गायत्री छठवीं कक्षा में पढ़ती थी।नाम के अनुरूप उसमें कभी एक सहज उजाला था—वैसा उजाला, जो किसी दीपक से नहीं, भीतर की जिद से निकलता है। साँवला रंग, बड़ी-बड़ी आँखें… और उन आँखों में हमेशा कुछ पाने की बेचैनी। वह उन बच्चों में से थी जो सपने देखते नहीं, उन्हें पकड़ने दौड़ पड़ते हैं।लेकिन अब… वह चमक बुझ नहीं गई थी, बस जैसे किसी ने उस पर राख डाल दी हो।
दोपहर की धूप कुछ ढलने लगी थी, पर गर्मी अभी बाकी थी। स्कूल की घंटी बजी और जैसे किसी ने बंद बोतल का ढक्कन खोल दिया हो ।लड़कियाँ एक साथ मैदान की ओर उमड़ पड़ीं।
“खो… खो… खो… पकड़ उसको!”
“अरे दाईं तरफ से जा, बेवकूफ!”
हँसी, चीख, धूल… सब कुछ एक साथ उड़ रहा था।
दो टीमें बन चुकी थीं। एक तरफ बैठी लड़कियाँ, दूसरी तरफ दौड़ती हुई—पीछे से ‘खो’ देतीं, आगे वाली झपटतीं। खेल में वही पुराना जोश था—पर उसमें एक कमी थी, जो सिर्फ कुछ आँखों को दिख रही थी।मैदान के एक कोने में, नीम के पेड़ की आधी छाँव में, गायत्री बैठी थी।घुटनों को बाँहों में जकड़े, जैसे खुद को टूटने से बचा रही हो। ठुड्डी टिकाए, आँखें सामने… पर देख कहीं और रही थीं।उसके आसपास की दुनिया जैसे उससे अलग हो गई थी।
रानी ने दौड़ते-दौड़ते उसे देखा और अचानक रुक गई—
“अरे! तू यहाँ क्यों बैठी है?”
वह उसके पास आई, हाँफते हुए—
“चल न… तेरे बिना तो खेल अधूरा लगता है!”
गायत्री ने सिर उठाया। आँखों में वही पुरानी चमक खोजने की कोशिश की, पर सिर्फ थकान थी।
“मन नहीं है…” उसने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि जैसे खुद से कह रही हो।
रानी हँस पड़ी—
“मन नहीं है? ये भी कोई बात हुई! तू तो हमारी सबसे तेज खिलाड़ी है!”
गायत्री ने कुछ नहीं कहा।
रानी ने ध्यान से उसे देखा। यह वही लड़की नहीं थी जो हारने पर मिट्टी पर मुक्का मार देती थी और जीतने पर सबको खींच-खींचकर गले लगा लेती थी।
“तू ठीक तो है?” उसने इस बार गंभीर होकर पूछा।
गायत्री ने सिर हिलाया।
यह ‘हाँ’ था या ‘नहीं’—रानी समझ नहीं पाई। शायद गायत्री खुद भी नहीं।
कुछ पल दोनों चुप रहीं।
फिर मैदान से आवाज़ आई—
“रानी! जल्दी आ… तेरी बारी है!”
रानी ने एक बार फिर गायत्री को देखा। जैसे कुछ कहना चाहती हो—पर शब्द नहीं मिले।
“ठीक है… मत आ…” उसने हल्के से कहा, “पर ऐसे बैठ मत… अजीब लग रहा है।”
वह भाग गई।
और गायत्री फिर अकेली रह गई।
मैदान अब और शोर से भर गया था।
एक लड़की गिर पड़ी—सब हँस पड़ीं।
दूसरी ने लंबी दौड़ लगाई—तालियाँ बजीं।
सब कुछ सामान्य था।सिर्फ गायत्री नहीं।
वह चुपचाप बैठी रही। उसकी उंगलियाँ मिट्टी कुरेद रही थीं—बिना किसी मकसद के। जैसे वह खुद को जमीन में गाड़ देना चाहती हो।
उसने एक बार खेल की तरफ देखा।उसी जगह… जहाँ कभी वह खुद दौड़ती थी।उसे याद आया—
“खो!” कहकर वह कैसे बिजली की तरह निकलती थी।
पीछे वाली लड़की उसे पकड़ ही नहीं पाती थी।
पूरा मैदान चिल्लाता था—“गायत्री! भाग… भाग!”
और वह हँसती हुई और तेज भागती।उसके पैर जैसे जमीन को छूते ही नहीं थे।आज… वही पैर जैसे किसी अदृश्य बोझ से बँधे थे।
उसने आँखें बंद कर लीं।शोर कम नहीं हुआ… पर उससे उसका रिश्ता टूट गया।अब उसे सिर्फ अपने अंदर की आवाज़ सुनाई दे रही थी—
“भागो…”
“तेज…”
“पकड़ो…”
पर ये आवाज़ें बाहर की नहीं थीं।ये यादें थीं।और यादें, जब वर्तमान से टकराती हैं, तो दर्द पैदा करती हैं।
गायत्री ने आँखें खोलीं।
उसके सामने लड़कियाँ दौड़ रही थीं—जैसे जिंदगी आगे बढ़ रही हो।और वह… पीछे छूट गई थी।
“तू क्यों नहीं खेल रही?”
पास से गुजरती एक छोटी क्लास की लड़की ने पूछा।
गायत्री ने उसकी तरफ देखा—
“बस… ऐसे ही…”
“तुझे चोट लगी है क्या?” उसने मासूमियत से पूछा।
गायत्री के होंठ हल्के से हिले—
“हाँ… लगी है…”
लड़की ने तुरंत उसके पैर की तरफ देखा—
“कहाँ?”
गायत्री ने कोई जवाब नहीं दिया।
लड़की समझ नहीं पाई और आगे बढ़ गई।
घंटी बजी।खेल खत्म।
लड़कियाँ हाँफती हुई, हँसती हुई, एक-दूसरे को धक्का देती हुई क्लास की तरफ लौटने लगीं।
रानी फिर उसके पास आई—
“चल, अब तो उठ…”
गायत्री उठी।
धीरे-धीरे।जैसे हर कदम सोच-समझकर रख रही हो।
“कल खेलेगी ना?” रानी ने उम्मीद से पूछा।
गायत्री ने जवाब नहीं दिया। बस चलती रही।
उस दिन पहली बार रानी को लगा—
गायत्री सिर्फ खेल से नहीं, खुद से दूर हो रही है।और शायद… यह दूरी इतनी आसान नहीं होगी कि अगले दिन मिट जाए।
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गणित की कक्षा चल रही थी।
“गायत्री!”
मैडम की आवाज़ इस बार सिर्फ पुकार नहीं थी—एक तरह की खीझ थी, जो पिछले कई दिनों से जमा हो रही थी।
गायत्री चौंकी। जैसे किसी ने उसके भीतर चल रही सोच को अचानक झकझोर दिया हो।
“कहाँ खोई रहती हो आजकल?”
मैडम ने चश्मा थोड़ा ऊपर चढ़ाया, “बोर्ड पर आओ… और ये सवाल हल करो।”
क्लास में हलचल थम गई।गायत्री उठी।
धीरे-धीरे।
ऐसे जैसे किसी ने उसके पैरों में अदृश्य वजन बाँध दिया हो। पहले वह फुर्ती से उठती थी—आधी क्लास से पहले बोर्ड तक पहुँच जाती थी। आज हर कदम नापा हुआ था, थका हुआ।पीछे से कुछ लड़कियाँ एक-दूसरे को देख रही थीं।किसी ने फुसफुसाया—
“देखते हैं आज…”
गायत्री ने सुना… या शायद नहीं सुना। अब फर्क नहीं पड़ता था।वह बोर्ड के सामने खड़ी हो गई।चॉक उसके हाथ में था—पर पकड़ ढीली थी।
सवाल लिखा था—सरल भिन्नों का। वही तरह का सवाल, जिसे वह कभी बिना सोचे हल कर देती थी।
मैडम ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा—
“जल्दी करो।”
गायत्री ने सवाल पढ़ा।
एक बार।.....फिर दोबारा।
अक्षर साफ थे… संख्याएँ भी… पर अर्थ जैसे गायब था।उसका दिमाग कहीं और चला गया—
रात का दृश्य…
चारपाई पर लेटे पिता…
माँ की सिसकियाँ…
भाई का थका चेहरा…
“गायत्री!” मैडम की आवाज़ फिर आई।
वह चौंकी।
“हाँ…”
“लिखो।”
उसने चॉक बोर्ड पर रखा।
हाथ काँप नहीं रहा था… पर स्थिर भी नहीं था।
उसने पहला कदम लिखा…फिर दूसरा…और वहीं गलती हो गई।
मैडम तुरंत उठीं—
“रुको!”
उनकी आवाज़ तेज थी, सीधी।
“ये क्या कर रही हो तुम?”
गायत्री ने हाथ वहीं रोक लिया। चॉक बोर्ड से सटा हुआ था… जैसे वह भी आगे बढ़ने से हिचक रहा हो।
मैडम उसके पास आईं।उन्होंने बोर्ड की तरफ देखा… फिर गायत्री की तरफ।
“इतना आसान सवाल भी नहीं आता अब?”
आवाज़ में सिर्फ झुंझलाहट नहीं थी—एक तरह की निराशा थी।
गायत्री चुप रही।
“पहले तो तुम क्लास में सबसे आगे रहती थीं…”
मैडम ने धीरे-धीरे कहा, “हर सवाल सबसे पहले हल करती थीं… और अब?”
कोई जवाब नहीं।
सिर्फ झुकी हुई आँखें।ऐसी आँखें, जो किसी से मिलना नहीं चाहतीं।
क्लास में सन्नाटा था।अब कोई हँस नहीं रहा था।सब देख रहे थे—एक गिरावट… जो धीरे-धीरे सबके सामने खुल रही थी।
मैडम ने कुछ पल उसे देखा।फिर गहरी साँस ली।
“बैठ जाओ।”
इस बार आवाज़ में पहले वाली कठोरता नहीं थी। जैसे उन्हें अचानक एहसास हुआ हो कि डाँट से कुछ नहीं होगा।
गायत्री ने चॉक नीचे रखा।उसकी उँगलियों पर सफेद धूल लग गई थी।वह मुड़ी… और अपनी सीट की तरफ चल दी।पीछे से कई नजरें उसका पीछा कर रही थीं।कुछ में जिज्ञासा थी…कुछ में दया…और कुछ में वह हल्की-सी संतुष्टि, जो अक्सर दूसरों की गिरावट देखकर मिलती है।
वह अपनी जगह पर बैठ गई।...धीरे से।जैसे कोई आवाज़ भी न हो।
पास बैठी पिंकी झुकी—
“तू पढ़ती नहीं क्या अब?”
उसका लहजा सीधा था… पर उसमें हल्की-सी चुभन थी।
गायत्री ने उसकी तरफ नहीं देखा।उसने खिड़की की ओर नजर घुमा ली।बाहर पेड़ हिल रहे थे।हवा चल रही थी।सब कुछ सामान्य था।सिर्फ उसका मन नहीं।
“पढ़ती हूँ…” उसने धीरे से कहा।इतना धीरे… कि जैसे वह खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रही हो।
पिंकी ने होंठ सिकोड़े—
“फिर ऐसा कैसे?”
गायत्री ने कोई जवाब नहीं दिया।क्योंकि इस “कैसे” का जवाब किताबों में नहीं था।यह सवाल गणित का नहीं था।और इसका हल… उसके पास नहीं था।गायत्री सिर्फ सवाल नहीं भूल रही थी… वह खुद को खो रही थी।
शाम को जब गायत्री घर पहुँची, तो दरवाज़ा वैसा ही था—पुराना, हल्का-सा टेढ़ा, जिसकी कुंडी हमेशा अटकती थी। उसने आदत से दरवाज़े को थोड़ा ज़ोर से धक्का दिया। वही चरमराहट हुई।
सब कुछ वैसा ही था। और… कुछ भी वैसा नहीं था।
आँगन में धूप का एक टुकड़ा पड़ा था, जो धीरे-धीरे दीवार पर चढ़ रहा था। पहले इसी समय घर में हलचल होती थी—बर्तन खड़कते, माँ की आवाज़, और सबसे ऊपर… पिता की हँसी।
“गायत्री आ गई!”
उनकी भारी, खुश आवाज़ गूंजती थी।
आज…आवाज़ नहीं थी।खामोशी थी—गाढ़ी, चिपचिपी, जैसे हवा में ही जम गई हो।गायत्री ने एक कदम अंदर रखा, फिर दूसरा… और वहीं रुक गई।आँगन के कोने में चारपाई पड़ी थी।वही पुरानी चारपाई जिस पर कभी पिता शाम को बैठकर चाय पीते थे, रेडियो सुनते थे, और मोहल्ले के लोगों से ऊँची आवाज़ में बहस करते थे।आज उसी चारपाई पर वे लेटे थे। .....सीधे, ...बिल्कुल स्थिर।उनका चेहरा अंदर की तरफ था, पर आँखें खुली थीं—छत को घूरती हुई।
गायत्री की नज़र अनायास नीचे खिसकी…और वहीं अटक गई।
जहाँ कभी उनके पैर होते थे… वहाँ अब कुछ नहीं था।कंबल समतल पड़ा था—अजीब तरह से समतल।जैसे किसी ने कहानी के बीच से एक पूरा अध्याय फाड़ दिया हो।गायत्री के गले में कुछ अटक गया।उसने तुरंत नज़र हटा ली। जैसे देखना ही कोई गलती हो।उसके कदम अपने आप धीमे हो गए। वह चाहती थी कि उसके चलने की आवाज़ भी न हो। जैसे आवाज़ होगी तो सच और भारी हो जाएगा।
चारपाई पर पड़े उसके पिता ने हल्की-सी हरकत की। शायद उन्हें उसके आने का आभास हुआ था।
“आ गई…” उन्होंने कहा।
आवाज़ वही थी… पर उसमें कुछ टूट गया था।
पहले यह आवाज़ भर देती थी—घर को, मन को।आज वही आवाज़ खाली लग रही थी।गायत्री ने जवाब नहीं दिया।उसने सिर्फ हल्का-सा सिर हिलाया—जो उन्होंने देखा भी नहीं।
अंदर से माँ की आवाज़ आ रही थी—
“हे भगवान… क्या बिगाड़ा था हमने…”
वह रो नहीं रही थीं अब। यह रोने के बाद की आवाज़ थी—थकी हुई, सूखी, जिसमें आँसू खत्म हो जाते हैं पर दर्द नहीं।
“किसका पाप था… जो ये दिन दिखाया…”
गायत्री ने एक पल को आँखें बंद कर लीं।
यह आवाज़ अब नई नहीं थी। पिछले कुछ दिनों से यह घर की दीवारों में बस गई थी—जैसे पुराना दाग, जो धुलता नहीं।
वह चुपचाप अंदर गई।
बैग कंधे से उतारा। पहले वह बैग फेंक देती थी—सीधे चारपाई पर या कोने में। आज उसने उसे धीरे से रखा।जैसे किसी चीज़ को संभालकर रखना जरूरी हो गया हो।वह दीवार के सहारे बैठ गई।घुटने मोड़कर।ठीक वैसे ही जैसे मैदान में बैठी थी। यहाँ शोर नहीं थायहाँ खामोशी थी—और खामोशी में हर आवाज़ और साफ सुनाई देती है।
चारपाई की हल्की चरमराहट…
माँ की टूटी हुई बुदबुदाहट…
और बीच-बीच में पिता की धीमी साँसें…
गायत्री ने एक बार फिर चोरी-छिपे उनकी तरफ देखा।उनका चेहरा अब पहले जैसा नहीं था। उसमें एक अजीब-सी हार थी ।जैसे आदमी नहीं, उसकी परछाईं बची हो।वह आदमी जो कभी पूरे घर को चलाता था… अब खुद हिल नहीं सकता था।
गायत्री की आँखें फिर नीचे जाने लगीं…वह तुरंत सीधी बैठ गई।नहीं देखना था।क्योंकि जितना देखती… उतना ही सच अंदर उतरता।और वह सच भारी था—इतना भारी कि एक छठवीं की लड़की के कंधे उसे उठा नहीं सकते थे।
अंदर से माँ बाहर आईं।आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए।
उन्होंने गायत्री को देखा—
“आ गई?”
“हाँ…” गायत्री ने धीमे से कहा।
“खाना खा ले…”
यह आदेश नहीं था। न ही प्यार। यह सिर्फ एक आदत थी—जो हालात के बावजूद चल रही थी।
गायत्री उठी नहीं।वह वैसे ही बैठी रही।
माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।फिर अचानक जैसे भीतर का दर्द फिर उभर आया—
“देख लिया ना… क्या हो गया…”
उनकी आवाज़ काँपी।
“कितना समझाया था… पर सुनता कौन है…”
गायत्री चुप रही।वह जानती थी—यह बातें अब किसी के लिए नहीं थीं। न पिता के लिए, न उसके लिए।यह सिर्फ दर्द था… जो बाहर आ रहा था।
चारपाई पर पड़े उसके पिता ने करवट लेने की कोशिश की।शरीर हिला… पर अधूरा।उन्होंने दाँत भींचे।
“चुप कर…” उन्होंने धीमे से कहा, माँ की तरफ देखे बिना।
आवाज़ में झुंझलाहट नहीं थी… थकान थी।
माँ चुप हो गईं।घर फिर खामोश हो गया।
गायत्री ने दीवार पर नजर टिकाई।दीवार पर एक पुराना कैलेंडर टंगा था। तारीखें बदल रही थीं।पर उसके जीवन की तारीख… जैसे वहीं अटक गई थी—उस दिन पर, जिस दिन सब बदल गया था।
उसने धीरे से अपनी उंगलियाँ आपस में कस लीं।जैसे खुद को संभाल रही हो।पर भीतर कहीं…कुछ टूट चुका था।और वह जानती थी—यह टूटना अब आसानी से नहीं जुड़ेगा।
उसे सब याद था।
यादें भी अजीब चीज़ होती हैं—जब वर्तमान सहने लायक नहीं रहता, तो वही बीते हुए दिन बार-बार लौटकर आते हैं। जैसे कोई पुराने घाव पर उँगली रख-रखकर पूछ रहा हो—“दर्द यहीं है न?”
गायत्री की यादों में उसके पिता हमेशा हँसते हुए ही आते थे।
वे टेम्पो चलाते थे। सुबह अँधेरा रहते ही निकल जाते—कंधे पर गमछा, और हाथ में चाभी
“चल बिटिया, पढ़-लिख ले… हम चलते हैं रोटी कमाने।”
गायत्री उनींदी आँखों से दरवाज़े तक जाती—
“जल्दी आना…”
“तेरे लिए कुछ लाऊँगा,” वे कहते
दिन भर की धूल, पसीना और शहर की धक्कामुक्की लेकर जब वे शाम को लौटते, तो उनके कपड़ों से मेहनत की गंध आती थी, कठोर, पर सच्ची, और जैसे ही उनकी नज़र गायत्री पर पड़ती…चेहरा खिल उठता।थकान जैसे दरवाज़े पर ही उतर जाती।
“आ गई मेरी अफसर!” वे ऊँची आवाज़ में कहते।
गायत्री दौड़कर उनसे लिपट जाती—
“आज क्या लाए?”
कभी टॉफी, कभी संतरा, कभी कुछ नहीं—पर हर दिन एक जैसा उत्साह।
“मेरी बिटिया तो एक दिन अफसर बनेगी!”
वे अक्सर कहते, जैसे यह कोई भविष्यवाणी नहीं, पक्की सच्चाई हो।
गायत्री भी कम नहीं थी—
“हाँ! और आपको सलाम करवाऊँगी!”
“हमसे?” वे हँसते।
“हाँ, रोज़!”
वह गर्दन तानकर खड़ी हो जाती—“सलाम करो!”
वे तुरंत खड़े हो जाते, मज़ाक में सीना तानकर—
“जी हुज़ूर!”
दोनों हँसते।
माँ रसोई से झल्लाकर कहती—
“बाप-बेटी दोनों पागल हैं!”
पर उनके चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ जाती।
लेकिन यह सब रात के पहले तक था।जैसे ही अँधेरा घिरता…कुछ बदलने लगता।पिता पहले हाथ-मुँह धोते… फिर कुछ देर इधर-उधर बैठते… और फिर बिना कुछ कहे बाहर निकल जाते।
गायत्री जानती थी—कहाँ।
माँ भी जानती थी।
वह चुप नहीं रहती थी।
“फिर जा रहे हो?”
आवाज़ में तंज होता था।
पिता टालते—
“अरे, बस ऐसे ही… दोस्तों के पास…”
“दोस्त नहीं, दारू के पास!” माँ तीखी हो जाती।
पिता हँस देते—
“अरे थोड़ा-सा ही तो…”
यह “थोड़ा-सा” हर दिन वही रहता था—पर उसका असर हर दिन थोड़ा और गहरा होता जाता था।माँ का धैर्य भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा था।
“यही थोड़ा-थोड़ा एक दिन सब खत्म कर देगा!”
वह गुस्से में कहती।
पिता उस वक्त सुनते नहीं थे… या सुनना नहीं चाहते थे।
रात को जब वे लौटते, तो कदम लड़खड़ाते नहीं थे हमेशा, पर आवाज़ बदल जाती थी। आँखें लाल होती थीं। और सबसे ज़्यादा… गंध। शराब की तीखी, कड़वी गंध।
गायत्री को वह गंध बिल्कुल पसंद नहीं थी।वह नाक सिकोड़ लेती—
“दूर रहो… बदबू आती है!”
पिता हँसते—
“अरे, इतना भी क्या…”
“मैं बात नहीं करूँगी आपसे!”
वह मुँह फेर लेती।उसकी नाराज़गी सच्ची होती थी—बचपने वाली, पर साफ।
पिता उसके पास बैठते—
“अच्छा बाबा, नहीं पियेंगे… पक्का।”
“सच?”
“हाँ, तेरी कसम।”
गायत्री थोड़ी देर उन्हें देखती… फिर धीरे-धीरे पिघल जाती।
“ठीक है… आखिरी बार।”
“आखिरी बार,” वे दोहराते।
लेकिन यह ‘आखिरी बार’ कभी आखिरी नहीं होता था।अगले दिन फिर वही।सुबह फिर … वही हँसी… वही वादे…और शाम होते-होते फिर वही रास्ता।
माँ की झुंझलाहट अब आदत बन चुकी थी।
“कहते-कहते थक गई हूँ…”
वह बड़बड़ाती।
“तुम भी तो हर दिन कहती हो,” पिता हँसते हुए जवाब देते।
“और तुम हर दिन सुनकर भी नहीं सुनते!”
माँ तड़प जाती।
गायत्री बीच में खड़ी रहती।
एक तरफ माँ का गुस्सा…दूसरी तरफ पिता की हँसी…और वह तय नहीं कर पाती थी—किसे सही माने।उसे बस इतना समझ आता था—
पापा अच्छे हैं… लेकिन ये दारू बुरी है।और यह बुरी चीज़ धीरे-धीरे उसके अच्छे पापा को खा रही थी।
कभी-कभी वह सोचती अगर दारू एक इंसान होती, तो वह उससे लड़ती ,उससे कहती—
“मेरे पापा को छोड़ दो।”
पर दारू कोई इंसान नहीं थी।वह एक आदत थी।और आदतें… धीरे-धीरे आदमी को अपने जैसा बना देती हैं।
आज जब वह चारपाई पर पड़े अपने पिता को देखती है…तो उसे वही हँसता हुआ चेहरा याद आता है।और फिर वही सवाल—क्या यह वही आदमी है?या वह आदमी कहीं रास्ते में… उसी “थोड़ा-सा” में खो गया?
उसे वह हादसा याद था ।उस दिन बारिश हो रही थी।वैसी बारिश नहीं, जो खेतों को हरियाली दे—यह शहर की बारिश थी। गंदी, चिपचिपी, सड़कों को कीचड़ में बदल देने वाली। आसमान से गिरता पानी जैसे सिर्फ भीगाता नहीं था, फिसलाता भी था।सड़क चमक रही थी ।ऐसे मौसम में समझदार आदमी गाड़ी धीरे चलाता है।पर उस दिन समझदारी किसी के पास नहीं थी।पिता नशे में थे।नशा ऐसा नहीं था कि आदमी गिर पड़े—बस इतना था कि उसे लगे वह सब संभाल सकता है।और यही सबसे खतरनाक होता है।
टेम्पो स्टार्ट हुआ। इंजन ने घर्र-घर्र की आवाज़ की।बारिश की बूँदें शीशे पर पड़ रही थीं—टक… टक… टक…वाइपर चल रहा था, पर हर बार साफ करने के बाद भी पानी फिर भर जाता।दुनिया धुंधली थी।और धुंधली दुनिया में आदमी अक्सर गलत फैसले लेता है।
पिता ने एक्सीलेरेटर दबाया।टेम्पो आगे बढ़ा—थोड़ा डगमगाता हुआ, पर चल रहा था।सड़क पर गड्ढे थे। पानी भरा था।कहाँ गड्ढा है, कहाँ सड़क—समझना मुश्किल था।पर नशे में आदमी को लगता है—सब साफ दिख रहा है।
एक मोड़ आया।साधारण-सा मोड़।जिसे पिता सैकड़ों बार पार कर चुके थे।पर उस दिन वह मोड़ वही नहीं था।या शायद… पिता वही नहीं थे।टेम्पो तेज था।थोड़ा ज़्यादा तेज।
टायर ने पकड़ खोई।
बस एक पल।एक छोटा-सा पल—जो जिंदगी और बर्बादी के बीच होता है।
फिसलन।
स्टीयरिंग घूमता है… हाथ संभाल नहीं पाते…
और फिर—
धड़ाम।
टेम्पो सड़क छोड़कर नीचे खड्ड में चला गया।
आवाज़ गूँजी।
बारिश चलती रही।
कुछ सेकंड के लिए सब शांत।
फिर…शोर।
“अरे! गिर गया!”
“जल्दी देखो!”
“कोई है अंदर!”
लोग दौड़े।
किसी ने टॉर्च निकाली।
किसी ने फोन किया।
टेम्पो उल्टा पड़ा था।लोहे का ढांचा मुड़ गया था—जैसे कागज़ हो।अंदर… पिता फँसे थे।खून बह रहा था।बारिश उस खून को धो रही थी—पर खत्म नहीं कर पा रही थी।
“साँस चल रही है!”किसी ने कहा।
“जल्दी निकालो!”
हाथ बढ़े। शरीर खींचा गया।कपड़े फटे। खून और कीचड़ एक हो गए।
पिता बेहोश थे।शायद उन्हें दर्द का अंदाज़ा नहीं था।या शायद… शरीर इतना टूट चुका था कि दर्द भी हार मान चुका था।
अस्पताल..सफेद दीवारें....तेज रोशनी....दवाइयों की गंध....और इंतज़ार।
माँ वहाँ पहुँची। भीगी हुई… बिखरी हुई… साँसें तेज।
“कहाँ हैं?”
उसने घबराकर पूछा।
किसी ने इशारा किया।
स्ट्रेचर पर पड़े थे पिता।
चेहरा पीला...आँखें बंद....नीचे चादर भीगी हुई… लाल।
माँ की चीख निकली—
“हे भगवान!”
वह उनके पास दौड़ी।
“ये क्या कर दिया तुमने…”
यह सवाल नहीं था...यह टूटन थी।
डॉक्टर आए।
सफेद कोट… ठंडा चेहरा… व्यस्त आँखें।
उन्होंने जल्दी-जल्दी जाँच की।
एक-दूसरे से धीमी आवाज़ में बात की। फिर माँ की तरफ मुड़े।
“देखिए…”
उनकी आवाज़ सीधी थी, बिना भाव के—
“चोट बहुत गंभीर है।”
माँ कुछ समझ नहीं पाई।
“क्या मतलब?”
डॉक्टर ने एक पल को रुककर कहा—
“जान बचानी है तो… दोनों पैर काटने होंगे।”
कमरे में जैसे आवाज़ जम गई।
माँ ने सुना… पर समझ नहीं पाई।
“क्या…?”
“गैंगरीन फैल जाएगा… खून रुक नहीं रहा… देर हुई तो मरीज नहीं बचेगा।”
सीधी, साफ भाषा।जैसे कोई गणित का सवाल समझा रहा हो।पर यह गणित नहीं था।यह जिंदगी थी।
माँ की आँखें फैल गईं।
“नहीं… नहीं… ऐसा मत कहिए…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
“कोई और रास्ता…”
डॉक्टर ने सिर हिला दिया—
“नहीं है।”
एक शब्द।
कठोर।
अंतिम।
माँ वहीं बैठ गई जमीन पर।
“हे भगवान…”
उसकी चीख इस बार अंदर से निकली।
गायत्री पास खड़ी थी...छोटी...चुप।
उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
“पैर काटने होंगे” — यह वाक्य उसके कानों में गूँज रहा था।
पर उसका मतलब वह नहीं समझ पा रही थी।
उसने माँ को रोते देखा… डॉक्टर को जाते देखा… लोगों को फुसफुसाते देखा…
और फिर स्ट्रेचर को ऑपरेशन थिएटर की तरफ जाते देखा।
दरवाज़ा बंद हुआ...लाल बत्ती जल गई।...उस रात… कुछ खत्म हो गया....और कुछ ऐसा शुरू हुआ… जिसका नाम भी गायत्री नहीं जानती थी।उसे बस इतना समझ आया—अब कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
गायत्री का एक बड़ा भाई है—राहुल। दसवीं में पढ़ता था।
“था”—क्योंकि अब वह सिर्फ कागज़ पर छात्र है, ज़िंदगी में नहीं।
पढ़ने-लिखने में तेज। उन लड़कों में से, जो किताब खोलते हैं तो शब्द उनके लिए अजनबी नहीं होते। मास्टर लोग नाम लेकर सवाल पूछते थे—
“राहुल, तुम बताओ…”
और वह बिना हड़बड़ाए जवाब दे देता था। गणित उसका खेल था।
गायत्री को वह रोज़ बैठाकर सवाल समझाता—
“देख, ऐसे मत सोच… ये लंबा तरीका है। शॉर्टकट पकड़।”
वह कागज़ पर दो-तीन लाइन लिखता… और जवाब सामने।
गायत्री की आँखें चमक उठतीं—
“इतनी जल्दी?”
“दिमाग लगाना पड़ता है,” वह हँसता, “रटने से कुछ नहीं होता।”
कभी-कभी वह अंग्रेज़ी भी सिखाता—
“बोल—My name is Gayatri.”
गायत्री हँसती—
“माय नेम इज… गायत्री।”
“अरे ‘इज’ नहीं, ‘इज़’… ज़ोर से बोल!”
“इज़!”
दोनों हँस पड़ते।
“एक दिन तू अंग्रेज़ी में ही बात करेगी,” राहुल कहता।
“और तुम?”
“मैं? मैं तो मास्टर बनूँगा… ”
उसकी आँखों में सपने थे—साफ, सधे हुए।उसे रास्ता दिखता था।लेकिन रास्ते हमेशा सीधे नहीं रहते।कभी-कभी एक हादसा पूरे नक्शे को बदल देता है।
अब राहुल सुबह किताब लेकर नहीं बैठता।सुबह वह जल्दी उठता है—पर पढ़ने के लिए नहीं...काम पर जाने के लिए।हाथ-मुँह धोकर, बिना कुछ बोले, वह बाहर निकल जाता है।उसके कपड़े अब स्कूल यूनिफॉर्म नहीं हैं—ढीली-सी पैंट, पुरानी शर्ट, जिस पर धूल जमी रहती है।
वह सुखविंदर सिंह के ट्रक पर क्लीनर है।“क्लीनर”—नाम छोटा है, काम लंबा। ट्रक साफ करना, टायर देखना, ड्राइवर के इशारे समझना, बीच-बीच में सामान लोड करवाना… और सबसे ज़्यादा—चुप रहना।
सुखविंदर सिंह मोटा आदमी है, ऊँची आवाज़ वाला।
“ओए राहुल! जल्दी कर… टाइम नहीं है!”
वह गरजता है।
राहुल “हाँ सरदार जी” कहता है और दौड़ पड़ता है।
पहले वह दौड़ता था मैदान में।अब वह दौड़ता है काम के पीछे।
फर्क सिर्फ इतना नहीं है, पहले दौड़ में खुशी थी...अब मजबूरी है।
ट्रक के नीचे घुसकर जब वह ग्रीस से सने हिस्सों को छूता है, तो उसकी उँगलियाँ काली हो जाती हैं, वही उँगलियाँ, जो कभी कॉपी पर साफ-सुथरे अक्षर लिखती थीं। वह कभी-कभी हाथ देखता है… और एक पल के लिए ठहर जाता है, फिर खुद ही हँस देता है—
“काम करने से कोई छोटा नहीं होता…”
यह बात उसने कहीं सुनी थी।अब खुद को समझाने के काम आती है।शाम को जब वह घर लौटता है, तो थका हुआ होता है।शरीर से भी… और थोड़ा-सा भीतर से भी।
गायत्री उसे देखती है।पहले वह आते ही कहता था—
“चल, आज नया सवाल सिखाता हूँ!”
अब वह बैठ जाता है।
चुपचाप।
माँ पूछती है—“कुछ खाएगा?”
“जो है दे दो,” वह कहता है।
सीधा जवाब। बिना मांग के।
गायत्री धीरे से उसके पास बैठती है—
“भइया… ये सवाल समझा दो…”
राहुल कॉपी लेता है। देखता है। समझाता भी है—
“देख, ऐसे…”
पर उसकी आवाज़ में पहले वाली चमक नहीं है।वह बीच-बीच में रुक जाता है।जैसे दिमाग कहीं और चला जाता हो।
गायत्री देखती है—
“भइया… आप ठीक हो?”
राहुल एक पल उसे देखता है।फिर मुस्कुरा देता है—
“हाँ, बिल्कुल।”
यह वही मुस्कान है… जो लोग दूसरों को दिलासा देने के लिए पहन लेते हैं।
एक दिन गायत्री ने पूछा—
“आप स्कूल नहीं जाओगे अब?”
सवाल सीधा था।
राहुल ने कुछ पल चुप रहकर जवाब दिया—
“देखेंगे…”
“मतलब?”
“मतलब… अभी घर ज़रूरी है।”
इतना कहकर वह उठ गया।बात वहीं खत्म हो गई।पर गायत्री के अंदर नहीं।
मोहल्ले में लोग कहते हैं—
“अच्छा लड़का है राहुल… जल्दी ड्राइवर बन जाएगा।”
यह तारीफ़ है… या तसल्ली—कोई तय नहीं करता।राहुल भी नहीं।
उसे पता है—ड्राइवर बनना बुरा नहीं है। पर यह उसका सपना नहीं था।सपना कुछ और था।और अब…सपनों को उसने मोड़कर कहीं रख दिया है—जैसे पुरानी किताब, जो अभी काम की नहीं।
रात को कभी-कभी वह छत पर चला जाता है।आसमान देखता है।कुछ सोचता है।शायद हिसाब लगाता है—कितना कमाना है…कितना बचाना है…घर कैसे चलेगा…
या शायद वह कुछ नहीं सोचता।
सिर्फ देखता है। क्योंकि कुछ सवाल ऐसे होते हैं…जिनका जवाब सोचना भी थका देता है।
गायत्री उसे देखती है।
उसे याद आता है—वही राहुल जो उसे “इज़” और “इज” का फर्क सिखाता था।
और अब…
वह खुद ज़िंदगी का फर्क सीख रहा है—
पढ़ाई और पेट के बीच का फर्क।
और यह फर्क…किसी किताब में नहीं पढ़ाया जाता।
सब सो गए थे।
या शायद—सबने आँखें बंद कर ली थीं। नींद किसी को आई थी या नहीं, यह अलग बात थी।घर में अँधेरा था। बस एक कोने में जलती मद्धम-सी बल्ब की रोशनी, जो दीवार पर पीला धब्बा बनाकर रह गई थी। उसी धब्बे के नीचे गायत्री लेटी थी।
आँखें खुली हुई।छत को देखती हुई।पंखा घूम रहा था—धीमे… थका हुआ… जैसे उसे भी जल्दी नहीं है कहीं पहुँचने की।उसकी हर घुमाव के साथ एक हल्की-सी आवाज़ आती—
टक… टक… टक…
और उस आवाज़ के बीच… गायत्री के मन में शोर था।बिना आवाज़ का शोर।
“भइया अब पढ़ नहीं पाएंगे…”
उसने सोचा।
राहुल का चेहरा सामने आया—धूल से भरा, थका हुआ, पर मुस्कुराने की कोशिश करता हुआ।वही राहुल, जो कहता था—
“दिमाग लगाना पड़ता है…”
अब वही दिमाग… शायद पैसों का हिसाब लगाने में लग रहा था।घर तो चलना ही पड़ेगा ।
“पापा काम नहीं कर सकते…”
चारपाई की तरफ उसका ध्यान गया।अँधेरे में भी वह आकृति दिख रही थी—स्थिर, भारी, अधूरी।वह आदमी, जो कभी पूरे घर का सहारा था… अब खुद सहारे पर था।
“माँ अकेली है…”
माँ की धीमी साँसों की आवाज़ आ रही थी। शायद सो गई थीं।या शायद थककर चुप हो गई थीं।दिन भर रोने के बाद… शरीर भी हार मान लेता है।
“और मैं?”
यह सवाल बाकी सब सवालों से बड़ा था।गायत्री ने करवट बदली।छत वही थी।पर अब उसे लग रहा था—वह नीचे दब रही है।उसका गला भर आया।आँखों से आँसू बह निकले।कोई आवाज़ नहीं।बस गीली होती हुई तकिया।
उसने होंठ भींच लिए।जैसे रोना भी अब किसी को सुनाना नहीं है।
“मेरी आगे की पढ़ाई कैसे होगी?”
यह सवाल उसने पहली बार नहीं सोचा था।पर आज… यह सवाल उसके भीतर अटक गया था।जैसे गले में फँसी हड्डी।न निकलती है… न निगली जाती है।उसने आँखें बंद कीं पर अँधेरा और गहरा हो गया।
उसे स्कूल याद आया।
मैदान…
खो-खो…
रानी…
मैडम…
और बोर्ड पर खड़ा वह सवाल।
सब कुछ धुंधला था।सिर्फ एक चीज़ साफ थी—वह पीछे छूट रही है।
उसने हाथ बढ़ाकर अपनी कॉपी उठाई।
अँधेरे में ही।
पन्ने पलटे।
एक सवाल सामने था—अधूरा।वही सवाल… जो उसने शाम को नहीं समझा था।
उसने उसे देखा।
अक्षर धुंधले थे—आँसुओं की वजह से… या अँधेरे की वजह से… पता नहीं।
उसने उँगली से उन संख्याओं को छुआ।धीरे-धीरे,जैसे किसी पुराने दोस्त को पहचानने की कोशिश कर रही हो।
उसे राहुल की आवाज़ याद आई—
“शॉर्टकट पकड़…”
मैडम की आवाज़—
“ध्यान लगाओ…”
पिता की आवाज़—
“मेरी बिटिया अफसर बनेगी…”
तीनों आवाज़ें एक साथ गूँज उठीं।
उसने आँखें खोलीं।
अँधेरा वैसा ही था।
पर उसके भीतर कुछ हल्का-सा हिला।
बहुत छोटा।
बहुत कमजोर।
पर था।
वह उठकर बैठ गई. धीरे से।चारों तरफ देखा।कोई नहीं जागा।अच्छा है।कुछ चीज़ें अकेले ही शुरू होती हैं।
उसने फिर कॉपी खोली।इस बार ध्यान से देखा।सवाल वही था। उसने चॉक की जगह उँगली से हवा में हल करना शुरू किया।
पहला कदम।
गलत।
दूसरा।
फिर गलत।
वह रुकी।
एक पल को लगा—छोड़ दे।
जैसे सब छोड़ रहे हैं।
पर फिर…
पता नहीं क्यों…
उसने फिर कोशिश की।
तीसरी बार...धीरे-धीरे...संभलकर।
और इस बार…
कुछ ठीक बैठा।
पूरा नहीं।
पर थोड़ा।
उसने हल्की-सी साँस ली।जैसे किसी ने भीतर से कसाव ढीला किया हो।उसी वक्त बाहर से हल्की-सी आवाज़ आई।
मुर्गे की पहली बांग।
सुबह होने की सूचना।बहुत हल्की।पर साफ।गायत्री ने खिड़की की तरफ देखा।अभी अँधेरा था।पर कहीं दूर… बहुत दूर…एक हल्की-सी रेखा उभर रही थी।सुबह की।
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