छपरा सिवान बिहार
बिहार गए हैं कभी ।भाई हमको तो अच्छा लगता है।यहाँ के लोग, यहाँ का लिट्टी और भूजा ।पूरी सब्जी और जिलेबी (जलेबी कतई नही) यहां का खाना पीना (जब भी खाना पीना कहता हूँ तो लालमुनि गुस्सा हो जाता है कहता है पीने के बात मत कीजिये नीतीश बाबू बलजबड़ी पीना बन्द करवा दिए हैं)
मन मोह लेगी यहाँ की बोली की मिठास और राह चलते हास परिहास ।शारदा सिन्हा से लेकर गुड्डू रंगीला और गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाइबो से लेकर होली में के खोली तक। सब कुछ बेहद अपना सा ।
बिहार के इस हिस्से में मैंने कुछ दिन बिताये हैं ।यहां के बुजुर्गों से बात करना शुरू कीजिये तो वे बड़े गर्व से बताते हैं की jp के आंदोलन में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था । कैसे वो जनता को एकत्र करते थे और भ्रष्ट व्यवस्था को पूरी तरह उखाड़ फेंका था ।
ये इलाका आज भी विकास से बहुत दूर है । नसड़कें न साफ पानी न रोजगार । कच्चे मकानों की ढेर सारी बस्तियाँ । आर्थिक विषमता बौद्धिक जड़ता और कैसे भी सडे गले के साथ निभा लेने की समझोता वादी सोच । सब ने अपना डेरा जमाया हुआ है । ये वही इलाका जहाँ संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति ने जन्म लिया था । मुझे लगता है जो ऊर्जा इन बुजुर्गों ने JP के आंदोलन के लिए लगाई थी उसकी आधी ऊर्जा भी वो सिर्फ अपने गाँव की बेहतरी में लगा देते और उन्ही तेवरों के साथ जो उन्होंने JP से सिखा था तो तस्वीर कुछ अलग ही होती।
बिहार के जिले सिवान में हूँ । उपजाऊ क्षेत्र है व्यवस्थाएं बंजर हैं । इलाका एमसीसी माओवादी चरमपंथियों का गढ़ रहा है नरसंहार होते रहें हैं ।इलाका बाहुबली शहाबुद्दीन के के लिए भी कुख्यात रहा है । ठिकाने तक पहुचाने वाले अपनी गाडी के ड्राइवर से जब पूछा 'अब तो शांति है ?'
जवाब मिला 'अलबत्त बात करते हैं जी सिवान में मर्डर कहियो बंद नही होता है ।'
विकास नाम के जीव से लोग अभी परिचित नही हैं। पिछली पीढ़ी के लोग शान से बताते हैं कि उन्होंने जे पी के आंदोलन में भाग लिया था पर वर्तमान पीढ़ी में सड़ी गली व्यवस्था और पिछड़ेपन से विद्रोह खत्म सा दिखता है। लोग तथाकथित नेताओं के करीबी बनना चाहते हैं रौब बना रहे और कुछ सरकारी योजनाओं में बिचौलिया बन सकें ।
राजनैतिक चेतना तो है पर हिम्मत कम होती जा रही है ।सुबह सुबह गांव के लड़के दंड बैठक करते हुए और दौड़ लगते हुए दिख जाएंगे। बहाली की तैयारी है ।
एक तस्वीर में जो पीपल का पेड़ देख रहे हैं वो सिर्फ पीपल का पेड़ नही है। गांव के स्थान देवता हैं पहलवान जी । कहते हैं कि मनौती पूरी होने पर पहलवान जी पर लाल लंगोट और शराब का पौआ चढ़ाना पड़ता था ।
पहलवान जी(पीपलका पेड़) के नीचे बैठे गाँव के तेज बहादुर के अनुसार " नितिशवा जब से दारू बंद किया है पहलवान जी खाली लाल लंगोटा ही डोलाते रहते हैं ।
लोगों ने बताया कि पास ही गंगा व सरयू नदी के संगम है और यह स्थल .महर्षि गौतम और ऋषि श्रृंगी की भी तपोभूमि रही है। गौतम ऋषि भी सप्तर्षियों में माने गये हैं। कहा जाता है कि गौतम ऋषि मिथिला नरेश जनक जी की सभा में अपने पुत्र सतानंद जी को स्थापित करने के बाद अपनी धर्मपत्नी अहिल्या तथा पुत्री अंजनी के साथ इस स्थान पर आये तथा इसे अपनी तपोभूमि बनाया। माता अंजनी हनुमान जी की माता थीं इस कारण इस स्थान को हनुमान जी का ननिहाल होने का भी गौरवशाली इतिहास है।
कथा है कि देवताओं का राजा इन्द्र ने छल से ऋषि पत्नि अहिल्या का सतीत्व नष्ट किया गौतम को जब जानकारी हुई तो उन्होंने देवराज के साथ अहिल्या को भी इसके लिए दोषी माना और शाप दिया अहिल्या पत्थर के समान जड़ हो गयी । भावनाओं से शून्य हो गयी होंगी शायद ,हैरान रह गयी होगी कुछ इन्द्र के छल से कुछ अपने पति के उसके प्रति अविश्वास से ।और फिर राम के चरण पड़े यहां और अहिल्या को छूते ही शायद वात्सल्य जाग पडा होगा और अहिल्या वापस सामान्य जीवन की तरफ लौट पड़ी होंगी ।
संयोग से उसी पावन भूमि पर गंगा और सरयू के संगम के समीप मर्यादा पुरुषोत्तम राम की महिमा को याद करते हुए स्वयं को धन्य पाता हूँ ।
ईश्वर से प्रार्थना बिहार में बहार आये ।

क्या बात है सर आपने बिहार आँखिन के सामने तेरा दिए। बहुतै बढ़िया लगी है लेख आपका।। ऐसे ही अन्य लेख लाते रहिये।।
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