'हाईवे ' देखी। फ़िल्म को देख रहा था और मुद्रा राक्षस का लिखा नाटक गुफाएँ दिमाग में बार बार कौंध रहा था।दो विपरीत पृष्ठभूमियों नायक नायिका। फ़िल्म का नायक महावीर भाटी अनजाने में अपहरण कर लेता है त्रिपाठी जो कि एक बड़ा व्यवसायी है की बेटी का जो अपने घर केउबाऊ वातावरण से निकल कर अपने मंगेतर के साथ सैर पर निकली थी। पर यह अपहरण अपहर्ता और अपहृत को एक यात्रा का मौका देता है अपने अंतर कि यात्रा का। जहाँ झूझते हैं वे अपने अकेले पन से और पाते हैं सहयात्री एक दुसरे को अपनी जीवन यात्रा का। फ़िल्म स्त्री सुरक्षा की बात करती है न सिर्फ देहरी के बाहर बल्कि घर की देहरी के भीतर भी . रणदीप हुड्डा औरआलिया भट्ट का शानदार अभिनय और साथ ही सपोर्टिंग एक्टर का बेहतरीन सपोर्ट फ़िल्म की कहानी को रोचक तरीके से बुनते हुए आगे बढाता है।फ़िल्म का संगीत ठीक ठाक है पर याद रखने और याद रहने लायक नहीं। सिनेमेटोग्राफी बहोत उम्दा खासकर हिमाचल और कश्मीर के दृश्य। फ़िल्म कि जो सबसे बड़ी कमी है वो है स्क्रीनप्ले। कहानी कहने का ढंग। कई बार झोल दीखते हैं और लगता है कि इम्तियाज़ के दिमाग में जो फ़िल्म बनी थी परदे पर उतारते वक़्त उसमे कुछ कमी रह गयी पर ओवरआल फ़िल्म एक बार देखि जा सकती है। मित्र रामजी सिंह के शब्दों में कहूँ अपहरण के बहाने घर की देहरी के भीतर स्त्री की असुरक्षा को विमर्श का विषय बनाना ....high class family(समाज की पुरानी/सड़ी इकाई परिवार) की घुटन से मुक्ति की चाहत,मुक्त न हो पाने का मलाल, पहल न करने की विवशता के मनोविज्ञान को नाटकीय अंदाज मे पकड़ने की अच्छी कोशिश ...... रणदीप हूड्डा और आलिया भट्ट से बेहद संवेदनशील काम करा लेने का माद्दा इम्तियाज़ मे है,खासकर प्रकृति/पहाड़ की गोद मे लिपट कर रोने का दृश्य में तो जैसे स्त्री-पुरुष दोनों ही अमानवीय समय से रोते,भागते रहते हैं लेकिन फिर भी .......... कहीं-2 संवादों के गैर जरूरी दोहराव को रोका जाता तो फिल्म और भी कसी होती .....फिर भी निराधार लटकों-झटकों से ऊबे संवेदनशील दर्शक के लिए यह फिल्म अवश्य ही देखने लायक है .
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