बहुत पुराना समय था, जब मनुष्य धरती से जुड़ा था —
इतना कि उसके कदम मिट्टी पर पड़ते ही मिट्टी मुस्कुरा उठती।
पेड़ों की डालियाँ मनुष्यों से बातें करतीं,
और नदियाँ उन्हें मधुर गीत सुनातीं।
उस समय जंगल कोई जगह नहीं था
वह एक जीवित देवता था।
हर पत्थर में आत्मा थी, हर हवा में स्मृति, हर बूंद में वचन।
कहते हैं, धरती माई तब जवान थी।
उसके माथे पर हरे जंगल थे, और उसके आँचल में नदियों के हार।
वह अपने बच्चों को दूध नहीं, मिट्टी का प्यार देती थी —
और वे बच्चे उसी में ताक़त पाते थे।
इन्हीं जंगलों में तनिया नदी की कल-कल करते तट के किनारे बसा था गाँव — उलीहातू।
साल और सखुआ के पेड़ों से घिरा, लाल मिट्टी का एक सुंदर टुकड़ा,
जहाँ हर घर में धुएँ की गंध रहती थी — लकड़ी की नहीं, जीवन की।
वहाँ के लोग खुद को “धरती के बच्चे” कहते थे।
उनका धर्म खेत में हल चलाना था, उनका त्योहार बीज बोना था।
उनके देवता जंगल में बसते थे —
पेड़ों की छालों पर, पत्थरों के नीचे, और पक्षियों की उड़ानों में।
सुबह होते ही महिलाएँ साल के पत्तों की टोकरी सिर पर रखकर निकलतीं,
पुरुष कंधों पर हल और बैल की रस्सी लेते।
बच्चे, जो अब तक खेल रहे होते, गीत गाते हुए उनका पीछा करते:
हे धरती माई, ओ सूरज देवा,
बरखा रानी, सुनियो गो सेवा।
ए माटी मोर, तोरे से उपजे दाना,
गोदिया भरल, नइ जाई केउ भुलाना।
फसल के पोसियो, हे दयालु माई,
हे सूरज दादा, तोरही से जग उजियारा,
अंधकार ना राखियो, देहियो सहारा।
हे बरखा रानी, तोरे से जीवन हमार,
बरसियो इतना कि खेत करे सिंगार।
हे धरती माई, ओ सूरज देवा,
बरखा रानी, सुनियो गो सेवा।
वह गीत हवा में घुल जाता,और हवा जवाब देती —
साल के पत्तों की सरसराहट में,
जैसे धरती मुस्कुरा रही हो।
शाम को, जब सूरज पहाड़ी के पीछे डूबता,
और आसमान में लाल धुआँ फैलता,
गाँव के बीच में एक गोल चबूतरा था ,वहाँ आग जलती।
चारों ओर लोग बैठते।
आग की लौ पर आँखें टिकतीं, और कहानी शुरू होती।
कथा कहने वाला था लाखा मुंडा —
गाँव का सबसे बुजुर्ग, जिसकी उम्र शायद पेड़ों से भी पुरानी थी।
उसकी झुर्रियों में बरसों की धूप, बारिश और धूल की यादें थीं।
उसकी आवाज़ में नदी की लय और हवा की थरथराहट थी।
लाखा कहता —
“सुनो बच्चों... धरती सो रही है।
बहुत थक गई है वो, बहुत दर्द में है।
जब उसके बच्चे दुखी हो जाते हैं,
तब वो करवट बदलती है।
वही दिन होता है उलगुलान —
धरती के जागने का दिन।”
बच्चे उसकी आँखों में झाँकते।
किसी ने पूछा, “दादा, धरती क्यों सो गई?”
लाखा बोला,
“क्योंकि इंसान ने उसकी बातें सुनना छोड़ दिया।
जब बच्चा माँ की बात नहीं सुनता,
तो माँ चुप हो जाती है।”
एक गर्मी भरा दिन था।
हवा भारी थी, जैसे पहाड़ सांस रोक कर खड़ा हो।
गाँव में किसी ने कहा — “आज कुछ अजीब है। पक्षी चुप हैं।”
शाम होते-होते आसमान काला पड़ गया।
बादल ऐसे गरजे जैसे पहाड़ों ने अपनी जुबान खोल दी हो।
और अचानक, बिजली धरती पर गिरी —
जैसे किसी ने सोई हुई माँ को झकझोर दिया हो।
उसी रात,
गाँव की एक झोपड़ी में एक बच्चे का जन्म हुआ।
बाहर आकाश फट रहा था, भीतर एक नई साँस जन्म ले रही थी।
माँ करमी हांसदा ने बच्चे को गोद में लिया —
उसकी हथेली में मिट्टी चिपकी थी, और आँखों में एक अजीब चमक।
करमी ने फुसफुसाया,
“धरती माई, ये तेरा ही बेटा है। तू इसकी रखवाली करना।”
बूढ़ी दाई बोली “ये बच्चा तूफ़ान की कोख से आया है।ये बड़ा होकर तूफ़ान ही बनेगा। इसका नाम होगा बिरसा।”
_________
बिरसा का बचपन किताबों में नहीं, पेड़ों में बीता।
उसकी पाठशाला — जंगल थी।
उसके शिक्षक — पक्षी, नदियाँ और पेड़।
वह पेड़ों की जड़ें पकड़कर झूलता,
पत्तों से गिनती सीखता,
और हवा के साथ दौड़ लगाता।
उसकी माँ कहती,
“तू दिन भर मिट्टी में खेलता है,
वह कहता “ यह मिट्टी मुझे हमेशा याद रखेगी।”
“धरती माई मेरी दोस्त है, माँ।
जब मैं बोलता हूँ, वो सुनती है।”
समय बदला।
एक दिन, सफेद कपड़े पहने कुछ लोग आए —
हाथ में लोहे के औज़ार, और जेब में कागज़ के नक़्शे।
वे बोले,
“ये ज़मीन अब सरकार की है।
जंगल कंपनी का है।
और तुम सब किरायेदार हो।”
लोगों ने समझा नहीं।
वे तो धरती के बेटे थे —
माँ को कोई कैसे खरीद सकता है?
पर सफेद लोग हँसे,
और कुल्हाड़ियाँ चलीं।
साल के पेड़ गिरते गए।
नदियाँ सिसकतीं रहीं , पहाड़ चुप हो गए।
लाखा मुंडा ने देखा,
उसने मिट्टी उठाई, माथे से लगाई और कहा “धरती रो रही है।
जब धरती रोती है,
तब उसका कोई बेटा जन्म लेता है —
जो उसे चुप कराता है ,एक दिन वह आएगा और उस दिन से सोई धरती जाग जाएगी।
एक शाम, आग फिर जल रही थी।
लाखा ने अपने काँपते हाथों से बिरसा का सिर सहलाया।
उसकी आँखें दूर आसमान में टिक गईं —
“बेटा, धरती तुझसे बात करती है, ना?”
“हाँ दादा, रात में वो फुसफुसाती है।”
“क्या कहती है वो?”
“वो कहती है — उसे दर्द है।”
“और तू क्या कहता है?”
“मैं कहता हूँ, मैं उसे जगाऊँगा।”
लाखा मुस्कुराया —
“तो समझ ले, तू वही है —
धरती का बेटा, जिसका इंतज़ार सदियों से हो रहा है।
उस रात, जंगल में अजीब शांति थी।
कुत्ते भौंकना भूल गए, उल्लू बोलना।
हवा में एक कंपन थी — जैसे धरती सांस रोक कर कुछ देख रही हो।
बिरसा झोपड़ी से निकला,
और नदी किनारे जा बैठा।
आसमान में चाँद टूटा हुआ था,
और पहाड़ों की परछाई पानी में काँप रही थी।
तभी, कहीं दूर से आवाज़ आई —
पहाड़ की गहराई से,
धीमी, पर भारी:
“बिरसा... धरती तुझसे कुछ कहना चाहती है।
वह अब जागना चाहती है।
तू उसकी आवाज़ बन।”
बिरसा काँप उठा।
उसने मिट्टी उठाई, माथे से लगाई,
और कहा —
“माई, मैं तेरा बेटा हूँ।
अब कोई तुझे नहीं सुलाएगा।”
कोई तुझे नहीं रुलाएगा ।
उसके शब्द हवा में फैल गए।
पेड़ों ने झुककर प्रणाम किया।
और पहाड़ों ने पहली बार गरज कर कहा —
“जग जा रे बिरसा... जग जा रे…”
उस रात से, जंगल की हवा में एक नई गंध घुल गई
हर पेड़ फुसफुसाने लगा, हर नदी गुनगुनाने लगी।
लोग कहते हैं, उस रात धरती ने करवट बदली थी।
और उसके साथ ही जन्म हुआ —
उलगुलान की आत्मा का।
बूढ़ा लाखा बाद में कहता था,
“उसी रात धरती ने अपनी आँखें खोलीं।
और जब धरती जागती है,
तो पहाड़ बोलने लगते हैं,
और हवा ढोल की तरह बजती है।”
लोग उसकी बात पर हँसते, पर जब भी हवा चलती,
तो उन्हें सचमुच कुछ सुनाई देता था —
एक हल्की गूंज,
जैसे कोई कह रहा हो —
“उलगुलान... उलगुलान...”
________________
उलीहातू के जंगल में जब सुबह होती,
तो वह केवल प्रकाश का नहीं, प्राण का जन्म होता।
नीचे से धुंध उठती, जैसे धरती साँस छोड़ रही हो।
पेड़ों की टहनियाँ झुककर नदियों से कुछ कहतीं,
और दूर मुर्गे की बांग —
एक नई लय शुरू कर देती।
बिरसा उस समय जागता था जब गाँव अभी नींद में था।
उसकी माँ करमी की धीमी खाँसी,
और झोपड़ी के बाहर गीली मिट्टी की गंध —
उसे खींच ले जाती जंगल की ओर।
वह नंगे पाँव निकलता,
हर कदम पर ओस और मिट्टी का मिलन महसूस करता।
पेड़ों के नीचे जैसे कोई उसे पुकार रहा हो,
“आ जा, बिरसा... आज फिर नई बात सिखानी है।”
जंगल के बीच एक विशाल साल का पेड़ था।
उसके नीचे मिट्टी हमेशा ठंडी रहती थी।
बिरसा वहीं बैठता,
और पेड़ की जड़ों पर उंगलियाँ फिराता —
जैसे किसी किताब के अक्षर पढ़ रहा हो।
धीरे-धीरे वह पेड़ की धड़कन सुनना सीख गया।
जब हवा आती, तो उसे लगता पेड़ बोल रहा है:
“मुझे देख, मैं खड़ा हूँ बरसों से,
तूफ़ानों ने मुझे झुकाया, पर तोड़ा नहीं।
यही जीवन है, बेटा।”
बिरसा ने सीखा —
सहनशीलता भी शक्ति है।
जिसने खड़ा रहना सीखा,
वह किसी से झुकता नहीं।
यह पेड़ उसका पहला गुरु था
उसका दूसरा गुरु थी — हवा
कभी-कभी वह खेतों के पार जाकर उस जगह बैठता जहाँ हवा सबसे तेज़ चलती।
वह अपनी बाहें फैलाकर खड़ा हो जाता,
और हवा को महसूस करता।
वह सोचता,
“हवा किसी से नहीं डरती,
पर किसी को मारती भी नहीं।
वो सबको छूती है, पर बंधती नहीं।”
तब उसे लगा —
स्वतंत्रता भी हवा जैसी है।
जिसे बाँधो, वह ठहर नहीं सकती।
जिसे उड़ने दो, वह सबको जीवन देती है।
उसका तीसरा गुरु थी — नदी
तनिया नदी उसके गाँव की आत्मा थी।
उसका जल साफ़ था, और किनारे लाल मिट्टी के।
बिरसा अक्सर उसके पास बैठता और कंकड़ फेंकता,
देखता — लहरें फैलती जातीं।
एक दिन उसने नदी से पूछा,
“तू हमेशा बहती क्यों रहती है?”
नदी बोली,
“जो रुक जाए, वह सड़ जाता है।
जो बहता है, वही जीवित है।”
बिरसा ने उस दिन सीखा —
जीवन का अर्थ गति है।
रुकना मृत्यु है, बहना जीवन।
शाम को वह माँ करमी के साथ खेत में जाता।
माँ धान बोते समय गीत गाती:
“धरती माई सोई थी,
बीजों ने उसे जगाया...”
बिरसा पूछता,
“माँ, धरती माई सच में सोती है?”
करमी मुस्कुराती —
“जब लोग उसे चोट पहुँचाते हैं, तब वह चुप हो जाती है।
जब लोग फिर उसे प्यार करते हैं, तब वह जग जाती है।”
वह दिन भर की थकान में भी धरती से बात करती रहती।
उसकी हथेलियाँ फटी हुईं थीं,
पर हर दरार में हरियाली थी।
बिरसा के मन में गहराई से बस गया —
धरती और माँ — दोनों एक हैं।
---
गाँव के बीच आग जलती।
बूढ़ा लाखा मुंडा अपने घुटनों को सहलाता और कहता,
“सुनो बच्चों... जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं है,
ये धरती की साँस है।”
बिरसा उसकी गोद में सिर रख देता।
लाखा कहता —
“पेड़ गिरा, तो हवा रोएगी।
नदी सूखी, तो मछलियाँ नहीं, इंसान भी मरेगा।
इसलिए जो धरती की रक्षा करता है, वही सच्चा योद्धा है।”
लाखा के शब्दों में आग थी,
पर उसकी आवाज़ में करुणा।
उस रात बिरसा ने ठान लिया —
वह जंगल की आवाज़ बनेगा।
फिर बरसात आई।
आसमान से बिजली गिरी,
और धरती ने सीने से बारिश को समेट लिया।
बिरसा मिट्टी पर लेट गया,
बारिश की हर बूंद उसके चेहरे पर गिर रही थी।
वह बोला,
“माई, तू क्यों रो रही है?”
हवा ने उत्तर दिया —
“ये आँसू नहीं, आशीर्वाद हैं।”
वह समझ गया —
कभी-कभी दुःख भी वरदान होता है।
धरती का रोना भी जीवन को जन्म देता है ।
एक सुबह उसने देखा —
पेड़ों पर सैकड़ों पक्षी बैठे हैं।
जैसे सब किसी परिषद में हों।
कौवा, तोता, चील, कोयल — सब एक साथ बोल रहे थे।
वह बैठ गया।
धीरे-धीरे सबकी आवाज़ें एक लय में बदल गईं।
एक कोरस की तरह:
“सुनना सीख, सुनना सीख,
धरती माई देती सीख
सूरज चंदा तारे चिड़ियां
नदी हवा पानी के झरने
आसमान में छाई लाली
खेतों की प्यारी हरियाली
कमल जवा और लाल पलाश
सोंधी मिट्टी नाजुक घास
कोयल के सुर का मीठापन
और कौए की कर्कश चीख
हर कोई देता है सीख
सुनना सीख सुनना सीख
उसने आँखें बंद कीं,
और पहली बार उसे लगा कि वह हर आवाज़ समझ रहा है।
पत्तों की सरसराहट, कीड़ों की भनभनाहट,
सब मानो ज्ञान का संगीत बन गए।
एक दिन गाँव में खबर आई —
अंग्रेज़ लोग जंगल के उस पुराने पेड़ को काटने आए हैं,
जिसके नीचे गाँववाले पूजा करते थे।
लोग भयभीत थे, कोई आगे नहीं बढ़ा।
बिरसा गया।
वह पेड़ के सामने खड़ा हुआ और बोला,
“यह पेड़ केवल लकड़ी नहीं, हमारी साँस है।”
अफसर हँसा।
“साँस? ये तो लकड़ी है!”
बिरसा बोला,
“जब तू इसे काटेगा, तो देखना —
तेरी कुल्हाड़ी तुझसे पहले रोएगी।”
अफसर ने वार किया —
और सचमुच, कुल्हाड़ी का लोहे का सिर उछलकर टूट गया।
लोगों ने कहा, “देवता नाराज़ हैं!”
बिरसा ने कहा, “नहीं, देवता ने चेतावनी दी है।”
पर चेतावनी को अनदेखा कर दिया गया ।
पेड़ काट दिया गया ।
पेड़ रो रहा था ,धरती बेचैन थी । बिरसा गुस्से में था, अंग्रेज हंस रहे थे
--
रात को लाखा ने कहा,
जब कोई धरती की रक्षा करता है,
तो प्रकृति खुद उसकी साथी बन जाती है।”
उसने आग की लपटों में देखा
लाल, नीली, सुनहरी — सब नाच रही थीं।
बिरसा ने महसूस किया —
यह धरती की आत्मा है,
जो रूप बदल-बदलकर उसे सिखा रही है।
उस रात उसे सपना आया।
धरती माई उसके सामने थी
उसके बालों में नदी बह रही थी,
और आँखों में चाँद का प्रतिबिंब था ।
वह बोली,
“तू मेरा बेटा है,
तेरे ऊपर मेरा कर्ज है
और वह कर्ज़ तभी उतरेगा
जब तू मेरी रक्षा करेगा।”
“कैसे, माई?”
“अपने शब्दों से, अपनी कर्म से,
और जब समय आए — अपनी आवाज़ से।”
बिरसा ने हाथ जोड़ लिए।
धरती ने कहा,
“सुन, ये जंगल तेरी पाठशाला है।
तुम यहां से बहुत कुछ सिखा रोज सीखता है
लेकिन अब तुझे सीखा ज्ञान बाँटना होगा।”
बिरसा की नींद खुल गई ,और फिर पूरी रात न आई ।
________
सुबह जब वह उठा,
आसमान साफ़ था, मिट्टी से भाप उठ रही थी।
उसने एक बीज उठाया —
धान का नहीं, सागौन का।
वह खेत में गया,
मिट्टी में गड्ढा किया,
और बोला,
“माई, यह बीज नहीं, वचन है।
जब यह पेड़ बनेगा, तब मैं भी बड़ा हो जाऊँगा।
और जब इसकी छाया फैलेगी,
तब तेरी आवाज़ सब सुनेंगे।”
उसने बीज बो दिया।
और हवा चली —
जैसे धरती ने आशीर्वाद दिया हो।
______
गाँव के लोग कहते —
“बिरसा अब जंगल का विद्वान हो गया है।”
लाखा मुस्कुराता,
“विद्वान नहीं, साधक।
जंगल उसे अब परीक्षा में बुलाएगा।”
और सचमुच,
कहीं दूर, जंगल की गहराई में
लोहे की ठक-ठक की आवाज़ गूँजने लगी थी —
अंग्रेज़ों की कुल्हाड़ियाँ,
कंपनियाँ, ज़मीनों के नक्शे...
धरती ने अपनी आँखें खोल ली थीं,
और उलगुलान का बीज
अब अंकुरित होने लगा था।
---
यह साल का वह महीना था — जब हवा में महुए की गंध होती है और पेड़ों से सफेद फूल झरते हैं।
सुबह की ओस से पत्ते ऐसे चमकते थे जैसे धरती ने खुद मोती बिछा दिए हों।
उलीहातू गाँव के चारों ओर का जंगल अब भी हरियाली से भरा था,
पर वहाँ एक अनकही बेचैनी थी —
जैसे कोई अदृश्य पशु चारों ओर घूम रहा हो।
बूढ़े लाखा अक्सर कहते,
“धरती जब कुछ बड़ा करने वाली होती है,
तो हवा पहले बताती है,
पर जो सुन नहीं पाता, वही हानि उठाता है।”
बिरसा सुनता था —
हर झोंके, हर पत्ते की सरसराहट में उसे कुछ संदेश मिलता था।
कभी हवा कहती, “सावधान रहो।”
कभी नदी फुसफुसाती, “कोई आने वाला है।”
---
और फिर
एक सुबह सूरज से पहले ही
घोड़ों की टापें सुनाई दीं।
पहाड़ी के उस पार से धुआँ उठा।
गाँव के लोग पहाड़ी पर चढ़ गए —
और जो देखा, वह किसी अनहोनी से कम नहीं था।
लोहे की चमकती बंदूकें, लाल पगड़ी वाले सिपाही,
सफ़ेद चेहरे वाले अफ़सर, और उनके पीछे बैलगाड़ियों पर भारी बक्से।
उन बक्सों में नक्शे, तौलने के औज़ार, और लोहे की खूंटियाँ थीं।
एक महाजन चिल्लाया —
> “अब ये जंगल सरकार की ज़मीन है।
पेड़ काटे जाएँगे, सड़क बनेगी,
और तुम सब यहाँ मज़दूरी करोगे।”
गाँववालों के चेहरे सख्त हो गए।
किसी ने नहीं समझा कि सरकार कौन है।
उनके लिए तो धरती ही सरकार थी —
जो अन्न देती, छाया देती, और जीवन देती थी।
लाखा मुंडा लाठी टेकते हुए आगे बढ़े।
“बाबू, ये ज़मीन हमारी माँ है।
अफ़सर हँसा —
“अब ये ज़मीन क्वीन विक्टोरिया की है।”
गाँववाले एक-दूसरे को देखने लगे —
क्वीन विक्टोरिया कौन है?
क्या वह इस जंगल की रानी है?
क्या उसने यहाँ कभी धान बोया?
लाखा ने कहा,
“अगर उसने कभी यहाँ की मिट्टी छुई होती,
तो उसे पता होता कि धरती किसी की दासी नहीं।”
अफ़सर ने कुछ समझा नहीं,
पर उसने एक आदेश दिया —
“इस गाँव के चारों ओर खूंटियाँ गाड़ दो।”
लोहे की खूंटियाँ धरती में गड़ीं —
और हर खूंटी के साथ धरती कराही।
बिरसा वह कराह सुन रहा था ।
---
रात को जब सब सो गए,
बिरसा खेतों में गया।
वहाँ की मिट्टी ठंडी थी, पर उसके नीचे कुछ बेचैन था।
उसने कान लगाकर सुना।
“मेरे बच्चों को बाँट रहे हैं…”
“मेरे पेड़ों को तोड़ रहे हैं…”
“क्या अब कोई है जो मेरी आवाज़ सुने?”
बिरसा ने मुट्ठी भर मिट्टी उठाई और कहा —
“माँ, मैं तेरी आवाज़ सुन रहा हूँ।
जब तक मैं जिंदा हूँ,
कोई तुझे बाँट नहीं सकेगा।”
---
कुछ सप्ताह बाद एक नया आदमी आया —
गले में क्रॉस, हाथ में बाइबल, सिर पर टोपी।
वह बोला,
“मैं तुम्हें नया रास्ता दिखाने आया हूँ।
एक ऐसा ईश्वर जो पेड़ या पत्थर में नहीं,
स्वर्ग में रहता है।”
गाँववाले चकित थे।
“हमारा ईश्वर तो धरती में है,
आकाश में नहीं।”
मिशनरी ने कहा,
“धरती तो सिर्फ़ मिट्टी है।”
बिरसा आगे आया —
“मिट्टी में ही जीवन है,
उसी से हम हैं,
उसी में लौटेंगे।
अगर मिट्टी नहीं, तो तुम भी नहीं।”
मिशनरी चुप हो गया।
वह समझ गया कि यह लड़का किसी किताब से नहीं,
धरती से पढ़ा है।
---
एक दिन मजदूरों का दल आया।
उन्होंने कुल्हाड़ियाँ चलाईं।
साल और सागवान के पेड़ धरती पर गिरे।
जंगल में पक्षियों के झुंड चीखते हुए उड़ गए।
हवा भारी हो गई।
बिरसा दौड़ा और बोला,
“रुको! ये पेड़ हमारे पुरखे हैं।”
अफ़सर हँसा —
“पेड़ पुरखे नहीं होते, लकड़ी होते हैं।”
बिरसा ने अपनी मुट्ठी में मिट्टी लेकर कहा,
“जब तुम्हारे पुरखों की हड्डियाँ मिट्टी बन जाएँगी,
तब ये लकड़ी उन्हें भी ढाँपेगी।”
अफ़सर ने बंदूक उठाई,
पर तभी बिजली आसमान से गिरी —
और उनके पास की खूंटी जल उठी।
लोग बोले,
“धरती माई नाराज़ है।”
---
उस शाम गाँव में आग के चारों ओर सभी जुटे।
बूढ़े, औरतें, बच्चे — सबके चेहरों पर गुस्सा और डर मिला हुआ था।
बिरसा ने कहा,
“हम हथियार नहीं उठाएँगे,
क्योंकि हमारी ताक़त हमारी मिट्टी है।
पर हम चुप भी नहीं रहेंगे।”
औरतों ने गीत गाया —
“धरती माई जाग रे,
लोहे वाले भाग रे,
जंगल तेरा घर है,
तेरी गोद में आग रे।”
गाना जंगल में गूँजा।
पहाड़ों ने प्रतिध्वनि की —
---
रात को बिरसा अकेला जंगल में चला गया।
वह पहाड़ी की चोटी पर बैठा रहा।
सितारे उसके चारों ओर चमक रहे थे।
वह बोला,
“माँ, तू क्यों चुप है?”
अचानक हवा तेज़ चली,
पेड़ों के पत्ते काँपे,
और उसे लगा कि कोई कह रहा है —
“बेटा, अब समय आ गया है।”
वह उठ खड़ा हुआ।
उसकी आँखों में अब डर नहीं,
जंगल की रोशनी थी।
अगली सुबह गाँववाले इकट्ठा हुए।
बिरसा ने मिट्टी अपने माथे पर लगाई।
“धरती मेरी माँ है,
और उसका अपमान मेरा अपमान।”
लोगों ने हाथ उठाए।
“हम लड़ेंगे।”
बूढ़े लाखा बोले,
“हमारे पास बंदूक नहीं।”
बिरसा मुस्कुराया —
“हमारे पास आशीर्वाद है।”
धरती का आशीर्वाद
--
अंग्रेज़ अफ़सरों ने खेतों पर टैक्स लगाया।
कहा —
“जो टैक्स नहीं देगा,
उसकी ज़मीन सरकार ले लेगी।”
गाँववाले बोले,
“हम तो धरती से उगाते हैं,
सरकार को क्या दें?”
सिपाही आए, उन्होंने अनाज लूट लिया।
लोगों ने प्रतिरोध किया।
ढोल बजा,
और पहली बार तीर चले —
धरती की रक्षा के नाम पर।
अंग्रेज़ अफ़सर हैरान थे —
उन्होंने ऐसे विद्रोह की कल्पना नहीं की थी
जिसकी जड़ें मिट्टी में हों।
---
रात को बिरसा को पकड़ लिया गया।
उसे बाँधकर लोहे की गाड़ी में डाल दिया गया।
माँ करमी ने मिट्टी उठाकर उसके पीछे फेंकी —
“धरती तेरे साथ जाएगी, बेटा!”
जेल में भी बिरसा चुप नहीं रहा।
उसने दीवारों से कहा,
“तुम भी धरती की हो,
तुम मेरा साथ दो।”
और दीवारें काँपीं।
झींगुरों ने गीत गाया।
रात में उसने अपने खून से दीवार पर लिखा —
“धरती मेरी माँ है।
मैं उसकी आवाज़ हूँ।”
थोड़े दिनों बाद
जब बिरसा जेल से लौटा,
गाँव बदल चुका था।
लोग उसकी राह देखते थे।
जैसे कोई देवता लौट आया हो।
वह बोला,
“अब धरती की नींद टूट चुकी है।
अब कोई उसे नहीं बाँट सकेगा।”
लोगों ने उसका नाम लिया —
“धरती आबा।”
धरती का पिता।
धरती का बेटा।
धरती की आत्मा।
---_______________
पहाड़ों के ऊपर सुबह की पहली किरण पड़ी।
पेड़ों की शाखाओं पर ओस की बूँदें लटक रहीं थीं —
जैसे धरती की आँखों के आँसू हों,
जो अब मुस्कुराना चाहते हों।
गाँव की हवा में एक गाढ़ी-सी गंध थी —
मिट्टी, धुएँ और बेचैनी की।
लोग अब भी अपनी रोज़ की मेहनत में लगे थे,
पर उनकी चाल में भारीपन था।
महाजन के लोग खेतों में घूमते थे,
अंग्रेज़ी अफ़सरों की निगरानी बढ़ गई थी।
हर झोपड़ी में चिंता थी,
हर माँ के दिल में डर।
और इन्हीं दिनों,
बिरसा पहाड़ की चोटी पर बैठा धरती का दिल सुनता था।
वह कान लगाकर मिट्टी को सुनता,
और मिट्टी उसके भीतर धड़कती थी।
“माँ कहती है — अब चुप नहीं रहना।”
उसके होंठों पर शब्द नहीं,
एक प्रतिज्ञा थी ।
गाँव में सभा बुलाई गई।
लोग ढोल की थाप पर इकट्ठे हुए।
साल के पेड़ों से पत्तियाँ गिर रही थीं,
और चाँदनी से पूरा मैदान सुनहरा था।
बिरसा ने हाथ में मिट्टी की एक मुट्ठी उठाई।
“ये मिट्टी सिर्फ़ ज़मीन नहीं,
ये हमारे पुरखों की हड्डियाँ हैं,
उनका पसीना, उनका विश्वास।”
भीड़ में सन्नाटा था।
फिर उसने कहा —
“जो इसे बेचते हैं,
वो माँ को बेचते हैं।”
किसी बूढ़ी औरत ने काँपती आवाज़ में कहा —
“बेटा, क्या धरती हमें माफ़ करेगी?”
बिरसा की आँखों में नमी थी,
पर स्वर दृढ़ था —
“हाँ, अगर हम अब उसके लिए उठ खड़े हों।”
लोगों ने एक साथ मिट्टी की मुट्ठी उठाई,
और आकाश की ओर फेंकी।
उस रात तारों में भी आग गहरी हो गई थी।
धरती सचमुच जाग रही थी।
रात गहरी थी।
बिरसा अकेला जंगल में गया।
उसने महुए के पेड़ से टिककर आँखें बंद कीं।
धीरे-धीरे उसे लगा कि चारों ओर से आवाज़ें आ रही हैं —
ढोल, गीत, पुरखों की फुसफुसाहट।
“बिरसा… तू उनके लिए जन्मा है…
जो बोल नहीं सकते…”
बिरसा ने सिर झुकाया।
“धरती माई, मैं तेरे बच्चों को जगाऊँगा।”
और उसी क्षण एक बिजली आकाश में गिरी —
जैसे धरती ने उसकी प्रतिज्ञा सुन ली हो।
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अगली सुबह गाँव में हलचल थी।
महाजन का आदमी आया था —
खेत की फसल पर कर माँगने।
बूढ़ा किसान रो पड़ा,
“साहब, ये तो बच्चों के मुँह का अनाज है।”
महाजन ने लाठी उठाई।
इतने में भीड़ जमा हो गई।
बिरसा आगे बढ़ा।
उसकी आँखों में बिजली थी।
“धरती के बच्चे भूखे रहेंगे
और तुम उनका अन्न ले जाओगे?”
महाजन हँसा, “कानून ऐसा है।”
बिरसा ने कहा —
“अब कानून मिट्टी लिखेगी।”
लोगों ने पहली बार प्रतिकार किया।
लाठियाँ टूटीं, ढोल बजे,
और महाजन भाग गया।
उस दिन गाँव में किसी ने कहा —
“धरती आबा ने आग जला दी है।
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लोगों ने खेतों की मिट्टी गूंथी,
झंडे बनाए, और उन्हें बाँस की डाल पर गाड़ दिया।
जब हवा चली,
तो वह झंडा लहराकर बोले
“मैं धरती की आत्मा हूँ।”
बच्चे हँसने लगे,
और बूढ़ों ने कहा —
“आज धरती मुस्कुराई है।”
जंगल-जंगल बिरसा के गीत गूंजने लगे।
ढोलक, मांदर, बाँसुरी और तुरी की आवाज़ें
हर गाँव में फैल गईं
“धरती माई की गोद में हम,
तेरा नाम लिए मर जाएँ हम।
इन गीतों में डर नहीं था,
बल्कि अपनापन था।
लोगों ने महसूस किया —
यह लड़ाई किसी दुश्मन से नहीं,
अन्याय से है।
बिरसा के आंदोलन में महिलाएँ दीवार नहीं,
मजबूत जड़ें बन गईं।
एक माँ ने अपने बेटे से कहा —
“अगर तू धरती के लिए जाएगा,
तो मैं तेरे लिए गीत गाऊँगी,
रोऊँगी नहीं।”
वे जंगल में पत्ते तोड़तीं,
महुए से तेल बनातीं,
और गुप्त संदेश भेजतीं।
उनके गीत अब विद्रोह की भाषा बन गए।
दिन बीतते गए,
पर आंदोलन रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
हर गाँव में सभा, हर पेड़ के नीचे गीत,
हर झोपड़ी में एक प्रतिज्ञा।
अंग्रेज़ों की चौकियाँ काँप उठीं।
अंग्रेज अफसर ने लिखा —
“ये बगावत आग की तरह फैल रही है।
और यह आग गीतों से भड़कती है।”
पर वे यह नहीं समझ पाए —
यह कोई राजनीतिक आग नहीं थी,
यह धरती की आत्मा की लहर थी।
एक दिन खूंटी के पास हज़ारों लोग इकट्ठे हुए।
साल के पेड़ों के नीचे,
मिट्टी के झंडे हाथों में लिए,
और हवा में गूँजता एक स्वर —
“धरती आबा की जय!”
बिरसा ने कहा —
“हम मिट्टी से जन्मे हैं,
मिट्टी में मिल जाएँगे,
लेकिन किसी और के अधीन नहीं रहेंगे।”
भीड़ ने एक साथ कहा —
“धरती हमारी माँ है!”
उस दिन पहाड़ों ने जवाब दिया —
“हाँ!”
बिरसा ने रात को अपने साथियों से कहा —
“अगर हम मर भी जाएँ,
तो धरती हमारे नाम से याद रखी जाएगी।
क्योंकि यह आग बुझने की नहीं,
फैलने की है।”
सबने मिट्टी उठाकर माथे से लगाई।
बिरसा ने कहा —
“यह हमारी प्रार्थना है,
यह हमारा धर्म है।”
ढोल बजा,
मांदर गूँजा,
और हवा में फिर वही शब्द —
“उलगुलान… उलगुलान…”
उस रात जब बारिश हुई,
तो हर बूँद धरती पर गिरकर अंगारे जैसी लगी।
लोगों ने कहा —
“धरती माई आशीर्वाद दे रही है।”
बिरसा ने आकाश की ओर देखा,
और बोला —
“अब यह आग हमारी साँस बन चुकी है।”
वह मुस्कुराया क्योंकि उसे पता था,
अब यह आंदोलन किसी का नहीं,
धरती का अपना है।
बरसात के बाद जंगल जैसे किसी रहस्य में डूब गया था।
नदियों का पानी ठहरा हुआ था,
हवा में धुएँ और कच्ची मिट्टी की मिली-जुली गंध थी।
गाँव के ऊपर आसमान भारी लग रहा था —
जैसे धरती और आकाश के बीच कोई संवाद रुका हो।
लोग कहते थे —
“धरती माई अब बोल नहीं रही।”
पर बुज़ुर्गों को पता था —
धरती जब चुप होती है,
तो वह किसी बड़ी बात के लिए साँस रोकती है।
बिरसा जंगल में अकेला चलता था।
पेड़ों की छाया में, वह मिट्टी को छूता और कान लगाकर सुनता।
उसे लगता, धरती की नसें काँप रही हैं।
“अब समय आ गया है,”
वह बुदबुदाया,
“धरती की साँस को आवाज़ बनाना होगा।”
गाँव की औरतें अब सिर्फ़ रोटियाँ नहीं सेंकती थीं —
वे युद्ध की ऊर्जा पकाती थीं।
वे बच्चों के बाल सँवारतीं,
पर हर बाल में जैसे कोई वचन गूँथ देतीं।
वे खेत में जातीं,
तो हर बीज के साथ प्रार्थना करतीं —
“धरती माई, तू फले,
पर पहले तू आज़ाद हो।”
रात को जब बच्चे सोते,
तो लोरियाँ अब सिर्फ़ नींद नहीं देतीं —
वे जागृति के बीज बोतीं।
“सो जा ललना, धरती जागे,
उसकी छाती पर कोई भागे।
लोरी नहीं, ये पुकार है,
धरती माई का सिंगार है।”
औरतें बच्चों के माथे पर मिट्टी का टीका लगातीं,
जैसे आशीर्वाद नहीं,
बल्कि संघर्ष का संस्कार दे रही हों।
खूंटी के आसपास के जंगलों में अंधेरा अब घना नहीं लगता था।
वहाँ संघर्ष की तैयारी की रोशनी थी।
हर घर में बाँस के तीर बन रहे थे,
हर बच्चे को मांदर की थाप सिखाई जा रही थी।
रात में युवा इकट्ठा होते —
धीरे बोलते, धीरे हँसते,
फिर गंभीर होकर कहते — “बिरसा कहता है, धरती को बेचा नहीं जा सकता।”
और फिर सब मिलकर कहते —
“धरती माई की जय!”
वो शब्द जैसे हवा में दरार डाल देता था।
पेड़ झूम उठते,
और साल के पत्ते सरसराने लगते —
जैसे वे खुद भी प्रतिज्ञा कर रहे हों।
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खूंटी का मैदान उस दिन एक मंदिर बन गया था।
आकाश तारों से सजा था,
जंगल की हवाएँ गूँज रही थीं।
हज़ारों लोग मिट्टी पर बैठे —
बिना सिंहासन, बिना मंच,
क्योंकि धरती ही उनका आसन थी।
बिरसा उठ खड़ा हुआ।
उसकी आँखों में जलते हुए दीप थे।
वह बोला —
“भाइयों-बहनों,
क्या तुम्हें याद है जब धरती ने हमें अनाज दिया,
जब उसने हमें छाँव दी, पानी दिया, जीवन दिया?”
भीड़ से हाँ की आवाज़ गूँजी।
“तो आज अगर कोई कहे कि यह धरती उसकी है,
तो क्या हम अपनी माँ को गुलाम बना देंगे?”
भीड़ ने एक साथ कहा —
“नहीं!”
“अगर कोई कहे कि माँ की गोद खरीदी जा सकती है,
तो क्या हम उस सौदे में शामिल होंगे?”
“नहीं!”
बिरसा ने मिट्टी उठाई और कहा —
“यह मिट्टी हमारी माँ है।
अब जो इस मिट्टी को छुएगा,
उसका उत्तर धरती खुद देगी।”
लोगों ने हाथ उठाए,
मांदर बजने लगे,
और जंगल की हवा में एक शब्द गूंजा —
“उलगुलान!”
धरती काँप उठी,
पेड़ों की शाखें झूमीं,
और चाँदनी में हवा चमकने लगी —
जैसे खुद धरती मुस्कुरा उठी हो।
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सुबह सूरज लाल था।
किसी ने कहा —
“धरती माई ने लाल साड़ी पहन ली है।”
अंग्रेज़ों की फौजें आईं —
घोड़े, बंदूकें, अफ़सर,
और एक हंसी जो अहंकार से भरी थी।
पर उन्हें नहीं पता था कि
उनके सामने कोई सेना नहीं —
एक धरती की आत्मा खड़ी है।
पहली गोली चली।
पहला जवान गिरा।
उसकी माँ दौड़ी,
उसका सिर अपनी गोद में लिया और बोली —
“बेटा, तू मरा नहीं,
तू मिट्टी में लौट गया है।
मिट्टी कभी मरती नहीं।”
उसने बेटे की हथेली में मिट्टी रखी,
और तीर उठाया।-
ढोल बज उठा।
मांदर की थाप तेज़ हो गई।
लोग दौड़े, पेड़ झूमे,
और जंगल ने आवाज़ दी —
“धरती माई की जय!”
बाँस के तीरों ने हवा को चीर दिया,
पत्थरों ने बंदूकों को जवाब दिया।
हर चीख एक गीत बन गई,
हर घाव एक श्लोक।
बिरसा आगे बढ़ा,
उसकी लाठी बिजली की तरह चमकी।
“भाइयों,
आज हमारी मिट्टी हमारी परीक्षा ले रही है।
जो गिरेगा, वह धरती का बीज बनेगा।
जो जिएगा, वह उसकी फसल।”
लोग टूट पड़े।
घोड़े बिखर गए,
फौज पीछे हटी,
जंगल ने रक्त स्नान किया
और लाल हो गया।
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लड़ाई के बाद जंगल चुप था।
कहीं दूर किसी औरत की सिसकी सुनाई दी।
बिरसा घायल साथियों के बीच बैठा था।
एक जवान ने कहा —
“आबा, क्या धरती माई खुश होगी?”
बिरसा मुस्कुराया —
“माँ कभी खुश या दुखी नहीं होती,
वह बस जन्म देती है।
आज उसने नया युग जन्मा है।”
रात के अंधेरे में
वह आकाश की ओर देखता रहा —
जहाँ चाँद धरती पर झुककर
मानो प्रणाम कर रहा था।
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अंग्रेज़ों ने धोखे से बिरसा को पकड़ लिया।
पर जब उसे बाँधा गया,
तो उसकी आँखों में अब भी ज्वाला थी।
रास्ते भर लोग आते गए,
महुए के फूल बरसाते गए।
कोई रोया नहीं,
क्योंकि सब जानते थे —
“धरती माई अपने बेटे को वापस बुला रही है।”
जेल में भी उसने मिट्टी माँगी।
उसने कहा —
“मैं उसे देखना चाहता हूँ,
आखिरी बार।”
उसे थोड़ी मिट्टी दी गई।
उसने उसे माथे से लगाया और कहा —
“धरती माई,
अब तेरा बेटा लौट रहा है।”
जब उसकी मृत्यु की खबर पहुँची,
तो गाँवों में मातम नहीं था।
लोगों ने चूल्हे नहीं जलाए,
पर माँएँ लोरी गा रही थीं —
“धरती आबा सो गया,
नींद नहीं, शांति में खो गया।
उसकी सांसों से खेत हरे,
उसकी गंध से फूल झरे।”
वो लोरी अब गीत बन गई।
गीत लोककथा बना,
और लोककथा इतिहास।
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____राम जनम




