर रुक कर उन्हें देखता रहा । थोड़ी देर बाद शहनाज ने उसे मुस्कुराते हुए विदा कर दिया और कॉलेज के अंदर आ गई ।

अफाक को देख कर वह मुस्कुराई थी पर अफाक ने महसूस किया यह मुस्कुराहट वैसी नहीं थी जैसी उसने अभी कुछ देर पहले देखी थी ।

कौन था 

अफ़ाक ने पूछा।

“अरे एक दोस्त है, मेडिकल की तैयारी करता है… बहुत ब्रिलियंट है।”

उस दिन पहली बार अफ़ाक को महसूस हुआ कि

दुनिया में “ब्रिलियंट” होना “अच्छा इंसान” होने से ज्यादा मायने रखता है।

और वह ना तो ब्रिलियंट था,

ना ही बहुत खास।

वो तो बस ऐसा ही था   से खुरदुरा सा अजीब  


अब वो इंटेलीजेंट अक्सर शहनाज को छोड़ने आने लगा था वे काफी देर तक गैलरी में बैठ कर बातें करते रहते । शहनाज ने अफाक को उस से मिलवाया था

डॉ़ आसिफ़।

अफाक को उस दिन समझ आया था कि शहनाज जो खूबसूरत सा A बनती थी वह अफाक के लिए नहीं था आसिफ के लिए था ।

वह उसके लिए “इंस्पिरेशन” था।

अफ़ाक के लिए वह “प्रतिस्पर्धा” भी नहीं था—क्योंकि वह जानता था कि वह उस लड़के के बराबर खड़ा होने लायक भी नहीं।


एक दिन शहनाज़ ने धीरे से कहा—

“अफ़ाक… मैं चाहती हूँ कि मैं किसी डॉक्टर से शादी करूँ।

है न अच्छा आइडिया?”


उसने हँसने की कोशिश की।

“बहुत… अच्छा।”


लेकिन उसकी आवाज़ में कहीं भी “अच्छा” जैसा कुछ नहीं था।


उसी रात घर लौटकर तकिए में मुंह दे कर रोया था 

“क्यूँ दिल ऐसे लोगों पे आता है जिनके पास तुम्हारे लिए दिल ही नहीं होता?”


शहनाज़ और डॉक्टर आसिफ की सगाई की ख़बर आई।

शहनाज़ ने खुद उसे बताया था  

“अफ़ाक, तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो इसलिए तुमको सबसे  पहले बता रही हूँ।

तुम खुश हो न?”


अफ़ाक ने कहा—

“हाँ… बहुत।”


लेकिन दोनों बार शब्द झूठ थे—

 कहने में भी,

और उसके सुनने में भी।


उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि

ज़िंदगी में कुछ लोग सिर्फ संपर्क होते  हैं

और कुछ आदत  बन जाते हैं।

शहनाज़ उसके लिए आदत थी 

एक ऐसी आदत जो छूटती नहीं

और जिस पर कोई अधिकार भी नहीं।


उस दिन

अफ़ाक का प्रेम मर गया था—

चुपचाप,

बिना शवयात्रा,बिना शोक-सभा,

बिना किसी सांत्वना के।


वह दिखा रहा था  कि उसे फर्क नहीं पड़ता,

लेकिन उसी रात उसने सड़क पर निकलकर खुद से पूछा—

“क्या मैं बेवकूफ हूँ? जो मेरा नहीं है, उसे अपना मान बैठता हूँ?”


कुछ दिनों बाद उसके हाथ में शहनाज़ की शादी का कार्ड था—सफेद, चमकदार, सुरुचिपूर्ण, बिल्कुल शहनाज की तरह।

ऊपर गुलाबी उर्दू में लिखा था—

 शहनाज़  और डॉ. आरिफ़ 


बस इतना।

अफ़ाक का नाम कहीं नहीं था—ना मेहमानों की सूची में, ना दावतनामे में, और शायद… जिंदगी की किसी भी सूची में।

वह कार्ड को देखते-देखते अचानक हँस पड़ा।लेकिन यह हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी वह हँसी थी भी नहीं—वह सिर्फ आँसुओं का मुखौटा थी ।उसने महसूस किया उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे ।

उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि प्रेम किसी का नहीं होता—

बस एक तरफा बोझ होता है, जो उठाने वाले की कमर तोड़ देता है।


उस रात, दिल के मलबे में बैठा अफ़ाक खुद से लड़ रहा था—

वह इतना महान नहीं था कि आसानी से भूल जाए,

और इतना क्रूर भी नहीं था कि शहनाज़ से नफ़रत कर सके।

वह शहनाज की शादी में गया था वह लाल दुपट्टे में, हल्के मुस्कान के साथ,  डॉक्टर के पास बैठी हुई—उसकी मुस्कान में वह स्थिरता थी जो अफ़ाक में कभी थी ही नहीं।

अफ़ाक को नहीं पता चला कि उसकी आँखें कब गीली हो गईं।

एक लंबा समय था जब वह खुद से कहता रहा था 

“हम दोस्त हैं… लेकिन शायद उससे थोड़ा ज़्यादा भी।”

लेकिन आज उस भ्रम ने अपने कपड़े बदल लिए थे और आइने के सामने खड़ा हो गया था—नंगा, झूठा, क्रूर।

उसे रोना नहीं आ रहा था।बस एक खालीपन महसूस हो रहा था, जैसे वह कोई बर्तन हो जिसे किसी ने अंदर से खुरच कर साफ़ कर दिया हो—और अब वह सिर्फ बज रहा था।


“क्या मैं सच में उसके लिए इतना ही गैर–जरूरी था?”


यादें उसके दिमाग में लैंप की तेज़ रोशनी की तरह झिलमिला उठीं—

कैंटीन के वो दोपहरें…

रामज़ान के समोसे…

शहनाज़ की वह आधी मुस्कान जो अफ़ाक को हमेशा पूरा कर देती थी।

लेकिन यही तो सच्चाई थी—

अफ़ाक पूरा था ही कहाँ और शहनाज मुस्कुरा रही थी डॉ आरिफ के लिए 

उस रात अफ़ाक खुद से हजार झूठ बोलता रहा।

कभी गुस्से में, कभी दर्द में, कभी पूरी तरह टूटकर—


“एक दिन मैं इतना बड़ा आदमी बनूँगा कि शहनाज़ को एहसास होगा…

कि उसने कुछ खो दिया।”


यह वह वाक्य था जो दुनिया के लाखों एकतरफ़ा प्रेमियों ने अपने दर्द की दीवार पर कोयले से लिखा है।

मगर अफ़ाक इसे सच मानना चाहता था।

क्योंकि सच मान लेने से दिल का दर्द थोड़ी देर के लिए मुल्तवी हो जाता है।


वह कभी डॉक्टर बनने का सपना देखता, कभी IAS, कभी प्रोफ़ेसर… वह बस ऐसा कोई बनना चाहता था जिसे देखकर शहनाज़ की आँखें पलटें और भर आएँ।


लेकिन तभी एक और आवाज़ उठती—

“तो क्या मेरी कीमत सिर्फ उसकी नज़रों से तय होगी?”



अफाक उस शाम बहुत देर तक कमरे के कोने में बैठा रहा। बाहर वही पुराना शहर था—दुकानों के नीले-पीले बल्ब, मोड़ पर खड़े धूल भरे रिक्शे, पान की दुकानों के सामने जमघट और वे चेहरे जिनमें वह अपना भविष्य ढूँढता-ढूँढता थक चुका था। लेकिन आज कुछ अलग था। शहर उसे पहली बार ऐसा लगा जैसे कोई पुराना जख्म, जिसमें से बदबू उठ रही हो,

शहनाज़ की शादी हो चुकी थी।

और वह भी एक डॉक्टर से—सलीकेदार, स्थिर, साफ़-सुथरी ज़िंदगी वाले व्यक्ति से और वह जैसेदुनिया को उसकी कोई जरूरत नहीं थी वह बिल्कुल अनवांटेड था दो छोरों के बीच उसका मन टूटता और जुड़ता रहता—गुस्सा और अजीब-सा आत्मतिरस्कार।

एक तरफ  एक ऐसा आदमी, जिसकी जेब में भरोसा था और आँखों में सुरक्षा।अफाक की आँखों में बस सपने थे — आधे टूटे, आधे धुंधले, और आधे हँसी उड़ाने लायक।

शहनाज़ की तस्वीर उसकी आँखों से हट नहीं रही थी,

बिस्तर पर लेटे अफ़ाक ने करवट बदली, कंबल अपने सीने से  कसकर चिपकाया और छत को घूरने लगा।

उसे नींद नहीं आई थी—

लेकिन अजीब बात ये थी कि वह सोया भी नहीं था और पूरी तरह जागा भी नहीं।

उसके भीतर एक उथली-सी परत में शोर था—

“कुछ नहीं कर पाया…”

शहनाज चली गई”

“एक बार पलट कर भी नहीं देखा…”

“मैं किसके लिए जी रहा हूँ?”


बाहर से देखो तो वह शांत था—जैसे कुछ सोचा ही न हो।

लेकिन अंदर—अंदर अफ़ाक अपनी ही चुप्पी में फँस चुका था।

वह उठ कर बैठ गया फर्श  इतना ठंडा  था कि पैर सुन्न हो गए, लेकिन चेहरा निर्विकार। उसने डायरी खोली।

कलम हाथ में ली।

और हर दिन की तरह अपने मन की आग बाहर उड़ेलने का सोचा।

लेकिन आज डायरी ने खुद उससे सवाल पूछ लिया—

“लिखकर क्या बदलेगा?”

कलम उसके हाथ से छूट गई।

कमरा खाली था… लेकिन खालीपन में एक अजीब-सी सघनता थी।


अफ़ाक ने अपने बैग से वो स्ट्रिप निकाली—

जिसे वह हमेशा “कभी नहीं खाऊँगा” कहकर रखता आया था।


लाइट बंद कर दी।

डेस्क वाली टेबल लैंप जला छोड़ी—बस हल्की रोशनी।

कमरे में हवा चल रही थी लेकिन वह स्थिर बैठा हुआ था, जैसे किसी निर्णय की मिट्टी से ढला हुआ पुतला।

उसने खिड़की से बाहर देखा—और पहली बार उसने खुद से यह सीधा सवाल पूछा—


“क्या मैं किसी के लिए ज़रूरी हूँ?”

सवाल इतना भारी था

कि उस रात उसका जवाब देने वाला कोई नहीं था।

उसने स्ट्रिप खोली।

एक गोली निकाली।

पानी का गिलास भरा।

और बिना एक्सप्रेशन के खा ली।


फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

फिर चौथी।

—जैसे वह कुछ कर ही नहीं रहा, बस समय काट रहा है।

न कोई रोना, न चीखना, न नाटक।

बस एक नीरस, शांत, भयावह स्वीकार

डायरी उसने दोबारा खोली।


लिखा—

मैं अब थक चुका हूँ। शायद जीवन से नहीं—अपने ही भीतर की उस आवाज़ से, जो हमेशा कहती रही कि “शायद शहनाज़ लौट आएगी।”

कैसा अजीब आदमी हूँ मैं—मैं जानता था कि वह मेरी नहीं थी, कभी थी ही नहीं।

उसकी हँसी में मैं बेतुके अर्थ खोजता रहा,

उसकी नज़र के हर मोड़ में कोई इशारा ढूँढता रहा,

और जब वह चली गई…

और मैं खाली डिब्बे जैसा बजता रह गया।

मैंने कितना झूठ बोला खुद से—

कि मैं उसे भूल जाऊँगा,

कि मैं पढ़ लिख कर कुछ बन जाऊँगा,

कि कामयाबी मुझे उसकी याद से मुक्त कर देगी…

पर सच तो यह है कि कामयाबी सिर्फ़ उन लोगों को मुक्त करती है, जिनके भीतर जड़ें नहीं होतीं।

और मेरी जड़ें…मैं जितना उखाड़ना चाहता, उतना ही गहरी होती जातीं। शहनाज मेरे अंतर में है किस से मुक्त होऊंगा ।

मैं शहनाज़ से एकतरफा प्रेम करता था

वह मेरे जीवन का वह दरवाज़ा थी जिसे खोलने की चाबी मुझे कभी मिली ही नहीं,

लेकिन मैं उस दरवाज़े के सामने बैठा रहा—कितने ही दिनों तक भ्रमों के बीच।

वह चली गई।

मुझे  एक अंतिम “ख़याल रखना” देकर।

कितना हल्का शब्द है—“ख़याल रखना।”

पर उस दिन से मैं अपने ख़याल ही नहीं रख पाया।

मैं जानता हूँ—

उसने कभी मुझसे कुछ वादा नहीं किया था,

कभी इशारा नहीं दिया,

कभी उम्मीद नहीं जगाई…

शायद समस्या वही थी—

उसने कुछ भी नहीं कहा,

और मैं सब कुछ समझ बैठा।


मेरे भीतर यह स्वीकारने की ताक़त नहीं है  कि वह किसी और की हो सकती है।

एक डॉक्टर, एक सुरक्षित ज़िंदगी, एक व्यवस्थित संसार—

और मैं?

मैं तो एक बिखरा हुआ पन्ना हूँ,

जिस पर किसी की उँगलियों के निशान भी नहीं टिकते।

मैं उससे शिकायत नहीं करता।

वह मुझे कभी समझ नहीं पाई—

और मैं उसे कभी समझा नहीं पाया।

यही हमारी कहानी थी,

और यही हमारी गलती।

अगर क़यामत जैसी कोई चीज़ है,

कोई और दुनिया है,

कोई दूसरा जन्म है…

तो मैं उसका वहीं इंतज़ार करूँगा।

जहाँ ना हलचल होगी,

ना अकेलापन,

ना मेरे भीतर का यह हंगामा।

अगर क़यामत में हम मिलें,

तो मैं उससे बस इतना कहूँगा—

"मैंने तुमसे कभी कुछ माँगा नहीं,

पर तुम्हें भूलने का हक़ शायद मुझे भी नहीं था।"

और आज…

मैं सिर्फ़ इतना मान रहा हूँ

कि मेरा दुख किसी के लिए बोझ न बने,

किसी पर इल्ज़ाम न रहे।

यह मेरी लड़ाई थी—और मैं हार गया।

बस इतना ही।...


उसने कलम वहीं रखी।

डायरी बंद की।

लाइट बंद कर दी।

लेट गया।


और फिर कमरा…

उसकी सांसों से पहले शांत हो गया। 



अगली सुबह दरवाज़ा तोड़ा गया।

लेकिन

 अफ़ाक नहीं खुला।



मंगलवार, 18 नवंबर 2025

उस शहर की हवा में मार्च की दोपहर को एक अलग-सी नमी रहती थी। हवा में कोयले की धूल भी होती, पर उसके भीतर कहीं दूर से आती हरियाली की गंध भी। मानो शहर अपने ही धुएँ और अपने ही सपनों के बीच रोज़ाना एक अदृश्य लड़ाई लड़ता हो।


देवाशीष उस दिन कॉलेज की लाइब्रेरी से निकल रहा था। किताबें बाँहों में थमी थीं, पर मन कुछ और ही खोज रहा था—एक अनजानी बेचैनी, शायद कोई आवाज़, शायद कोई हँसी। और तभी

धप्प-धप्प-धप्प…

 काँच की चूड़ियों की महीन खनक, पैरों की तेज़ सरसराहट, और एक नमकीन-सी, ताजगी भरी हँसी हवा को चीरते हुए आई।

देवाशीष ने मुड़कर देखा। वह थी—पियाली। चंचल ,छरहरी , आँखों में पहाड़ी नदी की-सी चमक, बाल खुले हुए जैसे हवा से दोस्ती कर रखी हो। उसका चलना किसी रफ्तार की तरह नहीं, बल्कि किसी लय की तरह लगता था। हँसते समय चेहरे पर जो डिंपल पड़ते, वे किसी भी कठोर आदमी को कुछ पल के लिए मुलायम बना दे सकते थे।

देवाशीष को हमेशा लगता था यह लड़की चलती नहीं… बहती है

 उसका नाम पियाली था। 

पियाली ये क्या नाम हुआ भला? 

एक बार उसने पूछा था उस से। वो हँसी थी। 

बिहारी रा किच्छुई जाने ना

 ए हम बिहारी नही है 

ठीक आछे तुमी हिंदुस्तानी

 प्याली कोई नाम होता है प्याली में रख कर चाय पी जाती है।

 बोका, पेयाली नेही पियाली। एटा एकटा नोदीर नाम।( यह एक नदी का नाम है )

 नदी सी ही थी वो पहाड़ों से तेज उतरती हुई वेग से भरी उमंग उत्साह से भरी।

हिन्दी भालो कोरे बोलने नेही आता हमको 

सीख लो 

की कोरे सीखबो 

कोई भी भाषा सीखने का एकसबसे आसान तरीका है

 की तरीका

 जिस भाषा को सीखना है उसे बोलने वाले से मोहब्बत कर लो 

वह हँसी , उसकी आँखें शरारत से गोल हो रहीं थी ,उसने अपनी गोल आँखें उठाई और कहा 

त होले  तुई सीखिए दे । आमी तोर संगे भालो बासा कोरबो कोतो दिन लागबे ।

    उसने अपनी बगल से गुजरती हुई लड़की को रोक 

ए सुन आई लव देवाशीष

देवाशीष हैरान था अरे रुको 

आमके रोकते पारवे ना ,वह मुस्कुरा रही थी । आमी अप्रतिरोध्य ।मुझे रोक नहीं जा सकता ,मुझे रुकोगे तो रास्ता बदल लूंगी और साथ चलोगे तो एक दिन समुद्र हो जाऊंगी ।

वो अपलक देखे जा रहा था 

क्या साथ चलोगे उसने हंसते हुए सवाल किया था 

 वह उस मासूम पर खतरनाक सवाल पर बस मुस्कुरा पाया। उसे पता था—यह लड़की मज़ाक करती है, पर हर मज़ाक के पीछे थोड़ा-सा सच भी छिपा रहता है।

पियाली का एक प्रेमी था—

शांत, धीर-गंभीर, सीधा-सादा।

वह उसे पूजा की तरह चाहता था।


पर पियाली को पूजा नहीं चाहिए थी…

उसे धड़कन चाहिए थी। बहाव चाहिए था।


वह कहती—


“ओ जे रकम चुपचाप …आमार माथा घूरे  जाय में 

”आमी ओके ठीक बुझते पारी ना अमाय एक्टू होई चोई एक्टू झोड़ चाय तुई एक्टा झोड़ 

(वह इतना शांत है कि मेरा दिमाग चकरा जाता है। मैं उसेसमझ नहीं पाती मुझे थोड़ी हलचल  हलचल, थोड़ी आँधियाँ चाहिए…तुम एक तूफान हो तुम्हारा जैसा कोई चाहिए मुझे )


देवाशीष हंस देता  

तुई एकेबरेई सुनामी 

देवाआशीष की भाषा में इन दिनों बंगला के शब्द झर रहे थे 

वह उसकी तरफ  खिंच रहा था  उसे लगता था अगर पियाली जलधारा है, तो वह शायद वह किनारा है जहाँ वह बार-बार आकर टकराती है, हँसती है, फिर भाग जाती है।

एक दिन वह अचानक  बोली 

चल सिनेमा देखते जाबो 

गेट पर सोमेन मिल गया था वही उसका प्रेमी वह कटरा कर निकल जाना चाहती थी पर देवाशीष ने  उसे साथ ले लिया था ।

सिनेमा देखने वो  तीनो गए थे । वो बीच में बैठी थी । तीनो चुपचाप देखते रहे दस मिनट , बीस मिनट  ,,,, तीनो के मन में कुछ चल रहा था ।

वह बीच मे बैठी थी ।फ़िल्म देखते हुए वह कभी चुप नही रहती थी , आज चुप थी , तीनो ही चुप थे

अचानक वह बीच मे से उठी और देवाशीष  के बगल में दूसरी तरफ जा कर बैठ गई ।सोमेन स्क्रीन की तरफ ही देखता रहा ।उसने कोई प्रतिक्रिया नही दी अब सोमेन के बगल की सीट खाली थी उसके बाद देवाशीष बैठा था और उसके बगल में दूसरी तरफ वो जाकर बैठ गई थी । उसने देवाशीष के कंधे से सर टिका दिया था सोमेन अपनी बगल की खाली सीट को इग्नोर कर रहा था । वो खुश थी। गीत गूंज रहा था 

" तोमार छाडा एई जगते , मोर केउ नाइ किछू नाइ गो"

देवाशीष ने प्याली के कान में धीरे से कहा था सोमेन तेरे ऊपर विश्वास  करता है ।

सेटा तार भूल (यह उसकी गलती है )

देवाशीष ने देखा 

पियाली में न कोई अपराध बोध था न कोई झिझक उसने सोमेन को एक स्पष्ट संदेश दे दिया था । 

फिल्म क्या थी यह अब किसी को याद नहीं है देवाशीष को जो याद था था वह था उसका सिर जो देवाशीष के कंधे से आ टिका था ।उसकी गर्म सांसें जो उसके गले से टकरा रही थीं ।उसकी उंगलियां जो उसके हाथों में फंस चुकी थी ।

एक दिन शाम को वे पार्क में बैठे थे 

पियली ने  घास की कुछ पत्तियां तोड़ी और देते हुए कहा कि ये रख लो 

क्यों

इसलिए कि तुम्हे याद रहे कि यह शाम मैने चुराई है 

वह मुस्कुराया तुम नदी हो सब कुछ बहा ले जाती हो 

और तुम मेरा किनारा हो जो मुझे रोकता नहीं मेरे साथ साथ बहता है 


चलो एक जगह चलते हैं 

कहां 

अरे चलो तो वह उसे ले गई

कॉलेज कैंपस के पीछे ही रतन रहता था उन दोनों का दोस्त वे उसके घर गए । रतन ने दोनों को बिठाया और कुछ देर बाद वह कहीं जाने को कह कर चला गया कह गया कि जब तक इच्छा हो रुको और फिर नीचे किरायेदार को कभी दे कर चले जाना ।

कमरे में उस शाम एक अजीब-सी रोशनी थी—जैसे सूर्य बस थोड़ी देर और ठहर जाना चाहता हो। खिड़की आधी खुली थी, बाहर बादलों की धीमी-धीमी गड़गड़ाहट थी, और हवा में उस बारिश की गंध जिसे देवाशीष हमेशा “जीवन की पहली धुन” कहता था।

पियाली खिड़की के पास खड़ी थी, उसकी चूड़ियों की हल्की खनक हवा में ऐसे गूंजी जैसे मौसम ने भी उसकी उपस्थिति दर्ज की हो। उसकी आँखों में कुछ अस्थिर था—कुछ कहना चाहती थी, मगर शब्द जैसे उसके होंठों पर जन्म लेकर मर जा रहे थे।

देवाशीष ने उसे देखा, और पहली बार महसूस किया कि किसी का भीतर इतना अंधेरा भी हो सकता है और इतनी रोशनी भी। वह एक पहाड़ी नदी जैसी थी—चंचल, तेज़, मगर अपने भीतर कहीं एक गहरा  रहस्य लिए हुए।

और तभी बारिश की कुछ बूंदें खिड़की की जाली से उछल कर भीतर आईं।

पियाली ने चौंककर कहा,

“बारिश शुरू हो गई…”

दे आशीष  उसके करीब आया।

बहुत पास।

इतना कि उनके बीच की हवा भी ठहर गई।

एक पल को दोनों ने एक-दूसरे को देखा—गहरा, संकोच भरा, इच्छाओं से धड़कता हुआ।

उसका  चेहरा बारिश में हल्का भीग गया था, उसके गाल पर ठहरी बूंद जैसे कोई मोती थरथराता हो।

पियली ने पहली बार अपनी पलकें नीचे कीं।

वह पल किसी कविता जैसा था—धीमा सधे हुए शब्दों से भरा हुआ।

किसी ने कुछ नहीं कहा।

पर कमरे की हवा बोल रही थी।

बारिश बोल रही थी।

मौन बोल रहा था।

देवाशीष ने हाथ बढ़ाया, उसके चेहरे के पास थमा, पर छुआ नहीं।

जैसे अनुमति मांग रहा हो—बिना शब्दों के।

पियाली ने हल्की-सी आँखें उठाकर उसे देखा…

वह एक ‘हाँ’ थी—नाज़ुक, कांपती हुई, मगर स्पष्ट।

और फिर—

उनके होंठ पहली बार मिले।

न तेज़, न अधीर।

बस इतनी धीरे कि जैसे दो ऋतुएँ सदियों बाद पहली बार एक-दूसरे को छू रही हों।

पहले स्पर्श में ही एक थरथराहट दौड़ी—प्याली हल्का-सा डरी, उसकी उंगलियाँ कस गईं।

देवाशीष  को उसका डर महसूस हुआ, उसने होंठों का स्पर्श और भी मुलायम कर दिया—मानो कह रहा हो,

“कोई जल्दी नहीं… कोई दावा नहीं… बस यह पल।”

पियाली की साँसें भारी हुईं, फिर धीमी।

वह पिघलने लगी—

जैसे पहाड़ी नदी पहली बार किसी समतल धरती को छूती है।

धीरे-धीरे।

अपने पूरे समर्पण के साथ।


उनके बीच की दूरी खत्म होने लगी—

पर देह का स्पर्श सिर्फ देह का नहीं था।

यह मन का अर्पण था, एक गहरा स्वीकार।

कमरा उनका संसार बन गया।

खिड़की पर बारिश तेज़ हो गई।

बाहर अंधेरा उतरने लगा।

अंदर हल्की पीली रोशनी में उनके चेहरे चमक रहे थे—

दो आत्माएँ जैसे पहली बार अपने भीतर के बंद दरवाज़े खोल रही हों।

दोनोँ के होंठों ने एक-दूसरे के भय को छुआ,

एक-दूसरे की चाहत को समझा,

और एक-दूसरे के मन को स्वीकारा।

उस पहले चुम्बन में प्रेम भी था, अपराधबोध भी,

आकर्षण भी था, और एक अनकहा डर भी—

जैसे वे दोनों जानते हों कि यह रास्ता कहीं नहीं जाता,

फिर भी चलने लायक है।

जब होंठ अलग हुए, प्याली ने आँखें बंद रखीं—

मानो वह उस स्पर्श को पूरी आत्मा में समाहित कर लेना चाहती हो।


देवाशीष ने धीमे से कहा,

“डर लग रहा है?”


प्याली ने आँखें खोले बिना उत्तर दिया—

“हाँ… पर अच्छा लग रहा है… जैसे पहली बार किसी ने मुझे पूरा सुना हो।”

उसने  उसके कंधे पर सिर रख दिया

कमरा शांत हो गया था 

बाहर बारिश  लगातार बह रही है—

और भीतर दो मौसम एक होकर ठहर गए हैं।

उसके बाद वे अक्सर मिलते कभी लाइब्रेरी ,कभी कैंटीन कभी गैलरी और कभी कभी उस कमरे में भी जहां वे दो से एक हो जाते 

वे अक्सर मिलते एक दिन वो देवाशीष का हाथ पकड़कर बोली

आमी जोदी हारिए जाइ धोरते पारबे

(अगर मैं खो जाऊँ… तो पकड़ लोगे?)

“हाँ।”

पर उसे पकड़ना इतना आसान नहीं था।

वह नदी थी—

और नदी कभी रुकी रहती है?



और फिर एक दिन नदी ने रास्ता बदल लिया


उस दिन वह बहुत शांत थी।

वैसी शरारत नहीं, वैसी चमक नहीं।


उसने कहा—

आमार बीए होच्छे 

(मेरी शादी हो रही है.)

 हवा अचानक रुक गई 

किससे?”

उसने मुश्किल से पूछा।

वह धीरे से बोली—

सोमेन 

लेकिन

उसने अपने परिवार वालों के साथ मेरे घर आ कर बात की उसे एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई है । घर पर सब चाहते हैं मैं उस से शादी कर लूं ।

और तुम 

शायद मैं भी

 देवाशीष उसे रोकना चाहता था।

चिल्लाकर कहना चाहता था कि वह उसके बिना नहीं रह पाएगी,

पर वह खुद आगे बोली—तुम मेरे दिल की आवाज़ हो… लेकिन मेरा भविष्य नहीं

“तुम खुश हो?”

उसने किसी तरह पूछा।


वह मुस्कुराई—

“खुश नहीं… पर शांत।”

फिर बोली—

“मैं नदी हूँ …पर घर की नींव नदी पर नहीं रखी जाती।”

देवाशीष  उसे रोक सकता था—

कह सकता था कि वह उसे चाहता है,कि वह बदल सकता है,कि वह भी एक सुरक्षित सहारा बन सकता है।लेकिन वह चुप रहा।और हारी हुई चुप्पियाँ सबसे लंबी होती हैं।

हवा स्थिर थीपियाली ने उसका हाथ पकड़ा,

और कहा—“अगर तुम मुझे रोकते… तो शायद मैं रुक जाती।

पर मैं तुम्हारे भरोसे नहीं रह सकती।

 उसने धीरे से उसका हाथ छोड़ दिया।

देवाशीष ने देखा—

एक नदी उसके सामने बह रही हैऔर वह हाथ बढ़ा नहीं पा रहा।

पियाली चली गई।और उसके जाते ही दुनिया में एक अजीब तरह की खामोशी फैल गई।

पियाली के जाने के बाद देवाशीष की ज़िंदगी किसी अधूरी किताब की तरह हो गई—जिसके पन्ने तो थे, पर कहानी का केंद्र अचानक गायब हो गया था।  दिन अब सबसे भारी लगने लगे। जो रास्ते कभी हल्के-फुल्के कदमों से तय होते थे, अब उन्हीं पर चलते हुए उसके कदम घसीटने लगे। जैसे शहर वही था पर उसके रंग उतर गए थे ।

जिस दिन पियाली की शादी की खबर पक्की हुई, देवाशीष  के भीतर कुछ टूटकर बिखर गया। उसने यह खबर एक दूसरे दोस्त से सुनी। वह जानता था यह दिन आएगा, पियाली ने खुद बताया था, पर खबर सुनकर भी दिल को कैसे समझाया जाता?वह घंटों चलता रहा। शहर की गलियों में बिना मंज़िल भटकता रहा। उसे लगा जैसे वह खुद से भाग रहा है—पर वह खुद से कहाँ भाग सकता था?उस रात उसने पहली बार महसूस किया कि किसी को खोना सबसे बड़ा दर्द नहीं, बल्कि खोकर भी उसे चाहना सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देता है।

जब पियाली ने कहा था— नदी सूख चुकी है देवाशीष”तो देवाशीष को लगा था जैसे उसके अपने भीतर की कोई धारा भी एकदम से खाली हो गई।पर वह समझता था—सूखी नदियाँ वापस नहीं आतीं।वे सिर्फ अपने पुराने रास्तों के निशान छोड़ जाती हैं, और उन्हीं निशानों पर यादें चलती रहती हैं।वह जानता था कि यदि वह चाहे भी, पियाली को अपने जीवन में वापस नहीं ला सकता।प्रेम सिर्फ चाहने से नहीं लौटता—उसके लिए एक पूरा समय, एक पूरा संसार, एक पूरा मन चाहिए।और वे सब बिखर चुके थे।

प्रेमिकाएँ वो नहीं होतीं जिनसे जीवन बनता है,वे वह होती हैं जिनके सहारे आदमी भूलना सीखता है।वे याद दिलाती हैं कि प्रेम दोबारा जन्म ले सकता है,पर पहले जैसा कभी नहीं होता।जीवन में सब कुछ मन के अनुसार नहीं होता…और शायद होना भी नहीं चाहिए।कुछ प्रेम पूर्ण नहीं होते—इसलिए ही अमर होते हैं।”

और पियाली…अब उसके पास वापस नहीं आएगी।पर वह उसके भीतर हमेशा रहेगी—एक दीपक की तरह,एक खरोंच की तरह,एक स्मृति की तरह,एक मणि की तरह—जो छीन तो ली गई है,पर जिसका दर्द ही अब उसका सत्य है।






मंगलवार, 4 नवंबर 2025

शिक्षा में पुतली कला की भूमिका

 शिक्षा में पुतली कला की भूमिका

अध्याय 1: पुतली कला की भारतीय परंपरा

भारतीय उपमहाद्वीप की मिट्टी अनुभवों और स्मृतियों का अक्षय भंडार है। इसी मिट्टी से उगती हैं वंशानुगत कलाएँ, और उन्हीं में से एक है—पुतली कला। यह कला केवल हस्तकौशल नहीं, बल्कि लोकमानस की सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक बोध और आध्यात्मिक चेतना का मूर्त रूप है।

राजस्थान के रेतीले टीले जब सांध्यवेला में सुनहरे रंग से रँजित होते हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो समय स्वयं थमकर उन डोरियों में बँधे पात्रों को देखने लगा हो, जो अनादि काल से मानव भावनाओं को स्वर देते आए हैं। कभी किसी राजकुमार की शौर्यगाथा, कभी किसी साधु का संतुलित उपदेश, और कभी किसी चतुर दरबारी की ठिठोली—कठपुतली ने सब कुछ समेटा है।

परंतु यह भूलना भूल होगी कि यह केवल राजस्थान की कथा नहीं। दक्षिण का बोम्मलट्टम, बंगाल का पुतुल नाच, उड़ीसा का कुंडेई नाच, आंध्र का तोलु बोंम्मालाटा और उत्तर भारत के विविध नाट्य—पुतली कला ने विविधता को अपने में सहेजकर एक ऐसी सांस्कृतिक नदी की धारा निर्मित की है, जिसमें क्षेत्रीयता और भारतीयता दोनों एकाकार हो जाते हैं।

इतिहास की छाया में

पौराणिक ग्रंथों में ‘सूत’ और ‘मागध’ नामक कथावाचकों का उल्लेख मिलता है, जो विविध प्रसंगों को अभिनय और वाणी के द्वारा जनसमूह तक पहुँचाते थे। कई विद्वान यह मानते हैं कि इन्हीं कथावाचन परंपराओं ने आगे चलकर पुतली कला को जन्म दिया।

कुछ शिलालेखों और भित्ति-चित्रों में ऐसे संकेत भी मिलते हैं कि पुतलियाँ केवल खिलौने नहीं थीं; वे राजकाज के साधन, सैन्य प्रशिक्षण के यंत्र और नैतिक शिक्षण के उपकरण भी थीं। प्राचीन भारत में युद्धनीति, सामाजिक रीति-नीति और राज्यव्यवस्था तक को इन छोटे-से रूपकों में बाँधकर प्रस्तुत किया जाता था।

एक सूक्त प्रचलित है—

मनुष्य ने देवताओं के लिए मूर्ति बनाई, और फिर अपनी भावनाओं के लिए पुतली।

देवत्व स्थिर है, पर मनुष्य का हृदय चंचल—इसलिए पुतली निरंतर चलती है, बदलती है, और समाज के हर परिवर्तन को अपने भीतर ग्रहण करती है।

दरबार और चौपाल के बीच

राजमहलों में बैठकर जब कठपुतली कलाकार राजा की नीति-व्यवस्था पर व्यंग्य करता, तो वह केवल हँसी न थी—वह एक सामाजिक संवाद था। पुतलियों की भाषा में कहे गए दोहरे व्यंग्य और सूक्ष्म संकेत उस समय की राजनीतिक चेतना के प्रतीक हैं।

गाँवों में वही कला नैतिक शिक्षा का रूप लेती। घरों के आँगन में, चौपाल पर, मेले-ठेले में—जहाँ लोग इकट्ठा होते, वहाँ जीवन के सरल-सच्चे सिद्धांत कठपुतलियों की भाषा में सुनाए जाते।

कभी लोभी व्यापारी, कभी साहसी ग्वाला, कभी धूर्त साधु—ये सब पात्र लोकजीवन से सीधे उठाए जाते थे। इसीलिए जनमानस इन्हें अपनाता था; क्योंकि यह कला उपदेश नहीं देती थी, आत्मबोध करवाती थी।

कठपुतली को चलाने वाला कलाकार केवल अपने कौशल का प्रदर्शन नहीं करता; वह अपनी आत्मा को डोरियों से जोड़ देता है। उसके उँगलियों की हर गति में जीवन का स्पंदन, हर विराम में भाव का संचार और हर संवाद में लोक-विवेक की अनुगूँज होती है।

यह कला सिखाती है कि

 कठोर लकड़ी भी संवेदनशील हो सकती है, यदि उसे उद्देश्य और भाव दिए जाएँ।

ठीक वैसे ही जैसे शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, संवेदना भी देती है।

युग बदले। तकनीक ने जीवन को नए रूप दिए। परन्तु पुतली कला का अस्तित्व मिटा नहीं—क्योंकि यह कला यंत्रों पर नहीं, मनुष्य की कल्पना शक्ति पर जीवित है।

आज भी विद्यालयों, शोध संस्थानों, नाट्य-शालाओं और सांस्कृतिक मंचों पर पुतली कला नए अर्थों और नए संदेशों के साथ जीवित है।

भारत की क्षेत्रीय पुतली शैलियाँ

भारत की सांस्कृतिक भूमि की सबसे अद्भुत विशेषता है—उसकी बहुरंगी विविधता। यहाँ एक भाषा दूसरी से मिलते हुए भी अपनी लय बचाए रहती है; एक वेशभूषा दूसरी में घुलते हुए भी अपनी पहचान सँजोए रखती है। यही रूप पुतली कला में भी देखने को मिलता है।

भारत की कठपुतली परंपरा एक स्रोत से निकली अवश्य है, पर हर क्षेत्र ने उसे अपनी मिट्टी की महक, अपने जन-जीवन की लय और अपनी भाव-संस्कृति के साथ नया रूप प्रदान किया। इसीलिए भारत की पुतली कला केवल तकनीकी भिन्नता की कथा नहीं—यह लोक-संवेदना, क्षेत्रीय सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक अनुवांशिकी की जीवंत विरासत है।

1. राजस्थान – कथन और शौर्य का रेतीला रंग

राजस्थान की “कठपुतली”—जिसे स्थानीय भाषा में कठ-पूतली कहा जाता है—शायद भारत में सबसे प्रसिद्ध शैली है।

लकड़ी के सिर, रंग-बिरंगे वस्त्र, चमकदार घाघरे, और तारों में बंधी गति—यह शैली वीरता, प्रेम और इतिहास का सजीव उत्सव है।

कथाएँ प्रायः शाही साहस, लोक-नायकत्व और मानवीय संघर्ष की होती हैं—

राजा भोज, अमर सिंह राठौड़, पाबूजी, ढोला-मारू

जैसे पात्र यहाँ अमर हैं।

बताया जाता है कि राजपूत दरबारों में एक समय कठपुतली कलाकारों को राज-नीति समझने और समाज की नब्ज़ पहचानने का विशिष्ट स्थान प्राप्त था।

राजस्थान की कठपुतली न केवल मनोरंजन, बल्कि इतिहास और स्मृति का जीवंत अभिलेख है।

2. आंध्र प्रदेश – छाया और मंत्रणा का प्रकाश: “तोलु बोंम्मालाटा”

आंध्र प्रदेश की तोलु बोंम्मालाटा पूरी तरह भिन्न सौंदर्य प्रस्तुत करती है। यहाँ कठपुतलियाँ चमड़े से निर्मित होती हैं।

रंगों की चमक, आकार की लचक, और छाया की जीवंतता—यह मिलकर एक ऐसा दृश्य संसार रचते हैं जहाँ छायाएँ स्वयं कथा बन जाती हैं।

इनका नायक संसार दो ग्रंथों से प्रेरित—

रामायण और महाभारत।

कहते हैं इन छाया पात्रों को जब दीप-पद्धति से उजागर किया जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे देवता स्वयं परदा खोलकर कथा सुना रहे हों।

यह शैली दिखाती है कि भारतीय कला में प्रकाश और अंधकार भी संवाद कर सकते हैं।

3. कर्नाटक – देवभाव, नाटक और शिल्प का संगम: “गुम्मेता”

कर्नाटक की पुतली परंपरा “गुम्मेता” अपने भीतर एक विशेष धार्मिक और नाट्य वातावरण रखती है।

यहाँ की पुतलियाँ बड़ी होती हैं, कभी-कभी एक मनुष्य जितनी।

उनके वस्त्र और आभूषण मंदिर-परंपरा के अनुरूप होते हैं।

इस शैली में भक्ति-माहात्म्य, नायकत्व और शौर्य का मंथन है।

संवादों में संगीत का प्रधान स्वर होता है, और प्रस्तुति में वैदिक-ध्वनि की एक शांत गरिमा।

यह कला हमें याद दिलाती है—

 भारत में नाटक केवल मनोरंजन नहीं, साधना भी है।

4. बंगाल – मधुरता और लोकगीतों का पावन छंद: “पुतुल नाच”

बंगाल का पुतुल नाच सौंदर्य और सरलता का अद्वितीय मेल है।

यहाँ लकड़ी, कपड़े और मिट्टी तीनों का प्रयोग होता है।

बंगाल की पुतलियों की आँखों में एक कोमल करुणा झलकती है—मानो गीत गाते हुए स्वयं भी भावविभोर हों।

इनकी कथाएँ लोक-देवताओं, गृहस्थ जीवन और मानवीय भावों पर आधारित होती हैं। इसमें मातृत्व, प्रेम, करुणा, और ग्रामीण विनोद की अनुपम छाया मिलती है।

इस शैली की आत्मा—

 गीत और भाव की रसमयी सहजता।

5. उड़ीसा – हरि-भक्ति की रागपूर्ण छवि: “कुंडेई नाच”

उड़ीसा की शैली कुंडेई नाच कृष्ण-लीला और वैष्णव काव्य परंपरा से अनुप्राणित है।

छोटी-सी पुतलियाँ, पर भाव अपार।

यहाँ के कलाकार अपने पात्रों को केवल चलाते नहीं—पूजते हैं।

कठपुतलियाँ जब राधा-कृष्ण की कथा प्रस्तुत करती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे मंदिर की घंटियों की ध्वनि भी नृत्य करने लगी हो।

6. महाराष्ट्र और उत्तर भारत – खिलौनों से कलेवर, कथाओं से काया

उत्तर भारत में पाई जाने वाली विभिन्न पुतली विधाएँ अपेक्षाकृत छोटी, पर भावपूर्ण हैं।

महाराष्ट्र में कोणकणी और वारकरी संस्कृति की छाप, बिहार-उत्तर प्रदेश में लोककथा और समाज-हास्य का मेल, पंजाब में वीररस और हास्य का मिश्रण—ये सब रूप भारतीय लोकमानस की विभिन्न संवेदनाओं को अभिव्यक्त करते हैं।

संक्षेप में

भारत की ये विविध शैलियाँ केवल कला नहीं—

ये जीवन-दर्शन, भाव-संस्कृति और सामाजिक स्मृति हैं।

हर कठपुतली एक छोटा-सा शरीर है, पर मनुष्य की अनंत अनुभूति का वाहक।

बूँद-बूँद में सागर,

और सागर में बूँद—

यही भारतीय पुतली कला का सत्य है।


उत्तर प्रदेश की अद्वितीय पुतली परंपरा — “गुलाबो-सिताबो”


उत्तर प्रदेश की धरती पर, विशेषकर लखनऊ और अवध अंचल में, ऐसा ही एक अनूठा रूप विकसित हुआ —

“गुलाबो-सिताबो”।


कौन हैं गुलाबो और सिताबो?


गुलाबो-सिताबो दो महिला पात्र हैं, दो पुतलियाँ—

पर वस्तुतः वे अवध की दो चतुर, तुनकमिज़ाज, फब्ती कसने वाली स्त्रियाँ हैं, जो जीवन की छोटी-छोटी चुभन और मिठास को हास्य में बदल देती हैं।

उनकी वेशभूषा में अवध की नज़ाकत और अंदाज़ निहित—

रंगीला दुपट्टा, नक्काशीदार नाक की लौंग, और परदे के पीछे से आती तंज-भरी आवाज़ें।


इन दोनों पात्रों की बातचीत सुनकर लगता है जैसे लखनऊ की गलियों में तहज़ीब और टेढे-मेढे तंज का पतंग-जसा खेल चल रहा हो।


> गुलाबो: थोड़ी तेज-तर्रार, नटखट, तंज़ की धार।

सिताबो: चुलबुली, प्रत्युत्तर-कुशल, जीवन-रागरंग में पगी हुई।




उनकी नोक-झोंक जीवन की सहज असहमति को हँसी में बदल देती है।


लोकभाषा का सौंदर्य


गुलाबो-सिताबो का संवाद शुद्ध लोक-अवधी और देसी लखनऊई ठसक लिए होता है। वहाँ किताबों का व्याकरण नहीं, गली-मुहल्लों की बोलचाल का जीवंत रस है।


इनकी आवाज़ में वह मस्ती है, जिसे कबीर ने “निंदक नियरे राखिए” की तरह जीवन का आवश्यक मसाला माना।

स्त्री-जीवन के छोटे-छोटे व्यंग्य—

सास-बहू की खिट-पिट, पड़ोस की चुहलबाज़ियाँ, पति-पत्नी की नोक-झोंक, और ज़िंदगी की किफ़ायत—सब इनकी बातचीत में नाच उठते हैं।


कला और समाज का दर्पण


गुलाबो-सिताबो केवल मनोरंजन नहीं; यह लोक-स्त्री की आवाज़ है।

समाज में स्त्री की वाणी अक्सर दबाई गई; पर कठपुतली के रूप में वही वाणी चुटकी लेकर, तंज करके, हँसी में लपेटकर अपना सच कह देती है।


जब वे कहती हैं—


> “हमरी सुनो सरकार, हम बिना पैसा कैसे गुज़ार?

महँगाई के मारे, चूल्हा ठंडा पड़ा चार-चार।”




तो यह केवल हँसी नहीं, गरीबी, गृहस्थी और संघर्ष का मार्मिक चित्रण भी है।


लोक कलाकारों की विरासत


इस परंपरा को पीढ़ियों से घूम-घूमकर प्रस्तुत किया गया—

मेला, हाट, चौपाल, बारात, तिराहे, स्कूल।

एक बांस की छड़ी, दो कपड़े की गुड़ियाँ, और कलाकार की तीखी-मीठी ज़बान ही इस कला का आधार।


यह कला किसी महल में  नहींजन्मी , लोकगलियों में पली, लोकजीवन में फली, और जनभावना का दर्पण बनी।

आज यह कला, लोकमंच और शैक्षणिक मंचों पर पुनः जीवित की जा रही है।
बच्चों, स्त्रियों और ग्रामीण समुदायों में सामाजिक शिक्षा, जेंडर-समानता और जनजागरण के लिए गुलाबो-सिताबो का उपयोग बढ़ रहा है।



पुतली कला का दार्शनिक-सांस्कृतिक आधार

भारतीय कला परंपरा का मूल केवल सौंदर्याभिव्यक्ति नहीं, बल्कि चेतना की खोज है। यहाँ कला मनोरंजन का साधन भर नहीं—अस्तित्व के रहस्य का उत्कंठित अन्वेषण है।
पुतली कला भी इसी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक धारणा से जन्मी है।
वह मनुष्य द्वारा रचा हुआ एक संसार है, जिसमें मनुष्य स्वयं को—अपने भाव, संघर्ष और आकांक्षाओं को—दूसरी सत्ता के रूप में देखता है। यही स्व-अनुशीलन उसकी जड़ है।

 “नट-नटवर” और “नटराज़” का तात्त्विक संबंध

भारतीय चिंतन में ब्रह्मांड एक नृत्य है — नटराज का नृत्य — जहाँ सृष्टि और संहार, गति और विराम, सब एक लय में बँधे हैं।
कठपुतली कलाकार उसी तत्त्व का लघु रूप प्रतीत होता है—
वह डोरियों से गति देता है;
परंतु दर्शक उस गतिमयता में ईश्वर और जीव के संबंध का प्रतीक खोज लेता है।

धागों के पीछे छिपे कलाकार का हाथ मानो कहता है:

 जो दिखाई देता है, वह दृश्य है;
पर जो चलाता है, वह अदृश्य।



यही सूत्र उपनिषदों का भी है —
“दृश्य-अदृश्य के द्वंद्व में ही सत्य जन्म लेता है।”

 जीव-जगत का प्रतीक — मनुष्य और उसकी डोरियाँ

भारतीय दर्शन में मनुष्य को प्रायः बंधन और मुक्ति की संवेदना से देखा गया है।
कठपुतली इसके लिए अत्यंत सटीक रूपक है —
डोरियों में बंधा शरीर,
परांत निर्देशित गति,
और भीतर छटपटाती चेतना।

यह वही द्वंद्व है जो गीता में अर्जुन पूछता है —
“क्या मनुष्य अपने कर्मों का स्वामी है, या नियति उसके कदमों को दिशित करती है?”

कठपुतली कला इसका सौम्य उत्तर देती है —

 संसार रूपी रंगमंच पर मनुष्य चलता है,
पर उसकी डोरियाँ कर्म, संस्कार और समय के हाथ में होती हैं।



“माया-नाटक” की अवधारणा

भारतीय ग्रंथों में संसार को “माया-नाटक” कहा गया —
जहाँ सब पात्र आए, भूमिका निभाई, और विलीन हो गए।
कठपुतली इसी दार्शनिक प्रतिमान का जीवंत रूप है।

एक छोटी प्रस्तुति में भी जन्म-विकास-संघर्ष-आनंद-विराम का क्रम दिखता है।
दर्शक उस क्षणिक नाटक में जीवन का विराट भाव अनुभव करता है —

 क्षणभंगुरता और अर्थ खोजने का अद्भुत संवाद।



 लोक-संस्कृति और सामूहिक स्मृति

भारतीय संस्कृति में ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, लोक-वाणी में भी जीवित रहा है —
कहानियों, गीतों, कहावतों, और नाट्य रूपों में।
पुतली कला इसी लोक स्मृति की संरक्षक है।

इसमें वे मूल्य समाहित हैं जो हजारों वर्षों से भारतीय चेतना में प्रवाहित हैं:

धर्म (कर्तव्य और नैतिकता)

लौकिक विवेक (व्यवहार-नीति)

प्रेम और करुणा

व्यंग्य और आत्म-समीक्षा

सामूहिकता और सहजीवन


जहाँ शास्त्र आदर्श देता है, वहाँ लोक-कला जीवन की और भी सच्ची कथा सुनाती है —
मिट्टी, खेत, चौपाल, दुख, और विनोद की कथा।

 स्त्री-स्वर और पारिवारिक संवेदना

भारतीय लोककला में स्त्री की आवाज़ अक्सर पिरोई जाती है—
कभी गीत में, कभी व्यंग्य में।
पुतली कला इस स्वर को दोहराती है; वह स्त्री-जीवन की पीड़ा को हँसी और व्यंग्य में बदल देती है।
यह भारतीय सांस्कृतिक बुद्धिमत्ता है —
दुख को करुणा बनाकर नहीं, हँसी बनाकर पार करना।

आत्मा और प्रतिरूप — “अहं और प्रतिबिंब”

जब कलाकार पुतली को चलाता है, तो वह उसे केवल बाहरी रूप नहीं देता; अपनी चेतना का अंश भी देता है।
यह वही अनुभव है जो भारतीय दर्शन में प्रतिबिंब-वाद के नाम से विख्यात है:
आत्मा एक है, रूप अनेक।

कठपुतली कलाकार अपनी सृष्टि रचता है —
और दर्शक उसमें स्वयं को पहचान लेता है।
यही कला का परम लक्ष्य है —

 दूसरे में स्वयं का बोध।


शिक्षा में कला का प्रयोग

भारतीय शिक्षा परंपरा केवल ज्ञानार्जन तक सीमित नहीं रही; वह जीवन-शिक्षा रही है। यहाँ शिक्षा का लक्ष्य मन को पुस्तकीय तथ्य भरना नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और चेतना को जागृत करना है। इसी कारण भारतीय गुरुकुलों में संगीत, कहानी, नृत्य, गीत, चित्रण और अभिनय—ये सभी साधन ज्ञान के वाहक थे।

आज जब शिक्षा “तथ्य” की भीड़ और “परिणाम” की दौड़ में उलझती जा रही है, तब पुनः यह स्मरण आवश्यक है कि

 कला ही वह तत्व है जो शिक्षा को जीवंत बनाती है।



कला बौद्धिक प्रक्रिया को भावनात्मक उष्मा देती है; व्यवहारिक दक्षता में सौंदर्यबोध जोड़ती है; और मानव को केवल “जानने वाला” नहीं, संवेदनशील मानव बनाती है।

 कला — भावनाओं से बौद्धिकता तक का पुल

शैक्षिक मनोविज्ञान बताता है कि भावनात्मक स्पर्श से समझ गहरी होती है।
कला बच्चे की संवेदना को स्पर्श करती है, और वह ज्ञान को ग्रहण करने के लिए सहज, खुला और उत्सुक हो जाता है।

कला के माध्यम से सीखने में

स्मृति स्थायी होती है

कल्पनाशक्ति तीक्ष्ण होती है

भाषा और अभिव्यक्ति विकसित होती है

अवलोकन कौशल बढ़ता है

टीमवर्क और सामाजिक समझ बनती है


यह केवल “विषय-अध्ययन” नहीं, जीवन कौशल का विकास है।

 खेल, अभिनय और कहानी — प्राकृतिक शिक्षण पद्धति

बच्चे स्वभावतः नाटक करते हैं—
वे मिट्टी में कल्पना रचते हैं, लकड़ी को तलवार और कागज को नाव बना देते हैं।
उनके लिए संसार खेल है, और खेल ही शिक्षा।

इसलिए शिक्षा भी जब कथा और अभिनय का रूप लेती है, तो ज्ञान सहजता से हृदय में उतर जाता है।

> अधिगम तब तेज होता है
जब विद्यार्थी केवल सुनता नहीं—जीता है।



यही कारण है कि कठपुतली, कहानी, लोकगीत, चित्र और खेल—यह केवल गतिविधियाँ नहीं, अधिगम की जड़ें हैं।

मूल्य शिक्षा में कला की भूमिका

सभ्य समाज संवेदनशील समाज है।
नैतिक शिक्षा केवल आदेश से नहीं आती;
वह अनुभव और भावनात्मक अनुकरण से आती है।

कठपुतली और कला

करुणा

सहयोग

सत्य

सहनशीलता

सामाजिक उत्तरदायित्व

न्याय और समानता


जैसे मूल्यों को कथा के माध्यम से सहज, रोचक और प्रभावशील बनाती है।

जब बच्चा किसी पुतली पात्र को विपत्ति में देखता है, तो वह अन्य के दुःख की अनुभूति करना सीखता है।
यही मानवीयता का बीज है।

बहु-संवेदी (Multisensory) अधिगम — कला का विज्ञान

आधुनिक शिक्षाशास्त्र बताता है कि बहु-संवेदी अनुभव—देखना, सुनना, स्पर्श, गति—साथ आते हैं, तब सीखना सबसे प्रभावी होता है।

कला इन्हें स्वाभाविक रूप से जोड़ देती है।

विशेष रूप से पुतली नाट्य में—

दृश्य (चरित्र, रंग, भाव)

श्रव्य (स्वर, संगीत, संवाद)

क्रिया (गति, सहभागिता)

कल्पना (आंतरिक अनुभव)


सभी घटक मिलकर एक समग्र अधिगम अनुभव बनाते हैं।

आत्मविश्वास और भाषा विकास

जो बच्चे साधारण कक्षा में मौन रहते हैं, वे कला-अधिगम में मुखर हो जाते हैं।
छोटा पात्र उन्हें सुरक्षित स्थान देता है—
वे पुतली की आवाज़ बनकर बोलते हैं, और अपने डर को क्रिएटिव अभिव्यक्ति में बदल देते हैं।

यही अभिव्यक्ति
भाषा, तार्किकता और संवाद कौशल में परिवर्तित होती है।

कला बच्चे को बोलना नहीं सिखाती,
स्वयं को कहना सिखाती है।


रचनात्मकता — 21वीं सदी का मूल कौशल

आज की दुनिया ज्ञान की नहीं, नवोन्मेष की है।
कला रचनात्मकता, समस्या समाधान और कल्पना—इन तीनों को पोषित करती है।
भविष्य की शिक्षा वहीं सफल होगी जहाँ विचार भी स्वतंत्र हों और अभिव्यक्ति भी।

शिक्षा का मानवीकरण

कला शिक्षा को मशीन नहीं बनने देती।
अंक और रिपोर्ट कार्ड शिक्षा का लक्ष्य नहीं—मनुष्य-निर्माण है।

कला हमें याद दिलाती है कि

 शिक्षा तब पूर्ण होती है
जब मनुष्य केवल समझदार नहीं,
संवेदनशील, सृजनशील और नैतिक भी हो।


कला-आधारित शिक्षण के सिद्धांत

शिक्षा का लक्ष्य केवल मस्तिष्क को सूचना-संपन्न बनाना नहीं; वह हृदय को संस्कारित करने और व्यक्तित्व को विकसित करने की प्रक्रिया है।
 यह विकास तभी संभव है जब ज्ञान केवल पढ़ाया न जाए, बल्कि अनुभव कराया जाए। कला इस अनुभूति का माध्यम है — वह सूखे शब्दों में रस मिलाती है और ज्ञान को जीवित अनुभव में रूपांतरित करती है।

कला-आधारित शिक्षण केवल एक पद्धति नहीं, बल्कि एक दर्शन है — यह मान्यता कि मनुष्य सीखते समय सिर्फ बुद्धि नहीं, बल्कि भाव, कल्पना, इंद्रियाँ, अनुभव और संपूर्ण अस्तित्व के साथ सक्रिय होता है।

1. अनुभव सिद्धांत (Experiential Learning)

कला आधारित शिक्षा अनुभव के माध्यम से सीखने पर बल देती है।
बच्चा तब सचमुच सीखता है जब उसने

देखा हो

सुना हो

किया हो

महसूस किया हो


कठपुतली, चित्र, नृत्य, नाट्य—ये सभी सीखने को जीवन की घटना बना देते हैं।
जैसे गुरुकुलों में वन और नदी शिक्षक थे, वैसे ही कला अनुभव की धरती तैयार करती है।

2. भावनात्मक अधिगम सिद्धांत (Affective Learning)

मनोविज्ञान कहता है —
“मनुष्य वही याद रखता है जो उसके हृदय को छू जाए।”

कला हृदय में उतरती है।
एक गीत, एक चित्र, एक नाट्य दृश्य —
बच्चे की अंतरात्मा में मूल्य, संवेदना और नैतिकता के बीज बोते हैं।

शिक्षा तब संपूर्ण होती है जब वह

केवल समझाए नहीं,

महसूस कराए।


3. बहु-बुद्धि सिद्धांत (Multiple Intelligences)

हॉवर्ड गार्डनर का सिद्धांत बताता है कि बुद्धि एक नहीं, अनेक आयामों में विद्यमान है —

भाषिक

तार्किक-गणितीय

संगीतिक

दृश्य-स्थानिक

शारीरिक-गतिज

भावनात्मक

सामाजिक

प्रकृति संबंधी


कला इन सभी बुद्धियों को सक्रिय करती है।
कठपुतली बनाना शारीरिक-गतिज,
कहानी सुनाना भाषिक,
संगीत श्रवणिक,
दृश्य प्रदर्शन स्थानिक,
और भूमिका-अभिनय सामाजिक बुद्धि को पोषित करता है।

4. रचनात्मक निर्माण सिद्धांत (Constructivist Learning)

कला आधारित शिक्षा बच्चे को
मन का शिल्पकार मानती है,
सिर्फ ग्राहक नहीं।

बच्चा केवल ग्रहण नहीं करता —
वह रचता है, प्रश्न करता है,
कल्पना करता है, संश्लेषण करता है।

कला में वह अपनी दुनिया बनाता है —
रंगों, ध्वनियों, आकृतियों और कथाओं की दुनिया।

यही सक्रिय निर्मिति
शिक्षा को आत्म-अनुभव बनाती है।

5. संलग्नता सिद्धांत (Engagement Theory)

जिस शिक्षा में आनंद है,
रुचि है,
रचनात्मकता है —
वही टिकाऊ होती है।

कला विद्यार्थी को सक्रिय रखती है —
वह सीखने की यात्रा का यात्री बनता है,
दर्शक नहीं।

कठपुतली यदि हँसाती है,
तो वह मन खोलती है।
मन खुलता है तो ज्ञान प्रवेश करता है।

6. सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत (Socio–Cultural Theory)

विगोत्स्की ने कहा —
“सीखना सामाजिक प्रक्रिया है।”

लोककला, पुतली नाट्य, लोकगीत, परंपराएँ —
ये सब बच्चे को अपने समाज, जड़ों और सामूहिक चेतना से जोड़ते हैं।

कला आधारित शिक्षण
केवल सूचना नहीं देता;
पहचान देता है।

स्वयं को, समाज को,
और अपनी संस्कृति को समझने की पहचान।

7. सौंदर्यपरक बोध सिद्धांत (Aesthetic Pedagogy)

कला सौंदर्य की साधना है।
सौंदर्य केवल सुंदरता नहीं —
यह समरसता, संतुलन और संवेदना का भाव है।

जब बच्चा
रंग मिलाता है,
ताल पकड़ता है,
संवाद बोलता है —
वह सौंदर्य-बोध विकसित करता है।

यह बोध जीवन में
समरसता और मानवीयता पैदा करता है।

8. नैतिक-अधिगम सिद्धांत (Moral Imagination)

कहानी और कला में नैतिकता छिपी होती है —
प्रत्यक्ष आदेश नहीं,
मृदु प्रेरणा के रूप में।

कठपुतली के माध्यम से
जब सत्य-असत्य का नाट्य होता है,
बच्चा नैतिकता को जीने का अभ्यास करता है।

वह “डर से” नहीं,
समझ और संवेदना से नैतिक बनता है।


पुतलीकला और बाल मनोविज्ञान

बचपन मनुष्य-जीवन की वह सुकोमल ऋतु है, जब मन मिट्टी की तरह नरम होता है और हर अनुभूति उसमें छाप छोड़ जाती है। जैसे किसान बीज बोते समय मिट्टी की प्रकृति पहचानता है, वैसे ही शिक्षा का वास्तविक स्वरूप बाल-मन की प्रकृति को पहचानने में है।

पुतलीकला बाल-मन की उसी भाषा में बोलती है —
खेल की भाषा, कल्पना की भाषा,
कहानी की लय और भावों की धुन वाली भाषा।

बच्चा वस्तुओं को जानने से पहले जीवित रूप में महसूस करता है।
एक लकड़ी का टुकड़ा, जब आँखें और आवाज़ पाता है,
तो वह बच्चे के लिए खिलौना भर नहीं रहता —
वह सहचर, मार्गदर्शक और भावनात्मक संसार का हिस्सा बन जाता है।

1. प्रतीकात्मक चिंतन और कल्पना

बाल मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे ने कहा है —
बच्चे काल्पनिक और प्रतीकात्मक रूपों द्वारा सीखते हैं।

कठपुतली एक प्रतीक है —

वस्तु होकर भी जीव

खेल होकर भी शिक्षा

कल्पना होकर भी यथार्थ


जब बच्चा कठपुतली से संवाद करता है,
तो वह वास्तव में विचारों और भावनाओं का अभ्यास कर रहा होता है।

वह कठपुतली को अपना मित्र मानता है,
और मित्र के सामने हृदय खुलता है —
यही शिक्षा का आरंभ है।

2. अनुकरण प्रवृत्ति

बच्चे अनुकरण से सीखते हैं।
कठपुतली उनके लिए उदाहरण बनती है।

यदि कठपुतली सत्य बोलती है,
गिरने पर उठती है,
दूसरों की सहायता करती है,
संवाद में विनम्र रहती है —
बच्चा भी वैसा होना चाहता है।

यह शिक्षा आदेश से नहीं,
अनुभव और आकर्षण से जन्म लेती है।

3. भावनात्मक सुरक्षा और अभिव्यक्ति

कठपुतली एक “सुरक्षित माध्यम” है।
बच्चा कभी-कभी अपने मन की बात सीधे नहीं कह पाता,
पर कठपुतली के माध्यम से कह देता है।

उदाहरण:
एक बच्चा कह सकता है—
“यह कठपुतली डर रही है,”
जबकि असल में वह स्वयं डर रहा होता है।

इस प्रकार कठपुतली बच्चे को
भाव व्यक्त करने का सुरक्षित पुल प्रदान करती है।

4. संवाद कौशल और भाषा-विकास

कठपुतली से वार्तालाप
बच्चे में भाषा और सामाजिक कौशल विकसित करता है —

स्पष्ट उच्चारण

शब्दावली विस्तार

क्रमबद्ध वाक्य

सुनने की क्षमता

प्रश्न करना


कठपुतली श्रवण–दृश्य–गतिशील
तीनों रूपों से भाषिक विकास को पोषित करती है।

5. सामाजिक सीख और सहानुभूति

कठपुतली के पात्र —
राजा–रानी, किसान–बच्चा, जानवर–देवी आदि —
बच्चे को समाज के विविध रूप दिखाते हैं।

जब पुतली दुखी होती है,
बच्चा सहानुभूति सीखता है।
जब पुतली हँसती है,
बच्चा साझा उल्लास का अनुभव करता है।

यह सामूहिक भावशीलता
मनुष्यत्व की जड़ें गहरी करती है।

6. सक्रिय अधिगम और ऊर्जा का संतुलन

बच्चों में ऊर्जा अपार होती है।
यदि उसे मार्ग न मिले, तो वह चंचलता बनती है;
यदि सही दिशा मिले तो रचनात्मकता।

कठपुतली-निर्माण, सजावट, संचालन, कथा-वाचन —
ये सभी कार्य बच्चे की ऊर्जा को
शिक्षण में रूपांतरित करते हैं।

7. आत्मविश्वास और पहचान निर्माण

जब बच्चा कठपुतली चलाकर संवाद करता है —
वह मंच पर नहीं,
आत्मा के मंच पर खड़ा होता है।

वह जानता है कि सबकी निगाह कठपुतली पर है,
उस पर नहीं।
इससे उसका संकोच टूटता है,
आत्मविश्वास पनपता है।

धीरे-धीरे वह स्वयं सामने आ खड़ा होता है —
स्वर विकसित होता है।

8. खेल-आधारित सीखने का सिद्धांत

आधुनिक शिक्षा शास्त्र कहता है —
बच्चे खेल में सबसे अधिक सीखते हैं।

कठपुतली नाटक
खेल भी है और कथा भी।
इसलिए यह सीखने की
सबसे प्राचीन और प्रभावी कला है।

संप्रेषण, भाषा एवं अभिव्यक्ति कौशल में पुतली कला की भूमिका


मनुष्य का प्रथम संप्रेषण संकेतों, हाव-भाव और ध्वनियों से हुआ। भाषा शब्दों के रूप में बाद में जन्मी। पुतली कला इन दोनों अवस्थाओं—पूर्व-भाषिक संप्रेषण और भाषायी अभिव्यक्ति—को एक साथ समाहित करती है। यही कारण है कि यह बच्चों के भाषिक विकास, सामाजिक संवाद और आत्मअभिव्यक्ति को अत्यंत स्वाभाविक, आनंदमय और प्रभावी रूप से विकसित करती है।

पुतली कला शिक्षा में तकनीक नहीं, अंतर-प्राण है—
जहाँ बच्चे बोलते ही नहीं, संवाद में जीते हैं।


---

1. भाषा अर्जन का मनोभाषिक आधार

 (क) अनुकरण सिद्धांत (Imitation Theory)

बच्चे शिक्षक और पुतली के संवाद का अनुकरण करते हैं।

पुतली बोलती है — बच्चा उसी स्वर में बोलता है।

संवाद बढ़ता है — भाषा विकसित होती है।


> बच्चे imitate नहीं करते, जीते-जागते संवाद को ग्रहण करते हैं।



 (ख) सामाजिक अंतःक्रिया सिद्धांत (Social Interaction Theory - Vygotsky)

वाइगोत्स्की के अनुसार सीखना सामाजिक सहभागिता से होता है।
पुतली बच्चों और शिक्षक के बीच सांस्कृतिक पुल बन जाती है—

बच्चे सहजता से प्रश्न पूछते हैं

जिज्ञासा प्रकट करते हैं

प्रतिक्रिया देते हैं


इससे Zone of Proximal Development सक्रिय होता है।

(ग) बहु-बौद्धिकता सिद्धांत (Howard Gardner)

पुतली कला कई बुद्धियों को एक साथ सक्रिय करती है:

भाषिक बुद्धि

अंतर्सम्बंधी बुद्धि

सांगीतिक-श्रव्य बुद्धि

काइनेस्थेटिक (शारीरिक) बुद्धि


इसलिए सम्पूर्ण भाषा विकास होता है।


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2. संप्रेषण कौशल का वैज्ञानिक विकास

कौशल पुतली कला से प्रभाव

Listening कथा, संवाद, ध्वनि अनुकरण
Speaking संवाद, भूमिका-निर्वाह, गीत
Reading संवाद-पत्र, कहानी-पाठ
Writing स्क्रिप्ट रचना, संवाद निर्माण


यह प्रक्रिया language lab की तरह काम करती है—
लेकिन मनोरंजन और आनंद के माध्यम से।


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3. भावनात्मक-बौद्धिक संप्रेषण

भाषा केवल शब्द नहीं—
भावना + आवाज़ + प्रतीक + मौन का संगीत है।

पुतली कला बच्चों को सिखाती है—

क्रोध को शब्द देना

दुख को व्यक्त करना

प्रसन्नता को साझा करना

सहानुभूति दिखाना


“मैं नाराज़ हूँ, क्योंकि तुमने मेरी बात नहीं सुनी।”
— इस वाक्य को पुतली के माध्यम से बोलना
संस्कारी भाव-शिक्षा है।


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4. पुतली एक ‘भावनात्मक दर्पण’

बहुत से बच्चे सीधे नहीं बोल पाते—
वे पुतली के माध्यम से बोलते हैं:

 “मेरी पुतली शर्माती है।”
“मेरी पुतली भूखी है।”



यह projection therapy जैसा कार्य करता है।
भाषा केवल बोलने की क्रिया नहीं—
अंतरमन की मुक्ति बन जाती है।


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5. समूह संप्रेषण और नेतृत्व कौशल

पुतली नाटक में

भूमिकाएँ बाँटना

मंच संचालन

संवाद समन्वयन

प्रश्नोत्तर
नेतृत्व और सहयोग कौशल को मजबूत करता है।


यह भविष्य के सामाजिक नेतृत्व और team communication का आधार है।


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6. शिष्ट भाषा एवं सामाजिक व्याकरण

संवाद से बच्चे सीखते हैं—

धन्यवाद देना

क्षमा माँगना

विनम्रता

अनुरोध करना


> “कृपया, क्या तुम मुझे वह रंग दोगे?”



यह सभ्य संप्रेषण का पाठ है।


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7. बहुभाषी संप्रेषण

पुतली बहुभाषा सीखने का उपकरण है।
एक ही दृश्य:

Hindi: “चलो खेलें।”

English: “Let's play!”

स्थानीय बोली: “चली रे खेलई!”


बच्चे भाषाएँ अनुभव से सीखते हैं, नियमों से नहीं।


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8. मौन भाषा (Silence as Expression)

पुतली कभी-कभी मौन भी रहती है।
यह सिखाता है—

भाव-वाचन

नज़रों की भाषा

शारीरिक संकेत

प्रतीकवाद


मौन भी संवाद है;
और पुतली कला इसे जीना सिखाती है।


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9. व्यवहारिक उदाहरण

🎭 कक्षा गतिविधि उदाहरण

गतिविधि: पुतली के साथ दिवस शुभारंभ
शिक्षक पुतली लेकर कहते हैं:

“बच्चो, आज हम ‘मित्रता’ पर बात करेंगे।”



बच्चों से संवाद:

मित्र कौन?

गुस्सा आए तो क्या करें?

धन्यवाद कब कहते हैं?


इस गतिविधि से
भाषा + मूल्य + भाव + सामाजिक कौशल
एक साथ विकसित होते हैं।






सोमवार, 3 नवंबर 2025

बेताल कथा

 राजा विक्रम ने बेताल को पकड़ कर कंधे पर डाला और चल पड़ा ।बेताल बोला राजन एक कहानी सुनता हूं 

एक नगर था—जननगर।

वहाँ एक आदमी रहता था—नाम?

कोई नहीं जानता। सब उसे आम जन कहते थे।


सुबह उसकी शुरू होती थी

घड़ी के अलार्म से नहीं,

महँगाई के डर से।


चावल महँगा, तेल महँगा, पेट्रोल आसमान में,

मगर उम्मीद हमेशा रोटी से भी ज्यादा फूली रहती।


वह ऑफिस जाता—बस में धक्के खाते,

लाइन में खड़ा रहता—बैंक में, अस्पताल में, राशन में

और सुनता एक ही वाक्य:

“बाद में आइए।”


घर आता तो बच्चा पूछता,

“पापा, नया बैग लेंगे?”

पत्नी कहती,

“दूध कम करना पड़ेगा।”

वह मुस्कुराता—

क्योंकि आँसू दिखा देने से घर का हौसला गिर जाता।


टीवी पर नेता बोलते—

“देश बदल रहा है!”

वह सोचता—

“हाँ, पर मेरा क्या बदल रहा?”


रात को इंटरनेट पर किसी ने पूछा—

“सबसे बड़ा अपराधी कौन?”

आम जन ने लिखा—

“मेरी मजबूरी।”


फिर चुनाव आया—

दरवाज़े पर नेता आए, बोले—

“आपका दर्द हमारा दर्द!”

उसने सिर हिलाया—क्योंकि उसे यह पंक्ति वर्षों से याद थी।


वोट दिया—उम्मीद के साथ

और फिर वही जिंदगी—

लाइन, महँगाई, काग़ज़ी झूठ, और मेहनत की बेड़ियाँ।


पर फिर भी वह टूटता नहीं था।

क्योंकि उसके पास

खाली जेब से बड़ी चीज थी—भरी जिम्मेदारियाँ।



-


बेताल मुस्कुराया—

“अब बता विक्रम, यह आम आदमी आखिर हारता क्यों नहीं?

क्यों वह दुखों के बीच भी चलता रहता है?”


अगर कहो कि वह मूर्ख है—तो उसके त्याग को छोटा करोगे।


अगर कहो कि वह वीर है—तो ऐसा वीर रोज़ क्यों रोता है?


अगर कहो कि उम्मीद उसे जीवित रखती है—तो उम्मीद की डोर इतनी मजबूत कैसी?


और अगर कहो कि वह मजबूर है—तो मजबूरी देश की रीढ़ कैसे बन गई?

विक्रम ने कहा 


“जब तक आम जन अपने दर्द को कर्तव्य समझेगा,

और अपने हक़ को भीख समझेगा,

तब तक उसका दुःख नहीं मिटेगा।”


इतना सुनते ही बेताल हंसता हुआ  उड़ गया—

ठीक वैसे जैसे नेता के वादे चुनाव के बाद उड़ जाते हैं।