पिछड़ता भारत
भारत गांवों का देश है। भारत की अधिकाँश जनता गांवों रहती है और सरकारों को बनाने में नगरों से अधिक गाँवो का योगदान रहता है। परन्तु आज गाँव और नगर को प्राप्त सुविधाओं की बात अगर तुलनात्मक रूप से करें तो समस्त सुविधाएँ नगरों में ही केंद्रित नज़र आती हैं। भारत के गाँव और किसान सिर्फ कच्चा माल रह गए हैं सत्ता के लिए जिनके बलबूते सत्ताएं अपनी विलासिताओं कि पूर्ती करती हैं।
बुआई के समय किसानो को न सही बीज मिलते हैं न उनके खेतों के लिए पानी ,,बिजली की स्थिति यह है कि किसी भी पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति को बड़ी अटपटी लग सकती है उत्तर प्रदेश के गाँवों में बिजली एक हफ्ते दिन की होती है अगले हफ्ते रात की। और वो भी कितनी आती है इसे बताने की जरूरत नही है।
जरूरत के वक़्त खाद कि जगह पुलिस की लाठियां मिलती हैं। फसल होने के बाद किसानो को उसका वाजिब मूल्य शायद ही मिल पाता है उल्टा उसे मंडी में होने वाली लूट से गुज़ारना होता है।और किसान जब भी दिखाई देता है इस कृषि प्रधान और गाँवों के देश में तो हमेशा अपनी अनंत चिंताओं और मुश्किलों के साथ दुनिया बहुत बदली पर किसान के लिए ये आज भी वैसी है जैसी पहले हुआ करती थी किसानो के लिए कुछ भी नहीं बदला बल्कि दिनों दिन जटिल होता जा रहा है।
गाँवों में प्राप्त होने वाली सुविधाओं की बात करें आज भी भारत के कई गाँव आदिम अवस्था में हैं। न बिजली न पीने को साफ़ पानी न अच्छे स्कूल न अस्पताल कुछ गाँव तो आज तक सडकों से भी वंचित हैं। आपको उदहारण दूँ उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद के एक गाँव का,, चकरनगर तहसील में एक गाँव है बिरौना बाग पिछले दिनों वहाँ जाने का संयोग मिला। इस गाँव के स्कूल तक पहुचना था जब हम चकरनगर से फूप जाने वाली रोड पर मोटर साईकल पर बढ रहे थे तो रास्ते में खड़े एक व्यक्ति से हमने गाँव का पता पूछा। बिरौना बाग का नाम सुन कर उस आदमी का पहला उत्तर था कि वहाँ नही पहुच पाओगे। हमने कहा कि जाना आवश्यक है तो उसने एक तरफ इशारा करते हुए कहा कि इस रास्ते पर चले जाओ। हम सड़क पर आगे बढे कुछ दूर जाने पर पक्की सड़क ख़त्म हो गयी हम कच्ची सड़क पर बढ़ते रहे वो भी खत्म हुई और आगे खेतों के बीच में एक पगडंडी आगे बढ़ रही थी। हम उस पर आगे बढ़ते हुए चम्बल के बीहड़ों के खार और करार लांघते चल रहे थे। सामने नदी दिखाई पड़ी तो लगा कि शायद रास्ता भटक गए फिर नदी के किनारे किनारे कुछ दूर चलने पर गाँव मिल गया। लगभग ५ k.m. तक कोई सड़क नही मिटटी के ऊंचे नीचे टीले जहाँ साइकिल तक चला पाना सम्भव नहीं। बरसात में इस गाँव का संपर्क पूरी तरह कट जाता है। और हाँ संचार क्रांति के इस युग में यहाँ मोबाइल फोन पर कोई नेटवर्क नहीं होता।
गाँव में कुछ लोगों से बात हुई तो मालूम हुआ कि इस गाँव में लड़कों कि शादी होना भी एक समस्या है। कोई भी बाहर का आदमी इस गाँव में अपनी लड़की नहीं ब्याहना चाहता। शादी डॉट कॉम के ज़माने में भी लोग यहाँ अपना जीवन साथी पाने को तरस रहे हैं। डर लगता है सोच कर कि बीमार मरीजों का क्या हाल होता होगा इलाज के लिए अस्पताल तक कि यात्रा में। यहाँ कोई अस्पताल नहीं है।
स्वस्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से भी भारत के गाँवो की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती। सरकार ने कई गांवों में सभी गाँवों में नहीं स्वास्थ केंद्र बना कर अपने कर्तव्यों कि इति श्री कर ली है। और ये स्वस्थ्य केंद्र ग्रामीणो को इलाज प्रदान करने के लिए नहीं बल्कि कुछ चुनिंदा नौकरशाहों और राजनेताओं कि कमाई का जरिया बनने के काम ज्यादा आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के स्वस्थ्य विभाग का घोटाला तो यही कहता है। और इस स्वस्थ्य केंद्र पर डॉक्टर भी आ कर इलाज करें ये तो सपने वाली बात होगी। यहाँ कि जिम्मेदारी प्रायः एक अर्धकुशल व्यक्ति ही उठाता है। और हद तो ये थी कि कुछ दिनों पहले सरकार गाँवों कि जनता को एक अलग किस्म का अर्ध ट्रेन्ड डॉक्टर देने वाली थी जो कि एक सामन्य mbbs डॉक्टर से कहीं घटिया क्वालिटी का होता। भला हो इंडियन मेडिकल कॉउंसिल का जिसने इसका विरोध कर दिया अन्यथा तो कृषि प्रधान और गाँवों के देश भारत को एक घटिया श्रेणी के चिकित्सक प्रदान कर दिए जाते। राजनेताओं को छींक भी आए तो विदेश जाएँ और इन्हे विदेश जाने लायक बनाने वाली ग्रामीण जनता घटिया और झोला छाप डॉक्टर से काम चलाये।
शिक्षा भी कोई कम दोयम दर्जे कि नहीं है गाँवों की। महानगरों के विद्यालय जहाँ चमचमाती मोटरों से उतारते कोट टाई पहने बच्चे जिनके लिए विद्यालय का दरवान मुस्कुराते हुए दरवाजा खोलता है तो स्वाभाविक रूप से बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है और दूसरी तरफ गाँव का सरकारी विद्यालय जहाँ बच्चे अपने फटे हुए बस्तों में मुफ्त में मिली किताबें जिनका कागज और छपाई कतई आकर्षक नहीं होती लेकर स्कूल आते हैं। कुछ एक तो बिना चप्पलों के ही , खुद ही झाड़ू लगते हैं विद्यालय में साफ़ सफाई करते हैं और जहाँ उनके नगरों के समवयस्क बच्चे कंप्यूटर और अन्य तकनीक द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं वे अध्यापकों के आभाव में और तकनिकी साधनो के आभाव में पिछड़ते चले जाते हैं। और एक अकुशल मजदूर बनने की राह पर चल पड़ते हैं। ये मत कहियेगा कि ग्रामीण विद्यालयों में भी कंप्यूटर हैं ,,,वो तो कब के पंखों समेत चोरी हो गए और थानेदार साहब ने रिपोर्ट तक नहीं लिखी।
भारत को अगर सुखी समृद्ध और सम्पन्न बनाना है तो हमे सबसे पहले भारत के ग्राम और किसान को सुखी सम्पन्न और समृद्ध बनाना होगा। भारत के विकास कि नीतियों को गाँवों कि तरफ मोड़ना पड़ेगा अन्यथा हम भारत का एकांगी तथाकथित विकास करते रहेंगे। भारत की ८०% जनता को सिर्फ कुछ लोगों के लालच और स्वार्थ के लिए पिछड़ा रखना किसी अपराध से कम नहीं है।
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